Thursday, 25 September 2025
प्रेम में आकंठ डूबी तरूणी "
Sunday, 6 July 2025
ज़िंदगी की वाशिंग मशीन
Friday, 19 July 2024
कुछ कहा क्या ??
Tuesday, 15 February 2022
भद्र लोक वाली महिला
"An Exotic Woman, A Delusional Woman, asking for Attention." This is how I would like to start my Blabber.
Friday, 29 January 2021
और हम बाकी लोगों का क्या ??
कहानियां किसके बारे में कही जाती हैं ? कहानियों से क्या आशा की जाती है कि उन्हें हमेश हैप्पी एंडिंग या कोई स्टीरियो टाइप एंडिंग होनी चाहिए ? अनगिनत फिल्में और उपन्यास जो अब तक रचे जा चुके, उनमे हर उस संभावना पर एक विस्तृत कथा है जिसके होने की कहीं एक ज़रा सी भी संभाव्यता है। इस दार्शनिकता से परे क्या कभी कोई कहानी ऐसी भी हो सकती है जिसम कोई एंडिंग नहीं है जिसमे दो तयशुदा किरदार नहीं है ? जिसमे लवस्टोरी नहीं है !! जिसमे हेट स्टोरी भी नहीं है !! जिसमे कोई प्रवचन या आदर्श या बहादुरी की गाथाएं भी नहीं है !!! क्या ऐसी भी कहानी हो सकती है ? ऐसे लोगों की कहानी जो कहानी का किरदार होने लायक माने नहीं गए ?? क्या किसी एक इंसान की भी कोई कहानी हो सकती है ?
Wednesday, 1 April 2020
मूर्ख होने का विज्ञान
Wednesday, 25 September 2019
old school charm
कोई चीज़ कितनी पुरानी हो सकती है ? या पुरानी होते हुए भी उसका ओल्ड स्कूल चार्म बना रह सकता है क्या ? ये ओल्ड स्कूल किसको कहते हैं ? शायद पुराने ज़माने से चिपके रहने की आदत को ??
बहरहाल, अभी पिछले कुछ वक़्त से हाईवे के होटल, गेस्ट हाउस, मिडवे रेस्टॉरेंट को देखते देखते यह ओल्ड स्कूल जैसा कुछ जाग गया। अजमेर जोधपुर हाईवे पर बना "बर" का मिडवे। जहां का कटलेट और इडली सांभर, ऑमलेट ब्रेड और चाय जिसके लिए हम पूरे रास्ते इंतज़ार करते थे बर पहुँचने का । कटलेट होता कुछ नहीं है सिर्फ आलू बेसन की एक बड़ी सी टिकिया, पर यही टिकिया उस मिडवे का बड़ा आकर्षण थी। इडली सांभर और नारियल की चटनी हर वक़्त ताज़ी मिलती थी। खैर, खाना वहाँ आज भी ताजा ही मिलता है। यह चमत्कार कभी समझ नहीं आया कि हर चीज़ उस बियाबान में इतनी फ्रेश और स्वादिष्ट कैसे है ? और वहाँ की वो छोटी सी knick knacks बेचने वाली दुकान; जहां से कई बार काफी कुछ ख़रीदा. अब वो काउंटर नुमा दुकान अपनी पुरानी चमक की परछाई जैसी कुछ बची है. मिडवे की इमारत भी जैसे कोई पुराना सरकारी गेस्ट हाउस; उभरे हुए सफ़ेद भूरे रंग के पत्थरों की बाहरी दीवारें जिन पर वक़्त और मौसम की मार से अब काई जमने लगी है. सामने गेट से आता हुआ एक खुला लम्बा रास्ता और इतना बड़ा कंपाउंड कि जहां दो तीन बसें आराम से खड़ी रह सकती हैं। यह इमारत भी एक हिस्सा है नास्टैल्जिया का; बीते समय के फ्रेम का। बारिश के मौसम में यहां अक्सर सब कुछ भीगा हुआ दीखता है. इमारत की बाहरी दीवारें, कंक्रीट की सड़क वाला रास्ता और सारे पेड़ पौधे । ऐसा लगता है कि बरसात बस अभी ही हुई है । अक्सर मुझे ऐसा वहम होता है कि बरसात का मौसम इस जगह पर हमेशा के लिए थमा हुआ है । इस जगह को देखकर लगता था कि जैसे कोई कोलोनियल ज़माने का गेस्ट हाउस जो किसी दूर दराज हिल स्टेशन पर बसा है । निर्मल वर्मा के उपन्यासों के हिल स्टेशन और कॉटेज हाउस का नक़्शा शायद ऐसा ही कुछ होता होगा !!! ( रेगिस्तान के पश्चिमी कोने पर बसे शहर के लिए ये बरसात का मौसम वाला हाईवे का ये अर्ध सरकारी मिड वे होटल ही हिल स्टेशन जैसा मालूम होता है )
इस मिडवे को देख कर हमेशा हिल स्टेशन जैसा क्यों महसूस होता था, इसका कारण तो नहीं पता पर शायद आस पास मध्य अरावली के पहाड़ है, जिनके कारण यहां काफी हरियाली है और बरसात में इस हाईवे पर और पहाड़ों पर धुंध और बादलों का डेरा रहता ही है । सफ़ेद रुई जैसे बादल पहाड़ो पर ही उतर आते हैं, पहाड़ का ऊपरी हिस्सा इन बादलों से अक्सर ढका हुआ ही दिखता है। बारिश ऐसी जम कर होती है कि हाईवे पर विजिबिलिटी ही ख़त्म हो जाती है , केवल गाड़ियों की हेड और टेल लाइट्स की रौशनी के धब्बे पानी के धुंधले बहाव में दिखाई देते हैं।
RTDC के राजस्थान भर में फैले हुए होटल्स का भी ऐसा ही किस्सा है। पुरानी लेकिन मजबूत इमारत । बाहर से और भीतर से । बाहर एक बड़ा खुला बगीचा जिसमे एक फाउंटेन लगा होता है,लोहे की कुर्सियां और टेबल पड़ी रहती हैं जहां बैठ कर ओपन एयर ब्रेकफास्ट या लंच का आनंद लिया जा सकता है। एक बड़ा सा कंपाउंड या अहाता जहां गाड़ियों की पार्किंग बेहद आराम से की जा सकती है। इन होटल्स को देख कर लगता है कि इनको बनाने की प्रेरणा पुराने ज़माने के सरकरी डाक बंगले या रेस्ट हाउस वगैरह से मिली होगी जिनको सरकारी अफसरों के लिए बनाया जाता था। लकड़ी का भारी फर्नीचर जिस पर सादी लेकिन एलिगेंट नक्काशी या डिज़ाइन होती है। कमरे और लाउंज का इंटीरियर साधारण ही होता है; राजस्थानी पेंटिंग्स जो दीवारों के खालीपन को भरने की कोशिश करती हैं । जो सबसे आकर्षित करने वाली चीज़ है, वो है कमरों का साइज़। खुले, हवादार कमरे जिसमे एक डबल बेड या तीन बेड और भारी कुर्सियां, मेज़ और ड्रेसिंग टेबल रखी होने के बावजूद कहीं से भी बंद जैसा नहीं लगता। बाथरूम्स में सारी आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। चमक दमक तो नहीं है पर आराम और तसल्ली पूरी है।
अब जब हाईवे और होटल का किस्सा निकला ही है तो एक पुराना किस्सा उदयपुर हाईवे का याद आ रहा है जिसे लिखे बिना मन नहीं मान रहा।
फाउंडेशन कोर्स की ट्रेनिंग के दिनों में एक बार अपने कुछ batchmates के साथ उदयपुर से घर जाने के लिए बस में रवाना हुए। दोपहर को १२:३० बजे रवानगी का समय था लेकिन कुछ हमारा आलस और कुछ बस चलाने वाले की दरियादिली कि बस आखिर कर १:३० पर रवाना हुई। हमने जल्दबाजी के चलते हॉस्टल से टिफ़िन भी नहीं लिया और अब खाने का वक़्त था। बस वाले ने अपना शुरूआती हाल्ट शहर के बाहर हाईवे पर कतार में बने ढाबों और दुकानों के सामने किया, इस उद्घोषणा के साथ कि पंद्रह मिनट यहां रुकेंगे। मैं और मेरी सहेली बस से उतरे ये सोच कर कि रास्ते के लिए चिप्स नमकीन खरीद लिए जाएँ। लेकिन सामने एक ढाबा देख कर विचार बदल गया। अपने एक साथी को चिप्स बिस्कुट और माज़ा की बोतल लाने का आदेश देकर हम दोनों ढाबे में घुसे। दुकान बिलकुल खाली थी, एक भी ग्राहक उस वक़्त तक नहीं था । जाते ही सवाल दागा, थाली का क्या रेट है और उसमे क्या क्या मिलेगा ? जवाब भी तुरंत था, चार रोटी, चावल, दाल, सब्ज़ी, दही ; दुबारा कुछ नहीं मिलेगा उसके एक्स्ट्रा पैसे लगेंगे वैसे थाली का रेट साठ रुपया बताया। सुनते ही तुरंत गुप्त मंत्रणा हुई। आदेश हुआ, फटाफट एक थाली लगा दो जिसमे चावल के बजाय एक कटोरी दही एक्स्ट्रा कर दो और सब्ज़ी भी नहीं चाहिए उसके बजाय दाल एक्स्ट्रा दे दो। और खाना कितनी देर में लगा दोगे या पैक कर दो ? कितना टाइम लगेगा ? पांच सात मिनट में कर दोगे ? ढाबे वाले ने अजीब ढंग से हम जीन्स कुरता स्पोर्ट्स शू धारित प्राणियों को घूरा और कहा, बैठो तो अभी लगा देंगे थाली। हम दोनों एक कुर्सी टेबल घेर के बैठ गए।
सचमुच तुरंत बैठते ही थाली आ गई और हम लोग हड़बड़ हड़बड़ करते खाना शुरू हुए। उसी लम्हे हम दोनों लापता को ढूंढ़ते वही batchmate आया जिसको चिप्स बिस्कुट लाने भेजा था। उसका रिएक्शन ऐसा था कि ये कौन भुक्खड़ है जिनकी सूरत तो ...… ख़ैर, सवाल जवाब हुए ; तय हुआ कि भूख तो सबको लगी है, थाली का दाम वाजिब है, हम भी यहीं खाएंगे और बस वाले को रुकने का कह देते हैं वैसे भी बस में हमारी २० लोगो की बारात के अलावा और कोई था नहीं। और देखते ही देखते उस खाली ढाबे में एक कुर्सी भी खाली नहीं बची। सभी ने अपने लिए एक एक थाली मंगवाई। यानि हमारी कंजूसी या किफायतशारी की भरपाई बाकी लोगों से हो गई। या अपने मुंह मियाँ मिठ्ठू बनने के लिए कह सकते हैं कि हमारे आते ही उसकी ग्राहकी बढ़ गई। साठ रूपए की उस थाली में उस दिन दो प्राणियों का भरपेट भोजन हुआ; ऐसा सस्ता सुन्दर दाम और इतने मितभोजी ग्राहक, कहीं मिलेगा भला ??
वह यात्रा मेरी सबसे यादगार यात्रा है क्योंकि उस दिन मेरा जन्मदिन भी था और उस दिन चलती बस में जो केक काटा और सबने खाया वह भूल सकने जैसी स्मृति नहीं। उस दिन दो केक काटे गए थे, एक जो मैं हॉस्टल के किचन में रखवा के आई थी बाकी सब batchmates के लिए और एक यहां रास्ते में सेलिब्रेशन के लिए लाया गया था।
यह ओल्ड स्कूल का चार्म अजीब है जो स्मृतियों के कबाड़ से पुराने रिकॉर्ड खंगालता रहता है।
Image Courtesy : my mobile camera photography.
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Sunday, 29 November 2015
ज़िन्दगी का खटराग --- 2
घड़ी की टिक टिक दिन और रात के प्रहर बीतने की सूचना देती है लेकिन इस मौसम के बीतने के कोई आसार नहीं दिखते। ये एक लम्बी गर्मियों की तरह है जिसमे दिन कभी नहीं ढलता, दोपहर सुबह से शुरू होकर अँधेरा घिरने के बाद भी कुछ देर तक बनी रहती है और घड़ी लम्बे पॉज लेकर चलती है. और इस गर्म मौसम के पार कोई और मौसम है भी या नहीं इसकी भी कोई खबर नहीं। अक्सर इस थमे हुए दिनों वाले मौसम के लिए उस शख्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिसकी ज़िन्दगी में ये उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के छह छह महीनो वाला मौसम आकर रुक गया है. पर अक्सर खुद उस शख्स को भी नहीं होती कि आखिर इतनी तेज़ गति से भागने के बावजूद समय रुका क्यों है ? अनंत तक फैले हुए ये दिन किसी झिलमिलाती खुशनुमा साँझ तक क्यों नहीं पहुँचते ? यहां रात को नींद में सपने क्यों नहीं आते ? यहां शाम कब आती है और कितने बजे आती है और कब ख़त्म हो जाती है, इसके बारे में घड़ी देख कर क्यों नहीं पता चलता ?
कलैंडर में तारीखें बदलती हैं लेकिन मौसम नहीं बदलता। दिन बीत जाता है लेकिन वक़्त थमा हुआ ही लगता है. उत्तरी रौशनियों के साये और महासागर के गहरे रंग कभी एक नया मौसम बना सकेंगे ? समय का एक नया आयाम ? दिन और रात का कोई नया हिसाब जो चौबीस घंटो और सात, तीस, बावन, बारह और 365 की गिनती से अलग और घड़ी की पाबंदी से दूर हो ?
Friday, 12 June 2015
ज़िन्दगी का खटराग
Monday, 8 September 2014
मेरी पसंद की कुछ किताबें : एक अधूरी सूची
तो इस बार का indispire टॉपिक है, आपकी पसंद की टॉप टेन किताबें बताइये। अब पढ़ा तो बहुत है, स्कूल कॉलेज और फिर नौकरी करते हुए पब्लिक लाइब्रेरी तक … जो हाथ लगा वो सब पढ़ डाला। पर ऐसा टॉप टेन जैसा कभी कुछ सोचा नहीं। तो चलिए आज सोचते हैं, मेरी पसंद की टॉप टेन किताबें।
Submit a list of your 10 favourite books with reasons as to why they made it to your list. Let us try to complete a circle and compile a list of books we are yet to pick.#loveofreading
Friday, 29 August 2014
समय के संसार में
Tuesday, 1 July 2014
कार का कनेक्शन
Saturday, 7 June 2014
एक ब्लॉगर की गुस्से भरी कथा
कुछ समय पहले भी इसी मुद्दे पर एक Essay लिखा था





















