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Thursday, 25 September 2025

प्रेम में आकंठ डूबी तरूणी "

प्रेम में आकंठ डूबी तरूणी " यह लाइन मैने बरसों पहले कहीं किसी किस्से कहानी में पढ़ी थी, कहां पढ़ी थी यह अब याद नहीं।  फिल्में, tv सीरियल और अब ये कोरियन, जापानी ड्रामा और सीरीज को देख कर निश्चित रूप से आप कहेंगे कि अरे, यही है इसका अर्थ। यही है इसका विवरण या रूप रंग । 
किंतु इसका अर्थ, इसका व्यवहारिक रूप और असल जिंदगी में इसे देखने समझने की जिज्ञासा कभी पूरी नहीं हुई। कम से कम मुझे अब तक ऐसा चेहरा या ऐसे मुखमंडल या हाल चाल वाली कोई दिखी नहीं । ऐसा नहीं है कि मेरे आस पास के लोगों में प्रेम का अकाल है या मैं कोई नुक्ताचीनी कर रही हूं पर यह जो फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर प्रेम का दरिया तस्वीरों, रीलों, वीडियो क्लिपों में बहे जाता है उसमे वह आकंठ डूबी तरूणी मुझे नहीं दिखती तो नहीं ही दिखती। 
मुझे बढ़िया पोज दिखे, सुंदर चेहरे दिखे, सुंदर बैकग्राउंड और नजारे दिखे, बेहतरीन फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, कपड़े गहने, चश्मे, जूते, बैग सब दिखता है लेकिन प्रेम में आकंठ डूबी तरूणी नहीं दिखी।
पर फिर अभी कुछ ही दिन हुए, हफ्ता दस दिन शायद। मैंने देखा ;  एक साधारण सा घर जिसमे रहने वाले किरायेदार को। वैसे इतने महीने हुए, मेरा कभी भी ध्यान नहीं गया पर एक छुट्टियों के दिन ठाले बैठे मेरी नज़र गई उस लड़की पर । दोपहर है और वह मेन गेट पर खड़ी है, उसके कपड़े भी साधारण हैं, एक  गहरे रंग का प्रिंटेड फिटिंग वाला ट्यूनिक टॉप और उसके साथ ट्राउजर जिनकी कीमत उस रंग प्रिंट से आराम से लग जाती है। गेट के भीतर रस्सी पर ऐसे कुछ कपड़े टंगे हैं, एक तरफ पोछे की बाल्टी रखी है जिस पर पोछा लटका है। 
और इस सब के बीच वह लड़की गेट पर खड़ी मुस्कुरा रही है, धूप तेज है और गेट के ठीक बाहर एक लड़का मोटर साइकिल पर है और बस रवाना होने से पहले वे दोनो कुछ बात कर रहे हैं। मोटर साइकिल ने रफ्तार पकड़ी, लड़की अब भी मुस्कुराती हुई उस दिशा में देखती जाती है और वह मुस्कुराहट कोई साधारण नहीं है। 
यह वही प्रेम में डूबी मुस्कुराहट है। चेहरे से छलकता प्रेम है, भीतर का सुख और आनंद है। वह एक साधारण सा चेहरा, पीछे बंधा जूड़ा नुमा कोई पोनीटेल , मेकअप दिखा नहीं और होने की संभावना भी नहीं दिखी। लेकिन " प्रेम में आकंठ डूबी तरूणी" साक्षात दिख गई। 
फिर उस दिन के बाद मेरा ध्यान उस घर की तरफ अक्सर जाता है। मैं उस तरफ देखती हूं, कभी झाड़ू लग रहा है, कभी कपड़े निचोड़ कर टांगे जा रहे हैं, कभी दरवाजा बंद है। और कभी  दरवाजा खुला है। 
फिर एक शाम , वही दृश्य, मेन गेट है और मोटरसाइकिल है। इस बार मैंने लड़के को भी देखने का विचार किया। हालांकि, सीधा यूं घूर कर देखना बेहद अटपटा और एकदम वह पड़ोस वाली आंटी की तरह दूसरों के घर में  तांक झांक वाला  मामला लगता पर फिर भी यह रिस्क लेते हुए मैने थोड़ा चोर नज़रों से देखा।
एक मझौले कद का, न गोरा न कला बस एक साधारण सा चेहरा जो मोटरसाइकिल के शीशे में अपने बाल ठीक कर रहा था।  
"प्रेम में आकंठ डूबी तरूणी" का जीता जागता उदाहरण गेट पर खड़ा था। चेहरे के वह भाव कौनसे  शब्दों में बांधे जा सकते थे ?  वह साधिकार प्रेम का संतोष,  वह स्नेह में पगी मुस्कुराहट जो एक गाल से दूसरे गाल तक जाती है और मोटरसाइकिल के रवाने होने के बाद भी टाटा करते हाथों के साथ उस दिशा को देखते  हुए, गेट बंद करते हुए भी जैसे चेहरे से जाने का नाम नहीं लेती। 
कौन है ये दोनों ? मुझे पता नहीं । इनका इतिहास, भूगोल, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र कुछ भी नहीं पता। और पता करने की कोई जिज्ञासा भी नहीं जागी। क्योंकि इस समस्त सूचनाओं के पहाड़ पर वह एक नजारा भारी पड़ता मालूम हुआ मुझे। 

Photo Courtesy : Google

Sunday, 6 July 2025

ज़िंदगी की वाशिंग मशीन

वाशिंग मशीन है आपके घर में ? कौनसी वाली ? सेमी ऑटोमैटिक या फुली ऑटोमैटिक ? मेरे घर में अब कुछ वर्ष से फुली ऑटोमैटिक मशीन है , जिसको चलाना सीखने में मुझे कुछ महीने लगे और अब भी कई बार मशीन अटक जाती है, पानी व्यर्थ बह जाता है क्योंकि सेटिंग में कुछ गडबड हो गई।  बार बार पॉज और स्टार्ट का बटन दबाते हैं,  कभी कोई और बटन।
 
जब मशीन में कपड़े ज्यादा डाले जाते हैं कि कम समय और कम पानी के राउंड में ज्यादा कपड़े धुल जाएं ; पर मशीन भी चालाक है। यह पहले कपड़ों को तोलती है, उनका वजन लेती है फिर उस अनुपात में धुलने का समय तय करके टाइमर दिखाती है। माने अगर आप हमारी तरह ऐसे किसी क्षेत्र में रहते हैं जहां पानी की समस्या बनी रहती है तो निश्चित रूप से आप तीन राउंड वाले पानी की सेटिंग का प्रयोग नहीं करना चाहेंगे । बजाय इसके आप कपड़े ही कम कर देंगे।
अब वाशिंग मशीन की अगली कलाकारी देखिए, अगर पानी का लेवल तय सीमा से ज्यादा हो गया तो नहीं चलेगी, अगर कम हो गया तो भी नहीं चलेगी। आप करते रहिए बटन की टिक टिक, यह नहीं चलेगी मतलब नहीं ही चलेगी।  आप एक दो कपड़े बाहर निकलेंगे, यह सोचकर कि क्या मालूम अब चल जाए, अब मशीन में वजन कम हो गया। पर यह फिर भी अटकी ही रहती है। तब तक जब तक कि सभी सेटिंग इसके खुद के मॉड्यूल के हिसाब से सही ना हो। 
थोड़ा सोचिए कि वाशिंग मशीन और हमारा जीवन भी कुछ मिलता जुलता है। कितनी अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और उपेक्षाओं का ढेर हमने भर रखा है मन की टंकी में। प्रतिक्षण किनारे तक भरी हुई और क्षण क्षण रीतती हुई मन की टंकी । इसका पानी का लेवल सही बना रहे इसके लिए अथक प्रयासों का बिलोना करता हमारा शरीर, मन और प्राण। पता ही नहीं चलता , कब पानी ज्यादा भर गया तो मशीन अटक गई, पानी कम पड़ गया है तो भी अटक गए। 
और मजेदार किस्सा ये कि दूसरे के जीवन की टंकी बिलकुल बराबर भरी और सही काम करती दिखती है। बस हमारी ही बार बार अटक रही। 
मशीन की सेटिंग में क्या गड़बड़ है ??? कौन बताए ? 
यह पानी क्या है ? यह वो अपेक्षाएं हैं , आशाओं के झूलते सिरे हैं जो किसी दूसरे तीसरे से जुड़े हैं। और इसलिए अक्सर कम ज्यादा या आधे अधूरे पड़े हैं।  इस पानी के लेवल को बराबर कर सकना अपने मन का होता तो मशीन अटकती ही क्यों ? और अटक ही गई है तो वापिस कैसे चले !!!  
मशीन लोहे स्टील की है, बिजली से चलती है, उसमे कोई एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम सेट है, इसलिए वह चलेगी अपने हिसाब से। हमारा इंसान का हार्डवेयर सॉफ्टवेयर सारा कुछ ही इधर उधर के रस्सियों तारों से अटका है।  यह सॉफ्टवेयर अपने मन का होते हुए भी दूसरे के मन और दूसरे के करने धरने से ज्यादा चलना पसंद करता है। और इसलिए पानी से बनी अपेक्षाएं बनती हैं, बहती हैं और बिगड़ती हैं। फिर अपेक्षा से आगे उपेक्षा वाले स्टेज पर पहुंचते हैं। उपेक्षा भी इसलिए कि सेल्फ रिस्पेक्ट और मान अभिमान का बिलोना करके अब कुछ शेष बचा नहीं। इसलिए कुछ समय उपेक्षा के खारे पानी से काम चला लेते हैं। लेकिन फिर  खारा पानी हमारे मन को भाता कहां है। फिर अपेक्षा का मीठा पानी तलाश करने निकल पड़ता है। 
और यह अपेक्षा, आकांक्षा और उपेक्षा की मशीन ऐसे ही चली चलती है। जब तक अपेक्षा का पानी पूरा भरा रहता है तब तक सारे सॉफ्टवेयर सही हैं जब उपेक्षा का पानी आने लगे तो ,,,,,


Friday, 19 July 2024

कुछ कहा क्या ??

लम्बा अरसा बीता जब मैं अपने ब्लॉग पर लिखा करती थी।  फिर अब अचानक से किसी ने याद दिलाया कि  " आपने अब अपना ब्लॉग डिस्कन्टिन्यूए कर दिया है। " और मैं जैसे नींद से जागी ; मुझे याद आया किस तरह लोग मेरे ब्लॉग पर लिखी हुई चीज़ों से मुझे आंक रहे थे , मुझे तौल रहे थे , मेरे बारे में अपने मुताबिक अनुमान /कयास / कल्पना बना रहे थे।  मेरे फेसबुक वाले ब्लॉग पेज पर लिखी हर बात को तौला और "समझा" जा रहा था। आखिर तब मैंने लिखना ही बंद कर दिया ; ना रहेगा बांस ना बजेगी  बांसुरी। और तब मैंने जाना कि "ना लिखना यानी ना कह पाने के बराबर है " . वह जो रुक गया था वह कीबोर्ड नहीं था , मन का प्रवाह था जिसे दुनियादारी के पैमाने पर बार बार एडजस्ट करने की कसरत चलती रही।  और यह कसरत कभी पूरी ना हुई।  कोई फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सप्प यूट्यूब उस लिखे की जगह ना ले सका। 
और अब याद आता है कि एक ज़माने में एक मित्र था जिसे मेरे ना लिखने की ही परवाह थी जो हर बार एक ही बात चिल्लाता था ; चाहे दो शब्द ही लिखो, चाहे किसी को अपशब्द ही कहो , चाहे कुछ बकवास ही लिखो पर लिखो. क्योंकि यही तुम्हारी आवाज़ है , तुम्हारा आनंद और मन का संगीत है।  
लेकिन तब वह मित्र मुझे "समझ" ना आये और आखिर "अमित्र" हो गए।  यह इस फेसबुक के ज़माने की भाषा है, "unfriend " . 

इन बीते बरसों में कितना कुछ था जो मैं कहीं नहीं कह सकी, किसी को ना कह सकी. अब भी नहीं कह सकती।  तो अब मन के संगीत का प्रवाह और  कीबोर्ड की खटर  पटर  का सामंजस्य बिठा लेने दो।  मैं अपने आस पास हर जगह देखती हूँ , लोग अपने मन की कह ही नहीं पाते ; क्योंकि हर क्षण कोई आपको सुन रहा है पूरी तन्मयता से ताकि आपको judge किया जा सके !!! जाना जा सके आपके बारे और सारे परदे , तहें और आवरण हटा कर देखा जा सके !!!
यहां मित्र कौन है ? मित्र , हितैषी या जिसको आप मान सकें मित्र ??? कोई एक इंसान जिसको आप कह सकें, सुना सकें , जिसके सामने बेपर्दा होने का डर या झिझक ना हो. जो आप पर कोई ठप्पा ना लगाए।  क्योंकि होता यही आया है कि जहां आप "नासमझ" हुए और बोलने कहने को दौड़े आये वहीँ आपको इमोशनली कमज़ोर मान लिए जाने में कोई कमी शेष नहीं रहती।  होने को यह भी हो सकता है कि यह बोल सकने की ख्वाहिश, कह सुन लेने की इच्छा आपको "निरा मूर्ख , दिन भर फुरसतिया और कूढ़ मगज़ " की उपाधि दिलवा दे !!!  होने को क्या नहीं हो सकता ??? 
आप चले थे "दिल का हाल कहे दिल वाला " और लोग कहें कि "अरे अरे यह कौन परेशानी का टोकरा आ गया ? अरे दूर हटाओ , इसकी छाया हमारे नाज़ुक सुख संसार पर ना आये।  
या इतना एक्सट्रीम ना भी जाएँ तो अगर आप उस व्हाट्सप्प वाले सन्देश प्रेरित हो गए कि " गर दिल खोल लिया होता दोस्तों के सामने तो आज,,,,,"   तब !! अच्छा बताइये , क्या सचमुच आपके मित्र हैं ? आपको लगता है कि आपके पास मित्र हैं, साथी हैं , संग बोलने बतियाने को एक ऐसा साथी जिसके दरवाजे पर बापर्दा या बेपर्दा के सवाल नहीं है ??? 
नहीं हैं ना।  
क्योंकि हम एक आदत में ढल गए हैं जहां विश्वास कर पाना और सरलता से मान लेना बेवकूफ होने का प्रमाण है।  हर समय अपने कवच को चाक चौबंद रखना और तीखी नज़र और प्रश्न करता दिमाग , संदेह से देखता दृष्टिकोण ; यह हम हैं।  यहां वही भला है जो या तो पर्दा बनाये रखे या जो परदे के पार की खबर रखे।  "खबर" रखना ही हमारी बैठक है, संगत है , हमारा तरीका है ; शेष सब व्यर्थ बचकाना और बालकों के खेल हैं।  यह बालक आप ही हँसते और आप ही रोते हैं , आप ही रूठते और मान भी जाते  हैं।  इनका यह "रोज का है " .  ना जाने कब आखिरी बार था जब हम सरल मन और सहज बुद्धि थे?  जब हर समय पक्ष विपक्ष का नहीं सोचा जाता था ? जब कोई छिपा हुआ विचार या राय नहीं बनाई जाती थी ? 

और इसीलिए , मेरा भी एक दुनियादारी वाला तजर्बा है कि अपने मन की तहें छिपा के रखिये कि हर इंसान आखिर एक साधारण औसत इंसान ही है।  औसत बुद्धि , औसत विचार श्रृंखला , औसत व्यव्हार और औसत प्रतिक्रिया।  इन औसत वाले इंसानों को दिल के सोने में खोट ढूंढने की इज़ाज़त नहीं दी जा सकती।  गर एक बार यह इज़ाज़त भूलवश दे ही दी तो तुरंत से एक्सेस  डिनाइड कीजिये।  मैं भी अपने मन के हाल अहवाल, हीरे और जवाहरात को औसत दिमाग वालों की महफ़िल का किस्सा नहीं बनने दे पाती।  इसलिए यह ब्लॉग ही साथी है।  
अब शुरुआत के लिए इतनी शिकायतें बहुत हैं।

Tuesday, 15 February 2022

भद्र लोक वाली महिला

"An Exotic Woman, A Delusional Woman, asking for Attention."  This is how I would like to start  my Blabber.


कुछ दो या तीन बरस हुए मुझे मेरे जन्मदिन पर एक नोटबुक तोहफे में मिली, जिसका कवर देखते ही मेरा मन उस पर अटक गया।  और साहब यह लीजिये उस कवर पर जो तमाम तस्वीरों के ठीक बीच में एक ब्लैक एंड वाइट ज़माने की जो दो भद्र लोक वाली महिलाओं की एक क्लिप थी, उसका मैंने आदि से लेकर अंत तक का विश्लेषण कर डाला।  अगर आप कोशिश करें तो उस तस्वीर को गूगल पर भी तलाश कर सकते हैं ; दरअसल उस ज़माने में यानि अँगरेज़ साहबों वाले दिनों में इन्हें "नाच गर्ल्स" कहा जाता था।  आम जनता, रईस, ज़मींदार,  साहब बाबू लोग तवायफ और कंजरी वगैरह कहा करते थे।  तो पूछिए या सोचिये कि आखिर आज मुझको यह क्या फफूंद आन  पड़ी, जो मैं इस अजीब से मुद्दे को यहां घसीटे जा रही हूँ।  दरअसल इस नोटबुक के शुरुआत के पन्नों में पाकीज़ा फिल्म का एक क्लासिक रंगीन पोस्टर है और उस में फिल्म के बारे में तवायफों के बारे में कुछ अंग्रेजी में विवरण वर्णन है. बस वही वर्णनं मुझे क्लिक कर गया।  


यह कहता है, "An Elegant Companion and A Potential Lover, A Glamorous Woman; well versed in poetry, music and dance. And my fellow citizens, this is what a woman would become when she doesn't get married till a certain age. Everybody around her acquaintance, looks at her or treats her as an opportunity to grab for . But Nobody bothers to see her as An Ultimate Choice or An Only Option. What an Irony !!!!!!


लेकिन अब इस एलिगेंट कम्पैनियन की भी एक उम्र है, एक वक़्त है, उस वक़्त की दहलीज के पार ना कोई कम्पैनियन है ना कोई लवर है ना कोई पहचान।  केवल एक कांटेक्ट लिस्ट है मोबाइल में, मुंह चिढ़ाती हुई सी।  ये बताती हुई कि किस कदर फ़िज़ूल लोगों की भीड़ है दुनिया में ; और मोहतरमा आप भी इस फ़िज़ूल भीड़ का ही एक बेहद नामालूम सा हिस्सा हैं। 
अब फैसला करिये कि आपको क्या बनना है ? किसी पैसे वाले का एलिगेंट कम्पैनियन,  या एक delusional ग्लैमरस भद्र लोक की attention  seeker , attention giver !!!! क्या सोच रखा है ?? कहाँ से यह अल्टीमेट चॉइस वाला ख्याली पुलाव दिमाग में घुस गया ? ऐसी भी क्या एलिगेंट या पोटेंशियल हैं ? यहां देखो, गली गली, सड़क चौराहे पर पोटेंशियल वालों की भीड़ लगी है।  

कहीं कोई आपके exotic होने को आपका ध्यान खींचने का तरीका समझ  लेगा तो क्या करियेगा ? क्या जवाब  दीजियेगा ? क्यों अपना ही मजाक बनाने पर तुली हैं !!! कुछ अपने ओहदे का, समाज में जो नाम है उसका ज़रा लिहाज़ करिये।  ज़माने की शराफत से चलिए, किसी दूर पास के  रिश्तेदार के किसी बच्चे पर अपनी करियर की मेहनत वाली कमाई खर्च करिये, उसे अपना वारिस या उत्तराधिकारी मान ही लीजिये।  वह जेवर जो कभी आपके लिए गढवाये थे वह अब किसी रिश्ते की भांजी भतीजी के ब्याह में उसे पहना कर दुनियादारी की तारीफ बटोरिये। क्योंकि अब यही तो तकाजा है दुनिया का।  

Who Am I ; Who Are You ? 
One Whom I like, treats me as a scapegoat. The Another One I like Thinks I am A Delusional Woman asking for Attention; an impossible thing.

P.S. --- This is a Blabber and not a Serious Work. Smile. 




Friday, 29 January 2021

और हम बाकी लोगों का क्या ??

 कहानियां किसके बारे में कही जाती हैं ? कहानियों से क्या आशा की जाती है कि उन्हें हमेश हैप्पी एंडिंग या कोई स्टीरियो टाइप एंडिंग होनी चाहिए ? अनगिनत फिल्में और उपन्यास जो अब तक रचे जा चुके, उनमे हर उस संभावना पर एक विस्तृत कथा है जिसके होने की कहीं एक ज़रा सी भी संभाव्यता है। इस दार्शनिकता से परे क्या कभी कोई कहानी ऐसी भी हो सकती है जिसम कोई एंडिंग नहीं है जिसमे दो तयशुदा किरदार नहीं है ? जिसमे लवस्टोरी नहीं है !! जिसमे हेट स्टोरी भी नहीं है !! जिसमे कोई प्रवचन या आदर्श या बहादुरी की गाथाएं भी नहीं है !!! क्या ऐसी भी कहानी हो सकती है ? ऐसे लोगों की कहानी जो कहानी का किरदार होने लायक माने नहीं गए ?? क्या किसी एक इंसान की भी कोई कहानी  हो सकती है ? 




आओ ज़रा इसे थोड़ी आसान भाषा में समझें, यह फिल्म "The Holiday" मैंने अभी देखी  तो नहीं लेकिन इसके डायलॉग्स का एक इमेज मुझे इंस्टाग्राम पर कहीं दिखा और मैंने इसका स्क्रीन शॉट लेकर इसे रख लिया. यह फ्रेज कहता है कि  " Most love stories are about those people who fall in love with each other. But what about the rest of Us ? what about our story ?"

यह रेस्ट ऑफ़ अस कौन है ? यह वो लोग हैं जिनके पास  Each Other  कह सकने जैसा कुछ नहीं है।  वो सिंगल हैं ? पता नहीं !!! हमेशा से सिंगल हैं ? पता नहीं !!! कभी कोई Each Other  जैसी उनकी कहानी हुई थी ? पता नहीं !!! अब क्या चाहते हैं ? आखिर कुछ चाहते भी हैं या नहीं ?? जब मैंने वनीला कॉफ़ी लिखी थी तब शायद ऐसे ही किसी रेस्ट ऑफ़ अस के बारे में लिखना चाह रही थी मैं ??   "Eternal Sunshine of The Spotless Mind"  इसका भी एक डायलाग है जिसका स्क्रीन  शॉट लिया था मैंने, यह कहता है, "We met at the wrong time. that's what I keep telling myself anyway. Maybe, one day, years from now, we will meet in a coffee shop in  a far away city somewhere and we could give it another shot.


ये सारे अलग अलग टुकड़े हैं जिनको जोड़ कर एक अधूरी या कभी भी शुरू नहीं हुई कहानी को समझा जा सकता है या उसके एक मुकम्मल कहानी हो सकने का गुमान पाला जा सकता है।  एक और फिल्म है, हैनकॉक, विल स्मिथ वाली, जिसमे एक डिनर टेबल पर कन्वर्सेशन चल रहा है और अपने बारे में बताते बताते वो सुपर हीरो कहता है कि  "Nobody was there to Claim me." "Nobody" यह नोबडी का कुछ अर्थ है।  





इसे दुनियादारी के तराजू से देखिये।  एक बाज़ार है इंसानों का, रिश्तों का, सुपर मार्किट की तरह सब कुछ सजा हुआ है, हर कोई डिस्प्ले पर है, हम ही खरीददार हैं और हम ही दुकानदार।  हमने किसी को खरीद लिया या क्लेम  कर लिया। किसी ने हमको ख़रीदा या क्लेम किया। और जब कोई नहीं खरीदता या क्लेम करता तब हम उस ख्याल पर पहुँचते हैं कि  हमारी कहानी का क्या ?? रेस्ट ऑफ़ अस का क्या ??  तब हम खुद को ये बड़ी प्यारी सी तसल्ली देते हैं कि  यह गलत वक़्त था , यह गलत surroundings थी।  जब सही वक़्त होगा, सही सब कुछ होगा तब हम एक कॉफ़ी शॉप में किसी दूर अजनबी जगह पर मिलेंगे, जहां हमको गुज़रे वक़्त का कुछ पता ना होगा और तब हम नए सिरे से, नए शब्दों से, नए तौर तरीकों से फिर से एक शुरुआत करेंगे।  

एक और फिल्म है, "Meet  Joe  Black" . इसमें भी एक दृश्य है कॉफ़ी शॉप का।  यह बेहद दिलचस्प तरीके से फिल्माया गया है, इसकी कलर स्कीम और  किरदारों का ड्रेस अप  बेहद न्यूट्रल रंगों से तैयार किया गया है  लेकिन सुबह की चमकती रौशनी में यह दृश्य बेहद प्रभावी दिखाई देता है।  आप इसे एक टिपिकल हॉलीवुड रोमांटिक स्टोरी वाली फिल्म का वही घिसा पिटा  सा नज़ारा कह सकते हैं लेकिन मुझे ये दृश्य काफी अच्छा लगा। Meet Joe Black Scene

 इसका हर फ्रेम, संवाद आपको एक परी कथा जैसे रोमांस की शुरुआत  का यकीन दिलाता है।  और फिर दुकान से बाहर निकल कर दोनों किरदारों का बार बार मुड़  कर देखना;  यह सब कई बार अनगिनत बार हम हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों में देख चुके हैं लेकिन फिर भी इस नज़ारे को देखना  कभी भी पुराना या बोरिंग नहीं लगता।  इसलिए नहीं कि  यह कोई ओल्ड स्कूल किस्म की चीज़ है, बल्कि इसलिए कि  यह एक स्थापित आदर्श है, एक निश्चित उम्र का; उस उम्र का जिसमे "इमोशंस रन हाई" का नारा  दिया जाता है। यह एक दूर की कौड़ी है उस उम्र की जो ज़िम्मेदारियों और सामाजिकताओं के बंधन तले  दबी है।  यह एक ख्वाहिश है उस उम्र की जो राह तकती है किसी चमत्कार के घटित होने का।  जब कोई मुड़  कर देखे और आवाज़ दे, बुलाये। इसलिए ये दृश्य हमेशा उतना ही जीवंत और गर्माहट भरा रहेगा जितना हमारे दिलों में हिलोरें लेता प्यार।  

अभी  कुछ दिन पहले मैं हॉलीवुड स्टार जॉनी डेप और विनोना रैडर के बारे में पढ़ रही थी।  नब्बे के दशक में जब देश दुनिया रॉक एन  रोल , डिस्को, पॉप, रैप म्यूजिक, मेटालिक म्यूजिक जैसे कई  नई  लहरों से रूबरू हो रही थी, जब जिप्सी और बोहेमियन होना अब भी एक  फैशन था, उस वक़्त में एक 26 साल का  जॉनी था और एक 18 साल की विनोना थी।  और एक किताबों के पन्नों से बाहर निकल आया रोमांस था। जिसमे सब वैसा ही  था जैसा किसी रोमियो जूलियट की कहानी में होता है।   एक कोई सिंड्रेला थी या स्लीपिंग ब्यूटी थी जिसे किसी राजकुमार ने ढूंढ लिया था। एक जादू था जो किसी परियों की रानी के महल की  चमकीली धूल के मन्त्रों से उपजा था।  लेकिन फिर चार  साल बाद जादू आखिरकार टूट गया।  एक हॉलीवुड स्टार  होना भी उस जादू को, उस कहानी को बचा नहीं पाया। इस कहानी ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया और फिर मैंने इससे जुडी हर खबर ढूंढ कर पढ़ी। उन दोनों के ज़िंदगियों में बाद के दिनों  के उतार चढ़ाव, सब पढ़ डाला   और आखिर कार इतना ही समझ आया कि, कहानी मुकम्मल होने के लिए  रुतबा, पैसा, प्रसिद्धि, स्वच्छंदता कुछ भी ज़रूरी नहीं। ज़रूरी सिर्फ इतना है कि कहानी हो, कोई क्लेम हो !! एक उम्मीद हो किसी दूर अनजान स्टेशन के कॉफ़ी शॉप पर दोबारा मिलने का एक बहाना हो।  रास्ते हों, रास्ते दिखें और रास्ते पर चलते जाने को एक कारण ज़रूर हो।  
अब इस वक़्त यह सब लिखते हुए एक और ख्याल आया कि यह तो एक ब्लॉग है जो इतना  आसानी से इस मुद्दे पर लिख पा रही हूँ, यदि कहीं ऐसी दो  लाइन कहीं फेसबुक पर लिख डाली होती तो  लोग सवाल जवाब का पूरा  संसार ही रच डालते।  यह रचनात्मक स्वतंत्रता इंसान को कुछ कोना उपलब्ध करवा देती है अपनी बात  कहने का। यह सोशल मीडिया के ज़रिये पिछले दो तीन दशकों से इंसान को जितने ज्यादा प्लेटफार्म मिले खुद को अभिव्यक्त कर सकने के या अपनी बात को दूर तक पहुंचा सकने के, उतना ही ज्यादा सिमट गया कही गई बातों का अर्थ। जब आप कह कुछ रहे हैं, सोच कुछ रहे हैं और लोग उसके अनेक अर्थ अनर्थ  किये जाते हैं। इसलिए कभी भी इस मुद्दे पर लिखने के लिए विचारों का तारतम्य बैठ ही नहीं पाया।  लेकिन इस बार यह रेस्ट ऑफ़ अस एक अजब ही सवाल बन कर आ गया।  

 जब दुनिया की हर चीज़ टेम्पररी हो चली  है, वायरल सेंसेशन की तरह सिर्फ कुछ घंटे या दिन का मामला रहा तब भी इंसान तलाश कर रहा है कि व्हाट अबाउट रेस्ट ऑफ़ अस ??? जब कहीं कोई अतिमानव भी यही पूछ रहा है कि No Claim ?? इन अधूरी छूटती जा रही कहानियों को पूरा होना चाहिए या नहीं !!!  या कहानी जैसा कुछ वहम  पाल रखा है लोगों ने ? क्योंकि यह सारा दिन फिल्म, टीवी, अख़बार, मैगज़ीन कुछ बाजार में बिक सकने लायक एक प्रेम कथा  के फॉर्मूले को हमें दिन रात सुनाते बताते रहते हैं तो हम लोग यह गुमान पाल कर बैठ जाते हैं कि लो हमारी कहानी क्यों ना हुई ?? क्या कहानियां सबके लिए नहीं लिखी रची जातीं ?? यहां मिनट मिनट पर कोई कहानी बताई जा रही है, इंस्टाग्राम भरा पड़ा है, अनेकों ख़ास आम कहानियों से, जिनके पीछे गहने, कपडे, मेकअप, लोकेशन डेस्टिनेशंस, बढ़िया खाना  और जूते बैग तक बिकने की आस में कहानियों का हिस्सा बन रहे हैं।  तब  इंसान पूछता है कि  हमारी कहानी क्यों नहीं लिखी जा रही ? ? क्या यह बिकने लायक या कहीं फोटो कैप्शन होने लायक कहानी नहीं हो सकेगी ?? 

Claims are not necessary !!! Romance is  a short time flick !!! There is no Dream Fairy tale story !!! 

Image Courtesy : Google 

Wednesday, 1 April 2020

मूर्ख होने का विज्ञान 

फिल्में देखने का शौक फिर से जागा है और इसलिए रोज की एक फिल्म  देखने पर कमर बाँध रखी है।  और उसमे भी  sci  fi  और fantasy  वाली फिल्में मुझे ज्यादा पसंद हैं।  तो इसी जोश के चलते इंटरस्टेलर,  एड अस्त्रा और क्रिस्टोफर रोबिन समेत कुछ फिल्में देखीं और फिर विचारों का रेला चल निकला।  

आदमी को कितना दूर जाना पड़ता है, कहीं पास पहुँचने के लिए ?  कितने  सौ या हज़ार किलोमीटर चलना या दौड़ना पड़ता है ? जिस दीवार और छत से बाहर निकल कर आदमी चलना शुरू करता है अंतत: वहीँ  वपिस लौट आता है या लौट आने को उसका इरादा और मजबूत होता जाता है।  यानी जितना ही दूर गए उतना ही वापिस आने की इच्छा ज़ोर होती गई।  यह  गोरखधंधा ही सारे एक्सपेडिशन्स या एडवेंचर्स की जड़ है !!! 
ये सवाल मुझे इसलिए सूझ रहा है कि  आज अप्रैल फूल का दिन है , मूर्ख दिवस !!! याद होगा हम सबको कि  कैसे एक  ज़माने में इस दिन का हफ्ता भर पहले से इंतज़ार होता था और योजनाएं बनाई जाती थीं कि  कैसे अपने पडोसी, रिश्तेदार या मित्रों को "फूल" बनाया जाए. कैसे लोग बड़ी सावधानी बरता करते थे।  साबुन के टुकड़ों को टॉफ़ी चॉकलेट के रैपर में लपेट के डब्बे में रख के दिया जाता था , नकली फल थैले  में रख के दिए जाते थे, लड्डू में लाल मिर्च भरी  जाती थी, चाय में नमक या मिर्च कुछ मिलाया जाता था।  यही तो मनोरंजन था उस  वक़्त जब मोबाइल नहीं था , कंप्यूटर भी नहीं था।  

तो अब अप्रैल फूल इसमें आने जाने की कथा में कैसे जुड़ गया ??  ऐसे जुड़ा कि इंटरस्टेलर  और एड अस्त्रा  एक ऐसे वक़्त की कथा सुना  रही हैं जब दुनिया के पास तकनीक तो ऊँचे से ऊँचे दर्जे की होगी पर मजबूरियां भी उतनी ही ऊँची होगी।  कभी धरती का बैलेंस बिगड़ा होगा तो कभी आसमान आग बरसायेगा।  और इसलिए मानव का नाम और निशान बचाये रखने की खातिर अंतिम सीमा के परे इंसान को जाना होगा।  आज जिस चीज़ पर हम विश्वास नहीं कर सकते कि  ऐसा कोई तकनीक हो  सकती है या ऐसी भी कभी परिस्थिति हो सकेगी ?!!! यह सोचना या मानना भी मूर्ख हो सकने का प्रमाण माना  जा सकता है।  लेकिन ये फिल्में कहती हैं की ऐसा हो क्यों नहीं सकता ?? यह "क्यों "  सवाल ही अंतर है मूर्ख और समझदार के बीच।  कल्पना ही तो करनी है कि  ऐसा कुछ  अघट  भी  घट  सकता है धरती पर !!!! कोरोना ने हमें समझाया कि  हाँ हो सकता है,  इंसान अपने घर में  बंद रहने को मजबूर हो सकता है. वो सारी  फिल्में जो आपने देखीं  जिसमे ज़ोंबी, वायरस , एलियन  और अलाना और फलाना थे वो सब हो सकता है। यहां आकर समझदारी और मूर्खता के किरदार बदल  जाते है। क्रिस्टोफर रोबिन देखते वक़्त भी यही ख्याल आया कि  हंड्रेड एकर वुड्स की तरफ जो रास्ता और दरवाजा  जिस पेड़ की खोह से होकर खुलता है, उस पेड़ और उस दरवाजे को देख पाना किसी समझदार के बस की बात नहीं।  इसे देखने के लिए  आपको विश्वास की और खाली कोरे दिमाग की ज़रूरत है। जहां तर्क और  स्थापित ज्ञान  रुकने को कहता है, वहाँ से एक दरवाजा खुलता है जो एक ऐसी दुनिया में जाता है जहां तर्क की कोई खास जगह नहीं है, जहां बुद्धि केवल नाप तौल और ऊँचा नीचे का साधन नहीं हैं, जहां नफा और नुकसान का कायदा भी नहीं है।  

क्रिस्टोफर रोबिन में में एक दृश्य है, जब पूह और उसके साथी लंदन जा रहे हैं तब पिगलेट रुकता है और झिझक रहा है जाने से, तब पूह कहता है,  कि  पिगलेट हमें वहाँ तुम्हरी ज़रूरत होगी, हमें हमेशा तुम्हारी ज़रूरत होगी। और तब पिगलेट थोड़ा खुश सा होता हुआ  अभी भी डरता हुआ सा कहता है, अच्छा ज़रूरत है मेरी ; ठीक है तो फिर चलो।  ये पिगलेट हम सब हैं ;  किसी ऐसे विन्नी the  पूह  की उस आवाज़ की ज़रूरत है जो ये कहे कि  हमें तुम्हारी ज़रूरत हमेशा होगी।  क्योंकि आदमी अकेला नहीं रह सकता इसलिए ये जो जगह जगह छोटे झुण्ड और ग्रुप से दिखते  हैं ना गली , मोहल्ले, दफ्तर , बाजार  सब जगह पर, ये सब पिगलेट और पूह  के संवाद का  ही पसारा  है।  कोई नहीं चाहता कि उसे मूर्ख समझा जाए या "फूल" बना दिया जाए या "फूल" माना जाए ;  और खुद को "फूल" कहलाने से बचाने के लिए ही पूह चाहिए जो  खुद को मूर्ख मान ले  और आपको बुद्धिमान होने का अहसास दिलाये। 
भला खिलोने भी बोल सकते हैं या आपकी तलाश में आपको ढूंढते हुए आप  तक पहुँच सकते हैं  ?? कोई समझदारी इसे स्वीकार नहीं कर सकती लेकिन कल्पना की दुनिया में ये हो  सकता है।  एक सपाट कोरी स्लेट की दुनिया में ये हो सकता है।  

  इंटरस्टेलर  में एक दृश्य है जिसमे कूपर  ब्रह्माण्ड के आखिरी संभव कोने तक जाकर फिर एक पांच आयामी  संसार के ज़रिये  अपनी बेटी के कमरे में पहुँचता है और तब वो कहता है कि  समय  और समाधान  दोनों हमेशा से इस छोटी लड़की के कमरे में मौजूद थे।  यह ग्रेविटी की विसंगति और  कुछ नहीं केवल एक संकेतक थी किसी के यहां होने की जो उसी समय कहीं और भी है।  एस्ट्रोफिजिक्स की यह भाषा और  सिंद्धांत सुनते देखते समय एक आम दर्शक अचंभित होता है और उसकी बुद्धि बिना सवाल किये  केवल स्वीकार करती है कि  जो कहा जा रहा है वह सही सत्य है।  तब हम अपने समझदारी के लबादे को भूल जाते हैं क्योंकि आखिरकार  मनोरंजन के लिए  सिनेमा देख रहे  हैं,  हमने टिकट ख़रीदा, पैसे दिए हैं।  उस समय अपने को मूर्ख मानने या अज्ञानी मानने में हमें झिझक नहीं होती क्योंकि तब हम एक बड़ी भीड़ में शामिल हैं।  जब सारे अज्ञानी हैं तो हम कौनसे अलग हैं !!!!!   



फिर ख्याल आया कि  नई  समझदारी जो  सितारों के पार जाने की बात कहती है वही समझदारी याद  दिलाती है कि  इंसान  सिर्फ एक वल्नरेबल  बीइंग है।  ह्यूमन बीइंग।  एड अस्त्रा में एक दृश्य है जहां ब्रैड पिट Neptun के दो  महीने के सफर पर अकेला जा रहा है तब वो कहता है कि  मैं हमेशा सोचता था कि  मुझे अकेला रहना पसंद है लेकिन ऐसा नहीं है और वो रोता है  अपने अकेले होने के  ख्याल पर। इसी  फिल्म का एक और दृश्य है लगभग आखिरी दृश्य जहां  लीमा प्रोजेक्ट के स्टेशन से निकल कर स्पेस वाक करते हुए उसे अपने शटल में वापिस जाना है ; उसके सामने  और कुछ नहीं का विस्तार है ;  अँधेरे में चमकता ब्रह्माण्ड  और उस शून्य में एक अकेला आदमी ; यहां अस्तित्व है कोई नहीं के होने का ; कोई भी नहीं  केवल आप हैं और आपकी मूर्खता या समझदारी जो भी गठरी आप उठा के लाये हैं।  

 एक और  दृश्य है जहां वो मंगल पर पहुंचा है और कहता है कि  ये मैं कहाँ जा रहा हूँ ? सूर्य से दूर, रौशनी से दूर, धरती से दूर।  यह धरती से दूरी है जो इंसान बरसों में, उम्र के साल के हिसाब से और समय के धीमे या तेज़ होने के हिसाब से  नापता है।  इंटरस्टेलर में कूपर  नई  दुनिया की खोज में इसलिए निकला है कि  अपने बच्चों  को , सबको  इस नष्ट होते ग्रह  से निकाल कर ले जाए एक हरे भरे संसार में जहां आदमी फिर से दुनिया बसाएगा।  और इसलिए वे लोग एक मिनट एक घंटा सब कुछ नाप रहे हैं ; 124 साल का कूपर आखिर लौटता है धरती पर  फिर से  उस दुनिया तक पहुँचने के लिए जहां इंसान के लिए एक नई  दुनिया बस रही  है।  

एक और फिल्म देखी , "सर्चिंग ",  हमारे पास महँगी टेक्नोलॉजी वाले बढ़िया गैजेट हैं , हम नियमित फेस टाइम और texting  करते हैं लेकिन हम आमने सामने बात नहीं कर पाते. जितनी ऊर्जा टाइप करने और वीडियो कॉल में लगाते हैं  उतना तो किसी को जाकर मिलने या बतियाने में भी नहीं लगाते।  ये  बेहद दक्ष तकनीक आपके कब कहाँ होने को एक सेकंड में बता देती है।  आपकी ब्राउज़िंग हिस्ट्री आपके बहुत से गतिविधियों को बता देती है।  कब किस से क्या बात की। .. सब रिकॉर्ड है यहां साइबर स्पेस में , बस नहीं है तो इंसान के पास असल ज़िन्दगी में कोई नहीं  है जिस  से बात की जाए बिना झिझके बिना डरे , बिना कुछ फ़िक्र चिंता कि  कहीं ये मुझे मूर्ख  ना समझ ले !! कहीं मुझ पर मूर्ख होने का लेबल ना लग जाए; इसलिए हम भागते फिरते हैं पिगलेट होने के लिए।  आदमी की तलाश में तकनीक बेहद मददगार है लेकिन जब वो आदमी आपके सामने है आस पास कहीं बैठा है तब उसके पास आप  क्यों नहीं गए ??? इस फिल्म का एक दृश्य है जहां मार्गोट की तलाश का ट्रेंड हैश टैग twitter पर चल रहा है , यूट्यूब पर वीडियो हैश टैग किये जा रहे हैं वो साथ पढ़ने वाले जिन्होंने कभी उसके साथ बैठ  कर खाना भी नहीं  खाया वे लोग बड़ी ही इमोशनल पोस्ट इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर अपलोड करते हैं कैप्शंस देते हैं।  उस लड़की को हर कोई याद कर रहा है और आंसू बहती फोटो अपलोड कर  रहा है जिसको कभी उन्होंने शायद क्लास में देखा भी नहीं होगा  या अनदेखा कर दिया होगा।  न्यूज़ चैनल को एक दिलचस्प खबर मिली हुई है जिसके दर्शक हैं और बाजार को एक मुद्दा मिला  हुआ है जिसे एन  कैश  किया जा सकता है।  

और अब मूर्ख दिवस की शुभकामनायें  
 



Image Courtesy : Google

Wednesday, 25 September 2019

old school charm

मुझे यात्राओं का कोई बहुत ज्यादा मौका नहीं मिला है; पुराने ज़माने के लोगों की तरह मेरी यात्रा भी छुट्टियों में ननिहाल जाने या बहुत हुआ तो किसी और रिश्तेदार के यहां जाने तक का एक सीमित अनुभव है ।  पर इस सीमित यात्रा में भी जो कभी रोडवेज की बस से और कभी भारतीय रेल से की गई; उसमे कुछ जगहें  ऐसी हैं कि उनको देख कर या याद कर के आप किसी और ही  संसार में पहुँच जाते हैं।  यह एक तरह से हमारा देसी नार्निया वाला छोटा मोटा अनुभव है। बस से आते जाते वक़्त कुछ तयशुदा जगहों पर हाल्ट होता था और ट्रेन तो खैर अपने आप में एक हाल्ट स्टेशन है जो निरंतर चलायमान रहता है। अब ये तय जगहें ही आदमी का एक परिचित आकर्षण बन जाती हैं; यहां चाय पिएंगे, यहां कचौड़ी या लस्सी बढ़िया मिलती है, यहां का दहीबड़ा नहीं खाया तो फिर यात्रा का आनंद ही क्या रहा !!! उन्ही तयशुदा  जगहों की यात्रा  में भी हर बार रास्ता कुछ नया ही लगता है; कुछ स्वाद, कुछ पहचान के पत्थर और कुछ स्मृति के चिह्न। 

कोई चीज़ कितनी पुरानी हो सकती है ?  या पुरानी होते हुए भी उसका ओल्ड स्कूल चार्म बना रह सकता है क्या ?  ये ओल्ड स्कूल किसको कहते हैं ? शायद पुराने ज़माने से चिपके रहने की आदत को ?? 

बहरहाल, अभी पिछले कुछ वक़्त से हाईवे के होटल, गेस्ट हाउस, मिडवे रेस्टॉरेंट को देखते देखते यह ओल्ड स्कूल जैसा कुछ जाग गया।  अजमेर जोधपुर हाईवे पर बना "बर" का मिडवे।  जहां का कटलेट और  इडली सांभर, ऑमलेट ब्रेड और चाय  जिसके लिए हम पूरे रास्ते इंतज़ार करते थे बर पहुँचने का ।  कटलेट होता कुछ नहीं है सिर्फ आलू बेसन की एक बड़ी सी टिकिया, पर यही टिकिया उस मिडवे का बड़ा आकर्षण थी।  इडली सांभर और नारियल की चटनी हर वक़्त ताज़ी मिलती थी। खैर, खाना  वहाँ आज भी ताजा ही मिलता है।  यह चमत्कार कभी समझ नहीं आया कि हर चीज़ उस बियाबान में इतनी फ्रेश और स्वादिष्ट कैसे है ?  और वहाँ की वो छोटी सी knick  knacks  बेचने वाली दुकान;  जहां से कई बार काफी कुछ ख़रीदा. अब वो काउंटर नुमा दुकान अपनी पुरानी चमक की परछाई जैसी कुछ बची है.  मिडवे की इमारत  भी जैसे कोई पुराना  सरकारी गेस्ट हाउस; उभरे हुए सफ़ेद भूरे रंग के पत्थरों की बाहरी दीवारें जिन पर वक़्त  और मौसम की मार से अब काई जमने लगी है. सामने गेट से आता हुआ एक खुला लम्बा रास्ता और इतना बड़ा कंपाउंड कि  जहां दो तीन बसें आराम से खड़ी  रह सकती हैं।  यह इमारत भी एक हिस्सा है नास्टैल्जिया का; बीते समय के फ्रेम का।  बारिश के मौसम में यहां अक्सर सब कुछ भीगा हुआ दीखता है.  इमारत की बाहरी दीवारें, कंक्रीट की सड़क वाला रास्ता और सारे पेड़ पौधे ।  ऐसा लगता है कि बरसात बस अभी ही हुई है ।  अक्सर मुझे ऐसा वहम होता है कि बरसात का मौसम इस जगह पर हमेशा के लिए थमा हुआ है । इस जगह को देखकर लगता था  कि जैसे कोई कोलोनियल ज़माने का  गेस्ट हाउस जो किसी दूर दराज  हिल स्टेशन पर बसा है । निर्मल वर्मा के उपन्यासों के हिल स्टेशन और कॉटेज हाउस का नक़्शा शायद ऐसा ही कुछ होता होगा !!! ( रेगिस्तान के पश्चिमी कोने पर बसे  शहर के लिए ये बरसात का मौसम वाला हाईवे का ये अर्ध सरकारी मिड वे  होटल ही हिल स्टेशन जैसा मालूम होता है )

इस मिडवे को देख कर हमेशा हिल स्टेशन  जैसा क्यों  महसूस होता था, इसका  कारण तो नहीं पता पर शायद आस पास मध्य अरावली के पहाड़ है, जिनके कारण यहां काफी हरियाली है और बरसात में इस हाईवे पर और पहाड़ों पर धुंध और बादलों का डेरा रहता ही है ।  सफ़ेद रुई जैसे बादल  पहाड़ो पर ही उतर आते हैं, पहाड़ का ऊपरी हिस्सा इन बादलों से अक्सर ढका हुआ ही दिखता है।  बारिश ऐसी जम कर होती है कि हाईवे पर विजिबिलिटी ही ख़त्म हो जाती है , केवल गाड़ियों की हेड और टेल लाइट्स की रौशनी के धब्बे  पानी के धुंधले बहाव में दिखाई देते हैं। 

RTDC  के राजस्थान भर में फैले हुए होटल्स का भी ऐसा ही किस्सा है।  पुरानी लेकिन मजबूत इमारत । बाहर से और भीतर से ।  बाहर एक बड़ा खुला बगीचा जिसमे एक फाउंटेन लगा होता है,लोहे  की कुर्सियां और टेबल पड़ी रहती हैं जहां बैठ कर ओपन एयर ब्रेकफास्ट या लंच का आनंद लिया जा सकता है।  एक बड़ा सा कंपाउंड  या अहाता जहां गाड़ियों की पार्किंग बेहद आराम से की जा सकती है।  इन होटल्स को देख कर लगता है कि इनको बनाने की प्रेरणा पुराने ज़माने के सरकरी डाक बंगले या रेस्ट हाउस वगैरह से मिली होगी जिनको सरकारी अफसरों के लिए बनाया जाता था।  लकड़ी का भारी फर्नीचर जिस पर सादी लेकिन एलिगेंट नक्काशी या डिज़ाइन होती है।  कमरे और लाउंज का इंटीरियर साधारण ही होता है; राजस्थानी पेंटिंग्स जो दीवारों  के खालीपन को भरने की कोशिश करती हैं ।  जो सबसे  आकर्षित करने वाली चीज़ है, वो  है कमरों का साइज़।  खुले, हवादार कमरे जिसमे  एक डबल बेड  या तीन बेड  और भारी  कुर्सियां, मेज़ और ड्रेसिंग टेबल रखी होने के बावजूद कहीं से भी बंद जैसा नहीं लगता।  बाथरूम्स में सारी आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। चमक दमक तो नहीं है पर आराम और तसल्ली पूरी है।

अब जब हाईवे और होटल का किस्सा निकला ही है तो एक पुराना किस्सा उदयपुर हाईवे का याद आ रहा है जिसे लिखे बिना मन नहीं मान रहा। 

फाउंडेशन कोर्स की ट्रेनिंग के दिनों में एक बार अपने कुछ batchmates के साथ उदयपुर से घर जाने के लिए बस में रवाना हुए।  दोपहर को १२:३० बजे रवानगी का समय था लेकिन कुछ हमारा आलस और कुछ बस चलाने वाले की दरियादिली कि बस आखिर कर १:३० पर  रवाना हुई।  हमने जल्दबाजी के चलते हॉस्टल से टिफ़िन भी नहीं लिया और अब खाने का वक़्त था।  बस वाले ने अपना शुरूआती हाल्ट शहर के बाहर हाईवे पर कतार में बने ढाबों और दुकानों के सामने  किया, इस  उद्घोषणा के साथ कि पंद्रह मिनट यहां रुकेंगे।  मैं और मेरी सहेली बस से उतरे ये सोच कर कि रास्ते के लिए चिप्स नमकीन खरीद लिए जाएँ।  लेकिन सामने एक ढाबा देख कर विचार बदल गया।  अपने एक साथी को चिप्स बिस्कुट और माज़ा की बोतल लाने का आदेश देकर हम दोनों ढाबे में घुसे।  दुकान बिलकुल खाली थी, एक भी ग्राहक उस वक़्त तक नहीं था । जाते  ही सवाल दागा, थाली का क्या रेट है और उसमे क्या क्या मिलेगा ? जवाब भी तुरंत था, चार रोटी, चावल, दाल, सब्ज़ी, दही ; दुबारा कुछ नहीं मिलेगा उसके एक्स्ट्रा पैसे लगेंगे वैसे थाली का रेट साठ  रुपया बताया।  सुनते ही तुरंत गुप्त  मंत्रणा हुई।  आदेश हुआ, फटाफट एक थाली लगा दो जिसमे चावल के बजाय एक कटोरी दही एक्स्ट्रा कर दो और सब्ज़ी भी नहीं चाहिए उसके बजाय दाल एक्स्ट्रा दे दो।  और खाना कितनी देर में लगा दोगे  या पैक कर दो ? कितना टाइम लगेगा ? पांच सात  मिनट में कर दोगे ? ढाबे वाले ने अजीब ढंग से हम जीन्स कुरता स्पोर्ट्स शू धारित प्राणियों को घूरा और कहा, बैठो तो अभी लगा देंगे थाली।  हम दोनों एक कुर्सी टेबल घेर के बैठ गए।

सचमुच तुरंत बैठते ही थाली आ गई और हम लोग हड़बड़ हड़बड़ करते खाना शुरू हुए।  उसी लम्हे हम दोनों लापता को ढूंढ़ते  वही batchmate  आया जिसको चिप्स बिस्कुट लाने भेजा था।  उसका रिएक्शन ऐसा था कि ये कौन भुक्खड़ है जिनकी सूरत तो ...… ख़ैर, सवाल  जवाब हुए ; तय हुआ कि भूख तो सबको लगी है, थाली का दाम वाजिब है, हम  भी यहीं खाएंगे और बस वाले को रुकने का कह देते हैं वैसे भी बस में हमारी २० लोगो की बारात के अलावा और कोई था नहीं। और देखते ही देखते उस खाली ढाबे में एक कुर्सी भी खाली नहीं बची।  सभी ने अपने लिए एक एक थाली मंगवाई। यानि हमारी कंजूसी या किफायतशारी की भरपाई बाकी लोगों से हो गई।  या अपने मुंह मियाँ मिठ्ठू बनने के लिए कह सकते हैं कि हमारे आते ही उसकी ग्राहकी बढ़ गई। साठ रूपए की उस थाली में उस दिन दो प्राणियों का भरपेट भोजन हुआ; ऐसा सस्ता सुन्दर दाम और  इतने मितभोजी ग्राहक,  कहीं  मिलेगा भला ??

 वह यात्रा मेरी सबसे यादगार यात्रा है क्योंकि उस दिन मेरा जन्मदिन भी था और उस दिन चलती बस में जो केक काटा और सबने खाया वह भूल सकने जैसी स्मृति नहीं। उस दिन दो केक काटे गए थे, एक जो मैं हॉस्टल के किचन में रखवा के आई थी बाकी  सब batchmates के लिए और एक यहां रास्ते में सेलिब्रेशन के लिए लाया गया था। 

यह ओल्ड स्कूल का चार्म अजीब है जो स्मृतियों के कबाड़ से पुराने रिकॉर्ड खंगालता रहता है। 


Image Courtesy : my mobile camera photography.

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Sunday, 29 November 2015

ज़िन्दगी का खटराग --- 2

दिन गुज़रते हैं फिर भी वक़्त थमा  हुआ सा है.

ये एक अजीब मौसम है, इसमें दिन और रात का हिसाब आपस में गड्डमड्ड सा हो गया है. यहां उत्तरी ध्रुव की लम्बी रौशनियों वाली रातें भी हैं और  महासागर  के अथाह विस्तार जैसे  अनंत तक पसरे हुए दिन भी. कब और कहाँ से दिन की या रात की सीमा रेखा शुरू होती है, इसकी थाह पाना मुश्किल है.   इस मौसम को यहां किसने बुलाया, किसने रोक के रखा है. यहां  समय रबड़ की तरह फ़ैल भी गया है और रेत  की तरह हथेलियों से फिसल भी रहा है, फिर भी नए पुराने दिनों का फर्क पता नहीं चलता है. यहां रोज़ सुबह  चौराहों से कई रास्ते निकलते हैं जो कहीं नहीं पहुँचते बस  एक गोल घेरे जैसा चक्कर काट कर वापिस वहीँ पहुँच जाते हैं जहां से शुरू हुए थे.  यहां से कहीं नहीं जाया जा सकता और कोई कहीं से आ भी नहीं सकता।

घड़ी  की टिक टिक दिन और रात के प्रहर बीतने  की सूचना देती है लेकिन इस मौसम के बीतने के कोई आसार नहीं दिखते। ये एक लम्बी गर्मियों की तरह है जिसमे दिन कभी नहीं ढलता,  दोपहर सुबह से शुरू होकर अँधेरा घिरने के बाद भी कुछ देर तक बनी रहती है और घड़ी लम्बे  पॉज  लेकर चलती है.  और इस गर्म मौसम के पार कोई और मौसम है भी या नहीं इसकी भी कोई खबर नहीं। अक्सर इस थमे हुए दिनों वाले मौसम के लिए उस शख्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिसकी ज़िन्दगी में ये उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के छह छह  महीनो वाला मौसम आकर रुक गया है. पर अक्सर खुद उस शख्स को भी  नहीं होती कि आखिर इतनी तेज़ गति से भागने के बावजूद समय रुका क्यों है ?  अनंत तक फैले हुए ये दिन  किसी झिलमिलाती खुशनुमा साँझ तक  क्यों नहीं पहुँचते ?  यहां  रात को नींद में सपने क्यों नहीं आते ? यहां शाम कब आती है और कितने बजे आती है और कब ख़त्म हो जाती है, इसके बारे में घड़ी देख कर क्यों नहीं पता चलता ?

कलैंडर में तारीखें बदलती हैं लेकिन मौसम नहीं बदलता। दिन बीत जाता है लेकिन वक़्त थमा हुआ ही लगता  है.  उत्तरी रौशनियों के साये और महासागर के गहरे रंग कभी एक नया मौसम बना सकेंगे ? समय का एक नया आयाम ?  दिन और रात का कोई नया हिसाब जो चौबीस घंटो और सात, तीस, बावन, बारह और 365 की गिनती से अलग और घड़ी की पाबंदी से  दूर हो ? 






Friday, 12 June 2015

ज़िन्दगी का खटराग

काश कि  एक बोहेमियन जैसी ज़िन्दगी होती। 


ये ख्याल अचानक आया कि  काश ऐसा बंजारों जैसा जीवन होता, एक अनवरत यात्रा, जिसका कोई ठौर ठिकाना, ठहराव, कोई मकान या निशान नहीं होता। सिर्फ ज़रूरत भर का सामान और साथ चल सके जितने ही रिश्ते … जब तक चलते रहे तब तक ज़िन्दगी और जब थम जाए तब  … 

ये जो ज़माने भर का खटराग हमने अपने आस पास फैला रखा है ... सजे संवरे  घर, करीने से संजोये गए रिश्ते, दफ्तर और दोस्तों की बतकहियाँ, महफिलें और कहकहे …यह सब हम अपने कन्धों पे उठाये फिर रहे हैं, कितना बोझ …दुनियावी तौर तरीकों और कायदों का बोझ,  कि  जिस समाज में रहते हो वहाँ के सलीके को सीखो। 

और अक्सर इस बोझ से थककर  कभी हम पहाड़, नदी, समंदर का किनारा तलाशते हैं तो कभी  अगला जन्म सुधारने की कसरत में लग जाते हैं. यानी एक नया खटराग पालने लगते हैं.      

अगर मुझसे पूछिए तो मेरी ज़िन्दगी में बोहेमियन हो सकने जैसा कोई मौका मौजूद नहीं है. यहां व्यस्तताए हैं, ज़िम्मेदारियाँ और कमिटमेंट्स हैं, हर ख्वाहिश के पूरे हो सकने का सामान मौजूद है लेकिन बस यही एक इच्छा कि  एक लम्बी ना ख़त्म होने वाली सड़क हो और उस पर हम चुपचाप चलते जाए. 

कहने को ये भी कहा जा सकता है कि  ये बोहेमियन होना कौन बड़ी बात है,  अकेले दुनिया से भागकर अपने में जीना तो कोई भी कर ले; दुनिया में रहकर यहां की ज़िम्मेदारियाँ निभाओ, जो लिया है उसे वापिस सूद समेत लौटाओ। और ये क्या अजब सा शौक पाला  है, बोहेमियन या बंजारा होने का ?? समझदार, दुनियादार लोग ऐसे खटराग नहीं पालते।

इस बंजारे वाले खटराग को मैं अपने जीवन के बीत रहे वक़्त में देखती हूँ, रोज़; क्षण प्रतिक्षण। ये कुछ इस तरह बीत रहा है कि  मुझे इसके चलने-रुकने का अहसास लगातार होता रहता है लेकिन मैं लगातार इस से ग़ाफ़िल होने का नाटक करती रहती हूँ. ये ऐसी दोहरी ज़िन्दगी है जो एक ही साथ दो अलग दिशाओं में चल रही है, एक तरफ अपने बोहेमियन होने के अहसास के साथ और दुसरे अपने सभ्य सामाजिक पैमानों पर संभल कर कदम ताल करती हुई.  मेरे ख्याल से हम सब दोहरी ज़िंदगियाँ जीते हैं, या नहीं ??? कौन जाने। 
मैं तो जी ही रही हूँ. अंदर से मुझमे कुछ दबा छिपा है जो ज़ोरों से चीख रहा है, बाहर निकलने को छटपटा रहा है और बाहर से मैं हंसती, खिलखिलाती, मुस्कुराहटें बिखेरती  और मासूमियत और नफासत छलकाती, लहकती फिरती हूँ. हर रोज़ कितने झूठ बोलती हूँ मैं खुद से और कितने सच छिपाती हूँ मैं दूसरों से.       

Monday, 8 September 2014

मेरी पसंद की कुछ किताबें : एक अधूरी सूची




तो इस बार का indispire टॉपिक है, आपकी पसंद की टॉप टेन किताबें बताइये। अब पढ़ा तो बहुत है, स्कूल  कॉलेज और फिर नौकरी करते हुए पब्लिक लाइब्रेरी तक …  जो हाथ लगा वो सब पढ़ डाला। पर ऐसा टॉप टेन  जैसा कभी कुछ  सोचा नहीं। तो चलिए आज सोचते हैं, मेरी पसंद की टॉप टेन किताबें।


1.  आखिरी शब के हमसफ़र : इस वक़्त जो पहली किताब मेरे दिमाग आ रही  है. वो है  कुर्रतुल ऐन हैदर की लिखी मॉडर्न क्लासिक  ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता किताब। इस किताब में 1939 से लेकर बांग्लादेश के निर्माण के कुछ साल बाद तक का कालखण्ड शामिल किया गया है. ये किताब अपने लेखक की राजनीती, इतिहास, आर्थिक मुद्दों और सबसे ऊपर बंगाल के साहित्य पर ज़बरदस्त पकड़ को बताती है. ब्रिटिश नौकरशाही से लेकर साम्यवादी क्रांतिकारी आंदोलन, भारत में  ईसाई मिशनरी और उनका फैलाव, विभाजन से जुड़े मुद्दे, बांग्लादेश, मुस्लिम लीग की राजनीती जैसे कितने कितने ही विषय अपने आप में समेटे ये किताब किसी एपिक से कम  नहीं है. भारत से बाहर ब्रिटिश उपनिवेशों में रहने वाले अप्रवासी भारतीय, 70 के दशक का हिप्पी आंदोलन, विदेशों में रहने वाले भारतियों के  सांस्कृतिक अंतर्द्वंद और इन सबसे ऊपर इंसान के मनोविज्ञान की  गहरी समझ; कुर्रतुल ऐन  हैदर  ने इस किताब को एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया है जिस को छूना ही मुश्किल है उस तक पहुँच पाना तो और भी मुश्किल। 


2 . अफीम सागर :  इस किताब का रिव्यु मैं Here पहले ही कर चुकी हूँ. अमिताव घोष की लिखी इस किताब को बुकर प्राइज के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था. अंग्रेजी में इसे Sea Of Poppies कहा गया है.  इस किताब की खासियत है अफीम के त्रिकोणीय व्यापार जो भारत ब्रिटेन और चीन के बीच चलता था उसे अमिताव घोष ने बड़ी बारीकी से बयान किया है. अगर आप हिस्ट्री स्टूडेंट रहे हैं तो इस किताब को पढ़ते वक़्त आपको लगेगा कि  जो आजतक सिलेबस में था वो अब उपन्यास की शक्ल में आपके सामने है और अगर आपका इतिहास से दूर पास कहीं का वास्ता नहीं पड़ा तो भी आप इसे ज़रूर पढ़े क्योंकि इतने सीधे सरल तरीके से  आर्थिक और व्यापारिक इतिहास ( ईस्ट इंडिया कंपनी के अफीम व्यापार सन्दर्भ में )  आपको और कहीं शायद ही मिले। 

3. अग्नि की उड़ान : इस किताब को ज्यादातर लोग विंग्स ऑफ़ फायर के नाम से जानते हैं. जी हां हमारे देश के मिसाइल मैन और  भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए. पी. जे. कलाम की आत्मकथा है ये. इस किताब में उनके बचपन से लेकर अग्नि मिसाइल की लॉन्चिंग तक  लेखा  जोखा है. कलाम साहब का बचपन,  उनके स्कूल और कॉलेज का वक़्त, ज़िन्दगी के संघर्ष और फिर करियर के उतार चढ़ाव; इस किताब के ज़रिये मिसाइल मैन के टाइटल के पीछे की कहानी हमारे सामने आती है. इस किताब  खूबी है इसमें दी गई छोटी छोटी कविताएं जो खुद कलाम साहब ने ही लिखी हैं. 

4. रांगेय राघव की श्रेष्ठ कहानियां :  ये किताब रांगेय राघव की लिखी हुई कुछ बेहतरीन कहानियों का संग्रह है.  इसी के ज़रिये मैं पहली बार मिली "गदल" से. जी हाँ रांगेय राघव की गदल, हिंदी साहित्य की दस बेहतरीन कहानियों में एक है गदल.  और पहली ही बार जाना रांगेय राघव की कहानियों का जादू, उनकी कलम का चमत्कार। उन्होंने समाज के सबसे निचले तबके से लेकर सबसे ऊपर के वर्ग तक की कहानियां लिखी हैं, भाषा ऐसी कि  बस बाँध ले आपको, लगेगा जैसे वे पात्र खुद जीवंत होकर आपके सामने आ खड़े हुए हो.

5. स्मृति कलश : इस किताब को लिखा है शिवानी गौरापंत ने, इसमें उनके शांति  निकेतन में बिताये  स्कूल कॉलेज के दिनों, अपने शिक्षकों, साथियों, शांति निकेतन की अनोखी शिक्षा प्रणाली और सबसे ऊपर खुद गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यादें शामिल हैं. इस किताब ने मुझे बंगाल से, बांग्ला भाषा से, शांतिनिकेतन से और रवीन्द्रनाथ से मिलवाया। और ऐसा मिलवाया कि  लगता है शायद कभी किसी जन्म में, मैं बंगाल में ही जन्मी थी. 

6. एक वायलिन समंदर के किनारे :  ये नावेल कृष्ण चन्दर का लिखा हुआ एक बेहतरीन फिक्शन है. फुल मसाला स्टोरी  हिट बॉलीवुड फिल्म बन जाए ( श्ह्ह्ह, ये बात प्लीज एकता कपूर को ना बताना, वो इस कहानी का बेडा गर्क कर देगी)  जिसमे अजंता एलोरा की गुफाओं का जादू,  एक अजब गज़ब प्रेम कहानी, बीत चुके समय के  संगीतकार का आज के वक़्त में लौटना और ....  बस अब आगे खुद पढ़िए, मैं क्यों बताऊ पूरी कहानी ??? वैसे दूरदर्शन वाले इस पर एक सीरियल बना  के दिखा चुके हैं. 

7. प्रथम शैल पुत्री च :  हाँ ये थोड़ा अजीब टाइटल है लेकिन  सभ्यता का  आविर्भाव कैसे हुआ होगा यानी, वो जो आप इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं ना स्टोन ऐज, आदि मानव, प्रीहिस्टोरिक ऐज  वगैरह उसी को कहानी के ज़रिये बताया गया है. कैसे इंसान ने आग जलाना सीखा होगा, भाषा कैसे बानी, कैसे कैसे छोटे छोटे आविष्कार हुए होंगे, आस्थाएं, देवता कैसे अस्तित्व में आये ? कैसे इंसान ने खेती करना और फिर व्यापार  करना सीखा …  और फिर कैसे एक दिन भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु घाटी की सभ्यता पनपी।  और कैसे रहे होंगे उनके शहर, वे लोग और कैसे हमारे आज के मिथक और आस्थाएं उनके बीते वक़्त से जुड़ गए हैं. मायानन्द मिश्रा का लिखा एक शानदार कहानी संग्रह, इसे पढ़ते वक़्त लगेगा जैसे इतिहास खुद ही अपनी कहानी सुनाने बैठ गया हो.

8.  गली आगे मुडती है :  शिव प्रसाद सिंह का लिखा "काशी  त्रयी" की पहली क़िस्त वाला उपन्यास।  ये उपन्यास बनारस यूनिवर्सिटी की राजनीती के इर्द गिर्द बुना  गया है, इसमें  आपको बनारस के  वर्तमान की कुछ झलक मिलेगी। आस्थाओं, विश्वासों, चमत्कारों  का शहर, भारत का प्रतीक बनारस  और  उसकी समस्याएं। एक बढ़िया किताब, दूरदर्शन वालों ने इस पर एक सीरियल भी बनाया था.  

9. बस भाई अब आगे और लिखने का अभी मेरे पास टाइम है नहीं और indispire का टाइम ख़त्म होता जा रहा है. और फिर बाकी दो किताबे अभी मुझे याद आ भी नहीं रही, जैसे ही याद आएगी, अपडेट कर दूँगी, तब तक के लिए स्टे इन टच. 


Friday, 29 August 2014

समय के संसार में

नरम हरी घास पर रखा हुआ हर कदम, एक ठंडी लहर उसके शरीर के अंदर भेज रहा था.  ऐसा लगता था कि  ओस  की नमी उसके पैरों से होते हुए थके हुए शरीर के हर हिस्से तक पहुँच रही थी, तेज़ धूप से जले हुए मन प्राण  को फिर से ऊर्जा मिल रही थी.

"ये सुबह को हरी घास पर घूमने वाला आईडिया शायद सही है." उसने सोचा और फिर उसकी नज़र  सामने लटकी घडी पर गई, सुबह के नौ बज कर पांच मिनट हुए थे. उसे फिर से नींद आने लगी और तभी उसे महसूस हुआ कि  वो चल नहीं रही, घास पर लेटी  हुई है.  उसने वापिस आँखें बंद कर ली. आँखों  पर नींद का बोझ अभी बाकी था और सुबह की ताज़ी हवा इस बोझ को नशे में बदल रही थी. अगले कितने मिनट नींद रही या नींद का नशा, इसका पता नहीं चल पाया।

आखिर आँखें खुलीं, और फिर से सीधे नज़र सामने घड़ी की तरफ गई, वहाँ अभी भी सुबह के नौ बज कर पांच मिनट हुए थे. उसने करवट बदली और देखा … एक आदमी जिसके लम्बे बाल उसके कन्धों तक बिखरे थे, वही पास में लेटा उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा रहा है. वो उठी; असहजता, अचरज, असुरक्षा, बहुत सारे ख्याल  एकसाथ आये  और लौट गए. 

"कौन हो तुम ?" 

"मैं तो हमेशा  तुम्हारे साथ, अंग संग चलता हूँ. तुम्हारी कलाई पर बंधा, दीवार पर लटका हुआ … मैं वही वक़्त हूँ जिसे देख कर, जिसका हिसाब लगा कर तुम रोज़ का शेड्यूल तय करती हो. भागती हो घड़ी  के कांटो के हिसाब से और रूकती हो मिनटों के हिसाब से." 

"ये मेरी जगह है. मैं यहां रहता हूँ. इसे मेरा घर समझ लो." वो बोलता गया. 

विश्वास कर सकने जैसी बात ये थी नहीं और विरोध करने के लिए तर्क उसे  सूझ नहीं पाया और इसलिए उसने तेज़ कदमो से चलना शुरू कर दिया। जहां तक नज़र जाती थी बस हरी घास का मैदान दिखाई देता था. एक ख्याल और मन में आया,  अगर ये एक मैदान है तो घडी किस दीवार पर लटकी है ?? उसने दुबारा मुड़  कर घड़ी को देखा और  इस बार गौर से देखा, नौ बज कर पांच मिनट। घड़ी की सुइयां थमी हुई थी.

" क्या मैं सपना देख रही हूँ ?? शायद हाँ …" 

घास के उस अनंत तक फैले मैदान पर चलते चलते उसने एक मेज़ के चारो ओर कुछ  लोगों को बैठे देखा। पास गई, और मुंह से चीख निकलते रह गई, वहाँ ऐलिस चाय की टेबल पर हैटर के साथ  बैठी थी और उनका साथ देने लिए cheshire  cat भी थी.  उसने विस्फारित आँखों से वक़्त नाम के  उस आदमी  को देखा, वक़्त ने उसे चुप रहने का इशारा किया और आगे चलता गया. 

फिर कहीं नज़र पड़ी ; वहाँ असलान और लूसी, प्रिंस कास्पियन के साथ घूम रहे थे. उनको ये चीखना पसंद आया या नहीं ये मालूम नहीं चल सका क्योंकि उन्होंने पलट कर उसकी तरफ देखा नहीं।     

" ये सब यहां कैसे आये, कौनसी जगह है ये ?? और मैं यहां कैसे आई ??" 

" इन सबको तुम अपने साथ ही लाइ हो,  ये सब, एलिस और उसका वंडरलैंड, नार्निया के राजा और रानी, तुम्हारी फंतासी का, तुम्हारे कल्पनालोक का  हिस्सा हैं, तुम्हारी पसंद हैं और शायद किसी दिन तुम नार्निया जाना भी चाहती हो. तुम यहां इसलिए हो क्योंकि  तुम आना चाहती थी यहां। देखना चाहती थी वो जगह जहां वक़्त रुक जाता है." वक़्त ने एक सांस में जवाब दिया। 

" ये सपना नहीं है गुड़िया, उस नीली डायरी में तुम्ही ने लिखा था ना कि भगवान  की बनाई हुई इतनी बड़ी दुनिया में वक़्त को ठहरने, रुकने और सुस्ताने को कोई जगह नहीं है क्या ??  तो लो, तुम आ गई यहां, जहां वक़्त भी ठहर जाता है, दो घड़ी आराम करने के लिए." 

"तुम नीली डायरी के बारे में क्या जानते हो ?" 

" तुम भूल रही हो, कि  मैं इस ब्रह्माण्ड के हर कोने में, हर पल मौजूद हूँ तो फिर तुम्हारी डायरी क्या मेरी नज़रों से छुपी रह सकती है? चलो आओ, तुम्हे कुछ दिखाऊं … "  

वो उसके पीछे चलने लगी,  हरी घास के अंतहीन  कालीन के एक हिस्से में कागज़ बिछे हुए  नज़र आये, पास गए तो समझ आया कि  असल में ये किताबें है जिनके पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे हैं.  थोड़ा और गौर से देखा, किताबें हर कहीं, ज़मीन पर हवा में तैरती हुई, पन्ने  बोलते हुए, अपनी कहानी सुनाते ....किताबों के अंदर की तसवीरें पन्नों से बाहर झांकती हुई  ....  कहीं एक पर्दा सा या दीवार सी खड़ी नज़र आई जिस पर तसवीरें और दृश्य चलते दिखे … 

"Ink-heart, Silver-tongue  " लड़की बुदबुदाई।

"एक और फैंटेसी, तुम फिल्में बहुत देखती हो ?" … वक़्त हंसा। एक नीली किताब हवा में तैरती हुई उन दोनों की तरफ आई.  ये किताब वही नीली डायरी है.

"ये सब किताबें और उनके पन्ने  ऐसे बिखरे हुए क्यों है ?" 

"ये  सब किताबें  दुनिया के हर कोने से यहां आई है, मेरा मतलब ब्रह्माण्ड के हर कोने से.  सभ्यताओं और बियाबानो का इतिहास बताती हैं,  मेरे  आज की तस्वीर  और मेरे आने वाले कदमों के संकेत मुझे बताती रहती हैं. इन्ही के ज़रिये मैं हर जगह हूँ  और सब कुछ देखता सुनता हूँ. " 

" तो फिर तुम आराम  कब करते हो ? मैंने तो डायरी  में ऐसी जगह के बारे में लिखा था जहां वक़्त भी आराम करता है, तुम तो लगता है कि  कभी सोते ही नहीं। यहां बैठे किताबें देखते या सुनते रहते हो …" 

" लगता है तुम्हारी मोटी  बुद्धि  है. क्या इतना भी नहीं जानती कि  फैंटेसी  की दुनिया में तुम्हारे संसार की घड़ियों के नियम नहीं चलते। इसलिए तो इतनी देर से वो घड़ी एक ही वक़्त दिखा रही है … नौ बज कर पांच मिनट।"

" दिन और रात, शाम और दोपहर वाले  हिसाब यहां नहीं है."

" अगर दिन रात का हिसाब  नहीं है तो फिर वो घड़ी ये नौ बज कर  …" बात अधूरी ही रह गई. 

"ये वक़्त, ये exact  वक़्त तुमने उस नीली डायरी में लिखा था, ठीक इसी वक़्त पर तुमने सोचा था कि  घड़ी  के कांटे थम क्यों नहीं जाते।" वक़्त ने एक रहस्य्मयी मुस्कान के साथ जवाब दिया। 

"अगर ये वक़्त, ये ऐलिस और असलान और ये जगह … सिर्फ मेरी ही कल्पना होने के कारण यहां  हैं तो फिर मेरी जगह अगर कोई और होता तो उसकी कल्पनायें ...." अबकी बार जान बूझ कर बात अधूरी छोड़ दी. 

वक़्त ने आगे कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसकी वही मुस्कराहट बनी  रही.

हरी घास के मैदान का ओर  छोर नहीं था  और चलने से वे दोनों थकते नहीं थे.  वक़्त की इस दुनिया के चमत्कार अभी बाकी थे.

"ये लोग कौन हैं और इस तरह क्यों यहां लेटे हैं?" 

"श्ह्ह, धीरे बोलो,  ये सब सो रहे हैं,  चलो यहां से,  इन्हे डिस्टर्ब मत करो अपने सवालों से." 

हवा में  स्थिर कुछ  मानव  शरीर, जैसे चैन से कोई अपने नरम गुदगुदे बिस्तर पर सो रहा हो वैसे हवा में ज़मीन से कुछ ऊपर वे सब सोये थे.   वक़्त उसे, उन लोगों से कुछ दूर ले गया.

" ये सब लोग अभी सो रहे हैं अपने घरों में. दुनिया के जिस भी हिस्से  में जब लोग सो जाते हैं तब मैं उन्हें यहां ले आता हूँ. ताकि उनकी नींदों में से कुछ हिस्सा चुरा सकूँ और  उस  कुछ देर के लिए मैं भी आराम कर लेता हूँ । तुम्हारे शब्दों में दो घड़ी सुस्ता  लेता हूँ. " 

"उनकी नींदों में वक़्त की सुइयां रुक जाती हैं और जितनी देर तक वे सोते हैं उतनी देर तक उनका वक़्त ठहर जाता है."

" क्या तुम उनकी परछाइयाँ यहां ले आते हो ?" उसने थोड़ा डर  कर पूछा।

" कुछ ऐसा ही समझ लो …" वक़्त ने हँसते हुए जवाब दिया लेकिन फिर थोड़ा संभल कर कहा, " ये परछाइयाँ नहीं है असल में ये उनका अवचेतन मन है जो सोये हुए शरीर में जाग उठा है." 

" वो इन्सेप्शन  फिल्म के जैसा ?" उसने थोड़ा दबी हुई आवाज़ में पूछा।

" इन्सेप्शन या मैट्रिक्स कहीं बाहर नहीं होता, वो हमारे ही अंदर, हमारे आस पास होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि  तुम सारा दिन   कम्प्यूटर, मोबाइल और पता नहीं कौन कौन सी मशीनों से और उनकी नित नई  तकनीक से इतना ज्यादा घिरे हो कि   जीवन के सीधे सरल रूप देख नहीं पाते। हर वो चीज़ जो आश्चर्यों से भरी है और तुम्हारी कल्पना से आगे की है  उसकी व्याख्या या तो इंटरनेट पर ढूंढते हो या  किसी फिल्म की कहानी से जोड़ देते हो."  वक़्त ने एक लम्बा और उबा देने वाला प्रवचन दिया। 
"लेकिन फिल्में भी तो आम ज़िन्दगी से ही निकलती हैं." उसने जवाब देने की सोची पर फिर चुप रह गई. 
"वैसे तुम्हारी ये जगह ब्रह्माण्ड के किस कोने में है, किस ग्रह  या गैलेक्सी में है ?" उसने तीखा सवाल किया। 

" हर कहीं, हमेशा तुम्हारी नज़रों के सामने, बस उसे देखने भर की देर है." वक़्त ने जवाब दिया।

"तो फिर मुझे या किसी और को आज तक कभी दिखी क्यों नहीं?" 

"क्योंकि इस से पहले कभी तुमने इसे देखने की कोशिश भी नहीं की." 

"तुम बात बदल रहे हो और मुझे अपनी इन रहस्य भरी बातों से बहलाने की कोशिश कर रहे हो." 

" ये ठहरी हुई वक़्त की  दुनिया हमेशा तुम्हारे आँखों के सामने होती है पर तुमको ठहरने की फुर्सत आमतौर होती नहीं।"  धीमी आवाज़ में जवाब आया.
" वो रंगीन रौशनी कैसी है और ये आवाज़ें कहाँ से आ रही हैं." अब उसने खुद ही  बात को  बदलते हुए सवाल किया और रौशनी की दिशा में इशारा भी किया।

" ये रौशनी तुम्हारी दुनिया से आ रही है, वो आवाज़ें घरों और सडकों पर पसरा शोर है जो अब तुम्हे वापिस बुला रहा है.  लौटने का समय हो गया है."  इतना कह कर वक़्त ने  हवा में लटकी घडी को देखा जो उनके साथ साथ चल रही थी. 

उस घडी में अब नौ बज कर दस मिनट हो रहे थे. 

घास का मैदान अब दीवारों और छत में तब्दील होने लगा.  


Image Courtesy : Google
      



   



Tuesday, 1 July 2014

कार का कनेक्शन

CarConnect.in, ये नाम मैंने इंडीब्लॉगर पर देखा और सोचा कि  क्यों ना इस कांटेस्ट में पार्टिसिपेट किया जाए, आखिरकार अब मुझे भी कार ड्राइविंग का और स्पीड का चस्का लग चुका है. जब बात हो रोडट्रिप्स की, फैमिली के स्टेटस की और कम्फर्ट की,  तब कार के बारे में ना सोचा जाए ये हो नहीं सकता। पर फिर एक झिझक सी हुई कि  हिंदी में कांटेस्ट एंट्री ?? कोई पढ़ेगा भी ?? या इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाएगा ?? लेकिन फिर सोचा कि कार खरीदने और चलाने वाले लोग क्या  हिंदी नहीं बोलते या समझते और फिर कार तो हमेशा से हिंदुस्तानी लोगों के लिए एक ख़ास आकर्षण रही है फिर चाहे वो पुराने वक़्त की अम्बेस्डर हो या 80 और 90 के दशक की "सड़को की रानी" मारुति या  आज के वक़्त की कोई भी लक्ज़री या स्पोर्ट्स कार.  तो ऐसे में मैंने तय किया कि  इस वेबसाइट का रिव्यु मैं हिंगलिश में लिखूंगी ताकि हर कोई मेरी बात आसानी से समझ सकें और इस वेबसाइट के बारे में  जान सके और वैसे भी हिंदी में किसी कार वेबसाइट का रिव्यु इंटरनेट पर होगा ऐसी संभावनाएं बहुत कम  ही हैं.  तो चलिए बात शुरू करते हैं CarConnect.in  के  बारे में. 


इस वेबसाइट पर जब पहली बार विजिट किया तो कुछ अनोखा सा लगा, पहले लगा कि  अरे ये इतना सिंपल सा होम पेज, ना कोई एड, ना यहां वहाँ से एकदम पॉप अप होते बॉक्स और ना कहीं कारों की तसवीरें। पहले लगा कि  ये क्या गड़बड़ झाला है. सिर्फ कुछ टैब्स, मैन मेनू बार में... पर फिर समझ आया यही तो है जो CarConnect.in को बाकी कार वेबसाइट से अलग  बनाती है.  CarConnect  जैसा कि  नाम से ही समझ आ जाता है कि ये वेबसाइट कार के बारे में हैं,  इसी  बात को ध्यान में रखते हुए इसे पूरी तरह यूजर फ्रेंडली इंटरफ़ेस के साथ बनाया गया है. लेकिन सिर्फ कार कह देने से बात पूरी नहीं होती, ये एक खास जगह है;  कार के साथ साथ कार ड्राइवर्स, कार लवर्स, लम्बी यात्राओं के शौकीन उन क्रेजी लोगों  के लिए,  जिनके लिए कार सिर्फ एक मशीन नहीं बल्कि ज़िन्दगी का एक हिस्सा है. " My Car, My Passion".  वो कनेक्शन, वो लगाव  जो हम अपनी कार के लिए महसूस करते हैं ( कुछ वक़्त पहले मैंने अपनी पुरानी कार बेच दी और उसकी जगह नई  कार खरीदी, वो पुरानी थी पर मैं उसे खटारा नहीं कह सकती; शायद इसीलिए उस कार को एक्सचेंज देने से पहले  मैंने आखिरी बार उसकी कुछ तसवीरें ली).

CarConnect.in मानव स्वभाव के sunny- social- side  को कितना महत्त्व देती है ये इस बात से पता चलता है कि वेबसाइट के मेनू बार में नौ में से छह टैब  सिर्फ सोशल इंटरैक्शन के लिए ही रखे गए हैं.  जैसे ही आप होम पेज पर आते हैं तब  दो चीज़ें आपका ध्यान खींचेंगी, "कार एक्सपीरियंस" और  "लॉन्ग ड्राइव",  नाम के दो लाल रंग के क्लाउड्स.  और तुरंत ही आपके अंदर  की जिज्ञासा जाग जाती है और तभी आपकी नज़र पड़ती है दायीं तरफ की साइड बार पर; जहां पर आपको कुछ ऑप्शन विंडोज दिखती है, मोस्ट पॉपुलर लॉन्ग ड्राइव एक्सपीरियंस, मोस्ट पॉपुलर कार एक्सपीरियंस और चैट रूम  वगैरह। पॉपुलर एक्सपेरिएन्सेस और उनसे जुड़े नाम और चेहरे।  आप तुरंत उनको पढ़ना चाहेंगे लेकिन रुकिए, यही तो ट्विस्ट  है CarConnect.in में. यहां आपको वेबसाइट का एक हिस्सा बनने के लिए अपनी फेसबुक प्रोफाइल के ज़रिये लोगिन करना होगा; एक प्रोफाइल क्रिएट करिये और बस शामिल हो जाइए कारकनेक्ट के क्रेजी कार पैशनेट लोगों की दुनिया में.

आप यहां किसी कार के बारे में यानी उसकी ड्राइविंग, रखरखाव वगैरह के बारे में अपने अनुभव शेयर कर सकते हैं या अपनी किसी रोडट्रिप के बारे में लिख सकते हैं. ये बिलकुल किसी पर्सनल ब्लॉग पर पोस्ट करने जैसा है, फर्क सिर्फ यही है कि  यहां वेबसाइट का खुद का ब्लॉग है जिसे यूजर/मेंबर्स  इस्तेमाल करते हैं और उसे  अपने अनुभवों से "एनरिच" करते हैं. मेरे ख्याल से ये एक बढ़िया आईडिया है कि एक प्रोफेशनल कार  वेबसाइट  लोगों  को अपनी कार से जुड़े अनुभव को दूसरों से शेयर  करने के लिए एक फोरम दे रही है. लगभग हर इंसान के पास अपनी कार से जुडी कुछ खास बातें होती है, फिर भले ही उस मॉडल और ब्रांड  की कार और बहुत से लोगों के पास हो लेकिन उस कार  को चलाने और उसके इस्तेमाल के बारे में सबके अनुभव अलग ही होते हैं. इस शेयरिंग का एक फायदा और भी है कि किसी भी कार के बारे में उसके मालिकों के निजी फर्स्ट हैंड अनुभव जानने को मिलते हैं.

लगभग यही चीज़ लॉन्ग ड्राइव एक्सपीरियंस के बारे में भी कही जा सकती है. आपको कार चलाने का शौक है तो बताइये दुनिया को कि  आप अपनी कार को कौनसे अनजाने, अनदेखे, पहाड़ो, रेगिस्तान, समुन्दर के किनारो या कच्चे रास्तों पर ले गए ? उन रास्तो, मंज़िलों और स्पीड  के रोमांच को शब्दों के ज़रिये सारी दुनिया को बताइये। CarConnect.in का लीडर बोर्ड ऐसे ही पैशनेट लोगों से आपको रूबरू करवाता है. और जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि यहां  आपको फेसबुक प्रोफाइल के ज़रिये ही एंट्री मिल सकती है तो ज़ाहिर है कि  लीडर बोर्ड पर वही तस्वीर और नाम दिखेगा जो आपके फेसबुक प्रोफाइल पर है. इसका मतलब ये कि  अगर आप अपनी पहचान छुपाना चाहें और अपनी "सीक्रेट छुट्टियों" या "एडवेंचर्स" के बारे में अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को ना  बताना चाहें तो कोई मुश्किल नहीं बस एक फेक आईडी बना लीजिये और बस हो गया ना  काम आसान।  और हाँ ये जो CarConnect वाले हैं ना,  उन्होंने हम users को लुभाने या पटाने के लिए Browny Points का भी इंतज़ाम किया है. जैसे जैसे आप अपने कार और ड्राइव एक्सपीरियंस शेयर करते जायेंगे वैसे वैसे आपके प्रोफाइल पर सिल्वर, गोल्ड, प्लैटिनम, वगैरह badges  के चार चाँद लगते जायेंगे यानी आप  कार लवर्स की इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर पॉपुलर होते जायेंगे; और तब आपका नाम भी होम पेज के दायीं तरफ की उस साइडबार पर दिखेगा, जिसके बारे में मैंने पहले बताया था. 

मैंने यहां कई ब्लॉगर्स के अनुभव पढ़े, लेह लद्दाख की ऊंचाइयां, जयपुर और मैसूर, विशाखापट्टनम और कोलकाता के रंग ...  यहां सब कुछ है; कहानियां है, कविताएं हैं, Travelogue है  … लेकिन वजह सिर्फ एक  "कार". 

बहरहाल, ये तो हुई अनुभव और परख की बात. CarConnect.in को सोशल कम्युनिटी की तरह तो बनाया ही गया है लेकिन ये सिर्फ इसका एक पहलू है; मान लीजिये कि  आपको इस ब्लॉगिंग वगैरह में दिलचस्पी नहीं  तो क्या ये वेबसाइट आपके किसी  काम की नहीं ?? जी नहीं, ऐसा बिलकुल भी नहीं है. आपको किसी नई  कार के बारे में  जानकारी चाहिए तो यहां देखिये "कार न्यूज़"  और "न्यू लॉन्चेस"  सेक्शंस में आपके हर सवाल का जवाब है.  कारों की दुनिया में होने वाली हर हलचल यहां मौजूद है और उसे लगातार अपडेट किया जाता है, यानी यहां आपका कार ज्ञान बढ़ाने का पूरा इंतज़ाम है.  अगर आपके पास नई कारों के बारे में कोई दिलचस्प जानकारी है और आपको वो यहां नहीं दिख रही तो कोई बात नहीं अपनी जानकारी को दूसरों के साथ  बाँटिये "कार न्यूज़" सेक्शन के ज़रिये।
आप नई  कार खरीदने वाले हैं और आप अलग अलग कारों को compare करना चाहते हैं. तो आइये "Compare Cars" में.  कोई भी दो कार चुनिए, उन्हें compare  करिये, आपको एक पीडीएफ फाइल अड़तालीस घंटे के भीतर भेजी जायेगी जिसमे उन दोनों का पूरा तुलनात्मक विवरण होगा। इस पीडीएफ का फायदा ये है कि  आप इस सारी  जानकारी को प्रिंट कर सकते है, अपने कंप्यूटर में सेव कर सकते हैं  और आपको  बार बार वेबसाइट पर जाने की ज़रूरत नहीं !!!!!!  वैसे "कार न्यूज़" सेक्शन भी आपको किसी भी नई या पुरानी/अपग्रेडेड  कार के बारे काफी अच्छी  जानकारी  उपलब्ध करवाता ही है, लेकिन ये पीडीएफ वाला तरीका मुझे काफी यूनिक लगा. ये उन लोगों के लिए बढ़िया है जो ज्यादा इंटरनेट सेवी नहीं है और जिन्हे हार्ड कॉपी इनफार्मेशन के साथ काम  करना ज्यादा आसान लगता है. 

तो इस तरह CarConnect.in  एक अनोखी वेबसाइट है जो कार और उसे चलाने वालों के बीच के ना दिखने वाले कनेक्शन को अपने  ब्लॉग, चैट रूम और लीडरबोर्ड जैसे फ़ीचर्स के ज़रिये सामने लाती है.  सिर्फ जानकारी मुहैय्या करवाने वाली और कार ब्रांड्स का प्रमोशन करने वाली websites  की भीड़ में  कारकनेक्ट अपने इन lively फीचर्स के कारण यूजर को ज्यादा आकर्षित करती है. ये एक तरह से हमारे गूगल प्लस, फेसबुक, ट्विटर वाले सोशल नेटवर्किंग का ही एक एक्सटेंडेड सर्किल  जैसा है, जहां मशीन (कार) के बजाय मानवीय पहलू ज्यादा मायने रखता है.   




This Post is written for the indiblogger.in contest "EXPERIENCE CARCONNECT.IN" sponsored by CarConnect.in

Image Courtesy : Google

Saturday, 7 June 2014

एक ब्लॉगर की गुस्से भरी कथा


इस बार फिर से उसी पुराने मुद्दे पर लिखना का मन हुआ. अब आप इसे बात को बार बार दोहराना कह लें, बेकार की बकवास कह लीजिये या एक फ़्रस्टेड दिमाग का कचरा … जो मन में आये सोचिये, मैं परवाह नहीं करती। तो मुद्दा वही है "एक ब्लॉगर की दुःख भरी कथा".  लेकिन इस बार गुस्सा इस बात को लेकर है कि ये  जो ज़माने भर के ब्लॉग संकलक या फोरम या मंच  ब्लॉग बने हुए हैं  ये आखिर किसके काम के हैं ??? यहां किन लोगों को जगह मिलती है, जहां तक मैंने देखा है कि  वही कुछ गिने चुने नाम हैं जिनको हर दुसरे तीसरे दिन किसी ना किसी मंच पे देखती हूँ (एक कारण ये भी है कि  इनमे से कई लोग डेली बेसिस वाले लेखक हैं, भगवान जाने इनकी कल्पनाशक्ति और अति सृजनात्मकता का रहस्य क्या है जो हर दूसरे दिन कोई आईडिया मिल जाता है लिखने को) खैर, इस बात पर तो कोई क्या ईर्ष्या करे.  

सवाल मेरा सिर्फ इतना है कि  ये सारे ब्लॉग  लिंक संकलक  करते क्या हैं ? क्या सिर्फ इनकी दिलचस्पी कविता, छंद, बंद तक है या किसी क्षेत्र विशेष से ही प्रेम  है जो "बाहरी" लोगों को इनके यहां प्रवेश नहीं मिलता। फेसबुक पर कई पेज/ग्रुप हैं जहां ब्लॉगर्स  अपनी लिखी रचना  के लिंक पोस्ट करते ही हैं, तब फिर उनमे से कितनों को जगह मिल पाती है इन फ़ोरम्स  में ?? कभी मिलती भी है ????? मेरा अपना उदाहरण देना चाहूंगी, इसलिए नहीं कि  हाय राम मेरी पोस्ट को शामिल नहीं किया इसलिए अब इनको गालियां देनी ही हैं, मगर इसलिए कि  जो घटना हुई उसने बहुत गुस्सा दिलाया (और मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता है, बाद में भले ही सोच विचार करूँ  पर उस वक़्त तो …) लेकिन इस समय सोच विचार का नहीं गुस्से का ही मन है. शायद यही गुस्सा रहा होगा दिमाग में जब करीब दो महीने पहले एक ब्लॉग लिंक संकलक  के फेसबुक पेज के एक पोस्ट  पर कमेंट किया था कि  भाई कभी मेरी भी पोस्ट को शामिल कर दिया करो (वैसे उन भले लोगों ने एक बार, जी हाँ एक बार तो लिया ही था  मेरी पोस्ट  को और बड़ी मेहरबानी उनकी कि  उस लिंक अप की वजह से  कुछेक कमेंट्स भी आये  पोस्ट पर ) तब जवाब यही मिला था कि  देखिये फलानी  तारीख को फलाने ब्लॉग पेज पर आपकी रचना है. पर पूछती हूँ कि  क्या उसके पहले कभी लिखा नहीं था या उसके बाद कभी लिखा नहीं ???  कम से कम हम ब्लॉगर्स   इतनी तो उम्मीद रखते ही हैं इन "चर्चा वाले ब्लॉग्स" (जैसा कि  यशवंत जी ने सही नाम सुझाया है)  से कि  कभी कभार "हम जैसे कम  जाने पहचाने या शायद बिलकुल अनजाने लोगों" के लिखे को भी शामिल कर लो. बार बार उन्ही लोगों को शामिल कर के कौनसा  तीर मारा जा रहा है जो आज इस फोरम पर तो कल किसी और फोरम पर  शोभा बढ़ाते ही  है.  जिनकी रचना की तारीफ़ के पुल, सड़क, रनवे का कोई अंत आलरेडी नहीं है उनको बार बार हर फोरम पर दोहराने का क्या फायदा। जिनके पास पहले ही ढेर सारे फॉलोवर्स हैं, उन्ही को अगर हाईलाइट कर रहे हैं  क्या बड़ी बात है.

सवाल ये भी नहीं उठा रही कि  इतनी इतनी बार आप के ब्लॉग संकलक  को विजिट करने, वहाँ कमेंट करने के बाद भी आप लोग जहमत नहीं उठाते ये देखने की कि  क्या कोई और ब्लॉगर्स  भी हैं जिनके ब्लॉग्स को शामिल किया जा सकता है ?? क्या आपके हिसाब से भारत के कुछ क्षेत्र विशेष ही हैं जहां से पोस्ट लिंक लिए जाने चाहिए ?? और कुछ फ़ोरम्स का सारा प्यार तो जैसे कविता पर ही उमड़ता है, वहाँ गद्य लेखन की कोई जगह नहीं  फिर क्यों वे लोग मेरे ब्लॉग पर कमेंट  करते वक़्त फरमाते हैं कि  हमारे इस एग्रीगेटर  पर पधारिये, तब मन करता है कि  दो चार कड़वी बात सुना ही दूँ।  इसके अलावा ज्यादातर ब्लॉग एग्रीगेटर सिर्फ लेटेस्ट यानी आज की डेट में लिखी हुई रचना को ही लिंक करते हैं तो फिर जो पुरानी हैं उनका क्या ?? क्या उनको कभी शामिल नहीं किया जाना चाहिए ?? 

गुस्सा इस बात का ज्यादा आता है की हिंदी ब्लॉगर्स  के लिए वैसे भी इंग्लिश एग्रीगेटर्स जैसे इंडीब्लोगर्स और ब्लॉगअड्डा वगैरह पर बहुत ज्यादा  स्कोप नहीं रहता तब ऐसे में अगर हिंदी के चर्चा ब्लॉग्स  भी ऐसा भेदभाव करेंगे तो फिर इनका क्या उपयोग हमारे लिए ??  अभी कुछ समय पहले की बात है कि  इंडीब्लॉगर पर एक फोरम डिस्कशन पर मैंने इस मुद्दे  को उठाया था कि  हिंदी में लिखने वालों को न वोट्स मिलते हैं ना कमेंट्स और ना ही कोई ऑनलाइन कांटेस्ट ऐसा होता है जिसमे हिंदी को भी जगह मिलती हो और हिंदी में लिखी पोस्ट का जीतना तो खैर दूर की कौड़ी लगती है,  बड़ी तीखी बहस हुई थी  … तब उन अंग्रेजी में लिखने वालों ने  इस बात को माना  कि हिंदी ब्लॉगर्स  की तरफ ध्यान नहीं जाता  ऐसे में जब इन संकलक  का ये व्यवहार देखती हूँ तो लगता है कि  दोष पढ़ने  का वालों का उतना नहीं जितना इन सो कॉल्ड चैनल्स का है जो अपनी सुविधा या पसंद के हिसाब से चलते हैं. 

खैर दुनिया यूँही चलेगी, मेरे चीखने या चिल्लाने  से क्या तो होगा और क्या ना होगा इसकी बहस फिर कभी.

कुछ  समय पहले भी इसी मुद्दे पर एक Essay लिखा था