Sunday, 8 March 2015

चिट्ठियों के पुल part 1

पहली चिट्ठी 

तुम मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले जाते या तुम खुद ही यहां क्यों नहीं आ जाते ??? मेरा ज़रा भी मन नहीं लगता है.  बताओ… तुम … मुझे पता है कि  तुम क्या कहोगे … यही कि मैं खुद ही चलकर क्यों नहीं आ जाती ....   हर बार तुम्हारा या किसी और का सहारा क्यों ढूंढती हूँ. पर फिर भी मैं ऐसे नहीं आउंगी, यही मेरी ज़िद है सुन लो तुम. क्या तुम मेरे लिए कुछ कदम चल कर नहीं आ सकते ?? कहो, बताओ ज़रा ?? मेरा उन पहाड़ों को देखने का और बर्फ को छूने का और वो जगह है ना वैली ऑफ़ फ्लॉवर्स, वहाँ जाने की बहुत इच्छा है …

तुम खुद तो बड़े मजे से बैठे हो वहाँ और मैं यहां अकेले बोर होती हूँ. तुमको मेरी ज़रा भी फ़िक्र है या नहीं,  यहां आये दिन कोई ना कोई आफत सर पे आ खड़ी होती है, मैं थक गई हूँ हर रोज़ नई  मुसीबत से उलझते जूझते, भाग जाना चाहती हूँ कहीं दूर  जहां खामोश रास्ते दूर तक फैले हो और जहां कोई ना बोले  पर फिर भी मैं सुनती रहूँ।  और अगर भाग सकना सम्भव ना हो तो कम से कम  तुम्हारे साथ के सहारे उन आफतों का बोझ कुछ हल्का लगेगा।  पर लगता नहीं कि  तुमको मेरी इन सब बातों  से कोई फर्क पड़ता है, तुमको ये सब ओवर रोमांटिक किस्म की गॉसिप लगती है.  

हाँ भूल गई, ये मोबाइल और ईमेल के ज़माने में मेरा ये फूलों की प्रिंट वाले  कागज़ पर नीले पेन से तुमको चिट्ठी लिखना भी तो एक ओवर रोमांटिस्म ही है. पता नहीं, तुम लिफ़ाफ़े को खोल के पढोगे भी या नहीं  और पढोगे तो संभाल के रखोगे या यूँही कहीं मेज की दराज में या इधर उधर कहीं कागज़ों के ढेर में रख दोगे  इस ओवर रोमांटिक गॉसिप के टुकड़े को ? अच्छा, चलो रहने दो ये सब फलसफा।  ये बताओ कि तुम कब आ रहे हो ? बड़ा लम्बा इंतज़ार है ये, मीलों तक फैला हुआ इंतज़ार का रेगिस्तान और उसमे एक गुम  हो गई भेड़ की तरह भटकती मैं. बताना, कब आ रहे हो.… ??  

अब तुम कहोगे कि  ये क्या रट लगा रखी है, एक ही सवाल दोहराये जा रही हूँ.  जब आना होगा तब आ ही जाओगे,  यूँ बार बार क्या एक ही बात पूछ कर irritate करना। लेकिन अभी और कुछ तो कहने को सूझ भी नहीं रहा बस तुम्हारी याद आ रही है और उसी से मजबूर होकर ये कागज़ भरे जा रही हूँ. पर फिर वही ओवर रोमांटिस्म … अच्छा ज़रा बताओ कि  कैंडल लाइट डिनर, ग्रीटिंग कार्ड्स में लिखी लाइनें और चॉकलेट बॉक्स का तोहफा  और वैलेंटाइन डे भी तो ओवर रोमांटिस्म ही हैं ना, घिसे पिटे ज़माने के पुराने चोंचले फिर भी उनका खुमार और शौक बना रहता है लोगों में. फिर मेरा ये चिट्ठियां लिखना, पोस्ट बॉक्स तक जाना और चिट्ठी  पोस्ट करना और फिर इंतज़ार करना कि  कब चिठ्ठी अपनी  मंज़िल पर पहुंचेगी कब वो अपने सही मालिक के हाथों में पहुंचेगी और कब उसे पढ़ा जाएगा और फिर कब उसका जवाब आएगा और जवाब किस तरह का होगा ?? फोन के ज़रिये, ईमेल के ज़रिये या व्हाट्सएप्प  में ??  ये सब इतना भी "ओवर" तो नहीं  ??? तुम्हारा क्या ख्याल है ??

हाँ थोड़ा लम्बा और धीमा प्रोसेस है यही ना … अच्छा खैर छोडो, मुझे उन छुट्टियों का इंतज़ार है जो हमने हिमाचल की किसी खूबसूरत घाटी में ट्रैकिंग करते हुए बिताने का प्लान किया था. योज़नायें धरी ही रही, तुम्हे समय ही नहीं मिलता।  ये समय बड़ी अजीब चीज़ है कभी किसी को नहीं मिलता  लेकिन इसके पास सबका हिसाब मौजूद है. समय बेहद रहस्यमय  सा लगता है मुझे, समय के साथ बदलते लोग, उनके विचार और उनके जीवन। ये बदलाव, ये नयापन सब एक अजब रोमांटिक रहस्य लगता है मुझे। एक धुंध में सिमटा समय जो अभी एकदम से धुंध को चीरकर  बाहर आ जाएगा अपने नये चेहरे के साथ.  तुम क्या सोचते हो इस सब के बारे में .... 

ये मैं ना जाने कहाँ की बकवास ले बैठी, चिट्ठी काफी लम्बी हो गई, अच्छा बताना कब आओगे तुम .... तुम्हारा इंतज़ार करते तो अब घडी और कलैंडर भी बोर हो गए हैं.  


दूसरी चिट्ठी 

तुम्हारा जवाब मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगा, अब इस शिकायत  का क्या  तुक है कि चिठ्ठी सीधे ही शुरू हो गई,  ना कोई सम्बोधन ना और कोई फॉर्मेलिटी। तो क्या अब तुमको भी  औपचारिक शब्द लिखने होंगे मुझे ?? खैर, मुझे इसकी आदत नहीं और आदत डालने की इच्छा भी नहीं। और तुमने ये भी कहा कि  अब मुझे स्ट्रांग और समझदार हो जाना चाहिए, बचपने को  छोड़ कर अब बड़ा हो जाना चाहिए। ये तुमने सही पहचाना, मुझसे बड़ा ही तो नहीं हुआ जाता। मेरी किसी भी कल्पना में मैं कभी बड़ी हुई ही नहीं, मैंने पढ़ने, नौकरी करने, दुनिया घूमने, लोगों से मिलने और बहुत सारी  चीज़ों की कल्पना की लेकिन कभी भी बड़े हो जाने और ज़िम्मेदारियों का बोझ उठा लेने की कल्पना नहीं की. और अब तुम कहते हो कि  एकदम से बड़ी हो जाऊं, मैंने सोचा था कि  घर बाहर  की ज़िम्मेदारियाँ हम मिल कर संभालेंगे लेकिन देखती हूँ कि ये ज़िम्मेदारियाँ मेरे अकेले के ही हिस्से आई, तुम तो दूर बैठे मजे ले रहे हो. तुमने वो फिल्म देखी  है "जॉन कार्टर",  तुम्हारे और मेरे बीच की दूरी मुझे "जसूम और बरसूम" के बीच की दूरी जैसी ही लगती है, तुम्हे नहीं लगता ऐसा ??  

वैसे सच बताओ क्या तुमने कभी मेरी जगह पर खुद को रखकर देखा है ? अकेले हर जगह भागते पहुँचते … कभी ये नहीं हुआ तो कभी वो, ये भी ज़रूरी है और वो भी … बस एक मैं हूँ जो ज़रूरी नहीं है. 

अच्छा, छोडो इसे. आजकल बरसात का मौसम है ना तो सफ़ेद लिली में फूल खिलने लगे हैं.  हर रोज़ गमला सफ़ेद पीले  फूलों से खिला रहता है, पर लिली में खुशबू नहीं होती, अजीब बात है ना इतना कोमल और सुन्दर फूल लेकिन खुशबू नाम की भी नहीं। मैंने सुना है कि  उत्तर पूर्वी भारत में ऐसे बहुत से  सुन्दर फूल होते हैं जिनमे खुशबू बिलकुल नहीं होती और हाँ वहाँ कुछ खास किस्म आर्किड और लिली होते हैं. क्यों ना वहीँ कभी घूमने चलें ? बताओ क्या ख्याल है तुम्हारा .... अबकी तुम आओ तो बनाते हैं कोई प्लान, पर पहले तुम आओ तो सही, तुमने अपने आने के बारे में तो कुछ बताया ही नहीं है, ऐसी भी क्या  आफत है. अब तो मुझे झुंझलाहट होने लगी है, लगता है कि  केवल मैं ही तुमसे मिलने के लिए मरी जा रही हूँ और तुमको कोई परवाह ही नहीं। नहीं, इस बात का जवाब देने की ज़रूरत नहीं और ना कोई सफाई मांग रही हूँ मैं. पर फिर भी .... 

अच्छा, अब इस बार मैं लम्बी चिट्ठी नहीं लिख रही.

To Be Continued....

The Second Part of the story is Here

4 comments:

विकेश कुमार बडोला said...

चिट्ठी का जवाब देने की हिम्‍मत लोग कहां बचे हैंं। चिट्ठी का जवाब देने के लिए आदमी को ईमानदार होना जरूरी है। इसके बिना जवाब कैसे सूझेगा?

M'Bai Madrasi said...

I read the second part first and then landed up here. Very emotional, I must say. Especially those english words in between , their usage gives me a totally different feel , awaiting the third part . For me it was sort of unwinding since i read it descending :) loved it

Bhavana Lalwani said...

shukriya vikesh ji .. ek lambe waqt ke baad maine kuchh likha ( janati hun average hi hai) par aapne padha aur apni prtikiriya di mujhe bahut achha laga.

Bhavana Lalwani said...

Hey M'M you made my day,thanks a million dear. yes its an emotion piece of thoughts, dreams and desires. I am glad that you liked both parts. keep encouraging me with your kind words.