Sunday, 29 November 2015

ज़िन्दगी का खटराग --- 2

दिन गुज़रते हैं फिर भी वक़्त थमा  हुआ सा है.

ये एक अजीब मौसम है, इसमें दिन और रात का हिसाब आपस में गड्डमड्ड सा हो गया है. यहां उत्तरी ध्रुव की लम्बी रौशनियों वाली रातें भी हैं और  महासागर  के अथाह विस्तार जैसे  अनंत तक पसरे हुए दिन भी. कब और कहाँ से दिन की या रात की सीमा रेखा शुरू होती है, इसकी थाह पाना मुश्किल है.   इस मौसम को यहां किसने बुलाया, किसने रोक के रखा है. यहां  समय रबड़ की तरह फ़ैल भी गया है और रेत  की तरह हथेलियों से फिसल भी रहा है, फिर भी नए पुराने दिनों का फर्क पता नहीं चलता है. यहां रोज़ सुबह  चौराहों से कई रास्ते निकलते हैं जो कहीं नहीं पहुँचते बस  एक गोल घेरे जैसा चक्कर काट कर वापिस वहीँ पहुँच जाते हैं जहां से शुरू हुए थे.  यहां से कहीं नहीं जाया जा सकता और कोई कहीं से आ भी नहीं सकता।

घड़ी  की टिक टिक दिन और रात के प्रहर बीतने  की सूचना देती है लेकिन इस मौसम के बीतने के कोई आसार नहीं दिखते। ये एक लम्बी गर्मियों की तरह है जिसमे दिन कभी नहीं ढलता,  दोपहर सुबह से शुरू होकर अँधेरा घिरने के बाद भी कुछ देर तक बनी रहती है और घड़ी लम्बे  पॉज  लेकर चलती है.  और इस गर्म मौसम के पार कोई और मौसम है भी या नहीं इसकी भी कोई खबर नहीं। अक्सर इस थमे हुए दिनों वाले मौसम के लिए उस शख्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिसकी ज़िन्दगी में ये उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के छह छह  महीनो वाला मौसम आकर रुक गया है. पर अक्सर खुद उस शख्स को भी  नहीं होती कि आखिर इतनी तेज़ गति से भागने के बावजूद समय रुका क्यों है ?  अनंत तक फैले हुए ये दिन  किसी झिलमिलाती खुशनुमा साँझ तक  क्यों नहीं पहुँचते ?  यहां  रात को नींद में सपने क्यों नहीं आते ? यहां शाम कब आती है और कितने बजे आती है और कब ख़त्म हो जाती है, इसके बारे में घड़ी देख कर क्यों नहीं पता चलता ?

कलैंडर में तारीखें बदलती हैं लेकिन मौसम नहीं बदलता। दिन बीत जाता है लेकिन वक़्त थमा हुआ ही लगता  है.  उत्तरी रौशनियों के साये और महासागर के गहरे रंग कभी एक नया मौसम बना सकेंगे ? समय का एक नया आयाम ?  दिन और रात का कोई नया हिसाब जो चौबीस घंटो और सात, तीस, बावन, बारह और 365 की गिनती से अलग और घड़ी की पाबंदी से  दूर हो ? 






6 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुती, धन्यबाद।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगवार (01-12-2015) को "वाणी का संधान" (चर्चा अंक-2177) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

निहार रंजन said...

जीवन की अपनी गति और अपना मनमानापन. हम बस देखनेवाले.

पुरानी बस्ती said...

इस रचना के लिए हमारा नमन स्वीकार करें
एक बार हमारे ब्लॉग पुरानीबस्ती पर भी आकर हमें कृतार्थ करें _/\_
http://puraneebastee.blogspot.in/2015/03/pedo-ki-jaat.html

विकेश कुमार बडोला said...

बहुत ही प्राकृतिक जिज्ञासा प्रकट की है। बहुत ही सुन्‍दर।