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Saturday, 3 August 2024

परिचय : अपरिचय

"यहां इतनी दूर तक आना और अब आगे ?" सवाल खुद से हो रहा है तो जवाब देने कोई दूसरा कहां से आएगा !! यह सोच कर ही खीझ होने लगी। यह क्या वाहियात आइडिया है, ऐसा फिल्मों में होता है या वो निठल्ले निहायत ही रोमांटिक किस्म के उपन्यासों में; असल जिंदगी में ऐसा कौन करता है ? 
और हो इंस्पायर इन इंस्टाग्राम और यूट्यूब वाली रीलों से। चले हैं साहब " फिर से शुरुआत करने" वह भी पूरे ड्रामेटिक तरीके से। 
इधर उधर नजर फेरी,  लोग एक दूसरे से बतियाने में मसरूफ़, कहीं कोई पूरा ग्रुप है जिनके शोर से दूसरे लोग बार बार उनकी तरफ तीखी नजरों से देखते हैं पर शोर मचाने वाले बेखबर या बाखबर अपना एक अलग संसारी बुलबुला रचने में मगन हैं; चाहे अस्थाई मगर रंग बिरंगा सा एक खूबसूरत मेमोरी !!! जिसे वे लोग जो आज इस समूह में एक साथ बैठे हैं , इस जगह, इस क्षण में वो सब लोग कल या उसके बाद का कल या उसके भी बाद का कल या और आने वाले बरसों के कल में इस जगह को, इस शोर को, इन ठहाकों और किस्सों को याद करेंगे। 
इतना सब सोचते सोचते फिर से खीजने वाली स्थिति हो गई। यह क्या अजीब ही ख्याल सूझ रहे हैं। फिर नज़र एक तरफ गई, यह लो रिमझिम हो रही है बाहर ;  अब जाते समय भीगने और रास्ते में कहीं ट्रैफिक या टूटे फूटे रास्ते में फंस जाने की फिकर होने लगी। 
" काहे की शुरुआत, यहां तो शुरुआत से पहले वापसी की फिकर है। कोई भरोसा है बरसात का , कब तेज हो जाए ; कब रास्ता ब्लॉक हो जाए बरसाती पानी से !!! "  
शुरुआत, फिर से, नए सिरे से, नई जगह से !!! नए चेहरे ? नया नाम ?? पुराना चेहरा, पुराना नाम, पुराना इंसान !!!! फिर नया क्या है ? नया विचार ? नया सवाल , नया जवाब ??  कितने ही प्रश्न, कितने ही ख्याल एक साथ बोलने लगे, शोर मचाने लगे। 
और फिर से नज़र इधर उधर भटकने लगी, अनजाने चेहरे और लोग; कोई परिचय या परिचित नहीं। क्या हर समय, हर जगह कोई परिचय की रस्सी या लाठी होना जरूरी है ? क्या इसके बिना आगे बढ़ा नहीं जाता ?
" क्या मैं यहां बैठ जाऊं ?"
" अं, इम्म " !!! 
" क्या मैं ? और कहीं जगह खाली नहीं है, इसलिए यहां ,,,," 
सामने एक अपरिचय है पर क्या इस अपरिचय से कोई परिचय निकलेगा ??
" अं, हां हां । बैठ जाइए"।
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" आप को कुछ ऑर्डर करना है ?" 
भीतर के ख्याल चुप हो गए।
" हां चाय और स्नैक प्लैटर"।"
"आपको अगर ये प्लैटर किसी के साथ शेयर करनी हो तो  मैं भी ब्लैक कॉफी के साथ "। 
शेयर ?? क्या ? परिचय ? परिचय की शुरुआत ?? अपरिचित ही रह जाने देने में क्या कोई हर्ज़ है ??  क्या बिना परिचय के कोई क्षण , कोई मेमोरी शेयर की जा सकती है ?? 
इतनी दूर, इस पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ इलाके के इस कोने में , इस रेस्टोरेंट में क्या कोई क्षण ऐसा मिल सकता है जहां से , जहां पर एक नया परिचय शुरुआत कर सकता है !!! क्या यह ठीक वही क्षण है जिसके लिए इतना रास्ता पार करके आना पड़ा ? 
यह तो निर्णय का क्षण है, परिचय या शुरुआत का नहीं। यह तो सोचा ही नहीं था!!! यह निर्णय वाला हिस्सा तो पहले से पता नहीं था !!! अब !!! 
**********************************
" लगता है बरसात तेज हो रही है। चलना चाहिए।"
" अभी इतनी भी तेज नहीं है, यहां तो ऐसी बारिश अक्सर ही होती है। थोड़ी देर रुक कर चलते हैं, कम से कम यह प्लैटर तो खत्म कर लें ।"
खाना महत्वपूर्ण है ? या रुकना ? या यह जो क्षण बीतता जाता है उसकी एक याद बुनते जाना महत्वपूर्ण है ?? यह फिर सवाल शोर मचाने लगे।
"क्या हुआ ? यह लो  एक केक स्लाइस, एक स्लाइस इस नई जान पहचान का ।"
"क्या यह जीवन का एक नया स्लाइस है ?"
"क्या, समझ नहीं आया ?" 
"अं अं, कुछ नहीं। यह  केक एकदम ताजा लग रहा है।"
"और लो।"
नए परिचय का स्लाइस !!!! जीवन का एक स्लाइस !!! पुराना कुछ नहीं ??? पुराना कोई नहीं ? सब नया !!! नया स्लाइस !!!!



Photo Courtesy : Google

Thursday, 10 September 2020

वनीला कॉफ़ी  --- 5 अंतिम भाग

 "ना जाने वक़्त की मर्ज़ी हैं क्या, क्यों हैं मिली ये दूरियां,  ओ मेरी जां "


"अब तुम अचानक से ये बात बता रही हो !!! पहले तो कभी तुमने इसका ज़िक्र भी नहीं किया।  रातों रात तो ये सब होता नहीं। तुम्हें इसका कैसे पता चला ? क्या तुम .... "
"चुप रहो तुम, फालतू के सवाल या कयास लगाने की कोई ज़रूरत नहीं। और मैंने कब कहा कि  रातों रात हुआ।  और तुम्हें कब बताती मैं ? और क्यों बताती ? तुम्हारे पास कौन सा वक़्त था ये सब सुनने का या किसी की मुसीबत को समझने का। "
"अब बिना बताये कैसे पता चल सकता है !!! मैं क्या कोई  अन्तर्यामी  हूँ जिसे अपने आप  भूत भविष्य  पता चल जाए." 
"पता चल भी जाए तो क्या कर लेगा इंसान।"

  "Sunayna, why on earth did you not tell me about this ? Why are you so introverted when it comes to your life and events."
"Introvert!!! you are  calling me an introvert !!!. Do you remember how many times I tried calling you, texting you ? but have you ever bothered to pick my call up ?  That fine early morning, when I called you to enquire about that Ayurvedic national institute and what you said.. you don't have  time to visit there, it was far from your work place and from your residence as well as. do you remember all that ??"
"Sunayna, I was actually busy, I wasn't making any excuses.. and even though you did the same with me a couple of years ago, you were also not picking my calls, not messaging me back; so what i did initially was just normal from my side. and as for that hospital thing, it is actually quite far and you know that cosmo city traffic... it will consume a whole day."
" fine then, Any other excuse do you have ?"
"it is not an excuse!!!"
"well, it is .. from my perspective, it is quite a good one. anyway, I am not asking for an explanation."
"Sunayna..."
"stop calling my name again and again. am I calling your name ?"
"why ? what is wrong in it ?"
"I don't like that. it sounds like you are dragging me in some sort of question answer session."


"ठीक है।" your Iron Curtain... and silent treatments were logical when applied to others but became irrational when others did the same to you. "


"Whatever it is.. it saves me from many uncomfortable situations." 

"Will you now tell me, what exactly happened ? and is this your reason for feeling miserable ?"

"Long story short, it was due to an internal injury, got hit by a vehicle, at first everything was fine, I was fine, minor bruises and cuts and then after a couple of weeks things strated getting bitter and tough. and then this decision was taken."

"and how an ayurvedic treatment was going to help?"
"they could have resolved the internal swellings or any wounds that were causing the ... the problem; at least this is what I was told by some people."

"Okay, let's not detail it. let's deal with it. let's think that it does not exist."

"I don't need any sympathy, it is not me who needs to think like this, it is the rest of the society, will they ever feel like this ? how am I supposed to marry or can have a family of my own?"

"You can adopt, of course with the consent of your ... alright.. I got it. But wait, Sunayana, the world is not that blanck or dull.. I am sure you will find a sensitive person. why do you not hope for good ?"

"because I don't want fake hopes."

"Anyway, next week , I am going back to delhi and then.. i don't know.  I will miss you Sunayna. will you remember me or not...?"

"I don't know... I don't want to keep a track of memories."

Four Months...

"Where are you ? why are you not picking up my calls? is everything ok ? are you alright ?"
"Sunayna, answer my question. this time I am actually asking a question." a message flashed on whatsapp screen and got seen after a couple of hours.
"I am at Dalhousie, it has been fifteen days since I am here. the internet and social media is not much allowed."
"what the hell on earth are you doing there ? and with whom you went there ? Sunayna , you ok ? tell me everything."

"relax, nothing to worry, do you remember, once I talked about visiting a place like Kothi or Sanavar .. a studio cottage .. here it is. It is a resort spa for those who want to heal themselves. and I am alone here, no one accompanied me here, no one brought me here, I came by myself."

"Are you happy ? is this your danube ? that Blue Danube?"

"I am still wandering.. I am looking for answers and lost pieces of the puzzle."

"shall I join you over there for the weekend, I am still in Delhi and not much occupied these days."

"No, I don't want to."

"Why ?"

"we all have our own journeys."
"What is that !!! ehh, can you ever be normal like normal people."
"it is normal, absolutely normal, as normal as playing pool and drinking beer in a pub."
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"तिशा, वापिस फोन कर रही है, क्या  जवाब दूँ ? तुम कुछ बताओ, उसका ब्वॉयफ़्रेंड तो जर्मनी चला गया बिना शादी किये। और अब मेरी फैमिली को   ऐतराज है।"

"मैं क्या कह सकती हूँ, मैं तो उसे जानती भी नहीं।  और मुझे इन सब मामलों की कोई ख़ास समझ भी नहीं। "
'अच्छा, तो तुम अपना बताओ, उस रिसोर्ट  से आने के बाद  अब आगे क्या ... ?"
"पता नहीं. बस कहानियां लिखने की कोशिश करती हूँ."
" कहानी  लिखने से ज़िंदगी चलेगी ?" 
"तो क्या नहीं लिखने से चल पड़ेगी ? तुम तो नहीं लिखते कहानी पर फिर भी अटके हो।   तुम क्या ढूंढ रहे हो ? तुम तिशा,  रिद्धि या वो हरिता किसी को भी नहीं ढूंढ रहे हो।  तुम अपने  फैसले की वजह ढूंढ रहे हो।  एक सही फैसले  के लिए एक सही और तार्किक वजह। तिशा वापिस आना चाहती है  पर क्या तुम उस मोड़ पर वापिस जाओगे या नहीं जाओगे या अब तुम कहीं और जा चुके हो ?"

"मैं कहीं नहीं जा रहा।  और तिशा से मैं बात नहीं करूँगा। अब इतना सब बखेड़ा करने के बाद उसको क्या चाहिए।"
"अगर ऐसा है तो तुम उसके बारे में मुझसे सलाह क्यों ले रहे हो ? अगर ये क्लोज्ड चैप्टर है तो इस पर विचार क्यों कर रहे हो ? क्योंकि अभी तक तुम इसे एक ओपन opportunity की तरह मान रहे हो ? है ना ?"

"नहीं, ऐसा कुछ नहीं सोच रहा मैं।"
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Three Months  .... 

"तो अब आखिर कुछ तो सोचा होगा ना तुमने। कहानी तो पूरी हो गई तुम्हारी।  अब ज़िंदगी की कहानी को आगे बढ़ाओ। सुनयना, तुम सुन  रही हो।"

"हाँ, मैं विएना के म्यूजिक फेस्टिवल का एक वर्चुअल कॉन्सर्ट  देख रही हूँ।  मैं सुन रही हूँ।"
"तुम कुछ नहीं सुन रही।  तुम कहो तो मैं तुम्हें कुछ अच्छा प्रपोजल बताऊँ, यहां मेरे कंपनी के कैंपस के पास वाले सेक्टर में में एक कंपनी में काम करता  ...."

"क्या उसे यह कॉन्सर्ट पसंद आएगा ? यह संगीत जिसकी भाषा अजनबी और शब्द अनोखे से हैं। "
"मैं समझा नहीं ?" 


"वादी के मौसम भी इक दिन तो बदलेंगे"




कहानी श्रृंखला समाप्त। 

Vanilla Coffee--Part 1


Thursday, 2 July 2020

वनीला कॉफ़ी - 4


ये वादियां, ये फ़िज़ाएं बुला रहीं हैं तुम्हें ......

Two months since then ...

"I am going to Dalhousie, do you want something from there ? shall I bring some souvenirs ?"
" I will be back in one week. "  a message flashed on whats app screen. 

"I don't want to bother you. I don't want anything." a short  text got typed.

"as you wish."

Four months...

"At least you can respond. such ego is not going to make your point better or superior."  another text flashed on facebook window. 
"I do not have any point anymore. and as you said those vanilla talks are useless, so why are you stretching this ?" 

Six months ...

" तुम आजकल कहाँ बिजी हो ? और वो तुम्हारे हॉलिडे ट्रिप का क्या रहा ?"
"कुछ नहीं, अकेले तो कहीं जा नहीं सकते और हर किसी का ट्रेवल हॉलिडे का अपना अलग mindset  है।  किसी को सस्ता पैकेज चाहिए किसी को ज्यादा दिन का। "
"तुम्हें क्या चाहिए ?" 
"मुझे बस एक कॉटेज या होम स्टे  चाहिए किसी दूर पहाड़ी जगह पर जैसे वो दीप्ति नवल का घर जिस लोकेशन पर है हिमाचल में, वो क्या नाम है !  हाँ, कोठी।  वहाँ से सुन्दर घाटियों के नज़ारे देखते हुए कुछ दिन गुज़ारे।"
" तो तुम्हें जाना  चाहिए। तुम किस  इंतज़ार  में हो ?"
"नहीं, मैं  फ़िलहाल कहीं नहीं जा रही।" 
"ये तुम्हारा हमेशा का जवाब है। "
"  मैं जाना चाहती हूँ  मुझे कोई ले जाने वाला नहीं मिलता। " 
" तो, तुम इस इंतज़ार में बैठी हो कि कोई तुम्हें लेकर जाए उन जगहों पर जो तुम्हारे पसंद मुताबिक हों ? ज़रूरी नहीं होगा कि  वो जगह, वो मौसम  दुसरे के पसंद मुताबिक हो। " 
"फिर ?" 
"फिर अब  मुझे  क्या पता ?" 
" तुम सोलो ट्रैवलर बन जाओ। क्या कहती हो ?"
"मुझे ये सब नहीं बनना, इतना कोई एडवेंचर नहीं करना। "
"तुमको तो डेन्यूब जाना था ? उसका क्या हुआ ?"

"हाँ जाना है। पता है, मैं चाहती हूँ कि  घर के आस पास एक अच्छा सा किचन गार्डन हो जिसमें  मौसमी  सब्ज़ियां और फल उगाये जाएँ, एक रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम हो  ओवरआल एक सेल्फ सस्टेनेड घर। "
"पहले तुम खुद तो सेल्फ सस्टेनेड बनो।  और किसी एक बात पर स्टिक रहो, कभी तुम कुछ प्लान करती हो कभी कुछ।  पहले तुमको डेन्यूब जाना था, अब तुमको हिल साइड कॉटेज चाहिए। और ये हार्वेस्टिंग वगैरह तो शायद नया आईडिया है तुम्हारा, पहले तो कभी कहा नहीं तुमने।"

"ऐसे ही सोचा,  ये भी एक तरीका है खुद को अपने आस पास से जोड़ने का। "
"आस पास से जोड़ने का !!!!  मतलब अभी  जुडी  हुई नहीं हो ??  तुम कितना ज्यादा सोचती हो !!!" 

"ये जगह कब ढूंढी तुमने ? कैसे पहुंचे यहां ?" सामने उस आर्टिफीसियल लेक पर नज़रें टिकाये पूछा।  
"ये बात बदल देने का हुनर तुमको गॉड गिफ्ट है ? या तुमने सीखा है , कोई कोर्स  वगैरह ? ऐसे ही एक दिन घूमते  ड्राइव करते इधर निकले तो दिख गया ये रिसोर्ट।  तुमको ऐसी ही जगहें पसंद है , इसलिए .... "

"मेरा काम अब यहां लगभग पूरा हो ही गया है। मुझे और मेरे उस सीनियर खरबूजे को  यहां जिस  नए प्लांट को सेट अप  करने के लिए यहां भेजा था  कंपनी ने, अब वो OPERATIONALIZE हो गया है ।  इसलिए अब नेक्स्ट वीक मैं वापिस जा रहा हूँ। "
"इतनी जल्दी तुम्हारे वापिस जाने का भी टाइम हो गया। कितने महीने हो गए तुम्हें यहां आए ? अभी चार पांच महीने पहले ही तो आये थे तुम ।" 
" चार पांच महीने नहीं, डेढ़ साल हो गया है मुझे यहां आए। अब तुम्हें तो वाकई कुछ याद भी नहीं है।"

"अच्छा, इतना समय हो गया !!! पता ही नहीं चला कब दिन गुज़रे। क्या तुम कुछ वक्त और नहीं  रुक सकोगे ? अब वापिस दिल्ली जाओगे या बैंगलोर ?" 

"फिलहाल तो दिल्ली, अभी एक प्लांट हरियाणा के पास लगा रहे हैं तो शायद वहां भेजेंगे, कुछ पक्का नहीं है।"
"फिर आखिर ज़िन्दगी में पक्का क्या है ?"
"पता नहीं।"

"तुम्हारे पास नहीं है ऐसा कोई प्लान या कोई ड्रीम ज़िन्दगी के लिए ?? या सिर्फ  वीकडेज़ और वीकेंड और इस शहर से उस शहर के बीच ही भाग रहे हो ? तुम किसी एक जगह को क्यों नहीं चुन लेते ?"

"तुम सोचती हो कि इन बड़ी कम्पनीज  में काम करने और कॉस्मो सिटी में रहने के कारण हम सिर्फ इन गिनी चुनी बातों में ही उलझे हैं ? यही लगता है तुम्हें ?"

" ज़िन्दगी के और भी चैलेंजेस हैं।  वर्क स्मार्ट रिटायर अर्ली !! वर्किंग नॉन वर्किंग स्पाउस , कितनी सारी  बातें  हैं।  financial security in old age and handsome savings for those times. I am probably going to Canada for a better career opportunity and a quick financial growth." 

"पर तुम तो अच्छी जॉब में हो और तुम्हें क्या फर्क पड़ेगा वर्किंग या नॉन वर्किंग से ? नॉन वर्किंग हो तो भी तुम्हारा काम तो चल ही जायेगा। " 
"अब तुम सरकारी बाबू के पास  फिक्स सैलरी है और  फिक्स रिटायरमेंट के प्लान हैं।  लेकिन हमको सब सोचना पड़ता है।  समझी तुम !!!  और अब मैं ये अरेंज्ड मैरिज  वाले  सुनहरे सपने में नहीं फंसने वाला।  मैंने घर पर बोल दिया है कि  अब मैं इस कास्ट, लैंग्वेज, स्टेट जैसे किसी क्राइटेरिया को नहीं  देखने वाला। पहले ही इतना सब ड्रामा हो गया अब और कोई मेलोड्रामा नहीं चलेगा। "

"मतलब ?? लव मैरिज ही चाहते हो ना !! इसमें क्या बड़ा मुद्दा है ? यह तो उलटे आसान है, तुम्हें आसानी से कोई भी अच्छी, पसंद की लड़की मिल सकती है। मैंने तो ज्यादातर यही  देखा है कि  जो लोग कॉस्मो सिटीज में नौकरी कर रहे हैं वो ढूंढ  लेते हैं अपनी तरह बढ़िया नौकरी स्टेटस वाला कोई।" 

"जितना लग रहा है उतना है नहीं आसान। और हाँ, तिशा के बाद एक शार्ट हुक अप भी हुआ था,  पर हमारी  आपस में जमी नहीं।  उसको बहुत ज्यादा ही जल्दी थी, कुछ डिसाइड  करो,  फिक्स करो, so many commitments and expectations. तिशा भी यही करती थी, उसके पास हर चीज़ की एक प्लानिंग थी,  कौनसा काम मुझे करना होगा, कौनसी ज़िम्मेदारी उसकी होगी, मेड  का क्या सीन  रहेगा।  शादी के बाद गाडी कौनसी वाली चलाएगी ये तक  डिसाइड कर लिया था उसने लेकिन जो सबसे ज़रूरी बात थी वो उसने मुझे सिर्फ पंद्रह  दिन पहले बताई  शुक्र है कि  मैंने अपने ऑफिस में इनविटेशन कार्ड्स नहीं बांटे थे वर्ना  सेण्टर ऑफ़ तमाशा बन जाता मैं।" 

" and you shouted at me when I asked  about  your dinner date !!! ... anyways,  why don't you want any commitment ? what is wrong with it ? all women want some sort of commitments or responsibilities from their husbands or partners. Am I wrong ??"

"I think I need more time and energy to prepare myself to deal with all this shit again. I will rather prefer to stay single and enjoy life than binding myself in a melodrama again. Many people in my circle are planning for a luxurious old age home stay; they don't want this responsibility of marriage and children and rather ready for a single and easy going no responsibility life. Some are in Live-ins, some others are single and want to live a life of their own choices.  I too am thinking on the same lines.. let see, what is stored in future.. right now, my focus is on good earnings and a luxurious life.. I don't want to compromise on that front."
between,how much YOU know about this relationship and love and marriage thing !!!! how many expectations or responsibilities are you ready to take over ?? you never talk about your personal life, relationships or any Hook up, if any such thing ever happened."

"I ... I want commitments, responsibilities and ... I always wanted to but I may not be able to  fulfill ..."

"तुम इतनी कन्फ्यूज्ड सी क्यों हो गई हो ? क्या है जो तुम्हें इतना उलझा रहा है ?  तुम खुद तो ज़िम्मेदारी उठा नहीं सकती और मुझे समझा रही हो।"

"कुछ भी तो  नहीं है। ज़िम्मेदारी उठाना कोई ऐसी बड़ी  बात नहीं है, जितना तुम सोच रहे हो, पर कभी कभी ज़िन्दगी आपको इज़ाज़त नहीं देती।"
"अब फिर तुमने  फलसफा शुरू कर दिया। "
" ऐसा कुछ नहीं है।"
"तो क्या है ? बोल सकने की हिम्मत है तुम में ?  दूसरों की ज़िन्दगी में झांकना और सलाह देना और कुछ जज करना बेहद आसान है लेकिन अपनी ज़िन्दगी के परदे  खोलना बेहद मुश्किल है ना !!! डेन्यूब जाना आसान है सुनयना, कहानी लिखना भी पर बोल कर बताना मुश्किल है। " 

"क्या मुश्किल मानते हो तुम ?"
" जो तुम कह नहीं पा रही।"

"I may not be able to ... conceive .. may not be able to carry on the pregnancies and ..." 

"What the hell are you talking about !!! Are you in sense ? Sunayna, you okay ??"

"Yes, I am alright, I am all in my sense. you wanted me to raise the curtain, see, I did. I am not a coward; I am not hiding my weakness, I am not covering up my incompetency. I am not giving any goddamn excuse."
"shut up, you are out of your mind. Do you even know what you are saying ?? Are you reading some sort of tragic novels and such stuff ? what is that crap you are reading these days ?" 
"This is no crap, this is the fact, I am talking ... you said, I am judging you, you said I am arrogant and do not know anything about relationships. I do want to know, I do want to experience all that  crap. you shouted at me, when I asked about your dinner date; you said, I have no right to enquire about your personal life.  And now, you are asking me to raise the curtain of life; atleast, I didn't hesitate, I have courage to accept and speak out. I am not escaping from responsibility and commitment; it is just, will anybody be ready to commit with me, to fulfill my expectation ?? Do I even have a right of expectation, when I myself can't fulfill this biggest expectation of  a married life ?"

"Sunayna, why have you never told me about this ? you could have at least .."
"have you ever asked ? Are you even interested in all these miseries of others ? nobody wants to listen to the sorrows and miseries of others."

"You can find an understanding person, these days it is not as  such a big issue, at least to a certain extent ... so many latest technologies are there. You can go for treatments and ..."

"Shutup, Gaurav, it is not a disease nor an illness for which I should sought a treatment. it is a health condition and that's it.  accept or reject. nothing more, nothing less."

To Be Continued... 

Image Courtesy : Google

Part--3

Wednesday, 10 June 2020

वनीला कॉफ़ी -- 3

"दो सदियों के संगम पर मिलने आये हैं, एक समय लेकिन दो सदियां , दो सदियां ". 

"तुम गाने भी इतने बोरिंग और डिप्रेसिंग किस्म के गाती  हो कि  मेरा मन होता है  कि अभी यहां से भाग जाऊं !!"

"क्यों, इतना अच्छा गाना है।  तुम्हें क्या पसंद है ?"

"कुछ भी, थोड़ा lively, कुछ full  of spirit जैसा। "

"तो हाई स्कूल musicals कैसा रहेगा ? पर मुझे वो गाना नहीं आता। "

"अब मैंने हाई स्कूल musicals  के लिए तो नहीं कहा ना !!"

" खैर, तुम यहां इस छोटे शहर में क्यों आये ?"

"अब ये तुम्हारा छोटा बड़ा शहर बीच में कहाँ से आया ? हम लोग तो कुछ गाने की बात कर रहे थे। "

'लेकिन हम कोई अंताक्षरी नहीं खेल रहे कि  और कोई बात बीच  में नहीं कही जा सकती। "

"ओके, i  Surrender .  मैं यहां डेजर्ट सफारी के लिए आया हूँ, कंपनी ने मुझे पेड हॉलीडेज पर यहां भेज दिया।  मुझे कहा कि  भाई गौरव, तुम हमारे बड़े ही काबिल एम्प्लॉई हो  तो जाओ और ऐश करो। और बस, मैंने कहा कि  मुझे ये सूखा रेगिस्तान और ये पुराने  महल हवेलियां और ये शानदार हेरिटेज होटल्स देखने हैं, घूमने हैं तो उन्होंने मेरे लिए टिकट करवा दी और रहने को कुछ allowance भी  दे दिया।  गाडी मैं अपनी लाया ही हूँ।  " 

"बस इसलिए या और भी कोई  बहाना है तुम्हारे पास ?" 

"बहाना !!!! सुनयना, तुम क्या कोई खास बहाना सुनना चाहती हो ?"

"नहीं, मैं सिर्फ कोशिश कर रही हूँ कि  समझ सकूँ तुम्हारे यहां आने की असली वजह क्या है ? तुम्हारी अच्छी खासी कॉस्मो सिटी लाइफ के बीच ये ट्रैन का छोटा स्टेशन कैसे आ गया ? " 

"ऐसे ही,  यहां से  कुछ नए बड़े रास्ते भी निकल सकते हैं।"

 "आज हम मैरिएट जायेंगे। मैं बोर हो गया तुम्हारे इन हेरिटेज होटल्स का इंटीरियर देख देख कर। "

''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''"

"तुम, तुमको याद है कि एक बार तुमने मुझसे कहा था कि, तुम्हारे लिए मसूरी से थोड़ी बर्फ और पहाड़ लेकर आऊं।  पहाड़ का नज़ारा और पता नहीं क्या क्या कबाड़। 
"अब कबाड़ है तो तुम  क्यों याद कर रहे हो ? और मुझे क्यों बता रहे हो ? 

"पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, सुरमई उजाला है, चम्पई अँधेरा है।"

"तुम्हारी वो एक्स .. फ्रेंड, रिद्धि   वो अभी वहीँ है या कहीं  दूसरे  शहर शिफ्ट हो गई ?"

"वो एक साल पहले ऑस्ट्रेलिया  चली गई। बात होती है  पर अब वो वहीँ सेटल्ड है  फ़िलहाल के लिए  और मैं  शायद कनाडा जाऊँगा अगले साल।  और कोई जानकारी चाहिए मोहतरमा आपको ? वैसे, आपका क्या चल रहा है, आप का क्या मूड है ? कब तक आप ऐसे कहानी लिखने में और कहानी का थीम ढूंढने में ....? "

"अब तुम अपनी असहजता को मेरी तरफ मोड़ रहे हो। तुम  अब तक चार या पांच  बार डेटिंग एंड मीटिंग एंड कोर्टशिप के किस्से मुझे बता चुके हो  और फिर भी मुझसे पूछ ऐसे रहे हो जैसे  तुमने बड़े  अच्छे ढंग से ..... "

"मैं  तुम्हारी तरह  खुद को दायरों में बिना वजह के क़ैद नहीं रखता।  सुनयना, तुम्हें नहीं  लगता कि  तुम खुद की ही खींची हुई  बॉउंड्रीज़ में बंद हो और बाहर देखना भी नहीं चाहती। "

"तो तुम्हारी तरह इस  टेबल से उस टेबल तक, इस मेनू कार्ड से उस मेनू कार्ड तक एक एंडलेस तलाश में घूमते  रहे ? ये ठीक लगता है तुम्हें ?"

"क्या मेनू कार्ड और कौनसी टेबल ? तुम क्या कहना चाहती हो ? तुम कहना चाहती हो की मैं यूँही टाइम पास कर रहा था और फ़्लर्ट कर रहा था !!!!!! और चार पांच बार कौनसा कैलकुलेशन किया तुमने ?? ज़रा बताओ ? किस किस की बात कर रही हो तुम ? अगर तुम रिद्धि की बात कर रही हो तो उस वक़्त हम लोग सीरियस थे पर उसके पेरेंट्स नहीं माने। जो कोशिश कर सकता था वो की ही थी।  तिशा  अपने बॉयफ्रेंड से शादी करना चाहती थी और ये उसने मुझे बहुत बाद में बताया जब ऑलमोस्ट सब फाइनल हो चुका  था। मैं इस अधूरे मन वाले रिश्ते को ज़िन्दगी भर नहीं झेल सकता था। "

"मुझे तो नहीं लगता कि  रिद्धि के लिए तुमने कोशिश की थी, वर्ना वो ऑस्ट्रेलिया क्यों जाती  और रही बात तिशा की,  तो तुम्हीं ने बताया था कि  उसने अभी तक शादी नहीं की है। "

"तिशा, अपनी ज़िन्दगी में आराम से है, किस से शादी करेगी, नहीं करेगी ये मेरा सिरदर्द नहीं  है। मेरी उस से कभी कभी बात होती है, पार्टीज में, पब में मिलते हैं कभी कभी।  बस। कोई ज़रूरी है कि  हम उसी रास्ते वापिस जाएँ ?" 

"तुमने  तिशा  से  नहीं पूछा, हो सकता है कि ... ?"

"सुनयना, तुम ये ज़रूरत से ज्यादा  ही फ़िल्मी कहानी बनाने की सोच रही हो। "

"मुझे लगता है कि, it was all your fault . And even after those experiences, you are still wandering and roaming around. It doesn't seem that you have learnt anything."

"What learnt, and what fault are you talking about ? what are you trying to say ? and what are those 4-5 times !!! will you please bother to explain ? I am losing my patience, be clear with your words. There is a limit for everything."

"How do I know, last month, you were talking about a dinner date and all ... I guessed you might have found a new girlfriend. am I right ?"

 "dinner date !!! I used to hang out with my friends and colleagues for dinner and parties; how can it be called a Date ?? and even if I am having a new girlfriend then how it is related with my past relationships ? However, Sunayana, I am not having any girlfriend these days. How did you reached to this conclusion of wandering and all ?"

"And if you are trying to blame me for all those things which were out of my control or where I had a little role to manage the situation then it is your own bias, your own judgmental mindset. You have always been rude and harsh with me; you think I am some sort of romeo ... is this what you think about me ??? I do not expect any answer." Anger mounted in his mind and a flow of unexpected thoughts rolled out from his mouth.

"I never wanted to say this, thought it will hurt you and I really never wanted to do that. But I think if you continued this type of behavior;  this being rude and judgmental to other people's lives and giving your half-baked opinion  on their relationship matters, provided that you never had been in any relationship before; how can you even imagine or understand about all this love and romance and emotions that get attached with all these things."

"What do you mean by rude, harsh and judgmental ?? I was trying to understand... why are you venting on  me ? what wrong did I said ? was it so wrong to ask  about your past relationships ?"

"You don't want to understand, you only want baseless allegations and negative points. we better not talk about this, I already said you won't be able to handle it;  but Sunayana, you are not a little kid. And with this arrogance, I fear you will end up destroying your future if ever happened relationships, in fact you will ruin things with your judgmental attitude." 

"I never thought my words are hurting you this much. I bothered you a lot. I was not aware..."

"Yes, it does hurt when you speak such harsh words. And these useless vanilla talks are useless, why the hell did you started it, why are you interested in my relationships." His voice tone was rough.

"I will not bother you from now onward, I want to go home." With a choking voice she spoke. 

"Ok."

"Can't I get a cab or auto ?"

"What cab auto you want !!!! we came here together and I will drop you home. Get in the car. "

"No, I will go myself." Moist eyes yet a firm slow voice.

"Don't create scene here and get in the car." Every word was spoken with a strong tone.

 "Will you not stop crying?" His anger was now turning into frustration and helplessness.

With this question the timid sound of tears stopped. A harsh silence prevailed between them.

She turned her face towards window and set her gaze in a vacuum. The car was running at a faster pace and so does the feelings of heart.

"Say something, Sunayana ...."

"Being quiet and bearing with this was an easy thing." he murmured and stared hard at the road.

finally, the destination arrived. She got out of the car and stepped towards the gate. With a decision of Not Bothering Back.



To Be Continued ...

Part 1
  







Saturday, 8 February 2020

चूड़ियाँ


"ऐ मन्नू, मुझे देर हो जाएगी,  तू ये पैकेट रख।  मुझे शाम को दे देना। "
" क्या है इसमें ? चूड़ियां !!!  ये औरतों की चीज़ें मैं कहाँ रखूं ? तू ले जा। "
"मुझे देर हो रही ऑफिस के लिए , वहाँ ड्यूटी पर कहाँ रखूंगी।  तू रख, शाम को बस स्टैंड पर पकड़ा देना।  मेरे को  गाँव जाना है. "

"  कुशियो  तू ले जाना याद से नहीं तो मैं इधर उधर फेंक दूंगा। "

"कुसमा !!! नाम तो सही ले, दिवालका। "

" जा रे "

  ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
"ऐ मन्नू तू आया क्यों नहीं बस स्टैंड पर ? फोन भी नहीं उठाया। मेरी चूड़ियां तो यहीं रह गई ? इतना सा काम भी नहीं संभला तेरे से।"
"अरे काम में फंस गया था, ज़रूरी जाना पड़ा। फोन की बैटरी ही खत्म हो गई थी। कल ला दूंगा।"
”'""""”''''''''"""""""""""'""""""""""""""""''''''''''''"'""'''''''''''''''''""'""""""

"  ऐ मन्नू, तू मेरी चूड़ियां कब वापिस देगा , अब  ऐसा कर तू ही रख ले।  घर में मम्मी  या किसी बहन को दे देना।मेरे गाँव के ब्याह शादी तो सब  निपट गए ,  अब कहाँ पहनूंगी  चूड़ियां ?  इतनी महँगी !! ढाई सौ रूपए का सेट ख़रीदा था। "

"अरे मैंने वो तेरा पैकेट अटाले में कहीं  धर  दिया कि कोई देखे नहीं।  अब तो मैं भूल गया कि कहाँ रखा है। "

''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

"ऐ मन्नू,  तूने वो  चूड़ियां कहाँ  रखी  ? ढूंढी कि  नहीं ?"
"अरे कंजूस काकी, तू ढाई सौ रूपए मेरे से ले लेना जब मेरी नौकरी लगे।  अब मैं कहाँ अटाले में ढूंढने जाऊं  स्टोर रूम में ज्यादा छानबीन करूँगा तो घरवाले पूछेंगे नहीं क्या ?"
"कब लगेगी तेरी नौकरी और तब तक मेरे तो पैसे डूब गए."
"अरे देखना IAS नहीं तो RAS  बन ही जाऊँगा , एकाध साल में। "
"मन्नू तेरे कोई भरोसा नहीं। मेरी तो छोटी सी प्राइवेट  नॉकरी है।"
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

बरस दो बरस बीत चला 

" ऐ मन्नू ये चूड़ियां तो देखी  हुई लग रही। "
"हाँ वहीँ पैकेट है न. देख कितना संभाल के रखा हुआ था. ढूंढा फिर। "
"अरे दिवालिया,  कम  से कम आज तो  नई  ले आता।  ये फिर बाद में दे देता। "
"क्यों इसमें क्या खराबी है,  अरे मिनकी ये भी एकदम नई  है, एकदम कोरी है, किसी ने नहीं पहनी।  पूरे ढाई सौ रूपए की है। "
"पर आज तो तू मुझे प्रोपोज़ कर रहा है ना , आज तो,,,,,,,,,,,,,,"
"कुशियो,  अब नई  पर फिर से पैसे क्यों खर्च करूं !!!"
"तू ज़िन्दगी भर दिवालका  ही रहेगा "
"ये तो देख कि  संभाल के रखा हुआ था ,,,,,,,,,,,,,,,"
"मेरा माथा, कुसुुुम नाम है ,,,,,,,,,,,"








Tuesday, 23 July 2019

Part 2 : वनीला कॉफ़ी




 "क्योंकि, मैं तुम्हारा  लौह आवरण उतरते देख रहा हूँ। "

'और तुम खुश हो रहे हो ?"

" नहीं, लेकिन इतना अंदाज़ा नहीं लगाया था मैंने।"

"किस बात  का अंदाज़ा ?"

"तो क्या अंदाज़ा था तुम्हारा ?"

"जो भी था, जाने दो। "

"मेरे ख्याल से एक एक कंकर  फेंकने के बजाय तुम पूरा पत्थर एक बार में ही पटक दो."

"तुम फिर फालतू सोचने लगीं, ऐसा कुछ नहीं कहा मैंने।'

"तुम बात को बदल सकते हो लेकिन उसका अर्थ नहीं बदल सकते।  शब्दों के अर्थ  उनके कहे जाने से ज्यादा गहरे होते हैं। "

"हो गई तुम्हारी फिलॉसोफी शुरू। "

"खैर."

"ये बारिश के छींटे खिड़की के कांच पर  ऐसे लगते हैं जैसे कांच में  जगह जगह छोटे महीन से  डिज़ाइन  आ गए  हो। "

"ये तुम्हारी नज़र है, मुझे तो सीधी सादी  बरसात की बूँदें ही दिख रही हैं। "

"हाँ, ये अब गोल बूँद ही दिख रही है। "

"तुम sci  fi  फिल्में बहुत देखती हो ना , उसी का असर है।  आजकल में कोई नई  फिल्म देखी ?"

"अरसा बीत गया फिल्म देखे तो। "

"क्यों , अब ये एक शौक भी बरसात में बह गया क्या तुम्हारा ? और तो कुछ तुम करती नहीं। "

"ऐसे ही, अब इच्छा  नहीं होती। "

"मतलब अब फिल्म देखने की भी कोई बाकायदा सिचुएशन होनी चाहिए। "

"अब तुम जो भी कहो। "

"मैंने बहुत से कहानी के थीम और बेस लाइन सोचे पर किसी को भी आगे नहीं बढ़ा पा रही हूँ। "

'क्योंकि तुम खुद आगे नहीं बढ़ रही हो।  सुनयना,  कहानी लिखने से ज्यादा कहानी जीना भी ज़रूरी है। "

"पर मैं कुछ लिखना चाहती हूँ , मुझे लगता है कि कहीं कोई सूत्र है जो मुझे मिल नहीं रहा या मैं देख नहीं पा रही।"

"वहम  है तुम्हारा। "

"चलो अब बारिश रुक ही गई। बाहर कितना पानी जमा हो गया है। "

"मौसम खुल गया है, चलो ड्राइव पर चलते हैं."

"तुम चलती हो या मैं अकेला ही निकल  जाऊं ?"

"रुको, मैं  आती हूँ। "

"आसमां ने खुश होकर रंग सा बिखेरा है। "

  "और कुछ नहीं तो अलग अलग गानों के टुकड़े जोड़ कर ही एक कहानी नुमा कुछ लिख मारो. तुम्हारा शौक पूरा हो जाएगा। "

"तुम फिर मजाक उड़ा रहे हो। मेरी समझ नहीं आ रहा कि आखिर अब इतने वक़्त बाद  तुम ठहरे पानी में कंकर फेंकने क्यों आये हो ? "

"मैं सिर्फ तुमको आज में खींचने की कोशिश कर रहा हूँ। और तुम इतनी चिढ क्यों रही हो. ? "

" तुम पहले ऐसे नहीं थे या  अब कोई नया बदलाव है ?  मुझे महसूस होता है कि तुम पहले ऐसे नहीं थे।  तुम्हारी भाषा ही बदल गई है।"

"कुछ नहीं बदला है सुनयना।  वक़्त के साथ हम सब ज्यादा परिपक़्व  और व्यावहारिक हो जाते हैं लेकिन तुम ओवर pampered रही हो इसलिए कोई भी नई  चीज़ तुम्हे आसानी से पसंद नहीं आती। come  out  of   your  shell . "

"तुम उन दिनों ज्यादा अच्छे इंसान थे। तब तुम्हारे पास वक़्त हुआ करता था।  अब तो तुम्हारा  वक़्त छतीस हज़ार कामों में फंसा है।"

'क्योंकि तब  मैंने कभी भी तुमको आइना दिखाने की कोशिश नहीं की। और सिर्फ यूँही इधर उधर की बातों के लिए वक़्त आजकल किसी के पास नहीं है।  और  तुम बार बार पलट कर उन पुराने दिनों में क्यों पहुँच जाती हो ?"


" ऐसा नहीं है। तुम्हारे हिसाब से तो परिपक्व होना मतलब सब तरह से इमोशंस को उठा कर ताक  पर रख देना।"

"अब तुम फिर वहीँ  पहुँच गईं। "

"रहने दो फालतू बहस है।  लम्हे फिल्म देखी  है तुमने ?"

"वो श्रीदेवी वाली ? इतनी पुरानी  फिल्म का अभी  यहां क्या काम है ?'

"एक  scene  है उसमे , जब वहीदा रहमान कहती है अनिल कपूर से  कि " हुकुम अब बड़े हो गए हैं और मेरा हाथ छोटा हो गया है."

"इसका क्या मतलब ?  तुम एक पूरी तरह से गैर ज़रूरी बात  को यहां quote  कर रही हो।  तुम वो डेन्यूब वाली बात ही करो।  तुम्हारा आवरण तुम्हारे इस बेसिर पैर की फ़िल्मी कल्पना से ज्यादा ठीक है। हाँ, कहानी वाली बात।  देखो इस बढ़िया मौसम और इन नज़ारों पर ही कुछ लिखो। "

"वो कोई आवरण नहीं है।  मैं सचमुच विएना देखना चाहती हूँ।  यूरोप का आर्किटेक्चर , वहाँ  का लोकल कल्चर  .... "

"अभी तुम ठहरे पानी की बात कर रही थीं और अभी दो घंटे पहले तुमको डेन्यूब सूझ रही थी।  क्या तुम सोचती हो कि डेन्यूब का पानी हज़ार साल से एक जैसा ही है ?  तुम जिस डेन्यूब को ढूंढ रही हो वो तुम्हारी एक पसंदीदा इमेजिनेशन है जिसे तुमने किताब में पढ़ा है और बस एक रोमांटिक सा ऑरा  बन गया। "

"ऐसा तुमको लगता है मुझे नहीं।  और कल्पना क्या कभी सच नहीं होती ? कोई ज़रूरी है कि जो आज दूर का ख्वाब है हमेशा  ऐसा ही रहेगा ? हो सकता है कि तुम को हंसी आ रही है पर ...

'तो चलो, कब फुर्सत है तुम्हें ? टिकट बुक करवानी होगी,  रहने का arrangement , सब देखना पड़ेगा  ना।  तुम को सुविधा से रहने की आदत है।"

"ऐसे अचानक  अभी ?"

"तो और कब ? वहीँ लिखना डेन्यूब पर कहानी।  यहां तो सूखी नदी पर कुछ लिखने का हाल बन नहीं रहा तुम्हारा। "

"बोलो ?"

"अच्छा, कॉफ़ी का कौनसा फ्लेवर पसंद है तुम्हे ? चॉकलेट, हेज़लनट, आयरिश या वनीला ?"


"वक़्त की क़ैद में है ज़िन्दगी , चंद  घड़ियाँ हैं जो आज़ाद हैं "

"कॉफ़ी का फ्लेवर साहब !!!"

"नहीं चाहिए। "

"वनीला से शुरू करो. बेसिक और मीठा  और खुशबू वाला। "






Image Courtesy : google









Wednesday, 17 July 2019

वनीला कॉफ़ी

"धड़कते हैं दिल कितनी  आज़ादियों से, बहुत मिलते जुलते हैं इन वादियों से" .....  

"क्या खूबसूरत गाना  है, लिरिक्स  क्या कमाल का है.;  कहानी की शुरुआत के लिए इससे बेहतर पंच  लाइन और क्या होगी ?"

"तुम एक घनघोर  decadent    रोमांटिक किस्म की प्राणी हो. इससे ज्यादा बेहतर लाइन तुमको सूझ भी नहीं सकती "..

"क्या मतलब घनघोर डीकैडेंट ?? हम क्या कोई जीवन का फलसफा झाड़ने बैठे हैं या फिर तुम्हारी तरह यथार्थवाद की गठरी लादे फिरें ?"

"अच्छा सुनो, वहाँ नीली डेन्यूब के किनारे कैसा महसूस होता होगा ? मैं वहाँ जाना चाहती हूँ ; देखना  छूना चाहती हूँ  वहाँ की आबो हवा, वहाँ का संगीत, डेन्यूब का पानी और ..."


" अच्छा, आज दिन तक तुमने ये सूखी नदी जो इधर झालामण्ड के  पास बरसात में बहती है, वो तो कभी  देखी  नहीं। वहाँ तक कभी गई भी नहीं और डेन्यूब देखने का इरादा है। "

, "ये  भी तो हो सकता है कि  जो इंसान कभी अपने आस पास के लैंडस्केप से भी परिचित ना  रहा हो, वो एक दिन.... "

"हाँ, वो  एक दिन अंतरिक्ष की सैर पर जायगा, सारी  पृथ्वी का भ्रमण करेगा और बेहद रंग बिरंगे travelogue लिखेगा. ज़रूर लिखेगा और उसके पहले अपने डिकइडेंट होने को  सार्थक करेगा। "

"तुम हद दर्जे के निराशावादी हो।  "

"और तुम हद दर्जे की कल्पनावादी ।  "

"मैं कुछ बेहद दिलचस्प किस्म की किस्सा बयानी करना चाहती हूँ ; जैसे वो पुराने ज़माने की बेहद खालिस किस्म की हिंदी के मुहावरे और लहजा।   या फिर पूर्वी भारत के लैंडस्केप, जहां पहाड़, नदियाँ, मैदान, हरे भरे जंगल और  ...... "


"तुम फिर नोस्टालजिक हुईं।  तुम कभी अतीत से बाहर निकलोगी या नहीं ?'

"अतीत एक सुरक्षित जगह है, वहाँ सब कुछ  एक निरंतरता में है. वहाँ कुछ बदलेगा नहीं और ...  वहाँ एक स्वर्णयुग जैसा अहसास होता है। "

"ये तुम्हारी ओरिजिनल लाइन है ?"

"नहीं, इसे मैंने एक उपन्यास में पढ़ा था।   क़ुर्रतुल ऐन हैदर के नावेल आखरी शब् के हमसफ़र।   और उसमे .... "

"मुझे पहले ही समझ लेना चाहिए  था कि  तुम्हारे साहित्य की दुकान वहीँ एक जगह खुलती और  बंद  होती है। "

"एक बात बताओ, दो साल तक तुमको कभी मेरी याद नहीं आई ? तुमने कभी फ़ोन करने तक की जहमत नहीं की उन दिनों।   शायद इसलिए कि  तुम और मैं दोनों बोर हो गए थे ?  मुझे ये अजीब सा लगता है कि  दो बरस अजनबी बने रहने के बाद, एक बार फिर से परिचय का सागर उमड़ना।  ठीक वैसे जैसे पढ़ाई के दिनों में रोज की   बतकहियाँ  .... तुम्हे कैसा लगता है ?"

"मुझे कुछ भी नहीं लगता , मैं इतना दिमाग नहीं लगा सकता तुम्हारी तरह. .  मुझे दिन  भर के छत्तीस हज़ार काम होते हैं, अब तुम सरकारी बाबू हो, काम कुछ है नहीं तो बस ख्याली बहस शुरू। "

"हाँ, और तुम खालिस कॉर्पोरेट वाले बाबू हो।  तुम्हारे छत्तीस हज़ार कामों की लिस्ट में मेरा  नंबर कहाँ आ सकता है ?"

"तुम खुद ही नहीं चाहती थी कि तुम्हे कोई याद करे, कांटेक्ट करे ....  क्या तुम चाहती थी ?'

"इस अंतहीन बहस  का कोई फायदा नहीं. ये सब समय और दिलचस्पी की बातें हैं। "

"तुम हमेशा इस तरह का कोई डायलाग चिपका कर बात बदलने का हुनर रखती हो ।  मैं  पूछता हूँ कि क्या तुम चाहती थीं  कि  कोई तुम्हे याद करे, फोन करे , मिलने आये  ?"

"शायद हो सकता है कि मैं ऐसा ही चाहती थी पर ज़ाहिर नहीं होने दिया। "

"और इस नौटंकी की वजह ?"

"मैं अपने आप को  miserable   नहीं दिखाना चाहती , किसी की दया की मोहताज नहीं होना चाहती  .... "

"Miserable तो तुम अभी भी हो।  इतना कितना सोचती हो और कोई किसी का मोहताज नहीं  बन जाता।  और जो तुम दूसरों के लिए सोचती हो वैसा दुसरे नहीं सोचेंगे क्या तुम्हारे लिए ?"

"मेरे ख्याल से हम कहानी लिखने बैठे थे, उसकी आउटलाइन सोच रहे थे. "

"हाँ,  कहानी लिखो; कुछ वही घिसा पिता सपाट सा।  तुम्हारी इमेजिनेशन को एक फ्रेशनेस की ज़रूरत है।  ताज़ी धुप, हवा और पानी ....  बाहर आओ इस किताबी किस्से से। '

"बाहर बारिश हो रही है , तिरछी बारिश है शायद।  खिड़की के कांच पर बौछार दिख रही है। "

"ये बारिश के दिन हैं. मौसम हर चार महीने में बदलता है।  तुम अपना मौसम क्यों नहीं बदलतीं ? तुम्हारा कैलेंडर तो .... "

"मुझे अब बारिश अच्छी नहीं लगती।  सारे रास्ते  बंद , धूप ताजी हवा का अता  पता नहीं।  सब तरफ सीलन। "

"कौनसा मौसम अच्छा है , जिसमे तुमको ताज़ी हवा दिखती है ?"

"सब एक से हैं।  सपाट और सीधी  लकीर जैसे। "

"अगर कभी मौसम बदला तो क्या तुमको बदलाव अच्छा लगा था ? या लगता है ?  तुम इतना सवालों और संदेहों में क्यों उलझती हो  ये तुम्हारा  एक  खोल में बंद बेवकूफाना  किस्म का   इंटेलेक्ट ; साइलेंट ट्रीटमेंट फॉर अदर्स।  तंग नहीं हो जाती तुम इन सबसे ?"

"साइलेंट ट्रीटमेंट अपना सेल्फ रेस्पेक्ट और वैल्यू  जताने का एक तरीका है। "

"हाँ, ज़रूर ; फिर भले ही उस तरीके से खुद अपना ही नुकसान  हो जाए।  और किसको वैल्यू दिखानी है ? क्या तुम सोचती हो कि  किसी बात को सुलझाने का यही सही तरीका है ?"

"ये सुलझाने का नहीं, बात को ख़त्म करने का तरीका है।   एक रॉयल साइलेंस  .... जब लोग आपको taken  for  granted  लेने लगते हैं या जब कोई चीज़ समझ या पसंद  से बाहर हो तब। "

"गॉड  सुनयना,  तुम इस किस्म के बोगस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचती हो ? ये taken  for  granted  वाला ?  ये तुम्हारी अपनी  Insecurity  है, इसे दूसरों की गलती कहना बंद करो। "

"सुनयना, तुम्हे अब शायद याद भी नहीं  कि तुम्हारा ये रॉयल साइलेंस कितना लम्बा चला था और उस साइलेंस को तोड़ने की और तुम तक  पहुँचने की कितनी  कोशिशें की थीं. मैंने।   याद है तुमको ??  फिर तुम एक दिन नींद से जागीं  अपने उसी पुराने Attitude  और अवतार में और तुमने सोचा  कि  लो सब कुछ पहले जैसा हो गया। "

'तुम आज इतने Cruel  और सख्त क्यों हो रहे हो ?"

"क्योंकि मैं तुम्हारी इस ड्रामा स्टोरी से ऊब गया हूँ।  तुम वक़्त के धागे कस  के रखने की कोशिश कर रही हो  जबकि वक़्त भागता जा रहा है। "

"बारिश अभी भी चल रही है. कब रुकेगी ?"

"मैं कोई इन्दर देवता का सेक्रेटरी हूँ जो मुझे पता होना  चाहिए।  खैर,  मैं चाय  बना रहा हूँ  तुम भी पियोगी ?"

"नहीं, मैं चाय नहीं पीती। "

"तो  ग्रीन टी , कॉफ़ी , लेमन टी ?"

"नहीं अभी सिर्फ ठंडा दूध बिना शक्कर का, उस से मेरी .... "

"तुम और तुम्हारे नुस्खे। कभी इन लकीरों के बाहर आकर देखा है तुमने ?"

"मुझे यही सूट होता है। "

"अब इस वक़्त तुम सचमुच Miserable  ही लग रही हो। "

"क्यों ?"



क्रमशः 





Wednesday, 26 July 2017

अथ प्रतीक कथा ---- दूसरा वर्शन


अपने दोनों हथेलियों  पर अपना सर टिकाये, कोहनियां मेज़ पर  चिपकी हुई ,  प्रतीक  शायद आराम कर रहा है।  पास में परदे के पीछे से एक रसोइया कभी कभी इधर दुकान में झाँक लेता है , दोपहर होने आई है  लेकिन यूँही खाली बैठे हैं।  वैसे ये बीच का वक़्त यूँ  ठाले बैठे ही गुज़रता है , सुबह लोग आते हैं।  वो जो सामने दरवाजा है कांच का बड़ा सा , वहीँ से एक एक कर  लोग अंदर आते हैं  और प्रतीक उनको देखने पढ़ने की कोशिश करता रहता है।   

अमूल बटर की खुशबू  दुकान में  हर समय मौजूद रहती है।  इस खुशबु में प्रतीक को कुछ याद नहीं रहता।   भूलने के लिए भी कोई शगल चाहिए और प्रतीक का शगल है  आलू परांठा  पर अमूल बटर की एक्स्ट्रा परत ।  
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कितनी देर से सोया  हुआ है प्रतीक।  इस कमरे के शोर गुल  की गूंजती हुई  चुप के बीच प्रतीक  सोया है। जब जागेगा तब दुनिया कैसी दिखेगी ?  दुनिया प्रतीक को  कैसे देखेगी ? प्रतीक कब तक सोयेगा ? जगाते हैं तो भी नहीं जागता, लगता है कि  बहुत थक कर सोया है।  

बिस्तर के दोनों तरफ एक जंगल है मशीनों का, टिम टिम करती छोटी छोटी बिंदी जैसी लाइटें  और तारें और ट्यूब  और उन ट्यूब से बहता पानी जैसा कुछ तरल और खून जैसा लाल कोई द्रव धीमे धीमे प्रतीक के शरीर में बूँद बूँद टपकता रहता है।  और  इस सबके   बीच प्रतीक शांत , तसल्लीबख्श  अंदाज़ में सोया रहता है।  लोग आते हैं जाते हैं , बैठे भी रहते हैं लेकिन प्रतीक को कोई नहीं जगाता।  उसे अभी और सोना है ऐसा डॉक्टर  ने बताया है।   कौन जाने कौनसा सूरज उसे जगायेगा ?

नींद के लिए क्या कुछ नहीं करते लोग ... एक गहरी खामोश और सपनों से  भरी नींद के लिए।  और प्रतीक को वही गहरी खामोश नींद  मिली है , बिना मांगे , बिना चाहे , बिना कहे।  कब उठेगा प्रतीक इस नींद से ? 

नींद की गोलियों के पत्ते को हाथ में दबाये , कभी अपने माथे को छूना और कभी प्रतीक के माथे को , दादा जी कितना  कुछ सोचते हैं !!!!  अब बस उनकी ड्यूटी ख़त्म होने वाली है रात को यहां सोने के लिए छोटा अभी आता होगा।  दोपहर बाद से ही वो यहां आकर बैठ जाते हैं , अपने  बड़े बेटे के इस इकलौते बेटे की देखरेख के लिए  और ज्यादातर वक़्त केवल उसे देखने के लिए।  कौन जाने प्रतीक कब जाग जाए !!! 

छोटे काका ड्यूटी पर टाइम से पहुँच गए।  आज ये उनकी तीसरी रात है इस   आई सी यू के बाहर।  लेकिन प्रतीक पिछली सात रातों से जागा  नहीं है।  रात भी  अपनी पारी  की ड्यूटी पूरी करके सुबह वापिस घर लौट जाती है , छोटे काका भी सुबह चले जाते हैं फिर प्रतीक के पापा आ जाते हैं।    

आठवें  दिन की सुबह प्रतीक जाग गया। शरीर हरकत करता है , आँखें इधर उधर देखती हैं,  कान सुनते हैं। 

धीरे धीरे  मशीनें कम हुईं।  फिर  कमरा बदल गया।  एक महीना गुज़र गया।

 और  जीवन की कहानी का एक अध्याय समाप्त होकर दूसरा शुरू हुआ ।  प्रतीक ने कितनी ही बार उस कहानी को मन में दोहराया , जब लद्दाख गया था, जहां ट्रैकिंग और क्लाइम्बिंग करते दोस्तों के संग  खूब सारी  तसवीरें और वीडियो और फिर कहीं एक जगह पैर फिसला था और उसके बाद कुछ नज़र नहीं आया। उसके बाद नींद आ गई थी।  और जब जागेगा  तो  सिर्फ ये हॉस्पिटल और पास बैठे परिवार वाले बस इतनी ही दुनिया है।  हेड इंजरी कहा था ना  डॉक्टर ने।  वक़्त लगता है रिकवरी में, प्रतीक को भी वक़्त की ही ज़रूरत है।

वक़्त रेत की तरह हाथ से फिसलता है।  

और इसी वक़्त की ऊँगली थामे प्रतीक और उसके मम्मी पापा दिल्ली , अहमदाबाद और मुंबई के हॉस्पिटल्स के चक्कर अगले कुछ महीनों तक काटते रहे।  और आखिर साल भर बाद जब अस्पतालों में जाने,  वहाँ रहने इलाज  करवाने का दौर ख़त्म  हुआ तब तक धरती  अपनी धुरी  पर  एक पूरा चक्कर  काट चुकी थी। प्रतीक की बैंगलोर सिलिकॉन वैली वाली  नौकरी जो उसका स्टेटस सिंबल और परिवार का गर्व थी,  जा चुकी थी। प्रतीक घर पर आराम करता है।  

रिश्तेदारों में किसी के बेटे  या बेटी का सिलेक्शन जब कभी  आई आई टी ,  इंजीनियरिंग  के कोर्स में या किसी ऐसी ही प्रतिष्ठित नौकरी में होता और बधाइयां दी जाती,  तब प्रतीक की मम्मी को अपने बेटे का डिस्टिंक्शन से पास होना, सेमेस्टर में टॉप करना और फिर कैंपस सिलेक्शन  में सबसे आगे रहना सब याद आता। प्रतीक  इतना सब याद नहीं करता , उसकी मेमोरी ज़रा कमज़ोर हो चली है , कभी कुछ याद करता है तो कभी कुछ भूल जाता है।  डॉक्टर ने  कह रखा है ज्यादा दिमाग खपाने की ज़रूरत नहीं।  जो भूल गए सो बढ़िया और जो याद है उतने से ही काम  चलाओ।

काम चलाने को, अस्पताल के रिहैबिलिटेशन सेशंस के बिल चुकाने को  और सबसे बड़ी बात ज़िन्दगी को वापिस पटरी पर लाने के लिए  कोई काम चाहिए।  और इस काम चलाने की कश्मकश के बीच प्रतीक कई बार सोचने की कोशिश करता है कि इस तरह यूँ अचानक ज़िदगी कैसे पलटा खा गई ?? वो बंगलौर का वेल फर्निश्ड फ्लैट, दोस्तों के संग धमाचौकड़ी और  वो सुनहरे दिन ....   सब कुछ कहाँ गया ? और अब उस फील्ड में वापसी भी संभव नहीं।  अब तो यहीं कुछ रास्ता निकालना होगा।  और इस  चिंता करने योग्य मुद्दे को लेकर भी प्रतीक कभी चिंता  नहीं कर पाता , क्योंकि अब इतना सब सोचने के लिए  प्रतीक के पास कल्पनाएं और ख्याल नहीं है।  मम्मी पापा को ज़रूर  प्रतीक के भविष्य की चिंता है ,  उसके आर्थिक और वैवाहिक भविष्य की भी चिंता है।  


"पिक एन पैक"   ये नाम कैसा रहेगा ,  शार्ट एंड स्वीट !!!!" प्रतीक का आईडिया। 

"कुछ और भी सोच , ये तो बहुत अँगरेज़ टाइप लग रहा है ", पापा को नहीं जमा। 

" अच्छा फिर,  "देसी ढाबा " कैसा रहेगा ?" 

" हाँ ये फिर भी थोड़ा सा ठीक है , पर कुछ और बढ़िया नाम सोच। "

" पिक एन  पैक ही ठीक है पापा , अब इतना तो कोई बड़ा रेस्टॉरेंट  हैं नहीं अपना। टेक अवे ही तो कर रहे हैं। " प्रतीक ने मुरझाई सी आवाज़ में कहा।  

"बेटा , शुरुआत तो छोटी ही होती है. खैर  आजकल के हिसाब से ये नाम भी सही है। " 

 "पिक एन  पैक"    फ़ास्ट फ़ूड , कुल्छे, परांठे , छोले भटूरे और आइस क्रीम वगैरह  पैक करवाइये,  टेक अवे पार्सल के लिए फोन पर आर्डर करिये  और यहीं बैठना चाहें तो जगह ज़रा छोटी है।  दुकान में घुसते ही सामने एक काउंटर है जहां प्रतीक बैठेगा उसके पीछे बाईं तरफ किचन का दरवाजा दीखता है  और दुकान के दोनों तरफ की दीवारों पर एक से दुसरे कोने तक  स्टील की लम्बी मेज़ लगवाई गई है और  प्लास्टिक के कुछ स्टूल रखे हैं।  परांठों और कुल्छों की कुछ  वैराइटियां हैं , भटूरे और पूरियां भी तीन चार तरह के मिलेंगे।  और  गेंहूं की चपाती  तो हर समय आर्डर पर  उपलब्ध है।  

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कांच के दरवाजे से अब धूप आ रही है,  दरवाजा खुलता है,  कोई स्टूडेंट्स आये हैं , स्टूल पर बैठे हैं और आलू परांठा दही राजमा  दाल और सादा परांठा  के आर्डर हवा में तिरने लगे हैं।  रसोइये  के लिए साँस लेने का भी वक़्त नहीं,  प्रतीक की नज़रें उस धूप के टुकड़े पर हैं जो खुले दरवाजे के ज़रिये दुकान के अंदर  तक पसर गया है।  अचानक उस रौशनी में  हवा की  परछाइयाँ  तैरने लगीं।  स्टील की लम्बी मेज़ पर थालियां सजने लगी हैं और परांठे की ऊपरी परत पर मक्खन का सुनहरा इंद्रधनुष दमक रहा है।  खाने वाले ने खुद से कहा , " इतना  ऑयली  है।"  ये ऑइल उसके चेहरे पर चमकने लगा है।  

प्रतीक ने देखा - पढ़ा।  

"अरे सुन  मास्टर , परांठों पर मक्खन ज़रा कम लगाया कर , आजकल के बच्चों से इतना ऑइल खाया नहीं जाता। " 


*Image Courtesy : Google 

Monday, 3 July 2017

प्रतीक : एक कथा

दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट  

"फ्लाइट  आने में अभी और कितनी देर है ?" उसने अपने आप से पूछा।

सिक्योरिटी चेक का कॉल आने पर थोड़ी राहत महसूस हुई।  अचानक ये मुल्क, ये खूबसूरत आसमान छूता,  सपनों की दुनिया जैसा ये शहर ,  अब उसके लिए बिलकुल अजनबी हो गया था। एकदम अचानक से कि आज सुबह आप सो कर उठे और आपको बताया गया कि चलो सामान बाँध लो , जाने का वक़्त आ गया और  बंजारे का सफर अब फिर से शुरू हुआ ही चाहता है। उसे अभी ऐसी कोई जल्दी नहीं थी यहां से जाने की ; वो अब खुद को यहीं का रहवासी मांनने लग गया था।  उसके  लिए बंजारे वाला जीवन अब  समाप्त हो चुका  था और ठहराव वाला मोड़ जिंदगी में बस अभी आया ही था।  उसके लिए जिसका नाम प्रतीक था।  उसने आस पास देखा कितने सारे लोग खड़े थे,  दिल्ली जाने वाली फ्लाइट के इंतज़ार में , उसके जैसे लोग।  पर नहीं, सब उसके जैसे कहाँ है ?  प्रतीक भीड़ में होकर भी भीड़ नहीं है।  

ये 2009  का दुबई है, जब इकनोमिक क्राइसिस ने दुनिया  की  इस तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, स्काई स्क्रैपर्स के मुल्क, शॉपिंग और टूरिस्ट  डेस्टिनेशन के लिए मशहूर  और रियल एस्टेट के स्वर्ग को हिला डाला था।  अखबार और न्यूज़ चैनल बता रहे हैं कि  बड़ी बड़ी रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनियां अपने कर्मचारियों को काम से निकाल रही हैं, घर वापिस भेज रही हैं।  प्रतीक भी घर जा रहा है।  लगभग सात साल इस स्वर्ग में बिताये हैं, अब वहाँ घर वापिस जाकर क्या करेगा ? उसके लिए अब नौकरी, पैसा, करियर, अलाना फलाना , लक्ज़री, सोसाइटी , सब कुछ यहीं दुबई में था।  अब वो "दुबई पलट "  बन गया था।  थोड़े दिन के लिए या कुछेक हफ़्तों के लिए घर लौटना और फिर  वापिस उड़ जाना अपने स्वर्ग में।  और अब इस तरह अचानक घर वापसी का  फरमान, नौकरी से निकाला  जाना , एक  बोल्ट फ्रॉम दि ब्लू की तरह था।

हिंदुस्तान के रेगिस्तानी कोने में फैला उसका शहर ; अब उसके लिए कोई आकर्षण नहीं जगाता था , वहाँ रह कर इतना पैसा और ऐसे ठाट बाट कमाए जा सकते हैं ?  क्या अब कोई नौकरी वहाँ ऐसी मिलेगी जिसमे इतनी तनख्वाह हो या कोई बिज़नेस करेगा ? ये बहुत बड़ा और भयानक सा सवाल था।  और जिसका जवाब धुल भरी सड़कों और  चिलचिलाती धूप में ढूंढ़ना प्रतीक के लिए किसी आपदा या विपदा से कम नहीं था।  

"सब बेकार बातें हैं, अभी तो मेरा वीसा भी साल भर के लिए वैलिड है अभी दो महीना पहले ही तो renew  करवाया था।  और क्या क्राइसिस !! चार छह महीने में सब सही हो जायेगा।  आखिर ये शेख लोग कुछ तो करेंगे ही। जनरल  मैनेजर भी बोल रहा था कि तेरे को वापिस बुला लूँगा।" 


दो महीने बाद : घर यानी जोधपुर 

" अरे यही एक नौकरी गई है दुनिया के सारे रास्ते तो बंद नहीं हो गए हैं। नौकरी के ऑफर तो आये ही हैं , मैं ही ज्वाइन  नहीं कर रहा हूँ  . तुम थोड़ा धीरज रखो। "

' कब तक धीरज रखूं, जब सगाई हुई थी तब तुम दुबई में सत्तर हज़ार महीने वाली नौकरी कर रहे थे और अब 15 -20  हज़ार वाली नौकरी की बात कर रहे हो। " 

"तुम आखिर  क्या कहना चाहती हो ? मुझे भी  चिंता है  कोशिश कर रहा हूँ कि  जैसे ही हालात सुधर जाएँ तो  चला जाऊँगा। " 

" रहने दो , कुछ नहीं होने का । "  और फोन कट गया।  

थोड़े दिन और कुछ बोझिल हफ्ते बीते।  फिर महीने भी बीते। इन्ही  दिन हफ़्तों के बीच  प्रतीक की सगाई टूट गई क्योंकि सौभाग्यकांक्षिणी को अपने भावी सौभाग्य की बेहद फिक्र थी ।  पंद्रह बीस हज़ार वाली नौकरी  प्रतीक को अब रास आ नहीं रही और एक लोकल कॉलेज के M B A  को पचास हज़ार जोधपुर तो क्या जयपुर में भी नहीं मिलेंगे।  

"दोबारा दुबई चला जाऊं ? वीसा अभी वैलिड है कोशिश  करूँगा तो नौकरी का कुछ जुगाड़ बैठ जाएगा और अब तो सात आठ महीने हो गए हैं मेरे कुछ फ्रेंड्स तो चले भी गए वापिस।  अब तो हालात सुधर रहे हैं। " 

एक सांस में सारी  कथा बांच दी प्रतीक ने और नेहा के पतिदेव सुमित यानी प्रतीक के जीजा जो फुटवियर का होलसेल व्यापार करते हैं  मुंह खोले चाय का कप हाथ में लिए धैर्य की पूंछ पकडे,  सुनने और समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

" यहीं मेरे साथ बिज़नेस कर लो फुटवियर का , क्यों इतना परेशान होते हो। साल दो साल में  जम जायेगा बिज़नेस।  अब देखो बैठे बैठे इतने महीने भी तो निकाल दिए ना। "

"अभी कहाँ इतना कमाया है कि बिज़नेस सेट करने के लिए पैसे  ब्लॉक कर दूँ।  ये तो अभी दो साल हुए जो ये कंपनी ज्वाइन की थी , इसके पहले तो कम ही थी सैलरी , फिर घर बनवाया  और भी खर्चे ... " प्रतीक का मन नहीं हो रहा था इतना सब बोलने का पर बोलना पड़  रहा था।  

तो फिर तय हो गया, प्रतीक वापिस दुबई जाएगा। 

दिल्ली एयरपोर्ट पर एक बार वापिस फ्लाइट के इंतज़ार में खड़ा  है  प्रतीक।  लगता है कि अपनी पहली नौकरी के लिए, पहली "मुसाफिरी" ( समुद्र  यात्रा ) के लिए जा रहा है। एक बार फिर अपने उसी स्वर्ग में वापिस जाना  जहां से कुछ महीने पहले इसलिए निकलना पड़ा कि कंपनी ने ही नौकरी से निकाल दिया था. तो अब दूसरी कंपनी  ने दुबारा नौकरी दी है, बैग में सारे कागज़ हैं  और उन कागज़ों में प्रतीक की सारी  समस्याओं ,  ख्वाहिशों और ख्वाबो की चाबियां  छिपी हैं. प्रतीक के मन में  उत्सुकता है, घबराहट है और बहुत जल्दी है , कि  बस एक बार वापिस नौकरी पे लग जाऊं।  इस बार मार्केटिंग की नौकरी मिली है, पूरे गल्फ और एशियाई बाज़ारों में घूमना पड़ेगा।  प्रतीक को अलग अलग मुल्कों की खूबसूरती इस वक़्त दिल्ली  एयर पोर्ट पर ही बिखरी दिखाई दे रही है। 

साल भर बाद 

"दुबई का नाम सुनते ही लोग दस शर्तें लगा देते हैं।  शादी के बाद साथ ले जाएगा कि  नहीं ? लड़की को वहाँ नौकरी करनी पड़ेगी ? और जब से ये दुबई की अर्थव्यवस्था में गिरावट हुई है तब से लोग  अब दुबई के नाम से ही बिदक जाते हैं।" 

"पैसे भी तो दुबई से ही मिल रहे हैं।  वहाँ इंडिया में कौन दे रहा इतनी तनख्वाह ?"  प्रतीक झुंझला रहा है।  

"बेटा, यहीं कोई बिज़नेस कर लेता या नहीं,  मन नहीं है तेरा यहां रहने का ?"  माँ  क्या कहे ,  एक तरफ लगता है कि  लड़का लौट आये फिर चिंता है कि यहां कोई भविष्य फिलहाल तो दिखाई नहीं देता।  अभी कुछ साल वहीँ रह के कमा ले फिर तो आखिर आना ही है।  पर आजकल दुबई सेटल्ड लड़कों के लिए लड़की तलाशना बड़ी मुसीबत हो गई है।  गए वो ज़माने जब दुबई के नाम से ही रिश्ता आ जाता था , अब तो आया रिश्ता भी  दुबई का नाम से ही ...
दुबई अब सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं है , क्या पता कब निकाल दें ? या ना भी निकाले पर आखिर कभी  तो छोड़ना पड़ेगा ही; अब सारी  ज़िन्दगी वहाँ रहना तो अच्छे भले के बस  नहीं।  सुना है वहाँ बच्चों की पढ़ाई, अस्पताल के खर्चे और घर के किराए बहुत महंगे हैं।  

दो साल बीते  

"पिंटू तू जल्दी घर आ।  पापा की तबियत ठीक नहीं , अस्पताल एडमिट कराया है कल रात , तू आ जाएगा तो मम्मी को हिम्मत बंधेगी। " सुमित ने  फोन पर इस से ज्यादा और कुछ नहीं कहा।  

दुबई से जोधपुर तक  समंदर और ज़मीन की  जो दूरी है उसे प्रतीक ने इतनी तेज़ी से पार किया कि लगता है कि कहीं कोई दूरी है ही नहीं।   तीन दिन के बाद धरती और आसमान के बीच जो दूरी है उसे प्रतीक के पापा ने पार किया बगैर किसी जल्दी के।  

अब आगे क्या ... दुबई अब बहुत दूर हो गया है। घर खाली हो जाएगा मम्मी के लिए अगर प्रतीक दुबई चला गया। 

बिज़नेस वो भी फुटवियर का,  जिस से अभी तक प्रतीक बचता आया था क्योंकि बिज़नेस का कोई खास अनुभव नहीं और पूँजी गंवाने का डर  भी है। कहना आसान है लेकिन बाजार में स्पर्धा में टिकना बेहद मुश्किल।  पर अब इस बाजार के समंदर में कूदने के अलावा कोई और  चारा भी नहीं।  सुमित के साथ माल खरीदी और फिर रिटेलर को सप्लाई के तौर तरीके, व्यापार का रंग और ढंग सब कुछ ध्यान से सीखा प्रतीक ने।  महीनों की "ट्रेनिंग"  और  "प्रैक्टिकल"  के बाद  अब प्रतीक ने खुद का रिटेल काउंटर यानी दुकान शुरू की है, शहर के एक सबसे व्यस्त बाज़ार में जहां  फैशन के ट्रेंड शुरू होते और ख़त्म होते हैं।  यहां किराया ही इतना महंगा है दूकान का लेकिन फिर नाम भी है कि इस "बाजार" में दूकान है।  

दिन चलने लगे , हफ्ते और महीने भी चले गए। सात आठ महीने बीत चले । सुमित काम सिखा सकता था, बिज़नेस का हुनर नहीं। दूकान नहीं चली, पंडित ज्योतिषी कहते हैं कि चमड़ा या जूता जैसी चीज़ का कारोबार प्रतीक को नहीं फल सकता इसलिए .... इसलिए इस दुकान के साथ साथ प्रतीक ने अपनी जमा पूँजी का एक बड़ा हिस्सा  घाटे में डुबा दिया।  अब, जेब खाली है।  शादी के लिए रिश्ते,  जब दूकान शुरू की थी तब आया करते थे लेकिन तब बिज़नेस जमाने के चक्कर में प्रतीक टाल  गया  और जैसे जैसे दूकान के घाटे में होने की बात फैलनी शुरू हुई तो सब रिश्ते उड़न छू हो गए।  

अब फिर से प्रतीक घर बैठा है। वापिस नौकरी की तलाश की लेकिन फिर वही पुराना  खटराग कि  15-20 हज़ार मिलेंगे मुश्किल से और खटना पड़ेगा 12 -16  घंटे। नौकरी है या कि बंधुआ मजदूरी और उस पर सेठ की डाँट फटकार भी सहो। अब इतना त्याग प्रतीक से हो  नहीं  पाता है।

कभी कभी पुरानी तसवीरें देखता है, जब दुबई में था तब कैसा था ....  एकदम गोरा गुलाबी रंग, हलकी सी दाढ़ी रखता था। उस चेहरे से नज़रें आसानी से हटती नहीं थी। हलकी धीमी आवाज़ और यूँ सामने देखते हुए भी कहीं दूर देखती हुई नज़रें ... ये प्रतीक का सिग्नेचर स्टाइल था।  और अब .... अब भी कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है।  आस पास के दूकानदार ही कहते थे कि प्रतीक गल्ले पे बैठने वाला बनिया नहीं किसी बड़ी फर्म के सजे धजे दफ्तर में बैठा सेठ साहब लगता है। पर अब लगने से क्या होता है। वक़्त बदल गया है और वक़्त ने प्रतीक को भी बदल दिया है पर आवाज़ और चाल ढाल की नफासत नहीं बदली है। कहीं कुछ तो बचा रहे।

पर अब बचा ही क्या है जो इस वहां को पाले रखा जाए कि "हम" कुछ अलग हैं।

साधारण होना और वो भी भीड़ में शामिल होना कितना आसान और सुविधाजनक है ये बात पहली बार प्रतीक को समझ आई।  कम्बख्त इतनी देर से समझ आई कि  प्रतीक का  मन किया कि उस पुराने वक़्त की याद को भी फाड़ कर फेंक दे।  पर यादें ज़रा मजबूत किस्म के पदार्थ की बनी होती हैं कि जितना ज़ोर लगाते हैं उतनी ही ज्यादा फैलती और बिखरती जाती हैं पारे की तरह। जाने कौनसे कागज़ या प्लास्टिक या मिटटी या धातु की बनी होती हैं  


फिर घूम फिर कर,  ये सब फिलोसोफी भूल कर ,  प्रतीक कुछ दिन-हफ्ते  सुमित के साथ  उसके दूकान पर बैठा ;  वक़्त गुज़ारने के लिए या कुछ सीखने के लिए  काम भी किया लेकिन दुकान पर सेठ नौकर का रिश्ता अलग है और जीजा साले का अलग है।  कुछ महीने तक एक दोस्त की ट्रेवल एंड टूर एजेंसी में  भी भागीदार बना और फिर जो पैसा कमाया उस से  दोस्त खुद ही टूर करने हांगकांग निकल गया और प्रतीक जोधपुर के उसके ऑफिस को ताला  लगा कर वापिस घर बैठ गया। और अब खाली बैठा घर में मम्मी की रसोई में हेल्प करता है।   क्या हेल्प करता है या रसोई को   बिगाड़ता है ये अभी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है।  पर कुछ तो खटर  पटर  करता ही है रसोई में।  वक़्त गुजारने का अपना अपना शगल है साहब। पैसा जेब  में हो  तो शगल और शौक के खर्चे उठाये जा सकते  खाली जेब हो तो सारे शौक  शगल दिमागी फितूर कहलाते हैं।

क्यों,  क्या कहते हैं आप ?? 

"यार ये जो छोटे मोटे  फ़ूड स्टाल  खड़े रहते हैं जगह जगह , इनकी मेनू लिस्ट भी सिंपल है और ज्यादा लम्बी नहीं है फिर भी कितनी भीड़ रहती है इनके यहां।" पिज़्ज़ा का स्लाइस खाते खाते प्रतीक ने उन सब ठेले वालों रेहड़ी वालों को गौर से देखा जो इस खूबसूरत बगीचे को चारों तरफ से एक गोल बाजार की तरह घेरे हुए थे।  क्या नहीं मिलता इन छोटे से फ़ूड काउंटर्स पर ;  पिज़्ज़ा, हक्का नूडल्स,  मचुरियन, चिली पनीर, स्प्रिंग रोल्स, मोमोज़, फ्राइड राइस और अपने हिंदुस्तानी चटपटे स्नैक्स की तो बहार है।  पाव  भाजी से लेकर वड़ा  पाव और पानी पूरी से लेकर छोले कुल्छे।  

"यार सीधी बात है कि  लागत बेहद  कम है जिस से कीमत भी बहुत वाजिब हो जाती है  और लिमिटेड आइटम एक रेहड़ी वाला  बेचता है तो ऐसा कोई सामान की बर्बादी भी नहीं और इसलिए पब्लिक भीड़ लगाती है। ये पिज़्ज़ा यहां साठ  रूपए में मिलता है वहाँ  रेस्टोरेंट में डेढ़ सौ में पड़ेगा, डोसा सांभर ये लोग तीस चालीस रूपए में दे देते हैं और रेस्त्रो वाला सौ में देगा।"  आशीष, प्रतीक का बेरोजगारी के  दिनों का साथी है, यहीं इधर ही कहीं  गली मोहल्ले में रहता है। 

"पर यार क्वालिटी और कुकिंग स्टाइल प्लस एम्बिएंस ...."

" जिसको हफ्ते में तीन दिन बाहर खाना है उसके  लिए तो ये ठेले ही बढ़िया हैं. और तू बोल क्या कमी है इस सिंपल चीज़ पिज़्ज़ा में, रोस्ट अच्छा किया हुआ है और टेस्ट भी ठीक है। अब तू वापिस अपने दुबई वाले मोड में मत घुस जाना। "

"बात तो सही है तेरी।"  इतने काम दाम में  मार्गरिटा पिज़्ज़ा मिलेगा क्या ? प्रतीक को फिर से उन यादों पर झुंझलाहट आई जो उसे किसी पिज़्ज़ा ब्रांड आउटलेट की तरफ खींचती थी।

 प्रतीक का ध्यान अब उस किचन नाम की जगह पर था जहां अभी सैंडविच तैयार किया जा रहा था, एक तरफ तवे पर भाजी गरम हो रही थी और पाव सेके जा रहे थे , मेयोनेज़ का डब्बा वापिस किनारे पर रखा जा चुका  था ।  उसने गौर से उस काउंटर को देखा, एक तरफ  ओवन रखा था जिसमे  सैंडविच पिज़्ज़ा रोस्ट होते हैं और बिजली का कनेक्शन पास की दुकान से लिया गया है।  फिर उसने उन लड़को की तरफ देखा जो इस किचन को चला रहे थे;  एकदम एक्सपर्ट कुक की   तरह काम करते हुए ,  जिनके कपड़ों पर तेल मसालों के दाग हैं , किसी एक ने ऐप्रन भी डाल रखा है गले में।  प्रतीक ने उस शाम वहाँ खड़े खड़े  ग्राहकों की संख्या और उनके ऑर्डर्स  का एक मोटा मोटा  हिसाब लगाया और फिर एक गहरी सांस ली।  


"अपना घर इधर मेन रोड पर होने के कारण सारा दिन गाड़ियों का शोर, धुंआ ही पीछा नहीं छोड़ता। " 

मम्मी की नींद डिस्टर्ब हो गई क्योंकि बाहर एक ट्रक और फिर कुछ बसें तेज़ हॉर्न बजाती बसें  एक के बाद एक निकली। ये घर प्रतीक के पापा ने जब ख़रीदा था तब यहाँ से  करीब एक किलोमीटर की दूरी पर कुछेक सरकारी दफ्तर थे और बाकी सब तरफ  घर बने थे।  अब यहां सड़क पर आमने सामने  एक व्यस्त  बाजार, बस स्टैंड,  बैंक, मिठाई की दुकानें, एक सरकारी डिस्पेंसरी और एक बड़ा होटल  भी   बन गया है।  एकाध कैफ़े टाइप रेस्टोरेंट भी खुल गए हैं , आइस क्रीम पार्लर भी हैं।  


रसोई 


घर के बाहर के बरामदे नुमा हिस्से को टीन शेड से कवर किया गया, कुछ कुर्सी टेबल लगाईं गई, एक काउंटर लगाया है और काउंटर के पीछे पर्दा है जिसके पीछे रसोई है।  बाहर एक  साइन बोर्ड सड़क पे लगा दिया गया है, "भाई की रसोई" . मेनू कार्ड जो एक कागज़ पर छापा है जिसे लेमिनेट करवा दिया गया है,   काउंटर पे रखा है और ऐसे कुछ और मेनू  टेबल्स पे भी रखे हैं।  मेनू के व्यंजन वहीँ हैं, सैंडविच, पिज़्ज़ा, पाव भाजी, चाउमीन वगैरह और हाँ प्रतीक ने कुछ वैरायटी भी दी है. "शाही सब्ज़ियां" और थाली यानी केवल फ़ास्ट फ़ूड ही नहीं पूरा भोजन का इंतज़ाम है ; वैसे सब्ज़ियां भी सीमित हैं, शाही पनीर, दाल फ्राई, मौसमी हरी सब्ज़ियां, गट्टे की सब्ज़ी  वगैरह।  

जैसे तैसे रसोई चल ही निकली, रोज के हज़ार  बारह सौ का गल्ला हो जाता है. प्रतीक ने मार्केट रिसर्च की और अपने शाही पनीर का दाम  साठ रूपए का हाफ प्लेट कर दिया जिसमे इतना पनीर और ग्रेवी देता है कि दो आदमी पेट भर के खा सकें।  दाल और भाजी भी महज़  चालीस रूपए   में इतनी कि दो जनो का पेट भी भरे और जेब भी राजी रहे।

बस केवल एक बात अजीब थी कि प्रतीक उस ढाबे के सस्ते और सादे सेटअप में फिट नहीं था क्योंकि वो चाह के भी  ना तो ढाबे वालों जैसा दीखता है  ना उसके हाव भाव और बोल चाल  में ढाबा समा पाया। ग्राहकों से उतना ही बोलता है जितना बोलने भर से काम चल जाए  और वो भी अपनी उसी खास धीमी  आवाज़ में।  कपडे आज भी सलीके से, और खुद के कद काठी पर फबने वाले ही पहनता है;  यूँ खड़ा रहे तो लोग उसे ही ग्राहक समझ बैठते हैं  पर फिर जब आगे बढ़ कर प्रतीक उनसे पूछता है कि ,  " हाँ, क्या चाहिए आपको?"  तब ग्राहक समझ पाते हैं !!!!  पर खाना प्रतीक अच्छा बनाता  है।  ग्राहक भी इस बात को प्रतीक से ज्यादा समझते हैं  और इसलिए ये ढाबा तो  सस्ता सा  लगता लेकिन मालिक ज़रा  महंगा सा  और ढाबे वाला नहीं लगता।

खैर।

"बेटा,  अब ये रिश्ता ठीक ही लग रहा है , अब मैं तो थक गई हूँ।  और इन लोगों ने खुद आगे बढ़ के बात चलाई  है, लड़की की फोटो भी साथ भिजवाई  है।  देख ज़रा , ज़रा सांवली है और थोड़ी वजन में भी तुझसे ज्यादा लग रही है  पर ठीक है।  इसके घरवालों ने कहा है कि अगर कभी भविष्य में तू अपने इस रेस्टोरेंट को और अच्छा बनाना चाहे तो वे लोग मदद भी करेंगे। "

 ये आखरी बात ज़रा हल्की आवाज़ में कही थी मम्मी ने , क्योंकि इस एक बात के पीछे ये सच भी छिपा है कि  प्रतीक का ढाबा अभी इतना नहीं  चलता कि अपने दम  पर वो इसका विस्तार कर सके।  कुर्सियों के सीट कवर अब थोड़े मटमैले हो गए हैं और मेनू कार्ड का  लेमिनेट भी ज़रा गन्दा सा हो गया है।  पर फिर भी काम तो चल ही रहा है। प्रतीक ने तस्वीर को सरसरी नज़र से देखा फिर उस नाम को फेसबुक  ढूंढा।   वहाँ और भी तसवीरें थीं; एक ज़रा सांवली रंगत वाली ज़रा मोटी  और चेहरे में एक तीखापन और अजीब सा हल्कापन लिए एक लड़की।  प्रतीक को अपने नफीस अंदाज़ की याद एक  बार भी नहीं आई और उसने हाँ कह दी।  

शुभ विवाह के बाद अब प्रतीक की पत्नी ज्योति भी रेस्टोरेंट के काम में हाथ बंटाती है।  परदे के पीछे की रसोई में वो भी प्रतीक के साथ खाना बनाती है और प्रतीक खुद सर्व करता है , बहुत से लोग पैक करवा के ले जाते हैं और बहुत से यहीं खाते हैं।  ज्योति को देख कर  लोगों को लगता है कि वो इस ढाबे की मालकिन है, उसका चेहरा और व्यक्तित्व इस ढाबे को आत्मसात कर  गया है और ढाबे के लिए  प्रतीक  के बजाय ज्योति को अपना  कहना ज्यादा आसान था।