Wednesday, 30 March 2011

मेरी डायरी का एक गीला पन्ना

आज मैं फिर से रोई ...बहुत दिन बाद....अचानक रोने का मन हो गया, ऐसा नहीं था .. पर जो एक भारी सा पत्थर रखा था मेरे अन्दर , वो बस आज जैसे संभल नहीं पाया ..सुबह से ही आँख में किरकिरी सी थी...शायद पत्थर पिघलना शुरू हो गया था ..पर मैं ही समझ नहीं पाई.. ..  दिन तो जैसे -कैसे गुज़र ही गया ..पर रात घिरते ही जैसे वो बोझ और नहीं उठा सकी और वो एकदम से जैसे  किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह टपक पड़ा ... बस बह निकला,  आँखों के रास्ते ...

पर मैं गलत वक़्त पर रोई ...शाम के वक़्त रोना कोई सही वक़्त तो नहीं है ना...जी हाँ..जब आप चीख कर, चिल्ला कर, जोर से अपने हाथों को पटकते हुए रोना चाहते हैं ..तब हर वक़्त सही वक़्त नहीं होता ....

जब रोई तो लगा कि सब कुछ उलट-पुलट दूं..कुछ तोड़ दूं...कुछ फेंक दूं..कुछ ऐसा कर डालूँ कि जिससे उस  पत्थर का छोटा सा भी टुकड़ा मेरे अन्दर बचा न रह जाए... 

लेकिन घर में ऐसे ..इस तरीके से रो नहीं सकती..क्यों ???...क्योंकि घर में, घर के लोग हैं  जो मुझे रोता  नहीं देख सकेंगे ....कम से कम इस तरह तो नहीं ही देख सकते ..और ना ही मैं अपनी सूजी हुई आँखें उनको दिखा पाउंगी....और अब तक के अनुभव से कह सकती हूँ कि रोने के लिए घर बिलकुल ही गैर-मुनासिब  जगह है..पर अब तक मुझे दुनिया का ऐसा  कोई कोना नहीं मिला है..जहां मैं रोऊँ.. चिल्लाऊं ..तो कोई मुझे ना देखे..ना सुने ...ना आकर पूछे कि क्यों ?..क्या..?...किसलिए ??....ना कहे कि अब बस..बहुत हुआ...बस होने दो ..जो हो रहा है...
 पर दुनिया में ऐसा एक कोना ढूंढना बड़ा मुश्किल है..बहुत कोशिशें कीं ...कि इस पत्थर के पिघलने के लिए कोई महफूज़..दूर..अकेली जगह मिल जाए..कोई ऐसा ज़मीन का टुकड़ा , आसमान का हिस्सा, क्षितिज का नज़ारा ..जहां बस मेरे भर खड़े रहने या बैठने की जगह हो....पर बताया ना  ये  बहुत मुश्किल है.. ..

कोई कह सकता है कि जाओ....अपने दोस्तों के पास जाओ...वहाँ रोओ..वहाँ कोई सवाल या जवाब न होगा.पर मैं कहती हूँ ये भी कोई  तरीका नहीं ..जिन पत्थरों का बोझ हमसे खुद तो   संभल  नहीं रहा, उसे  दूसरों पर भला क्यों लादा जाये....और फिर क्यों बेकार किसी की सहानुभूति के लफ्ज़ सुने जाएँ जो अक्सर उम्मीदों, तसल्ली और स्नेह के आवरण में लिपटे होते हैं..

इसलिए बहुत अरसे से मैंने एक ख़ास, बहुत बढ़िया और कारगर तरीका रोने के लिए ढूंढ निकाला है..मैं रोती  हूँ ..पर बेआवाज़....इतनी ख़ामोशी से कि कभी-२ तो रो लेने के थोड़ी देर  बाद  मुझे खुद भी याद नहीं रहता कि अभी थोड़ी देर पहले मेरी आँखें गीली थीं ...कि मेरी आवाज़ गले में ही अटक गई थी...कि  कुछ देर के लिए मैं खुद में  ही खो गई थी..


पर मैंने कहा ना कि ये बढ़िया तरीका... हमेशा ही काम करे ऐसा कोई ज़रूरी नहीं..कभी कभी आप जोर  से चीखना चाहते हैं ..पर हम है पढ़े-लिखे , समझदार, अक्लमंद , सभ्य किस्म के लोग....ऐसे कैसे गंवारों कि तरह गला फाड़ कर रो सकते हैं. ...आखिर कुछ तो फर्क है ही....उनमे और हममें ...


और इसलिए मैं तो उस दिन भी खुल कर नहीं रो पायी जिस दिन मेरे लिए सचमुच आसमान ही टूटा था....कम से कम उस वक़्त मुझे तो ऐसा ही लगा था..हाँ ये और बात है कि कहने वाले कहेंगे... कि ...ups and down ...raise  and fall ...let  down ...let  go ....तो जब उस वक़्त  गले से आवाज़ ना निकली...  तो अब ही ऐसा कौनसा आसमान सर पर आ पड़ा है..कि एक अकेला कोना ढूंढ निकालने के लिए सड़क पर मुंह उठाये , जिस दिशा  में समझ आये..उस तरफ चल दें हम..

नहीं आसमान नहीं टूटा है...कोई धरती भी नहीं फटी है ना कोई बिजली ही गिरी है....ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है..बस एक पत्थर है..जो पिघल कर निकलना चाहता है...पर उसे  रास्ता नहीं  मिल रहा...इसलिए...इसलिए ....धरती के एक कोने की तलाश है....उस कोने में चाहे आसमान में बादल ना  हो ....चाहे उस धरती के टुकड़े पर हरी घास ना हो...पर हो एक टुकड़ा ज़मीन, कहीं......मिले किसी को तो बताइयेगा..या आपको पहले ही मिल चुका हो तो भी बताइयेगा.. 

12 comments:

rajanikant mishra said...

दुःख उन्छुआ निकल जाता है शब्द घेरों से
रो नहीं सकने पर

दुःख रह जाता है अनकहा

Namisha Sharma said...

marvelous !!

मनीष said...

काफ़ी विवशता है...
पर... आप रोई क्यों?

Bhavana Lalwani said...

..thnks for reading..there could not be any specific reason when ppl cry in such a painful manner.

मनीष said...

but...
if there is no specific reason, then...

'palako ko bhigane ki saza kyu milti hai aur hamesha aankho ko hi moti kyu khona padata hai...?'

js kalra said...

शुभ संध्या मित्र..!!

आज बारी मेरी थी. एक शिशु समान उत्सुकतावश आज मैं घूमते-घुमाते आपके ब्लॉग में चला गया. जिंदगी में पहली बार ख़ामोशी को इतने करीब से कुछ कहते सुना. एक छोटी सी, सिमटी हुई दुनिया से साक्षात्कार हुआ. एक अधूरे, अनसुने सपने की व्याकुलता को महसूस किया. टैगोर जी के व्यक्तित्व का एक अनछुआ अध्याय पढ़ा. रेलवे स्टेशन की अनुपम सैर की. पता किया कि बिन्नी आखिर बिन्नी क्यों है और फिर आखिर में भावना की कुछ भावुक भावनाओं से उसकी डायरी के पन्नों को गीले होते देखा..!!

कुछ प्रश्न उठने स्वाभाविक ही थे. स्वाभाविक था, इसलिए उठे भी. क्या यह मात्र संजोग ही है कि किसी का काम उसके नाम को प्रतिबिंबित करे. यह कैसे संभव हुआ कि किसी की भावनाएं किसी और को उसी स्थान पर आंदोलित करें, उद्वेलित करें जहां पर वो स्वयं हुई थीं. क्या यह भी संजोग है कि किसी की डायरी के कुछ गीले पन्नें किसी और की आँखों में भी अविरल अश्रुधारा का प्रवाह बहा दे..?? पता नहीं क्यों पर आज मैं भी बहुत रोया. फूट फूट के, एक शिशु समान, बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना किसी संकोच के, बिना किसी भय के. समय का कुछ ध्यान नहीं था पर आज अपने दिल पर पड़े कुछ बहुत पुराने, कुछ बहुत भारी पत्थर इस प्रवाह में दूर बहा दिए. पहली बार महसूस हुआ कि आंसू एक कमज़ोरी नहीं अपितु अपनी नींव को सींचने का ही सार्थक साधन है. बहुत दिनों के बाद पता चला कि मैं अभी भी, आज भी इंसान हूँ, जीता जागता, पूरा मशीन नहीं बना. और पता नहीं क्यों, पर आज मैं दिल से, पूरी निष्ठा से, पूरी शुचिता से किसी का धन्यवाद करना चाहता हूँ.

कुछ बहुत ही महान लोग कहते हैं कि अगर हमारे प्रयास से किसी एक भी मनुष्य का भला हो जाए तो हमारा जीवन सफल हो जाता है. आज मैं आपके सफल जीवन को साधुवाद देता हूँ. आशा करता हूँ कि आप को जीवन में बहुत सफलताएं प्राप्त हों...!!!

Bhavana Lalwani said...

@J.S. kalra....pata nahin mujhe kya kahnaa chahiye...thanks a million for all yr appreciation and the way you praised my work. maine jyadatar apne personal experiences ya vichaaron ko apne lekhan mein utaarne ki koshish ki hai...aapko itna pasand aaya iske liye bahut bahut dhanywaad..

Anonymous said...

Just came to visit your blog after your post at RAS exam forum on facebook. I liked this article and prompted me to comment. I realized that I am not the only 'human being' on earth. Every man/woman hasn't stopped being human. Others also feel pain and deep existential pain as me. Keep blogging.

Bhavana Lalwani said...

Thank u very much .. it wud hv been good if u had mentioned yr name in the comment as well so I cud recognize the anonymous reader:)

योगेश वैष्णव "योगी" said...

umda lekhan...

Bhavana Lalwani said...

Thank u Yogesh ji

MS said...

बहुत अच्छा लिखा है :)