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Tuesday, 15 February 2022

भद्र लोक वाली महिला

"An Exotic Woman, A Delusional Woman, asking for Attention."  This is how I would like to start  my Blabber.


कुछ दो या तीन बरस हुए मुझे मेरे जन्मदिन पर एक नोटबुक तोहफे में मिली, जिसका कवर देखते ही मेरा मन उस पर अटक गया।  और साहब यह लीजिये उस कवर पर जो तमाम तस्वीरों के ठीक बीच में एक ब्लैक एंड वाइट ज़माने की जो दो भद्र लोक वाली महिलाओं की एक क्लिप थी, उसका मैंने आदि से लेकर अंत तक का विश्लेषण कर डाला।  अगर आप कोशिश करें तो उस तस्वीर को गूगल पर भी तलाश कर सकते हैं ; दरअसल उस ज़माने में यानि अँगरेज़ साहबों वाले दिनों में इन्हें "नाच गर्ल्स" कहा जाता था।  आम जनता, रईस, ज़मींदार,  साहब बाबू लोग तवायफ और कंजरी वगैरह कहा करते थे।  तो पूछिए या सोचिये कि आखिर आज मुझको यह क्या फफूंद आन  पड़ी, जो मैं इस अजीब से मुद्दे को यहां घसीटे जा रही हूँ।  दरअसल इस नोटबुक के शुरुआत के पन्नों में पाकीज़ा फिल्म का एक क्लासिक रंगीन पोस्टर है और उस में फिल्म के बारे में तवायफों के बारे में कुछ अंग्रेजी में विवरण वर्णन है. बस वही वर्णनं मुझे क्लिक कर गया।  


यह कहता है, "An Elegant Companion and A Potential Lover, A Glamorous Woman; well versed in poetry, music and dance. And my fellow citizens, this is what a woman would become when she doesn't get married till a certain age. Everybody around her acquaintance, looks at her or treats her as an opportunity to grab for . But Nobody bothers to see her as An Ultimate Choice or An Only Option. What an Irony !!!!!!


लेकिन अब इस एलिगेंट कम्पैनियन की भी एक उम्र है, एक वक़्त है, उस वक़्त की दहलीज के पार ना कोई कम्पैनियन है ना कोई लवर है ना कोई पहचान।  केवल एक कांटेक्ट लिस्ट है मोबाइल में, मुंह चिढ़ाती हुई सी।  ये बताती हुई कि किस कदर फ़िज़ूल लोगों की भीड़ है दुनिया में ; और मोहतरमा आप भी इस फ़िज़ूल भीड़ का ही एक बेहद नामालूम सा हिस्सा हैं। 
अब फैसला करिये कि आपको क्या बनना है ? किसी पैसे वाले का एलिगेंट कम्पैनियन,  या एक delusional ग्लैमरस भद्र लोक की attention  seeker , attention giver !!!! क्या सोच रखा है ?? कहाँ से यह अल्टीमेट चॉइस वाला ख्याली पुलाव दिमाग में घुस गया ? ऐसी भी क्या एलिगेंट या पोटेंशियल हैं ? यहां देखो, गली गली, सड़क चौराहे पर पोटेंशियल वालों की भीड़ लगी है।  

कहीं कोई आपके exotic होने को आपका ध्यान खींचने का तरीका समझ  लेगा तो क्या करियेगा ? क्या जवाब  दीजियेगा ? क्यों अपना ही मजाक बनाने पर तुली हैं !!! कुछ अपने ओहदे का, समाज में जो नाम है उसका ज़रा लिहाज़ करिये।  ज़माने की शराफत से चलिए, किसी दूर पास के  रिश्तेदार के किसी बच्चे पर अपनी करियर की मेहनत वाली कमाई खर्च करिये, उसे अपना वारिस या उत्तराधिकारी मान ही लीजिये।  वह जेवर जो कभी आपके लिए गढवाये थे वह अब किसी रिश्ते की भांजी भतीजी के ब्याह में उसे पहना कर दुनियादारी की तारीफ बटोरिये। क्योंकि अब यही तो तकाजा है दुनिया का।  

Who Am I ; Who Are You ? 
One Whom I like, treats me as a scapegoat. The Another One I like Thinks I am A Delusional Woman asking for Attention; an impossible thing.

P.S. --- This is a Blabber and not a Serious Work. Smile. 




Monday, 8 September 2014

मेरी पसंद की कुछ किताबें : एक अधूरी सूची




तो इस बार का indispire टॉपिक है, आपकी पसंद की टॉप टेन किताबें बताइये। अब पढ़ा तो बहुत है, स्कूल  कॉलेज और फिर नौकरी करते हुए पब्लिक लाइब्रेरी तक …  जो हाथ लगा वो सब पढ़ डाला। पर ऐसा टॉप टेन  जैसा कभी कुछ  सोचा नहीं। तो चलिए आज सोचते हैं, मेरी पसंद की टॉप टेन किताबें।


1.  आखिरी शब के हमसफ़र : इस वक़्त जो पहली किताब मेरे दिमाग आ रही  है. वो है  कुर्रतुल ऐन हैदर की लिखी मॉडर्न क्लासिक  ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता किताब। इस किताब में 1939 से लेकर बांग्लादेश के निर्माण के कुछ साल बाद तक का कालखण्ड शामिल किया गया है. ये किताब अपने लेखक की राजनीती, इतिहास, आर्थिक मुद्दों और सबसे ऊपर बंगाल के साहित्य पर ज़बरदस्त पकड़ को बताती है. ब्रिटिश नौकरशाही से लेकर साम्यवादी क्रांतिकारी आंदोलन, भारत में  ईसाई मिशनरी और उनका फैलाव, विभाजन से जुड़े मुद्दे, बांग्लादेश, मुस्लिम लीग की राजनीती जैसे कितने कितने ही विषय अपने आप में समेटे ये किताब किसी एपिक से कम  नहीं है. भारत से बाहर ब्रिटिश उपनिवेशों में रहने वाले अप्रवासी भारतीय, 70 के दशक का हिप्पी आंदोलन, विदेशों में रहने वाले भारतियों के  सांस्कृतिक अंतर्द्वंद और इन सबसे ऊपर इंसान के मनोविज्ञान की  गहरी समझ; कुर्रतुल ऐन  हैदर  ने इस किताब को एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया है जिस को छूना ही मुश्किल है उस तक पहुँच पाना तो और भी मुश्किल। 


2 . अफीम सागर :  इस किताब का रिव्यु मैं Here पहले ही कर चुकी हूँ. अमिताव घोष की लिखी इस किताब को बुकर प्राइज के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था. अंग्रेजी में इसे Sea Of Poppies कहा गया है.  इस किताब की खासियत है अफीम के त्रिकोणीय व्यापार जो भारत ब्रिटेन और चीन के बीच चलता था उसे अमिताव घोष ने बड़ी बारीकी से बयान किया है. अगर आप हिस्ट्री स्टूडेंट रहे हैं तो इस किताब को पढ़ते वक़्त आपको लगेगा कि  जो आजतक सिलेबस में था वो अब उपन्यास की शक्ल में आपके सामने है और अगर आपका इतिहास से दूर पास कहीं का वास्ता नहीं पड़ा तो भी आप इसे ज़रूर पढ़े क्योंकि इतने सीधे सरल तरीके से  आर्थिक और व्यापारिक इतिहास ( ईस्ट इंडिया कंपनी के अफीम व्यापार सन्दर्भ में )  आपको और कहीं शायद ही मिले। 

3. अग्नि की उड़ान : इस किताब को ज्यादातर लोग विंग्स ऑफ़ फायर के नाम से जानते हैं. जी हां हमारे देश के मिसाइल मैन और  भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए. पी. जे. कलाम की आत्मकथा है ये. इस किताब में उनके बचपन से लेकर अग्नि मिसाइल की लॉन्चिंग तक  लेखा  जोखा है. कलाम साहब का बचपन,  उनके स्कूल और कॉलेज का वक़्त, ज़िन्दगी के संघर्ष और फिर करियर के उतार चढ़ाव; इस किताब के ज़रिये मिसाइल मैन के टाइटल के पीछे की कहानी हमारे सामने आती है. इस किताब  खूबी है इसमें दी गई छोटी छोटी कविताएं जो खुद कलाम साहब ने ही लिखी हैं. 

4. रांगेय राघव की श्रेष्ठ कहानियां :  ये किताब रांगेय राघव की लिखी हुई कुछ बेहतरीन कहानियों का संग्रह है.  इसी के ज़रिये मैं पहली बार मिली "गदल" से. जी हाँ रांगेय राघव की गदल, हिंदी साहित्य की दस बेहतरीन कहानियों में एक है गदल.  और पहली ही बार जाना रांगेय राघव की कहानियों का जादू, उनकी कलम का चमत्कार। उन्होंने समाज के सबसे निचले तबके से लेकर सबसे ऊपर के वर्ग तक की कहानियां लिखी हैं, भाषा ऐसी कि  बस बाँध ले आपको, लगेगा जैसे वे पात्र खुद जीवंत होकर आपके सामने आ खड़े हुए हो.

5. स्मृति कलश : इस किताब को लिखा है शिवानी गौरापंत ने, इसमें उनके शांति  निकेतन में बिताये  स्कूल कॉलेज के दिनों, अपने शिक्षकों, साथियों, शांति निकेतन की अनोखी शिक्षा प्रणाली और सबसे ऊपर खुद गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यादें शामिल हैं. इस किताब ने मुझे बंगाल से, बांग्ला भाषा से, शांतिनिकेतन से और रवीन्द्रनाथ से मिलवाया। और ऐसा मिलवाया कि  लगता है शायद कभी किसी जन्म में, मैं बंगाल में ही जन्मी थी. 

6. एक वायलिन समंदर के किनारे :  ये नावेल कृष्ण चन्दर का लिखा हुआ एक बेहतरीन फिक्शन है. फुल मसाला स्टोरी  हिट बॉलीवुड फिल्म बन जाए ( श्ह्ह्ह, ये बात प्लीज एकता कपूर को ना बताना, वो इस कहानी का बेडा गर्क कर देगी)  जिसमे अजंता एलोरा की गुफाओं का जादू,  एक अजब गज़ब प्रेम कहानी, बीत चुके समय के  संगीतकार का आज के वक़्त में लौटना और ....  बस अब आगे खुद पढ़िए, मैं क्यों बताऊ पूरी कहानी ??? वैसे दूरदर्शन वाले इस पर एक सीरियल बना  के दिखा चुके हैं. 

7. प्रथम शैल पुत्री च :  हाँ ये थोड़ा अजीब टाइटल है लेकिन  सभ्यता का  आविर्भाव कैसे हुआ होगा यानी, वो जो आप इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं ना स्टोन ऐज, आदि मानव, प्रीहिस्टोरिक ऐज  वगैरह उसी को कहानी के ज़रिये बताया गया है. कैसे इंसान ने आग जलाना सीखा होगा, भाषा कैसे बानी, कैसे कैसे छोटे छोटे आविष्कार हुए होंगे, आस्थाएं, देवता कैसे अस्तित्व में आये ? कैसे इंसान ने खेती करना और फिर व्यापार  करना सीखा …  और फिर कैसे एक दिन भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु घाटी की सभ्यता पनपी।  और कैसे रहे होंगे उनके शहर, वे लोग और कैसे हमारे आज के मिथक और आस्थाएं उनके बीते वक़्त से जुड़ गए हैं. मायानन्द मिश्रा का लिखा एक शानदार कहानी संग्रह, इसे पढ़ते वक़्त लगेगा जैसे इतिहास खुद ही अपनी कहानी सुनाने बैठ गया हो.

8.  गली आगे मुडती है :  शिव प्रसाद सिंह का लिखा "काशी  त्रयी" की पहली क़िस्त वाला उपन्यास।  ये उपन्यास बनारस यूनिवर्सिटी की राजनीती के इर्द गिर्द बुना  गया है, इसमें  आपको बनारस के  वर्तमान की कुछ झलक मिलेगी। आस्थाओं, विश्वासों, चमत्कारों  का शहर, भारत का प्रतीक बनारस  और  उसकी समस्याएं। एक बढ़िया किताब, दूरदर्शन वालों ने इस पर एक सीरियल भी बनाया था.  

9. बस भाई अब आगे और लिखने का अभी मेरे पास टाइम है नहीं और indispire का टाइम ख़त्म होता जा रहा है. और फिर बाकी दो किताबे अभी मुझे याद आ भी नहीं रही, जैसे ही याद आएगी, अपडेट कर दूँगी, तब तक के लिए स्टे इन टच. 


Wednesday, 7 November 2012

ज़िन्दगी आधी हकीकत आधा फ़साना : भाग 2


उसी चौराहे पर, उन भिखारियों की हंसी में। फिर से जैसे वो  बेचैनी का माहौल लौट आया जब वीरेन अपने से ही लड़ता, अपने ही रचे संसार में खुद को तलाशता और आखिर में आईने में परछाइयां देखकर रो पड़ता। एक बवंडर मचा था उसके भीतर जो बाहर किसी को न दीखता था ना सुनाई देता था .. किसी को उसकी आहट  तक ना थी .. पर वीरेन हर रोज़ उस तूफ़ान से संघर्ष कर रहा था। हर रोज़ पूछता था सवाल कि  "तुम कौन हो?  क्यों चले आये हो ? वापिस क्यों नहीं चले जाते ?  क्यों मुझे सता रहे हो ? मैं तुमसे लड़ना नहीं चाहता .. चले जाओ .. "  एक रात यूँही हमेशा की तरह नींद गायब थी,  वो उठा और चुपचाप घर से बाहर निकल गया, किसी को पता  नहीं पड़ा .. चलता गया सड़क  पर .. ऐसा लगता था जैसे वो बंधनों में बंधा है और उसे मुक्ति की तलाश है .. छुटकारे की ..


" इस तरह टुकड़ों टुकड़ों में हारने से, हर रोज़ थोडा थोडा रोने से एक बार हमेशा के लिए हार जाना ... एक बार ही सही हमेशा के लिए जीत जाना ... हाथों की लकीरें या किसी किस्मत नाम की परछाई या निरुद्देश्य से जीवन की परिस्थितियों से हारना ... ?"

"नहीं ये नहीं होगा .. मैं ये नहीं होने दूंगा।। अपनी ज़िन्दगी पर, इस आज पर, इस लम्हे पर तो मेरा ही अधिकार है ... " वीरेन जोर से चीखा , उसकी आवाज़ सुनसान रात में गूंजती रही .. घरों में सोये लोगों को खबर तक न हुई, चौकीदार ने इसे किसी पागल की हरकत समझ कर अनसुना कर दिया।  

वीरेन फिर चीखा .. " मैं इस ज़िन्दगी को वहाँ ले जाऊँगा जहां सारी  ख्वाहिशें ख़त्म हो जायेंगी .. जहां कुछ बाकी नहीं रहेगा ... जहां एक बार फिर मैं अपनी सारी  कमजोरियों  और  नाकामियों से जीत जाऊँग .. मैं दिखा दूंगा इस दुनिया को, ऋचा को ... " चीखता गया वीरेन और भी जाने क्या क्या। तभी लगा जैसे सामने कोई खड़ा है, एक धुंधली सी आकृति, उस बदहवासी की हालत में भी उसके कपड़ों से  वीरेन ने अंदाज़ा लगाया कि  कोई लड़की है पर चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा, अँधेरे में ही खड़ी है। फिर एक हंसने की आवाज़ आई ... "क्या हुआ है तुमको? क्या चाहिए ? घर लौट जाओ , सो जाओ।  " 

"तुम कौन हो? अपना काम करो". 
"मैं ..!!! " फिर से हंसने की आवाज़ आई .... "मैं वही हूँ जिस से तुम भागते फिरते हो, तुम्हारी परछाई, तुम्हारी सांसें, तुम्हारा वजूद, मैं तुम्हारे ही हाथों की लकीरों में रहती हूँ। "  इतना कहते उसना अपना हाथ बढाया वीरेन की तरफ जैसे आगे आकर उसका हाथ पकड़ लेगी। पर वीरेन थोडा पीछे हटा .. "दूर हटो, मुझसे दूर रहो ... पास मत आना" .. डर  वीरेन के चेहरे पर था और उसके पैर कांपने लगे। पर फिर  उसने हिम्मत जुटाई, "तुम सोचती हो कि  मैं तुमसे हार जाऊँगा,  तुम मुझे बाँध कर रखोगी और मैं देखता रहूँगा .. ऐसा नहीं होगा ... कभी भी नहीं होगा .. तुम देखना .. अब तुम देखना .."  और वीरेन ऐसे ही बोलता गया .. अँधेरे में, पीछे हटता रहा, हंसने की आवाज़ सुनाई देती रही फिर धीरे धीरे गायब हो गई।            

और फिर सूरज निकला, सुबह हुई .. वीरेन कहीं रास्ते में किसी पेड़ के नीचे एक पत्थर पर बैठा है . अब उसका मन शांत है पर बेहद थका हुआ है .. पर जैसे उसने कोई फैसला ले ही लिया है।  घर लौटा तो देखा,  पापा और मम्मी और उसका छोटा भाई  तीनों बाहर बरामदे में ही खड़े हैं, "क्या मेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं? "  पर उसने कुछ कहा नहीं, नज़र बचा के निकल जाने का सोचा पर कुछ सवाल आये, कहाँ थे, कब गए ,  माँ का उलाहना, भाई का खामोश गुस्सा ... पर वीरेन निकल ही गया।  आज सीधा ही आश्रम चला गया।  स्वामी अमृतानंद से पूछने को  कोई  सवाल नहीं था पर कहने को बहुत कुछ था। 

बावन साल के उस आदमी ने जिसके चेहरे पर अनुभव और परख की लकीरें थीं, जिसने वीरेन से भी छोटी उम्र में गेरुए रंग को अपना लिया था  ... सब सुना, समझा और  कुछ देर की चुप्पी के बाद समझाने के तरीके से कुछ बातें कहीं। पर थोड़ी देर में ही जब लगा कि  वीरेन नहीं सुन रहा, नहीं मान रहा तब स्वामी अमृतानंद को शायद गुस्सा ही आ गया .. " क्या सोचते हो, संन्यास लेना कोई मज़ाक है,  कोई खेल है, कोई नया शौक है या बाज़ार में बिकने वाली कोई चीज़ कि  तुम जाओ और पैसे देकर खरीद लाओ। यहाँ खुद को, अपनी हर ख्वाहिश को कुर्बान करना होगा, घर, परिवार, दुनिया के ये सारे नज़ारे, ये  तुम्हारी लाइफस्टाइल सब छोड़ देना होगा।  ये जो आज इतने महंगे कपडे पहने हो, कार में घूमते  हो, दोस्तों के साथ पार्टी  करते हो,ये सब छोड़ देना होगा .... कर सकोगे क्या ... सारी ज़िन्दगी ये सादे सफ़ेद और गेरुए कपडे पहनने होंगे, ज़बान के स्वाद और पसंद नापसंद सब भूलना होगा .. शादी -ब्याह तो भूल ही जाना .. किसी लड़की का ख्याल भी मन में ना लाना .. कर सकोगे?"  सवाल में चुनौती थी, व्यंग्य था, उपेक्षा थी और साथ ही सामने वाले को तौलने की खनक भी थी।                      

"मैं कर लूँगा .. मैं ये सब जानता हूँ .. और मैं आप को और खुद को निराश नहीं करूँगा ." 

"हमारा  आश्रम  और इसकी छत, दुनिया से भागने वाले का ठौर ठिकाना नहीं है, यहाँ वही रह सकेगा जो खुद को पूरी तरह मिटा सके और गुरु की आज्ञा  का पालन हर हाल में कर सके।" 

और उस दिन ये बात यहीं रह गई, वीरेन का फैसला तो नहीं बदला पर उस वक़्त उसने ज्यादा बहस भी नहीं की।  फिर कुछ महीने और बीते।  वीरेन अब भी आश्रम आता  था .. और अक्सर अपनी यही ख्वाहिश दोहराता था .. घर वाले भी अब जान ही गए, माँ ने स्वामी अमृतानंद को साफ़ शब्दों  से कह  दिया था कि  वो अपने बेटे को नहीं जाने देंगी।  पर अब वीरेन ने आश्रम  को ही अपना दूसरा घर बना लिया था .. जो और जैसा काम स्वामी जी  बताते वीरेन करता .. भूल गया कि  वो किसी प्रसिध्द बिज़नेस  कॉलेज का डिग्री होल्डर है ,  उसे कैंपस इंटरव्यू में एक अच्छा खासा पैकेज मिला था। लेकिन वो सब छोड़कर वो यहाँ अपने घर किसी और मकसद आया था, अपने फॅमिली बिज़नस को expand करने के लिए।  अब उसे कुछ और ही करना था, कहीं और, किसी अनजाने लेकिन सबसे अलहदा रास्ते पर चलते जाना था .. ऐसे रास्ते पर जहां उसका अस्तित्व भी मिट जाए पर फिर भी वो सबसे उंचा उठ जाये ... 

आखिर वो वक्त भी आया, वीरेन को ना माँ का रोना और पुकारना रोक पाया और ना पिता का पथराया हुआ चेहरा ...

जिस आश्रम में वीरेन और माँ जाते थे वो असल में ऐसे कई आश्रमों की श्रृंखला का एक हिस्सा था  .. और पूरे देश में उनके ऐसे कई आश्रम थे .. अनेक शहरों में, शायद लगभग हर शहर में।  और इन सबका एक  केन्द्रीय स्थान था, जो महाराष्ट्र में कहीं था।   जिसे इस सम्प्रदाय का तीर्थ कहा जाता था। यहीं से बाकी सब आश्रमों को superwise  किया जाता था, और यहीं उन लड़के लड़कियों का प्रशिक्षण भी होता था जो अपना घर और इस तथा कथित नश्वर संसार को त्याग कर आध्यात्मिकता की राह पर चल पड़ते थे। वीरेन का नया पता ठिकाना भी यही जगह थी। 

यहाँ आने के बाद वीरेन को समझ आया कि  जितना वो इस आश्रम को जानता था ... ये उस से कहीं ज्यादा जटिल और विस्तृत संगठन है।  और  महज घर छोड़कर  यहाँ चले आना ही संन्यास नहीं ... असल सफ़र तो अब शुरू हुआ .. कई तरह की औपचारिकताएं हुई,  जिनमे सम्प्रदाय के प्रमुख से मिलने और उसे एक नया नाम देने की रस्म सबसे महत्वपूर्ण थी।  ये नया नाम वीरेन की नई  ज़िन्दगी, एक नए जन्म और उसकी आत्मा के नए रूप में ढलने का सूचक है .. ऐसा  श्री महाराज स्वरूपानंद ने फ़रमाया .. वीरेन को भी यही लगा .. और अब वो वीरेन नहीं था .. अब उसका नाम था  "राम" .. वीरेन को ये नया नाम पसंद भी आया।  और हाँ अब उसके बाल भी काट दिए गए। अब उसे सिर्फ सफ़ेद कपडे ही पहनने थे।  पर अभी आगे और रास्ता बाकी था .. बाकायदा साधु  बनने का प्रशिक्षण शुरू हुआ .. जिसमे   धर्मग्रंथों का, आध्यात्म का और गुरुवाणी  की गहरी जानकारी दी गई। आश्रम के सन्यासियों की क्या जिम्मेदारियां है, क्या उद्देश्य होने चाहिए, किस तरह उनको मोह माया के जाल में फंसे बेचारे संसारी मनुष्यों को "सच्चे सुख",  "कल्याण" और  मोक्ष के मार्ग  पर ले जाना ये सब आश्रम के सन्यासियों की ही ज़िम्मेदारी है। दुनियादारी के फेर में फंसे इंसानों को ज्ञान की  रौशनी देना, उनको उस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करना ... ये सब जिम्मेदारियां निभाने के लिए  और उसके साथ और भी कई लड़के लड़कियों को जो उसी की तरह अपना घर और दुनिया के सारे आकर्षण छोड़ आये थे .. उन सबको प्रशिक्षित किया गया। 

और फिर  एक दिन आया जब सब नए recruits को अलग अलग शहरों में भेज दिया गया .. किसी ना किसी आश्रम में .. किसी सीनियर "स्वामी" या महात्मा के निगरानी में  सीखने-समझने और नए माहौल में ढलने  के लिए ... वीरेन को भी फिलहाल महाराष्ट्र के ही किसी छोटे से शहर में भेज दिया गया। हाँ इस बीच कभी कभी घर याद आता  था ..अब कभी कभी तो क्या होता है , घर तो सबको याद आता ही है .. घर के लोगों से कितना भी नाराज़ हो,  उनकी याद तो आती ही है। पर अब जो एक बार इस रास्ते पर पैर रख दिया तो पीछे लौटना संभव नहीं .. कुछ वक़्त तक माँ और पापा वीरेन की खोज खबर  की कोशिश करते रहे पर आखिर उन्हें स्वामी अमृतानंद ने समझाया .. "अब वीरेन तुम्हारा बेटा  नहीं है  अब वो हमारा हो गया है , आश्रम का, इस पंथ का, उसका जन्म  एक बड़े उद्देश्य के लिए हुआ है .. क्यों उसके रास्ते में रुकावटें खड़ी  करते हो .."

लेकिन वीरेन का  मन अभी भी भटकता है .. अक्सर सोचता है कि  दुनिया को रौशनी  दिखानी है, उनको राह दिखानी है पर खुद उसे ही अपनी राह का अता  पता नहीं . वो चला आया है यहाँ पर क्या सच में वो बन सकेगा जो उस से  उम्मीदें है  ?? नहीं जानता ... नहीं समझता .. पर इतना तो जानता ही है कि  अब वो कोई मामूली इंसान नहीं रहा.. अब वो  "राम"  है .. "वीरेन"  अब उस से अलग हो गया है , ऐसा लगता है कि  जैसे उसने अपने पुराने शरीर को छोड़ कर  जीते जी ही नया शरीर, नया रूप धारण कर लिया है , बहुत हल्का और शांत चित्त महसूस करता है अब "राम" ... 

आखिर उसे एक साल के बाद  गुजरात के किसी शहर में स्वतंत्र रूप से भेज दिया गया, आश्रम संभालने के लिए .. अब यहाँ  उसके अलावा एक वरिष्ठ सन्यासिनी और भी है जिसे सब बहन जी कहते हैं .. सब अच्छा ही लग रहा था, लोग आकर पैर छूते हैं, आशीर्वाद लेते हैं,  रोज़ सुबह शाम कुछ प्रवचन भी देने होते हैं दोनों समय की आरती और पूजा के बाद, आश्रम की सार संभाल और हाँ, नए आये हुए संत को जो अभी इतनी छोटी उम्र का है .. लोग अपने घर भी बुलाते ये कह कर कि  स्वामीजी अपने चरण तो फेर जाइए हमारे घर से .. कुल मिलाकर इस नए माहौल, नई  जिम्मेदारियों और नई भूमिका ने   वीरेन को  सम्मोहित कर दिया  है।  वीरेन को देखकर लोग हैरान होते, जब उसके गुज़रे जीवन की थोड़ी बहुत जानकारी पाते (उसकी शिक्षा, नौकरी, पारिवारिक पृष्ठभूमि ) तो  कहते ... " इतना पढ़ा लिखा, ऐसा सुन्दर सुदर्शन लड़का और  इतनी छोटी उम्र में वैराग्य .." 

वीरेन अपना लैपटॉप साथ लाया था, जिसमे अब भजन -- कीर्तन, प्रवचन के विडियो  सेव किये हैं। वीरेन का प्रवचन सचमुच बहुत गंभीर, गहन और प्रभावपूर्ण होता, साफ़ ज़ाहिर होता था कि  जो कुछ उसे सिखाया पढाया.. उसने , उस से कहीं ज्यादा जान लिया है।  आश्रम आने वालों को वीरेन सचमुच  highteck  सन्यासी लगता था।  औरतें, लडकियां उसे देखतीं और विश्वास ना कर पाती कि  इतना खूबसूरत नौजवान सफ़ेद कपड़ों में सन्यासी बन कर आश्रम आया है।  वीरेन, लोगों के इस असमंजस और आश्चर्य को देखता समझता और कहीं ना कहीं दिल में खुश भी  होता, लगता जैसे कुछ achieve  कर लिया .. आखिरकार कुछ ऐसा जो बहुत ऊँचे और गैर मामूली दर्जे का है, असाधारण है !!!! ...कोई सोच भी ना सके जो वो मैंने कर दिखाया .. (हाँ सही समझे, थोडा अहंकार आ ही जाता है इंसान में इतना सब झेल जाने के बाद फिर वीरेन को ही दोष क्यों दें ). 

शुरू के कुछ खुशनुमा  हफ़्तों के गुजरने के साथ साथ अब वीरेन आश्रम के कुछ प्रमुख लोगों को भी जानने लगा, प्रमुख यानी ऐसे लोग लगभग हर जगह मिल जायेंगे जो हर तरह की गतिविधि में, प्रबंधन में आगे रहते हैं और  धार्मिक आश्रम जैसी जगहों पर तो इनका होना बेहद ज़रूरी है, आखिर यही लोग सबसे ज्यादा चंदा देते हैं, हर बार जब कोई बड़ा खर्च हो या ऐसा कोई मौका हो तो उसमे उनका अच्छा खासा आर्थिक योगदान होता है।  आश्रम के बड़े स्वामी और महाराज भी विशेष निमंत्रण पर  कभी कभी  इन्ही लोगों के घर आकर रुकते हैं और इनकी गाड़ियाँ इस्तेमाल करते हैं। आश्रम के दिन प्रतिदिन के प्रबंधन और नियंत्रण में इन लोगों की बड़ी - छोटी  सारी  भूमिकाएं रहती ही हैं, कह लीजिये कि  इनके बिना आश्रम का कोई काम हो नहीं सकता (ऐसा ये लोग मान के चलते हैं, यानी कि  आश्रम ना हुआ इनकी व्यक्तिगत सम्पति हो गई)  और यही एक बड़ी वजह भी है कि  आश्रम के सन्यासियों को भी थोडा बहुत इन लोगों के अनुसार चलना ही होता है, इनके दखल को सहन भी करना होता है। वीरेन को शुरू में तो इस सब का इतना ज्यादा अहसास नहीं हुआ पर  कुछ त्योहारों के सत्संग वाले दिनों में ये बात कुछ हद तक वीरेन  को समझ  आई, जब उसने  देखा कि  आश्रम में होने वाले लगभग हर काम पर एक ख़ास व्यक्ति का नियन्त्रण है .. रमण भाई .. बाकी के सब लोग हर बात में उनसे सलाह ज़रूर ले रहे हैं। 

आश्रम में एक सेवा समिति है जो साफ़ सफाई से लेकर दोनों  समय की आरती -पूजा और प्रसाद बांटने तक के सारे काम संभालती है। यहाँ तक कि  कौन सदस्य क्या काम करेगा और कौनसा नहीं करेगा, ये भी  है और तय करते  हैं रमण भाई।  आरती के समय समिति के सदस्य ही आरती का थाल लेकर खड़े हो सकते हैं, बाकी लोग केवल थाल  को हाथ लगा हाथ जोड़ कर ही संतुष्ट हो लेते हैं। प्रसाद बांटने के वक़्त रसोई और भण्डार पर जैसे सेवा समिति के सदस्यों का वर्चस्व हो जाता है ...कोई वहाँ आ नहीं सकता, आएगा तो उससे वजह  पूछी जायेगी और फिर डांट  के भगा दिया जाएगा।  एक दो बार वीरेन ने ऐसा देखा तो रोकने और समझाने की कोशिश की लेकिन कुछ हुआ  नहीं। रमण भाई की भुवन मोहिनी हंसी के सामने  किसी की नहीं चल सकती। वीरेन को महसूस हो रहा था कि  रमण भाई का दखल कुछ ज्यादा है .. पर उनका प्रभाव कितना है इसका अंदाज़ा उसे तब हुआ जब उसने सेवा समिति में अपनी मर्ज़ी से कुछ लोगों को शामिल करने की कोशिश की।  पर जल्दी ही उन नए लोगों को और खुद वीरेन को समझ आ गया कि  वे लोग  सिवाय डेकोरेशन पीस के कुछ नहीं।  कुछ लोगों ने वीरेन से शिकायत भी की और  वीरेन ने कुछ कह सुन कर सामंजस्य बिठाना भी चाहा ...

"अरे राम दादा आप क्यों  परेशान  होते हैं, हम लोग सब संभाल रहे हैं, नए लोगों की ज़रूरत ही नहीं। हम सब कर लेंगे। आप अपना काम  संभालिये, इतने वक़्त से मैं, संजीव, रोहन और मनीष और हमारे बाकी लोग ये सब काम कर रहे हैं .. आप क्यों उलझते हैं इसमें " ये रमण भाई की स्नेह भरी वाणी थी।  वीरेन बहुत कुछ देख रहा था, प्रसाद बनता है और बहुत बनता है, कोई कमी नहीं है भगवान् के दरवाजे पर .. पर सही ढंग से तो केवल आगे की कतार में  लोगों को ही मिलता है, जो पीछे बैठे हैं  उनको तो सिर्फ खानापूर्ति भर का मिलता है।  और जिनको रमण भाई नया कह रहे हैं असल में  वे कोई कल के आये हुए श्रद्धालु नहीं, बरसों से आ रहे हैं आश्रम पर ...

पर वीरेन भी कहाँ मानने वाला  था .. उसने अगली बार गुरु पूर्णिमा के त्यौहार के समारोह के लिए अपनी एक योजना बनाई, जिसमे लंगर का मेनू, आश्रम की सजावट और यहाँ तक कि  उसने कुछ और लोगों को भी, इनमे कुछ बुजुर्ग और कुछ लड़के शामिल थे, इनको अलग अलग कामों की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी।  तैयारी के एक दो दिन ठीक ही बीते लेकिन फिर सेवा समिति के संजीव और रोहन कुछ अनमने से दिखे .. फिर रमण भाई ने नए सेवादारों के काम पर ऐतराज जताया ..गुरुपूर्णिमा का त्यौहार तो वीरेन की पसंद के हिसाब से हो गया  पर अगले ही दिन स्वामी प्रकाशानंद का जो सम्प्रदाय के प्रमुखों में से एक थे, उनका फोन आया वीरेन को, पहले हाल चाल पूछते रहे, फिर पूछा कि  सब कुछ ठीक चल रहा है ना ... कोई समस्या .. 

उनके आने का प्रोग्राम तय था दस दिन बाद का ... वे आये और तीन दिन रहे ... बहुत धूम रही, लगातार भजन कीर्तन के कार्यक्रम चलते रहे .. सुबह यहाँ शाम वहाँ, लोगों  की भीड़ लगी रही उनके दर्शन के लिए .. यहाँ फिर वीरेन ने देखा कि  "बहन जी"  "कुछ"  लोगों को तो  बहुत तसल्ली से स्वामी जी से मिलवा रही हैं,  उनका परिवार समेत परिचय भी करवा रही हैं, वहीँ बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो बस आते और यूँही माथा टेक कर चले जाते उनको जल्दी प्रसाद देकर रवाना कर दिया जाता,  परिचय आधा अधूरा सा होता और बस ... ऐसा भी नहीं था कि  वे लोग  "भेंट" कम देते हैं या आश्रम को दिया जाने वाला चंदा बहुत कम है, पर फिर भी सालों से आने के बावजूद उनका कोई ख़ास वजूद नहीं था। 

रात को सब तरह से फुर्सत मिलने के बाद स्वामी प्रकाशानंद ने वीरेन को अलग से बुलाया और कमरा बंद कर के काफी देर को समझाते रहे या कहते रहे .. और उनके कहे का सार यही था कि  जैसा लोग चाहते हैं, जैसा चल रहा है, चलने दो , इसी में उनकी ख़ुशी है , हम सन्यासी हैं, हमें आज यहाँ और कल कहीं और जाना है, क्यों इनके काम में दखल देते हो।  तुम्हे यहाँ जिस उद्देश्य से भेजा गया है बस उतने पर ही ध्यान दो।  अब वीरेन बस यही नहीं समझ पाया कि  उसे "किस उद्देश्य" के लिए भेजा गया है .. "लोगों को ज्ञान की रौशनी दिखाने के लिए ?????????? 

खैर, दिन गुजरे,  अब एक और बात वीरेन को दिखाई देने लगी ... शुरू  में तो  उसने खुद को ही लताड़ा कि  क्या वाहियात चीज़ें सोच रहा है ... पर फिर यकीन हो गया .. कई दिनों से देख रहा था वीरेन,  कुछ लडकियां और औरतें (जी हाँ जवान, मध्यम  आयु की, सभी ) अक्सर जब आश्रम आती हैं तो वजह बिना वजह उसके कमरे में भी चली आती हैं .. और कुछ नहीं तो यूँही नमस्कार करने, प्रणाम करने, पैर छूने ....  वीरेन उनके कपड़ों को देखता है और सोचता है कि  क्या और कितना  फर्क है इस छोटे शहर की औरतों में और उन बड़े मेट्रोज की क्राउड में ... फिर सोचता .. आखिर तो सब इंसान ही हैं , अन्दर से सब एक से ... पर उन लड़कियों का इस तरह बार बार आकर कमरे में बैठ जाना .. वीरेन को परेशान करने के लिए काफी होता ... और वीरेन इतना भी मूर्ख नहीं कि  नज़रों के भाव ना समझ सके .. पर उसे पता है कि  वो क्या कुछ पीछे छोड़ आया है और इन लोगों को नहं पता कि  ये सब आकर्षण और लालसाएं अब अर्थहीन हो गई हैं।

जैसे जैसे दिन गुज़र रहे थे, वीरेन रमण भाई और उनकी "जागीर" बन गए आश्रम  के रंग रूप को देखता और हैरान होता जाता कि  भगवान् के दरवाजे पर भी लोगों को आपस में छोटी छोटी बातों के लिए लड़ने  और राजनीति  करने से फुर्सत नहीं।  "ये  सेवा मेरे जिम्मे  है, सिर्फ मैं ही कर सकता हूँ, आपने क्यों हाथ लगाया ..." " सब लोग लाइन में खड़े रहिये।। ऐ अम्माजी, कहाँ लाइन से बाहर  जा रही हो .." " क्यों क्या काम है, यहाँ क्या कर रहे हो ... पीछे बैठो, इस जगह पर हम बैठते हैं .." और भी पता नहीं क्या क्या .. वीरेन ने कई बार इस सब को रोकने और समाधान की कोशिश की पर बेकार गया .. उसकी बात को सुना अनसुना कर सेवा समिति के लड़के अपनी मनमानी करते रहते ..   


 यहाँ तक अब कई बार रमण भाई वीरेन को भी झिड़क देते थे।

"वैसे राम दादा, कितना  वक़्त हो गया  आपको ये चोला धारण किये हुए .." सवाल था या व्यंग्य समझना कठिन था .

" यही एक साल हुआ होगा .. "

"बस !!!!! .. मैं तो अपने पिता के समय से आ रहा हूँ आश्रम में और तब से ही  ये  सारी व्यवस्था संभाल रहा हूँ। आज तक कितने ही संत आपके जैसे यहाँ आये और गए .. सब के साथ मेरा अच्छा सम्बन्ध रहा .." 

अब इसका अर्थ समझना  मुश्किल नहीं  था।  वीरेन समझ गया कि  रमण भाई के  साम्राज्य में हरेक को सोच समझ कर चलना होगा .. उसने "बहनजी" को बता कर कुछ समाधान करने की कोशिश की। पर वहाँ  बेहद ठंडा  जवाब मिला और उसकी वजह भी जल्दी समझ आ गई .. आश्रम की रसोइ में modular किचन लगवाने की तैयारी हो रही थी। और उसका पूरा खर्च रमण भाई और उनकी सेवा समिति के कुछ सदस्य उठा रहे थे। 

और फिर एक दिन, शाम को स्वामी प्रकाशानंद का फोन आया ... "राम, तुमको छत्तीसगढ़ भेज रहे हैं .. आज रात ही कोशिश करो रवाना होने की।" 

"पर स्वामी जी, अभी तो यहाँ आये सिर्फ आठ महीने ही हुए हैं, अभी तो यहाँ .."

"राम, सन्यासी का कोई निश्चित ठिकाना या घर नहीं होता और ना किसी जगह से इतना मोह पालो ..वैसे भी तुम यहाँ ठीक से संभाल नहीं पा रहे .."

"क्या ...???"       

       
To Be Continued.. 
     
 

  1st Part of The Story is Here

The Story, Charactors and Events are all FICTIOUS.
  



    
   

  



Thursday, 25 October 2012

ज़िन्दगी : आधी हकीकत, आधा फ़साना भाग --1

छत का पंखा तेज़ गति से चल रहा था .. नवम्बर के आखिरी दिन थे और ऐसी कोई गर्मी भी अब नहीं थी। लेकिन ऐसे  में भी  वीरेन के माथे से  पसीना बह रहा था। उसकी आँखें छत के पंखे को घूर रही थी, एकटक ... कमरे में जीरो बल्ब जल रहा था जिसकी हलकी रौशनी में उसका भावहीन  चेहरा   और पथराई आँखें एक डरावना  दृश्य बना रही थी।  अचानक वो उठा,  एक झटके से और तेज़ क़दमों से अपने फ्लैट से बाहर निकल गया .. चलता गया .. सड़क पर भीड़ है, ट्रैफिक का शोर है पर वीरेन को कुछ नहीं दिख रहा .. कोई उसे नहीं देख रहा । किसी ने उसकी तरफ ध्यान भी नहीं दिया।  वो चलता गया , कोई उस से टकराया तक नहीं .. सब जैसे  आज वीरेन से नज़र बचा कर, अपना कंधा बचा कर ही निकल रहे थे। आज वीरेन अकेला है .. आज इतनी बड़ी दुनिया में  उसका एक छोटा सा कोना भी नहीं।  ऐसा कैसे और क्यों हो गया ... क्या गलत हो गया .. कौन गलत था .. कौन, कितना गलत या सही था .. और अब आगे ?? और जो पिछला बीत गया .. ?? क्या सब बीता हुआ वक़्त हो गया ? क्या कुछ नहीं लौटेगा ? क्या कोई भी नहीं लौटेगा ?  क्या कभी कोई मुझसे फिर से बात नहीं करेगा वैसे ही जैसे पहले था ?  क्या, क्यों, कैसे ??? सवाल ही सवाल .. बवंडर सा मचा है उसके अन्दर .. उसका दिमाग चकराने लगा है ... लगता है जैसे अभी  गिर पड़ेगा .. पर वीरेन चलता गया .. उसका गला सूख रहा है ... नवम्बर की गुलाबी सर्दी की जगह जून की तपती दोपहर ने उसके शरीर और आत्मा को घेर लिया है .. उसकी आँखें सड़क पर फिसल रही है पर कहीं रूकती नहीं .. आखिर उसे रुकना पड़ा .. पैर कहीं टकराया है, शायद पत्थर है .. उसका सर घूम रहा है ..


वीरेन कब घर वापिस लौटा उस खुद  ही खबर नहीं .. कैसे लौटा, नहीं पता .. वही बिस्तर है, छत का पंखा और उसको घूरती दो आँखें .  पिछले चार दिन से यही चल रहा है .. दोस्तों, परिवार वालों को नहीं पता कि  वीरेन कहाँ है .. उसके फोन पर मिस्ड कॉल्स और sms की संख्या बढती ही जा रही है .. पर उसने एक बार भी नहीं देखा ... खुद वीरेन को नहीं पता कि वो खुद कहाँ है .. लेकिन  ऋचा इस समय   कहाँ है , ये उसे ज़रूर पता है ... और उसे सवाल पूछने हैं ऋचा से .. पूछ भी चुका  है पर जितने जवाब सुनता है उतना ही उसके अन्दर के  तूफ़ान की चीखें बढ़ने लगती हैं।  



" क्या सिर्फ यही वजह है? क्या सिर्फ यही स्पष्टीकरण है तुम्हारे पास? और वो सात साल उनके लिए क्या कहोगी ? ये सब तुमने पहले नहीं सोचा था या तुम्हे पता नहीं था ? "


"देखो वीरेन , तुम जानते हो मुझे .. मैं अपनी सारी  ज़िन्दगी यहाँ नहीं गुजारना चाहती ... इतनी पढ़ाई लिखाई और उस पर इतना इन्वेस्टमेंट क्या यहाँ भारत में रहने के लिए किया था ..मैंने कभी नहीं सोचा था  कि  तुम अपने अच्छे  खासे  करियर और नौकरी के अवसरों  को छोड़ कर मध्यप्रदेश के किसी छोटे से शहर में  ये फॅमिली बिज़नेस  संभालने के लिए चले आओगे ।" क्या तुम कह सकते हो कि  तुम वही वीरेन हो जिस से मैंने कॉलेज में प्यार किया था ?"

" लेकिन ऋचा ये कोई मामूली बिज़नेस  तो नहीं .. पैसा है, पोजीशन है,  स्टेटस है सोसाइटी में .. और क्या चाहिए ?"

"मुझे यहाँ नहीं रहना .. जैसी ज़िन्दगी मुझे चाहिए वो तुम मुझे नहीं दे सकोगे। ज़रा देखो इस disgusting  शहर को ... क्या मैं यहाँ रहूंगी ? मैं अपनी लाइफ स्टाइल क्या तुम्हारे इस नए एडवेंचर या वेंचर के लिए बदल डालूँ ... क्या मैं अपनी सारी   ज़िन्दगी यहाँ इन मुर्गीखानों में गुज़ार दूँगी? "

"नहीं वीरेन, मुझसे ये नहीं होगा .."

और ऋचा चली गई, कनाडा .. अपने पति के साथ, जो वहाँ का परमानेंट सिटीजन कार्ड होल्डर भी है।   


सब बेकार है, बकवास है, a big bullshit ..
वीरेन अपने आप में ही बोले जा रहा है .. छत का पंखा वैसा ही तेज़ चल रहा है।  उसका चेहरा विवर्ण  होता जा रहा है .. आईने के सामने खडा वो चीख रहा है, उसी पागलपन की हालत में उसने कांच को जोर से मार कर तोड़ दिया .. उसके हाथ और बांह से खून बहने लगा  और  तभी एक धारदार कांच का टुकड़ा उसने अपने हाथ में उठा लिया .. और शायद वो टुकड़ा अभी अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ता इसके पहले ही दरवाजे पर घंटी बजी । और ऐसा लगा जैसे वीरेन एकदम से किसी गहरी नींद से जागा हो .. कांच का टुकड़ा हाथ से गिर गया .  कुछ देर बाद जाकर उसने दरवाजा खोला ... वहाँ अब कोई नहीं था।


"बेटा  कब तक ऐसा चलेगा .. कब तक तू ऐसे ही .."

"प्लीज माँ .."

"अच्छा , सुन  आज मुझे आश्रम जाना है तू भी चलेगा साथ में?"
"मैं??"

और यही कोई एक घंटे के वाद  वीरेन  माँ के साथ एक बड़े से हॉल में बैठा किसी गेरुए वस्त्र पहने, हलकी दाढ़ी और गेरुए कपडे से ही सर को ढके हुए,  किसी उम्रदराज लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति का प्रवचन सुन रहा था। कहना मुश्किल है कि  वीरेन सच में सुन रहा था या सिर्फ देख रहा था या खुद में ही कहीं गुम  था . आखिर प्रवचन भी ख़त्म हो गया, सबको प्रसाद दिया गया और जब वो गेरुए कपड़ों वाला आदमी भी जाने लगा तो वीरेन की माँ ने उसे जाकर कुछ कहा और फिर इशारे से वीरेन  को भी बुलाया.  वे श्रीमान  थोड़ी देर तक कुछ कहते रहे समझाते रहे वीरेन को जो सब उसने सुना और फिर भूल गया .

पर उस दिन के बाद जैसे कैसे भी, माँ रोज़ या हर दूसरे  दिन अपने उदास बेटे को  आश्रम ले जाने लगीं। इस उम्मीद में कि  उसका मन संभल जाएगा (आश्रम और साधू सन्यासियों के प्रवचन मन को बहलाने की चीज़ नहीं होते ) .  कुछ दिन और बीते और अब खुद वीरेन को भी वहाँ अच्छा लगने लगा .. प्रवचन होता था , वो सुनता था .. उसमे ज़िन्दगी की व्यर्थता, हमारे चारों और मोह माया के बंधन, हमारे  जीवन के वास्तविक लक्ष्य यानी मोक्ष प्राप्ति और इस जीवन में वास्तविक सुख कैसे पाएं और ऐसी जाने कितनी बातों का जिक्र रहता था .

वीरेन का थका हुआ मन था और उलझा हुआ दिमाग था .. ऋचा के जाने के बाद वैसे भी उसके लिए संसार सचमुच मोह माया जैसी ही कोई बेकार सी चीज़ बन गया था और आश्रम उसका नया शगल था .. यहाँ कुछ तो बात थी .. माहौल बेहद शांत रहता है, जैसे कोई अदृश्य सा aura  यहाँ की दीवारों, छत और हर छोटी बड़ी चीज़ को घेरे  हुए है।  सबसे शांत और रहस्यमय व्यक्तित्व था, स्वामी  अमृतानंद जी का।  जैसा उनका नाम था वैसा ही उनका aura था ..  धीमी  और गहरी  आवाज़ ... बस सुनता  ही जाए इंसान। स्वामीजी ने वीरेन की माँ को तसल्ली दी थी और अपने ही अंदाज़ में भविष्यवाणी भी  की थी, कि   उसका  बेटा  फिर से अपनी ज़िन्दगी में रम  जाएगा, उस बेकार सी लड़की की कोई परछाई भी उस पर बाकी नहीं रहेगी।  और इसलिए जब वीरेन ने अपनी शामें और कभी कभी दोपहर भी आश्रम में बिताने शुरू किये तो माँ को कोई ऐतराज नहीं हुआ।

"अरे संतों की सेवा तो जितनी करो उतनी कम है ... इतने साल तो कभी गया नहीं .. अब जाकर कुछ सदबुद्धि आई है ". 

अब वीरेन को नहीं पता कि  उसे कौनसी सदबुद्धि  या और कोई बुद्धि मिल गई है पर वहाँ जाना उसे ज़रूर अच्छा लगता है . वहाँ से किताबें लाकर पढना , उनका अर्थ समझना और ये महसूस करना , यकीन करना कि  दुनिया में कोई तो है जिसे हम दिल खोल कर अपना हाल बता सकते हैं उसके आगे रो सकते हैं और उम्मीद भी कर सकते हैं हमारी प्रार्थनाओं और पुकार की कहीं तो सुनवाई होगी ही .. हो भी रही होगी .  (वैसे अब वीरेन की  प्रार्थनाएं ना तो करियर को लेकर थी ना और किसी सुख सुविधा के लिए, ऋचा का तो खैर अब सवाल ही नहीं उठता था)  अब उसकी प्रार्थनाये अपने लिए शान्ति और एक नए रास्ते की खोज के लिए हैं । वीरेन को विश्वास हो चला है कि  इस नश्वर संसार में अब और कुछ नहीं बचा जो देखा नहीं, जिसका अनुभव नहीं किया और  जिसकी कोई ख्वाहिश बाकी रह गई।

"कहाँ  है आजकल,  कोई खबर ही नहीं तेरी ?"

"बस यूँही .. "

" अच्छा सुन आज चलते हैं,  वहीं ... तू पहुँच जाना। कहाँ रहता  है आजकल ?"

"कहीं नहीं बस माँ  को आश्रम ले जाता हूँ तो वहीँ देर हो जाती है .."  एक सीधा सरल बहाना जो बेकार  गया .

"क्या??? आश्रम ... तू कब से इन जगहों पर जाने लगा ..क्या चक्कर है भाई  ??"

अरे कुछ नहीं ...अच्छा मैं आ जाउंगा।"

लेकिन वीरेन कहीं नहीं गया , कभी नहीं गया।  उसे जाने में दिलचस्पी ही नहीं।  उसने कहीं जाना ही छोड़ दिया ... साथ ले जाने वालों के साथ कभी कभार जाता पर फिर जल्दी   लौट आता . वो ठिकाने, वो महफिलें, वो दोस्तों का मेला ..सब बेमजा और बेगाना होने लगा था ..जाने कैसा हो गया था वीरेन का मन, लगता था जैसे इंसानों  के इस जंगल में उसका कहीं कोई संगी साथी नहीं .. केमिस्ट्री, जियोग्राफी और मैथमेटिक्स अब सब अर्थहीन होने लगे थे ...  कोई कहता कि  वीरेन अब आधुनिक देवदास बनेगा, कोई कहता नहीं ये तो  नया ही अवतार लेगा .. कोई कोई हँसते कि  इसका दिमाग खराब हो गया है ... कुछ इलाज की ज़रूरत है।  कहने वाले दोस्त -यार सब ने  आखिर  तंग आकर कहना और पूछना और याद दिलाना भी छोड़ दिया . उन्होंने मान लिया कि  वीरेन को अब कुछ नहीं समझाया जा सकता।

पर वीरेन को अब कुछ नहीं बनना है .. बीते दिनों का एक छोटा सा टुकड़ा भी याद नहीं करना . बीती हुई कोई चीज़ वापिस नहीं चाहिए।  पर फिर भी उसे कुछ तो चाहिए, कुछ .. एक अपमान सा महसूस होता है उसे .. लगता है जैसे उसका अपना  एक हिस्सा छिन  गया  है।  बदला चाहिए उसे .. पर फिर सोचता कि  बदला किस से ले .. किस बात का .. और लेने या छीन सके ऐसा क्या शेष रहा।

आश्रम आकर एक अच्छी  चीज़ ये हुई कि  वीरेन के मन को यहाँ कुछ सुकून और  शांति मिलने लगी।  इस जगह आकर उसे लगता जैसे  दुनियादारी और  उसके नुमाइंदों की परछाई भी उससे दूर भाग गई है। उसे नफरत हो गई है रिश्तों से, शब्दों के जंजाल से, चेहरों के नकाब से और अंतहीन सामाजिक व्यवहारों के तरीकों से ... जिनमे आप लोगों को नापसंद करते हुए भी उनसे निभाते चले जाते हैं , सामने हंस हंस के बोलते हैं और मुंह फेरते ही बुराइयां गिनाने लग जाते हैं। जहां ज़रूरत के,  लालच के सम्बन्ध है।  जहां लोग अपने अलावा बाकी हर इंसान में, हर चीज़ में खामियां निकालते फिरते हैं। जिस चीज़ से शिकायत है उसी से चिपके हुए हैं।  जहां हर कोई अपनी ही सफलता, समृद्धि और उपलब्धि  के गीत गाये जा रहा है, दूसरों को उनकी कमतरी का अहसास दिलाये जा रहा है।  जहां हर तरफ घुटन है, हवा में सड़े  गले मांस की बदबू है ... और कई सारे पुराने कंकाल हैं .. जाने किन किन नामों का कफ़न ओढ़े हुए ... 

वीरेन को सांस लेना भी मुश्किल लगता है इस हवा में ... यहाँ रहना और जीना उसकी  बर्दाश्त से बाहर है।  पर जिम्मेदारियों और  दायित्वों  से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता  इसलिए इस बोझ को उठाये वीरेन भागता फिरता है दिनभर ...

और अब वीरेन कुछ तलाशने में जुट गया है, उसे ऐसा लगता है जैसे वो इस आस पास के माहौल से belong नहीं करता .. उसे कहीं और होना चाहिए .. ये हर रोज़ का गल्ले का हिसाब, ये खरीद - बेचान के समीकरण, ये मुनाफे और घाटे का हिसाब ...इनमे अब उसका मन नहीं टिकता .
उसकी प्यास नहीं मिटती .. उसकी तृष्णा  शांत नहीं होती .. सवाल के बिच्छू डंक मारते ही रहते हैं। सब से दूर कहीं खो जाने, किसी  अनजानी मगर उजली मिटटी में मिल जाने का उसका मन चाहता है।

वीरेन अपने इन सब सवालों को स्वामी अमृतानंद  के सामने रख देता  .. और हैरानी की बात ये भी थी कि  आजकल अब वो बहुत दार्शनिक  नज़रिए से सोचने और सवाल करने लगा था।

"ऐसा क्यों होता है ... वैसा क्यों नहीं होता ? और अगर ऐसा ही होना है तो फिर हम क्या सिर्फ  मूक दर्शक है अपने ही जीवन की घटनाओं के ?"

" और इस जीवन के परे इस संसार के परे सच में कोई स्वर्ग है क्या ? ये मोक्ष क्या है ..और अभी जो नरक इस जीवन में झेल रहे हैं वो मरने के बाद के नरक के अतिरिक्त यानी एक्स्ट्रा addition है क्या ?"

उसका सबसे बड़ा सवाल था कि  इस आम साधारण ज़िन्दगी को  असाधारण  कैसे बनाया जाए ???? स्वामी अमृतानानद  सुनते .. मुस्कुराते .. अपनी आँखों को थोडा सा बंद करते फिर अपने नज़रिए और ज्ञान के मुताबिक़ जवाब देते।  कई बार वीरेन के सवाल शांत हो जाते कई बार नहीं भी होते।

अपने  काबिल बेटे के बदले रंग ढंग और उसका नई  चाल ढाल घरवालों की खासतौर पर पिता का सरदर्द बन रही है और माँ ये सोचती कि  कोई नहीं सब ठीक हो जाएगा ... वीरेन की शादी हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा ..पर लड़का माने जब ना।  अब उसे शादी नहीं करनी अपना परिवार, गृहस्थी, बीवी  ये सब शब्द वीरेन को बेहद दकियानूस और बोझ लगते हैं ... (जिसके साथ सात साल गुज़ारे जब वही ज़िन्दगी में साथ निभाने को राज़ी ना हुई तो ये मम्मी और डैड की ढूंढी हुई राजरानी कौनसा साथ निभाएगी ) 

और फिर इसी मुद्दे पर घर में बहसें चलती ... लम्बी लम्बी .. जिनका कोई निष्कर्ष नहीं था .. वीरेन शादी नहीं करेगा और ऐसे ही सवालों के जवाब ढूंढता फिरेगा ... माँ और बूढ़े पिता के माथे पे मारे चिंता के पड़ने वाली रेखाएं और गहरी होती जातीं ... ज़िन्दगी  अपने इन चेहरों से बेहाल हो उठी थी।

कुछ हफ्ते, महीने बीते ... वीरेन को इतना तो समझ आ ही गया कि  ऋचा वाला अध्याय ना उसकी कोई व्यक्तिगत असफलता है, ना उसका अपमान और ना ही उसकी कोई गलती ... बीती ज़िन्दगी को जब सोचता, बैंगलोर, मुंबई और पूना में गुज़रे सालों को याद करता।। वो सच में ज़िन्दगी का एक बेहद खुशगवार वक़्त था .. बेफिक्री थी .. भविष्य के सपने थे ..वीरेन तो अब भी वही है   पर अब उसे लगता कि  अपनी ज़िन्दगी को ऐसे किसी आयाम पर ले जाए जहां  ये  सो-कॉल्ड  असफलताएं , ये निराशाएं और वो पूरी ना हुई ख्वाहिशें अपने आप में ही छोटी पड़  जाएँ।  कुछ ऐसा जो उसे इस दकियानूसी माहौल से दूर ले जाए। अब उसे ना स्टेटस चाहिए था, ना पैसा, ना कोई और चीज़ अब उसकी आँखों को आकर्षित कर पा रही है ... पैसा और उस से खरीदी जाने वाली ख़ुशी अब ख़ुशी नहीं लगती  थी .. स्टेटस तो पहले भी था  और अभी भी है पर  उसे बना संवार के रखने की कोशिशें सिवाय बोझ के और कुछ नहीं ...

लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं निकाल  सकते हम कि  वीरेन को इस संसार से, इस  तथाकथित नश्वर संसार से कोई वितृष्णा हो गई थी या उसने  वैराग्य  लेने का इरादा कर लिया था।  अगर कोई गौर से देखता तो समझ पाता  कि  वेरेन दरअसल अपने ही तरीके से उस भूतकाल से छुटकारा पाने की कोशिश में लगा था .यानी उसके हिसाब से ज़िन्दगी वापिस नार्मल ट्रैक पर आ रही थी।

पर अभी सब कुछ  नार्मल कहाँ हुआ है .. जब हम सोचते हैं कि  अब  सब  ठीक है तभी ज़िन्दगी अपने तरीके से कोई यू  टर्न लेती है। एक अच्छी खासी शाम को, एक लम्बे वक़्त के बाद दोस्तों के साथ एक पूरी शाम और शायद रात भी गुज़ार देने का इरादा बनता, पर घर से कोई ज़रूरी  काम के लिए फोन  आया और वीरेन रवाना हुआ . मस्ती से, आराम से  अपनी बाइक  चलाते हुए .. रास्ते से कुछ सामान  लेना था , इसलिए वीरेन रुका शहर के सबसे व्यस्त चौराहे के सामने वाले बाज़ार की किसी दूकान पर। दूकान पर भीड़ थी, उसका नंबर आने और सामान मिलने में अभी वक़्त लगना था .. इसलिए उसकी आँखें यूँही  "बाज़ार दर्शन" करने लगी .. और निगाहें रुकी चौराहे पर बने सर्किल के किनारों पर बैठे एक परिवार पर .. उसमे बच्चे थे, बड़े भी थे और वो भिखारी ही थे। पर वीरेन ने कुछ और भी देखा ... उसने हँसते हुए बच्चे  देखे, अपने से छोटों को हाथ से कुछ  खिलाते हुए , बड़े प्यार से आपस में बतियाते हुए परिवार के लोग देखे, एक दुसरे से हंसी मजाक करते हुए, किसी नन्हे को गोद में खिलाते हुए एक काले गंदे से भिखारी को भी देखा। ऐसा लग रहा था कि  उन लोगों को  इस वक़्त इस पूरे जहान  में किसी से कोई लेना देना नहीं .. ये जो शाम का भागता दौड़ता ट्रैफिक है, ये बाजारों की व्यस्तताएं,  ये भीड़ का शोर .. किसी बात से कोई मतलब नहीं उनको।  चौराहे पर बसी अपनी ही उस टेम्पररी दुनिया में खुश थे।

ये नज़ारा जैसे वीरेन के दिल पर नक्श हो गया। वो घर लौटा और एक बार फिर  से  "खो" गया ... उसी चौराहे पर, उन भिखारियों की हंसी में।       

To Be Continued ...

The second part of the story is Here

Sunday, 30 September 2012

आईनों का जहान

धरती और आसमान में बीच एक जगह थी .. जहाँ बादलों की छत थी और ओस की ज़मीन.. धरती पर  रहने वाले उस जगह को "बादलों का घर" कहते थे.  और आसमान के रहने वाले उसे "धरती का पालना" कह कर पुकारते थे..कुदरत का अजीब ही करिश्मा थी वो जगह.. उसका अपना कोई नाम नहीं था .. और ना वहाँ रहने वालों ने उस जगह को कभी कोई नाम दिया.. हाँ वो एक आबाद जगह थी.. धरती वाले सोचते थे कि वहाँ परियां रहती है.. और आसमान वालों का ख्याल था कि वहाँ यक्ष और गन्धर्वों का घर है. ओस की ज़मीन और बादलों  की छत के नीचे कहीं बीच में आईने लगे थे.. जिनकी सतह समन्दर की लहरों की तरह हिलोरे  लेती  थी.. और वो लहरें ऐसे चमकती थीं जैसे नदियों का बहता पानी.. 

उन आइनों की सिफत ऐसी थी कि उनमे लोगों के ख्याल और कल्पनाएँ आकार लेती नज़र आती थी.. जीते जागते चेहरे, चलती- फिरती तसवीरें, आवाजें.. बिलकुल वैसे जैसे हम फिल्म देखते है .. जब भी धरती या आसमान का कोई रहवासी कोई ख्याल बुनता या कल्पनाएँ करता तो  वो सब  उन आइनों में धीरे- धीरे  आकार लेने लगता.. ऐसा सदियों से चला आ रहा था... धरती वाले और आसमान वाले  किसी को भी इस बात की खबर नहीं थी..  पर उस जगह के रहने वाले इन आइनों और उनमे बोलने वाली तस्वीरों को हमेशा से देखते आ रहे थे.. ख्याल आज के , कल के.. आने वाले दूर के कल और अपने, दूसरों के, बेगाने लोगों के भी.. बस सिर्फ ख्याल और उनकी दुनिया.. भले-बुरे, कभी डरावने,  कभी कोमल, सुख के दुःख के .. ख्याल और उनकी कल्पनाएँ.. जब भी कोई ख्याल या कल्पना सच होने वाली होती तो उस वक़्त ऐसा लगता जैसे आइनों में शांत बहता  समन्दर अचानक जाग गया हो, उसकी लहरों की धडकने तेज़ हो जाती और लगता  मानो पानी आइनों  के दायरे से बाहर आना और सब कुछ भिगो देना चाहता हो..

एक दिन उस जगह पर रहने वाले किसी ने सवाल किया.. कि क्या कभी ये सब ख्याल, ये कल्पनाएँ .. सब सच में बदलते हैं? 

जवाब आय़ा कि हर ख्याल इतना ताकतवर नहीं होता कि उसकी कल्पना हकीकत बन जाए.. कुछ ख्याल मामूली होते हैं, कुछ गैरज़रूरी, कुछ सिर्फ दिल-दिमाग की हलचल और कुछ ख्याल और कल्पनाएँ  ऐसी  होती हैं कि जो सिर्फ कल्पनाओं में ही रहे  तो अच्छी लगती हैं... उनका वास्तविकता से  कोई लेना देना नहीं..

सवाल करने वाले ने  जवाब देने वाले का हाथ पकड़ा और उसे एक आईने की तरफ ले गया.. "इसे देखो कितनी सुन्दर कल्पना है,  कितना बेहतरीन ख्याल .. मैं कई सालों से इसे यहाँ  अलग अलग आइनों में देख रहा हूँ.. ये तो अब तक सच हो ही गया होगा ना.."
जवाब देने वाले ने एक गहरी नज़र से आईने को देखा फिर कहा.. "नहीं इस ख्याल की ताबीर अब तक नहीं हुई है.. कुछ ख्याल उसे बुनने वाले के मन में बने रह जाते हैं, मिटते नहीं.. सच तो नहीं  हो पाते पर उनका असर ख़त्म नहीं होता.. और इसलिए जब तक वो कल्पना उसे देखने वाले के मन में जवान है तब तक वो ख्याल, इन आइनों के पानी में भी जिंदा है.. इनकी तसवीरें सालों तक यूँही लहरों में बहती रहती है तब तक, जब तक कि वक़्त के हाथ उनके रंगों को मिटा नहीं देते.. 
कहने वाला आगे  कहता गया.. "ये ख्याल, ये कल्पनाएँ .. धरती और आसमान के रहने वालों के  दिलों का आइना हैं.. उनके दिमागों की परख.. उनकी जिंदगियों का उतार चढ़ाव" .. तभी सवाल पूछने वाले ने टोका.. "तो क्या इन ख्यालों और कल्पनाओं को देखकर हम धरती और आसमान और वहाँ के लोगों के वर्तमान और  भविष्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं..?"

जवाब देने वाला जोर से हंसा .. "नहीं मेरे बच्चे.. पूरी तरह से तो नहीं .. तुम इन आइनों से सिर्फ इतना जान सकते हो कि एक ख़ास वक़्त पर एक इंसान या एक आसमानी देव क्या सोच रहा है .. क्या चाहता  है.. क्या नहीं चाहता.. ये ख्याल, ये कल्पनाएँ  हर पल अपना रंग बदलती हैं ..  इन्हें  गौर से देखो .. तो तुम जानोगे कि हर बार ये आईने तुम्हे एक नई कहानी दिखा रहे हैं .. जबकि उस कहानी के पात्र अक्सर पुराने होते हैं .. ये ख्याल एक इशारा हैं भविष्य का, एक झलक है किसी के वर्तमान की.. लेकिन जैसा कि कुदरत ने इंसान को तेज़  बुद्धि और और एक चालाक दिमाग दिया और आसमान के देवों  को एक दार्शनिक का, आराम तलबी का  दृष्टिकोण दिया तो ये दोनों ही अपने अपने नज़रिए से ख्याल बुनते हैं .. और अपने मनचाहे आज और कल की तलाश इन कल्पनाओं में करते हैं.."

सवाल करने वाला एक आईने के पास बैठ गया.. उसकी लहरों  को बहता देखता रहा.. उसके पानी का छलकना और शांत हो जाना और उसकी तस्वीरों का आपस में गडमड्ड होना .. कभी लगता कि एक ही तस्वीर है फिर लगता कि उसके ऊपर , उसमे मिली हुई कोई और तस्वीर और चेहरे हैं.. फिर दिखता कि कोई नया ख्याल पुराने को ढकता जा रहा है.. फिर दिखा कि नहीं पुराना वाला ही नए को अपने में समाये जा रहा है.. कभी दिखता कि धरती और आसमान के रहने वालों के ख्याल और  कल्पनाएँ जुदा जुदा हैं.. तो कभी वे आपस में मिलते और एकाकार होते नज़र आते... 

ख्यालों का सिलसिला यूँही चलता चला आ रहा है..

Sunday, 25 December 2011

एक दुनिया जिसका नाम है परछाई उर्फ़ सपना

सपनों का एक संसार है ..या संसार में सपने है ..शायद ये सब एक दूसरे  में घुल मिल गए हैं.  सपनों का संसार जिसमें वो सब रंग हैं जो हम इस वास्तविक संसार में देखते हैं या देखना चाहते हैं और वो रंग जो हमें बहुत अच्छे लगते हैं ..वो सब खूबसरत रंग जो अच्छे तो बहुत लगते हैं पर असल ज़िन्दगी में हमारे पास है  नहीं . सपनों के इस संसार की हुकूमत और उस हुकूमत का दायरा  हमारी दो छोटी आँखों और उन पर बिछी नाज़ुक पलकों पर ही है ..सपने देखना ज़रूरी है ये ज़माने से चली आ रही सीख है ...सपनों को पूरा करना ये मज़बूत इरादों और उनके पीछे पड़  जाने वालों की सीख है.  पर सपने कोई शिकार का जानवर तो नहीं है कि हर बार या हर किसी का निशाना ठीक बैठ ही जाए...निशाना चाहे कितना ही चूके
..चाहे कितनी ही बार चूके ..आँखों के बंद लेकिन पारदर्शी (हाँ आँखों का पर्दा बेहद झीना होता है ..वो दिखता है जो होता है और वो भी जो हम देखना चाहते हैं और वो भी जो नहीं होता ही नहीं) ..तो आँखों के बंद पर ज़रा खुले हुए परदे एक के बाद एक  सपने  देखते ही जाते हैं ..थकते नहीं..कोई एक सपना पूरा हो जाए तो उसके बाद उस से आगे का..कोई सपना पूरा ना हो अधूरा छूट जाए तो उसकी जगह नया सपना ..सपने ना हुए भगवान् कृष्ण का दिया चावल का कटोरा हो गया कि  जिसमे एक दाना शेष रहते भी फिर से पूरा भर जाता था.


यानि सपने एक ऐसा गिफ्ट बॉक्स हैं जो कभी खाली नहीं हो सकता ..जादुई डब्बा ..वहाँ हमारे लिए हमेशा कुछ ना कुछ  रहेगा...आंखें बंद करते ही कुछ ख्याल, कुछ बातें दिल  दिमाग में तैरने लगती हैं ..और देखा जाए तो उन बातों को आँखें बंद होने का भी इंतज़ार नहीं होता ..पर इतना ज़रूर है कि पलकें खुली रहे तो उन ख्यालों के साथ और बहुत सी चीज़ों की
मिलावट होती रहती है ..पर एक बार बिस्तर पर लेटते ही..तकिये पर सर टिका नहीं कि आँखों के आगे एक सुन्दर सी फिल्म चलने लगती है ..खुली आँखों के सपने ..जिनको सच हो जाना चाहिए ..जिनको पूरा होना चाहिए ..जिनकी ताबीर कब होगी इसका जवाब ढूँढने  में अक्सर नींद भी बेचारी थक हार के अपना घर कहीं किसी और के तकिये में ढूँढने चली जाती है.. 

सपनों के इस साम्राज्य में.. (भले इसका राज पाट हमारी आँखों की परिधि से बाहर ना हो..कुछ ऐसे कि जगत के स्वामी का शासन आलम से पालम तक)....जगह सबके लिए है, हर चीज़ के लिए है ..हर उस बात के लिए जो हमें अच्छी लगती है ..हर उस इंसान के लिए जो हमें पसंद है ..हर उस घटना के लिए जो अभी घटित नहीं हुई पर होनी चाहिए ..या हर उस घटना के लिए जो हो चुकी है और हम चाहते है कि ऐसा दोबारा हो और  उन घटनाओं के लिए भी जो हम चाहते हैं कि ऐसा कभी तो, कभी एक बार ही सही पर होना चाहिए ..यहाँ सबके लिए जगह है ..छोटी या बड़ी पर एक ख़ास कोना सबके लिए..हर इंसान के लिए हर बात के लिए...सपने हैं या भानुमती का पिटारा ..कभी कभी ये सपने हमको एक अलग ही यूटोपिया में ले जाते हैं..उस दुनिया में जैसी हम अपने लिए चाहते हैं  पर जो हमारे पास होती नहीं. एक ऐसा जीवन जिसका रंग रूप हमारी पसंद का हो ..जिसका हर चेहरा, हर किरदार हमारे लिए हो, जहाँ  सब कुछ "हम से हो"...ऐसी एक ख़्वाबों भरी  दुनिया  हो हमारी पसंद की.. पर मुसीबत ये है कि ऐसा कुछ परफेक्ट दुनिया में होता नहीं..इसलिए हम में से कुछ लोग अपने उन सपनों को ही अपना घर बना लेते हैं ..यूटोपिया सच होता नहीं ..उसकी तृष्णा बनी रहती है.. 
पर फिर भी उस थोड़ी देर के यूटोपिया में जो ख़ुशी और सुकून मिलता है वो कहीं नहीं, कहीं भी नहीं..इस असल ज़िन्दगी में भी नहीं....लेकिन कांच की परछाई  को सच नहीं मानना है ये दिमाग जानता है  इसलिए बार बार अपनी चाबुक चला के हमको सावधान करता रहता ..कभी हम सुन लेते हैं कभी अनसुनी कर देते हैं 


कितनी बार टूटते हैं सपने  ..तिनका तिनका बिखर भी जाते हैं ..कभी सपने मर भी जाते हैं तो कभी पहुँच  से बहुत दूर हो जाते हैं. पर ऐसे  में हमारा दिल बड़ा समझदार है वो पुराने सपने का कोई नया version तैयार कर लेता है..जिसमे थोडा नया, थोडा  पुराना , थोडा ऐसा, थोडा वैसा का कुछ अजीब घालमेल सा बना कर हमको बहला लेता है..फिर से आँखों की
चमक लौटा लाता है ..जैसे कभी कुछ खोया ही नहीं था ..कुछ भी, कहीं भी   कम नहीं हुआ ..सपने हमेशा जीते रहते हैं ..तब तक, जब तक दिल जाग रहा है ..और तब तक, जब तक दिल बैचैन है...सपने किसी "हमेशा" का वरदान लेकर आये हैं ..जिनकी उम्र हमारी ख्वाहिशों से भी बड़ी है..ना हो ये सपने तो सच में जीना ही मुश्किल हो जाए .. इनके होने से मन को तसल्ली मिली रहती है ..कि आने वाला कल.. कल सुबह का सूरज बड़ा ख़ूबसूरत होने वाला है ..उस किसी अनजानी सुनहरी सुबह के मिलने कि आस में  आँखें हर लम्बी से लम्बी और सख्त रात बड़े आराम से मीठी नींद में काट देती हैं...हम से ज्यादा  हिम्मत हमारी पलकों के पास है..दिल-दिमाग के हर उस बोझ को जो आँखों से झांकता रहता है ..बहने की
कोशिश करता है ..उसे बड़ी मजबूती से बाँध लेती हैं ...थामे रखती हैं...सपनों के इंद्रजाल में उलझाए रखती हैं..सुलाए रखती है ...ना होता इस दुनिया में सपनो का जहान तो जाने क्या होता ..

Image Courtesy : Google