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Friday, 11 February 2022

हवा खाओ

 संसार  कथा -- भाग एक 


"आपको हवा खाने के लिए किसने कहा था ? दुनिया में खाने के लिए एक से एक बढ़िया पकवान हैं, व्यंजन हैं,  तरह तरह के फल और सलाद हैं।  शाकाहार से लेकर मांसाहार तक, फलाहार से लेकर पयाहार तक।  कोई कमी है भला !!! "
"बताओ !!! यह हवा खाने की क्या सूझी ?? " 

"और अब देखो गले में हवा भर गई ना।  और ये कि अगर साधारण तापमान वाली हवा खाई  होती तो फिर भी कुछ ठीक था।  लेकिन यह ठंडी सूखी शीत लहर वाली हवा खाने को किसने   कहा ?"
"और फिर उसका संतुलन या एडजस्टमेंट बिठाने को यह हीटर की हवा खाने की सलाह किस समझदार  नासपीटे ने दी ?"

"वो मिंटू ने कहा कि थोड़ी देर हीटर चला के बैठ जाओ तो ठण्ड का असर कम हो जाएगा और शरीर नार्मल फील करेगा। "
"नास जाए इस मिंटे का।  निकम्मा दिन भर मोबाइल पर जाने क्या आँखे फोड़ता है।  और अब तुम्हें वही उलटे सीधे नुस्खे बता रहा।  अरे तुम तो इतनी उम्र हुए, अब क्या इस घास के टोकरे से मौसम की संभाल करना सीखोगे ?"  

"और कहे देती हूँ, आजकल अगर हवा खाने की इच्छा इतनी ही ज्यादा हो रही है तो साफ़ सुथरी sanitized मास्क वाली हवा ही खाओ।  अगर कहीं तुम कोरोना और उसके रिश्तेदार ओमीक्रॉन को घर ले आये तो याद रखना तुम्हें ही टप्पर समेत घर से बाहर क्वारंटाइन कर दूंगी. समझ रखना।"



संसार कथा -- भाग दो 

"तुम्हें पूछना तो चाहिए था, कि आखिर पत्थर खाने की क्या सूझी ?" 
"यह कोई भले आदमियों का काम है कि कंकड़ पत्थर खाते रहे ?? फिर अब क्या रहा ?"

"ऑपरेशन आज हो गया और कह रहे कि अब चिंता  फ़िक्र की कोई बात नहीं है।  तीन दिन बाद छुट्टी दे देंगे।  बाकी खाने में परहेज कही है।  ख़ास तौर से सब्ज़ियां बार बार धोकर ही रांधनी  हैं ;  चावल, दलिया,  चिवड़ा भी अच्छे से साफ़ करके ही पकाने होंगे और कच्ची सब्ज़ी या पत्ते वाली सलाद नहीं खानी। " 

"लो यह नया नखरा सम्भालो।  मैं कहती हूँ कि आखिर इतने पत्थर खाता  ही क्यों था ?" 
"यह सब बचपन की आदतें हैं, मिट्टी, स्कूल की चॉक और बाटा  पेन्सिल,  दीवार का चूना और प्लास्टर खाने की आदत पहले से ही रही होगी। " 

"हाँ, ब्याह के वकत बताये नहीं होंगे और अब पेट से पत्थर पहाड़ निकल रहे। "
 

Thursday, 10 September 2020

वनीला कॉफ़ी  --- 5 अंतिम भाग

 "ना जाने वक़्त की मर्ज़ी हैं क्या, क्यों हैं मिली ये दूरियां,  ओ मेरी जां "


"अब तुम अचानक से ये बात बता रही हो !!! पहले तो कभी तुमने इसका ज़िक्र भी नहीं किया।  रातों रात तो ये सब होता नहीं। तुम्हें इसका कैसे पता चला ? क्या तुम .... "
"चुप रहो तुम, फालतू के सवाल या कयास लगाने की कोई ज़रूरत नहीं। और मैंने कब कहा कि  रातों रात हुआ।  और तुम्हें कब बताती मैं ? और क्यों बताती ? तुम्हारे पास कौन सा वक़्त था ये सब सुनने का या किसी की मुसीबत को समझने का। "
"अब बिना बताये कैसे पता चल सकता है !!! मैं क्या कोई  अन्तर्यामी  हूँ जिसे अपने आप  भूत भविष्य  पता चल जाए." 
"पता चल भी जाए तो क्या कर लेगा इंसान।"

  "Sunayna, why on earth did you not tell me about this ? Why are you so introverted when it comes to your life and events."
"Introvert!!! you are  calling me an introvert !!!. Do you remember how many times I tried calling you, texting you ? but have you ever bothered to pick my call up ?  That fine early morning, when I called you to enquire about that Ayurvedic national institute and what you said.. you don't have  time to visit there, it was far from your work place and from your residence as well as. do you remember all that ??"
"Sunayna, I was actually busy, I wasn't making any excuses.. and even though you did the same with me a couple of years ago, you were also not picking my calls, not messaging me back; so what i did initially was just normal from my side. and as for that hospital thing, it is actually quite far and you know that cosmo city traffic... it will consume a whole day."
" fine then, Any other excuse do you have ?"
"it is not an excuse!!!"
"well, it is .. from my perspective, it is quite a good one. anyway, I am not asking for an explanation."
"Sunayna..."
"stop calling my name again and again. am I calling your name ?"
"why ? what is wrong in it ?"
"I don't like that. it sounds like you are dragging me in some sort of question answer session."


"ठीक है।" your Iron Curtain... and silent treatments were logical when applied to others but became irrational when others did the same to you. "


"Whatever it is.. it saves me from many uncomfortable situations." 

"Will you now tell me, what exactly happened ? and is this your reason for feeling miserable ?"

"Long story short, it was due to an internal injury, got hit by a vehicle, at first everything was fine, I was fine, minor bruises and cuts and then after a couple of weeks things strated getting bitter and tough. and then this decision was taken."

"and how an ayurvedic treatment was going to help?"
"they could have resolved the internal swellings or any wounds that were causing the ... the problem; at least this is what I was told by some people."

"Okay, let's not detail it. let's deal with it. let's think that it does not exist."

"I don't need any sympathy, it is not me who needs to think like this, it is the rest of the society, will they ever feel like this ? how am I supposed to marry or can have a family of my own?"

"You can adopt, of course with the consent of your ... alright.. I got it. But wait, Sunayana, the world is not that blanck or dull.. I am sure you will find a sensitive person. why do you not hope for good ?"

"because I don't want fake hopes."

"Anyway, next week , I am going back to delhi and then.. i don't know.  I will miss you Sunayna. will you remember me or not...?"

"I don't know... I don't want to keep a track of memories."

Four Months...

"Where are you ? why are you not picking up my calls? is everything ok ? are you alright ?"
"Sunayna, answer my question. this time I am actually asking a question." a message flashed on whatsapp screen and got seen after a couple of hours.
"I am at Dalhousie, it has been fifteen days since I am here. the internet and social media is not much allowed."
"what the hell on earth are you doing there ? and with whom you went there ? Sunayna , you ok ? tell me everything."

"relax, nothing to worry, do you remember, once I talked about visiting a place like Kothi or Sanavar .. a studio cottage .. here it is. It is a resort spa for those who want to heal themselves. and I am alone here, no one accompanied me here, no one brought me here, I came by myself."

"Are you happy ? is this your danube ? that Blue Danube?"

"I am still wandering.. I am looking for answers and lost pieces of the puzzle."

"shall I join you over there for the weekend, I am still in Delhi and not much occupied these days."

"No, I don't want to."

"Why ?"

"we all have our own journeys."
"What is that !!! ehh, can you ever be normal like normal people."
"it is normal, absolutely normal, as normal as playing pool and drinking beer in a pub."
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"तिशा, वापिस फोन कर रही है, क्या  जवाब दूँ ? तुम कुछ बताओ, उसका ब्वॉयफ़्रेंड तो जर्मनी चला गया बिना शादी किये। और अब मेरी फैमिली को   ऐतराज है।"

"मैं क्या कह सकती हूँ, मैं तो उसे जानती भी नहीं।  और मुझे इन सब मामलों की कोई ख़ास समझ भी नहीं। "
'अच्छा, तो तुम अपना बताओ, उस रिसोर्ट  से आने के बाद  अब आगे क्या ... ?"
"पता नहीं. बस कहानियां लिखने की कोशिश करती हूँ."
" कहानी  लिखने से ज़िंदगी चलेगी ?" 
"तो क्या नहीं लिखने से चल पड़ेगी ? तुम तो नहीं लिखते कहानी पर फिर भी अटके हो।   तुम क्या ढूंढ रहे हो ? तुम तिशा,  रिद्धि या वो हरिता किसी को भी नहीं ढूंढ रहे हो।  तुम अपने  फैसले की वजह ढूंढ रहे हो।  एक सही फैसले  के लिए एक सही और तार्किक वजह। तिशा वापिस आना चाहती है  पर क्या तुम उस मोड़ पर वापिस जाओगे या नहीं जाओगे या अब तुम कहीं और जा चुके हो ?"

"मैं कहीं नहीं जा रहा।  और तिशा से मैं बात नहीं करूँगा। अब इतना सब बखेड़ा करने के बाद उसको क्या चाहिए।"
"अगर ऐसा है तो तुम उसके बारे में मुझसे सलाह क्यों ले रहे हो ? अगर ये क्लोज्ड चैप्टर है तो इस पर विचार क्यों कर रहे हो ? क्योंकि अभी तक तुम इसे एक ओपन opportunity की तरह मान रहे हो ? है ना ?"

"नहीं, ऐसा कुछ नहीं सोच रहा मैं।"
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Three Months  .... 

"तो अब आखिर कुछ तो सोचा होगा ना तुमने। कहानी तो पूरी हो गई तुम्हारी।  अब ज़िंदगी की कहानी को आगे बढ़ाओ। सुनयना, तुम सुन  रही हो।"

"हाँ, मैं विएना के म्यूजिक फेस्टिवल का एक वर्चुअल कॉन्सर्ट  देख रही हूँ।  मैं सुन रही हूँ।"
"तुम कुछ नहीं सुन रही।  तुम कहो तो मैं तुम्हें कुछ अच्छा प्रपोजल बताऊँ, यहां मेरे कंपनी के कैंपस के पास वाले सेक्टर में में एक कंपनी में काम करता  ...."

"क्या उसे यह कॉन्सर्ट पसंद आएगा ? यह संगीत जिसकी भाषा अजनबी और शब्द अनोखे से हैं। "
"मैं समझा नहीं ?" 


"वादी के मौसम भी इक दिन तो बदलेंगे"




कहानी श्रृंखला समाप्त। 

Vanilla Coffee--Part 1


Wednesday, 25 September 2019

old school charm

मुझे यात्राओं का कोई बहुत ज्यादा मौका नहीं मिला है; पुराने ज़माने के लोगों की तरह मेरी यात्रा भी छुट्टियों में ननिहाल जाने या बहुत हुआ तो किसी और रिश्तेदार के यहां जाने तक का एक सीमित अनुभव है ।  पर इस सीमित यात्रा में भी जो कभी रोडवेज की बस से और कभी भारतीय रेल से की गई; उसमे कुछ जगहें  ऐसी हैं कि उनको देख कर या याद कर के आप किसी और ही  संसार में पहुँच जाते हैं।  यह एक तरह से हमारा देसी नार्निया वाला छोटा मोटा अनुभव है। बस से आते जाते वक़्त कुछ तयशुदा जगहों पर हाल्ट होता था और ट्रेन तो खैर अपने आप में एक हाल्ट स्टेशन है जो निरंतर चलायमान रहता है। अब ये तय जगहें ही आदमी का एक परिचित आकर्षण बन जाती हैं; यहां चाय पिएंगे, यहां कचौड़ी या लस्सी बढ़िया मिलती है, यहां का दहीबड़ा नहीं खाया तो फिर यात्रा का आनंद ही क्या रहा !!! उन्ही तयशुदा  जगहों की यात्रा  में भी हर बार रास्ता कुछ नया ही लगता है; कुछ स्वाद, कुछ पहचान के पत्थर और कुछ स्मृति के चिह्न। 

कोई चीज़ कितनी पुरानी हो सकती है ?  या पुरानी होते हुए भी उसका ओल्ड स्कूल चार्म बना रह सकता है क्या ?  ये ओल्ड स्कूल किसको कहते हैं ? शायद पुराने ज़माने से चिपके रहने की आदत को ?? 

बहरहाल, अभी पिछले कुछ वक़्त से हाईवे के होटल, गेस्ट हाउस, मिडवे रेस्टॉरेंट को देखते देखते यह ओल्ड स्कूल जैसा कुछ जाग गया।  अजमेर जोधपुर हाईवे पर बना "बर" का मिडवे।  जहां का कटलेट और  इडली सांभर, ऑमलेट ब्रेड और चाय  जिसके लिए हम पूरे रास्ते इंतज़ार करते थे बर पहुँचने का ।  कटलेट होता कुछ नहीं है सिर्फ आलू बेसन की एक बड़ी सी टिकिया, पर यही टिकिया उस मिडवे का बड़ा आकर्षण थी।  इडली सांभर और नारियल की चटनी हर वक़्त ताज़ी मिलती थी। खैर, खाना  वहाँ आज भी ताजा ही मिलता है।  यह चमत्कार कभी समझ नहीं आया कि हर चीज़ उस बियाबान में इतनी फ्रेश और स्वादिष्ट कैसे है ?  और वहाँ की वो छोटी सी knick  knacks  बेचने वाली दुकान;  जहां से कई बार काफी कुछ ख़रीदा. अब वो काउंटर नुमा दुकान अपनी पुरानी चमक की परछाई जैसी कुछ बची है.  मिडवे की इमारत  भी जैसे कोई पुराना  सरकारी गेस्ट हाउस; उभरे हुए सफ़ेद भूरे रंग के पत्थरों की बाहरी दीवारें जिन पर वक़्त  और मौसम की मार से अब काई जमने लगी है. सामने गेट से आता हुआ एक खुला लम्बा रास्ता और इतना बड़ा कंपाउंड कि  जहां दो तीन बसें आराम से खड़ी  रह सकती हैं।  यह इमारत भी एक हिस्सा है नास्टैल्जिया का; बीते समय के फ्रेम का।  बारिश के मौसम में यहां अक्सर सब कुछ भीगा हुआ दीखता है.  इमारत की बाहरी दीवारें, कंक्रीट की सड़क वाला रास्ता और सारे पेड़ पौधे ।  ऐसा लगता है कि बरसात बस अभी ही हुई है ।  अक्सर मुझे ऐसा वहम होता है कि बरसात का मौसम इस जगह पर हमेशा के लिए थमा हुआ है । इस जगह को देखकर लगता था  कि जैसे कोई कोलोनियल ज़माने का  गेस्ट हाउस जो किसी दूर दराज  हिल स्टेशन पर बसा है । निर्मल वर्मा के उपन्यासों के हिल स्टेशन और कॉटेज हाउस का नक़्शा शायद ऐसा ही कुछ होता होगा !!! ( रेगिस्तान के पश्चिमी कोने पर बसे  शहर के लिए ये बरसात का मौसम वाला हाईवे का ये अर्ध सरकारी मिड वे  होटल ही हिल स्टेशन जैसा मालूम होता है )

इस मिडवे को देख कर हमेशा हिल स्टेशन  जैसा क्यों  महसूस होता था, इसका  कारण तो नहीं पता पर शायद आस पास मध्य अरावली के पहाड़ है, जिनके कारण यहां काफी हरियाली है और बरसात में इस हाईवे पर और पहाड़ों पर धुंध और बादलों का डेरा रहता ही है ।  सफ़ेद रुई जैसे बादल  पहाड़ो पर ही उतर आते हैं, पहाड़ का ऊपरी हिस्सा इन बादलों से अक्सर ढका हुआ ही दिखता है।  बारिश ऐसी जम कर होती है कि हाईवे पर विजिबिलिटी ही ख़त्म हो जाती है , केवल गाड़ियों की हेड और टेल लाइट्स की रौशनी के धब्बे  पानी के धुंधले बहाव में दिखाई देते हैं। 

RTDC  के राजस्थान भर में फैले हुए होटल्स का भी ऐसा ही किस्सा है।  पुरानी लेकिन मजबूत इमारत । बाहर से और भीतर से ।  बाहर एक बड़ा खुला बगीचा जिसमे एक फाउंटेन लगा होता है,लोहे  की कुर्सियां और टेबल पड़ी रहती हैं जहां बैठ कर ओपन एयर ब्रेकफास्ट या लंच का आनंद लिया जा सकता है।  एक बड़ा सा कंपाउंड  या अहाता जहां गाड़ियों की पार्किंग बेहद आराम से की जा सकती है।  इन होटल्स को देख कर लगता है कि इनको बनाने की प्रेरणा पुराने ज़माने के सरकरी डाक बंगले या रेस्ट हाउस वगैरह से मिली होगी जिनको सरकारी अफसरों के लिए बनाया जाता था।  लकड़ी का भारी फर्नीचर जिस पर सादी लेकिन एलिगेंट नक्काशी या डिज़ाइन होती है।  कमरे और लाउंज का इंटीरियर साधारण ही होता है; राजस्थानी पेंटिंग्स जो दीवारों  के खालीपन को भरने की कोशिश करती हैं ।  जो सबसे  आकर्षित करने वाली चीज़ है, वो  है कमरों का साइज़।  खुले, हवादार कमरे जिसमे  एक डबल बेड  या तीन बेड  और भारी  कुर्सियां, मेज़ और ड्रेसिंग टेबल रखी होने के बावजूद कहीं से भी बंद जैसा नहीं लगता।  बाथरूम्स में सारी आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी। चमक दमक तो नहीं है पर आराम और तसल्ली पूरी है।

अब जब हाईवे और होटल का किस्सा निकला ही है तो एक पुराना किस्सा उदयपुर हाईवे का याद आ रहा है जिसे लिखे बिना मन नहीं मान रहा। 

फाउंडेशन कोर्स की ट्रेनिंग के दिनों में एक बार अपने कुछ batchmates के साथ उदयपुर से घर जाने के लिए बस में रवाना हुए।  दोपहर को १२:३० बजे रवानगी का समय था लेकिन कुछ हमारा आलस और कुछ बस चलाने वाले की दरियादिली कि बस आखिर कर १:३० पर  रवाना हुई।  हमने जल्दबाजी के चलते हॉस्टल से टिफ़िन भी नहीं लिया और अब खाने का वक़्त था।  बस वाले ने अपना शुरूआती हाल्ट शहर के बाहर हाईवे पर कतार में बने ढाबों और दुकानों के सामने  किया, इस  उद्घोषणा के साथ कि पंद्रह मिनट यहां रुकेंगे।  मैं और मेरी सहेली बस से उतरे ये सोच कर कि रास्ते के लिए चिप्स नमकीन खरीद लिए जाएँ।  लेकिन सामने एक ढाबा देख कर विचार बदल गया।  अपने एक साथी को चिप्स बिस्कुट और माज़ा की बोतल लाने का आदेश देकर हम दोनों ढाबे में घुसे।  दुकान बिलकुल खाली थी, एक भी ग्राहक उस वक़्त तक नहीं था । जाते  ही सवाल दागा, थाली का क्या रेट है और उसमे क्या क्या मिलेगा ? जवाब भी तुरंत था, चार रोटी, चावल, दाल, सब्ज़ी, दही ; दुबारा कुछ नहीं मिलेगा उसके एक्स्ट्रा पैसे लगेंगे वैसे थाली का रेट साठ  रुपया बताया।  सुनते ही तुरंत गुप्त  मंत्रणा हुई।  आदेश हुआ, फटाफट एक थाली लगा दो जिसमे चावल के बजाय एक कटोरी दही एक्स्ट्रा कर दो और सब्ज़ी भी नहीं चाहिए उसके बजाय दाल एक्स्ट्रा दे दो।  और खाना कितनी देर में लगा दोगे  या पैक कर दो ? कितना टाइम लगेगा ? पांच सात  मिनट में कर दोगे ? ढाबे वाले ने अजीब ढंग से हम जीन्स कुरता स्पोर्ट्स शू धारित प्राणियों को घूरा और कहा, बैठो तो अभी लगा देंगे थाली।  हम दोनों एक कुर्सी टेबल घेर के बैठ गए।

सचमुच तुरंत बैठते ही थाली आ गई और हम लोग हड़बड़ हड़बड़ करते खाना शुरू हुए।  उसी लम्हे हम दोनों लापता को ढूंढ़ते  वही batchmate  आया जिसको चिप्स बिस्कुट लाने भेजा था।  उसका रिएक्शन ऐसा था कि ये कौन भुक्खड़ है जिनकी सूरत तो ...… ख़ैर, सवाल  जवाब हुए ; तय हुआ कि भूख तो सबको लगी है, थाली का दाम वाजिब है, हम  भी यहीं खाएंगे और बस वाले को रुकने का कह देते हैं वैसे भी बस में हमारी २० लोगो की बारात के अलावा और कोई था नहीं। और देखते ही देखते उस खाली ढाबे में एक कुर्सी भी खाली नहीं बची।  सभी ने अपने लिए एक एक थाली मंगवाई। यानि हमारी कंजूसी या किफायतशारी की भरपाई बाकी लोगों से हो गई।  या अपने मुंह मियाँ मिठ्ठू बनने के लिए कह सकते हैं कि हमारे आते ही उसकी ग्राहकी बढ़ गई। साठ रूपए की उस थाली में उस दिन दो प्राणियों का भरपेट भोजन हुआ; ऐसा सस्ता सुन्दर दाम और  इतने मितभोजी ग्राहक,  कहीं  मिलेगा भला ??

 वह यात्रा मेरी सबसे यादगार यात्रा है क्योंकि उस दिन मेरा जन्मदिन भी था और उस दिन चलती बस में जो केक काटा और सबने खाया वह भूल सकने जैसी स्मृति नहीं। उस दिन दो केक काटे गए थे, एक जो मैं हॉस्टल के किचन में रखवा के आई थी बाकी  सब batchmates के लिए और एक यहां रास्ते में सेलिब्रेशन के लिए लाया गया था। 

यह ओल्ड स्कूल का चार्म अजीब है जो स्मृतियों के कबाड़ से पुराने रिकॉर्ड खंगालता रहता है। 


Image Courtesy : my mobile camera photography.

© all rights reserved

Monday, 3 July 2017

प्रतीक : एक कथा

दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट  

"फ्लाइट  आने में अभी और कितनी देर है ?" उसने अपने आप से पूछा।

सिक्योरिटी चेक का कॉल आने पर थोड़ी राहत महसूस हुई।  अचानक ये मुल्क, ये खूबसूरत आसमान छूता,  सपनों की दुनिया जैसा ये शहर ,  अब उसके लिए बिलकुल अजनबी हो गया था। एकदम अचानक से कि आज सुबह आप सो कर उठे और आपको बताया गया कि चलो सामान बाँध लो , जाने का वक़्त आ गया और  बंजारे का सफर अब फिर से शुरू हुआ ही चाहता है। उसे अभी ऐसी कोई जल्दी नहीं थी यहां से जाने की ; वो अब खुद को यहीं का रहवासी मांनने लग गया था।  उसके  लिए बंजारे वाला जीवन अब  समाप्त हो चुका  था और ठहराव वाला मोड़ जिंदगी में बस अभी आया ही था।  उसके लिए जिसका नाम प्रतीक था।  उसने आस पास देखा कितने सारे लोग खड़े थे,  दिल्ली जाने वाली फ्लाइट के इंतज़ार में , उसके जैसे लोग।  पर नहीं, सब उसके जैसे कहाँ है ?  प्रतीक भीड़ में होकर भी भीड़ नहीं है।  

ये 2009  का दुबई है, जब इकनोमिक क्राइसिस ने दुनिया  की  इस तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, स्काई स्क्रैपर्स के मुल्क, शॉपिंग और टूरिस्ट  डेस्टिनेशन के लिए मशहूर  और रियल एस्टेट के स्वर्ग को हिला डाला था।  अखबार और न्यूज़ चैनल बता रहे हैं कि  बड़ी बड़ी रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनियां अपने कर्मचारियों को काम से निकाल रही हैं, घर वापिस भेज रही हैं।  प्रतीक भी घर जा रहा है।  लगभग सात साल इस स्वर्ग में बिताये हैं, अब वहाँ घर वापिस जाकर क्या करेगा ? उसके लिए अब नौकरी, पैसा, करियर, अलाना फलाना , लक्ज़री, सोसाइटी , सब कुछ यहीं दुबई में था।  अब वो "दुबई पलट "  बन गया था।  थोड़े दिन के लिए या कुछेक हफ़्तों के लिए घर लौटना और फिर  वापिस उड़ जाना अपने स्वर्ग में।  और अब इस तरह अचानक घर वापसी का  फरमान, नौकरी से निकाला  जाना , एक  बोल्ट फ्रॉम दि ब्लू की तरह था।

हिंदुस्तान के रेगिस्तानी कोने में फैला उसका शहर ; अब उसके लिए कोई आकर्षण नहीं जगाता था , वहाँ रह कर इतना पैसा और ऐसे ठाट बाट कमाए जा सकते हैं ?  क्या अब कोई नौकरी वहाँ ऐसी मिलेगी जिसमे इतनी तनख्वाह हो या कोई बिज़नेस करेगा ? ये बहुत बड़ा और भयानक सा सवाल था।  और जिसका जवाब धुल भरी सड़कों और  चिलचिलाती धूप में ढूंढ़ना प्रतीक के लिए किसी आपदा या विपदा से कम नहीं था।  

"सब बेकार बातें हैं, अभी तो मेरा वीसा भी साल भर के लिए वैलिड है अभी दो महीना पहले ही तो renew  करवाया था।  और क्या क्राइसिस !! चार छह महीने में सब सही हो जायेगा।  आखिर ये शेख लोग कुछ तो करेंगे ही। जनरल  मैनेजर भी बोल रहा था कि तेरे को वापिस बुला लूँगा।" 


दो महीने बाद : घर यानी जोधपुर 

" अरे यही एक नौकरी गई है दुनिया के सारे रास्ते तो बंद नहीं हो गए हैं। नौकरी के ऑफर तो आये ही हैं , मैं ही ज्वाइन  नहीं कर रहा हूँ  . तुम थोड़ा धीरज रखो। "

' कब तक धीरज रखूं, जब सगाई हुई थी तब तुम दुबई में सत्तर हज़ार महीने वाली नौकरी कर रहे थे और अब 15 -20  हज़ार वाली नौकरी की बात कर रहे हो। " 

"तुम आखिर  क्या कहना चाहती हो ? मुझे भी  चिंता है  कोशिश कर रहा हूँ कि  जैसे ही हालात सुधर जाएँ तो  चला जाऊँगा। " 

" रहने दो , कुछ नहीं होने का । "  और फोन कट गया।  

थोड़े दिन और कुछ बोझिल हफ्ते बीते।  फिर महीने भी बीते। इन्ही  दिन हफ़्तों के बीच  प्रतीक की सगाई टूट गई क्योंकि सौभाग्यकांक्षिणी को अपने भावी सौभाग्य की बेहद फिक्र थी ।  पंद्रह बीस हज़ार वाली नौकरी  प्रतीक को अब रास आ नहीं रही और एक लोकल कॉलेज के M B A  को पचास हज़ार जोधपुर तो क्या जयपुर में भी नहीं मिलेंगे।  

"दोबारा दुबई चला जाऊं ? वीसा अभी वैलिड है कोशिश  करूँगा तो नौकरी का कुछ जुगाड़ बैठ जाएगा और अब तो सात आठ महीने हो गए हैं मेरे कुछ फ्रेंड्स तो चले भी गए वापिस।  अब तो हालात सुधर रहे हैं। " 

एक सांस में सारी  कथा बांच दी प्रतीक ने और नेहा के पतिदेव सुमित यानी प्रतीक के जीजा जो फुटवियर का होलसेल व्यापार करते हैं  मुंह खोले चाय का कप हाथ में लिए धैर्य की पूंछ पकडे,  सुनने और समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

" यहीं मेरे साथ बिज़नेस कर लो फुटवियर का , क्यों इतना परेशान होते हो। साल दो साल में  जम जायेगा बिज़नेस।  अब देखो बैठे बैठे इतने महीने भी तो निकाल दिए ना। "

"अभी कहाँ इतना कमाया है कि बिज़नेस सेट करने के लिए पैसे  ब्लॉक कर दूँ।  ये तो अभी दो साल हुए जो ये कंपनी ज्वाइन की थी , इसके पहले तो कम ही थी सैलरी , फिर घर बनवाया  और भी खर्चे ... " प्रतीक का मन नहीं हो रहा था इतना सब बोलने का पर बोलना पड़  रहा था।  

तो फिर तय हो गया, प्रतीक वापिस दुबई जाएगा। 

दिल्ली एयरपोर्ट पर एक बार वापिस फ्लाइट के इंतज़ार में खड़ा  है  प्रतीक।  लगता है कि अपनी पहली नौकरी के लिए, पहली "मुसाफिरी" ( समुद्र  यात्रा ) के लिए जा रहा है। एक बार फिर अपने उसी स्वर्ग में वापिस जाना  जहां से कुछ महीने पहले इसलिए निकलना पड़ा कि कंपनी ने ही नौकरी से निकाल दिया था. तो अब दूसरी कंपनी  ने दुबारा नौकरी दी है, बैग में सारे कागज़ हैं  और उन कागज़ों में प्रतीक की सारी  समस्याओं ,  ख्वाहिशों और ख्वाबो की चाबियां  छिपी हैं. प्रतीक के मन में  उत्सुकता है, घबराहट है और बहुत जल्दी है , कि  बस एक बार वापिस नौकरी पे लग जाऊं।  इस बार मार्केटिंग की नौकरी मिली है, पूरे गल्फ और एशियाई बाज़ारों में घूमना पड़ेगा।  प्रतीक को अलग अलग मुल्कों की खूबसूरती इस वक़्त दिल्ली  एयर पोर्ट पर ही बिखरी दिखाई दे रही है। 

साल भर बाद 

"दुबई का नाम सुनते ही लोग दस शर्तें लगा देते हैं।  शादी के बाद साथ ले जाएगा कि  नहीं ? लड़की को वहाँ नौकरी करनी पड़ेगी ? और जब से ये दुबई की अर्थव्यवस्था में गिरावट हुई है तब से लोग  अब दुबई के नाम से ही बिदक जाते हैं।" 

"पैसे भी तो दुबई से ही मिल रहे हैं।  वहाँ इंडिया में कौन दे रहा इतनी तनख्वाह ?"  प्रतीक झुंझला रहा है।  

"बेटा, यहीं कोई बिज़नेस कर लेता या नहीं,  मन नहीं है तेरा यहां रहने का ?"  माँ  क्या कहे ,  एक तरफ लगता है कि  लड़का लौट आये फिर चिंता है कि यहां कोई भविष्य फिलहाल तो दिखाई नहीं देता।  अभी कुछ साल वहीँ रह के कमा ले फिर तो आखिर आना ही है।  पर आजकल दुबई सेटल्ड लड़कों के लिए लड़की तलाशना बड़ी मुसीबत हो गई है।  गए वो ज़माने जब दुबई के नाम से ही रिश्ता आ जाता था , अब तो आया रिश्ता भी  दुबई का नाम से ही ...
दुबई अब सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं है , क्या पता कब निकाल दें ? या ना भी निकाले पर आखिर कभी  तो छोड़ना पड़ेगा ही; अब सारी  ज़िन्दगी वहाँ रहना तो अच्छे भले के बस  नहीं।  सुना है वहाँ बच्चों की पढ़ाई, अस्पताल के खर्चे और घर के किराए बहुत महंगे हैं।  

दो साल बीते  

"पिंटू तू जल्दी घर आ।  पापा की तबियत ठीक नहीं , अस्पताल एडमिट कराया है कल रात , तू आ जाएगा तो मम्मी को हिम्मत बंधेगी। " सुमित ने  फोन पर इस से ज्यादा और कुछ नहीं कहा।  

दुबई से जोधपुर तक  समंदर और ज़मीन की  जो दूरी है उसे प्रतीक ने इतनी तेज़ी से पार किया कि लगता है कि कहीं कोई दूरी है ही नहीं।   तीन दिन के बाद धरती और आसमान के बीच जो दूरी है उसे प्रतीक के पापा ने पार किया बगैर किसी जल्दी के।  

अब आगे क्या ... दुबई अब बहुत दूर हो गया है। घर खाली हो जाएगा मम्मी के लिए अगर प्रतीक दुबई चला गया। 

बिज़नेस वो भी फुटवियर का,  जिस से अभी तक प्रतीक बचता आया था क्योंकि बिज़नेस का कोई खास अनुभव नहीं और पूँजी गंवाने का डर  भी है। कहना आसान है लेकिन बाजार में स्पर्धा में टिकना बेहद मुश्किल।  पर अब इस बाजार के समंदर में कूदने के अलावा कोई और  चारा भी नहीं।  सुमित के साथ माल खरीदी और फिर रिटेलर को सप्लाई के तौर तरीके, व्यापार का रंग और ढंग सब कुछ ध्यान से सीखा प्रतीक ने।  महीनों की "ट्रेनिंग"  और  "प्रैक्टिकल"  के बाद  अब प्रतीक ने खुद का रिटेल काउंटर यानी दुकान शुरू की है, शहर के एक सबसे व्यस्त बाज़ार में जहां  फैशन के ट्रेंड शुरू होते और ख़त्म होते हैं।  यहां किराया ही इतना महंगा है दूकान का लेकिन फिर नाम भी है कि इस "बाजार" में दूकान है।  

दिन चलने लगे , हफ्ते और महीने भी चले गए। सात आठ महीने बीत चले । सुमित काम सिखा सकता था, बिज़नेस का हुनर नहीं। दूकान नहीं चली, पंडित ज्योतिषी कहते हैं कि चमड़ा या जूता जैसी चीज़ का कारोबार प्रतीक को नहीं फल सकता इसलिए .... इसलिए इस दुकान के साथ साथ प्रतीक ने अपनी जमा पूँजी का एक बड़ा हिस्सा  घाटे में डुबा दिया।  अब, जेब खाली है।  शादी के लिए रिश्ते,  जब दूकान शुरू की थी तब आया करते थे लेकिन तब बिज़नेस जमाने के चक्कर में प्रतीक टाल  गया  और जैसे जैसे दूकान के घाटे में होने की बात फैलनी शुरू हुई तो सब रिश्ते उड़न छू हो गए।  

अब फिर से प्रतीक घर बैठा है। वापिस नौकरी की तलाश की लेकिन फिर वही पुराना  खटराग कि  15-20 हज़ार मिलेंगे मुश्किल से और खटना पड़ेगा 12 -16  घंटे। नौकरी है या कि बंधुआ मजदूरी और उस पर सेठ की डाँट फटकार भी सहो। अब इतना त्याग प्रतीक से हो  नहीं  पाता है।

कभी कभी पुरानी तसवीरें देखता है, जब दुबई में था तब कैसा था ....  एकदम गोरा गुलाबी रंग, हलकी सी दाढ़ी रखता था। उस चेहरे से नज़रें आसानी से हटती नहीं थी। हलकी धीमी आवाज़ और यूँ सामने देखते हुए भी कहीं दूर देखती हुई नज़रें ... ये प्रतीक का सिग्नेचर स्टाइल था।  और अब .... अब भी कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है।  आस पास के दूकानदार ही कहते थे कि प्रतीक गल्ले पे बैठने वाला बनिया नहीं किसी बड़ी फर्म के सजे धजे दफ्तर में बैठा सेठ साहब लगता है। पर अब लगने से क्या होता है। वक़्त बदल गया है और वक़्त ने प्रतीक को भी बदल दिया है पर आवाज़ और चाल ढाल की नफासत नहीं बदली है। कहीं कुछ तो बचा रहे।

पर अब बचा ही क्या है जो इस वहां को पाले रखा जाए कि "हम" कुछ अलग हैं।

साधारण होना और वो भी भीड़ में शामिल होना कितना आसान और सुविधाजनक है ये बात पहली बार प्रतीक को समझ आई।  कम्बख्त इतनी देर से समझ आई कि  प्रतीक का  मन किया कि उस पुराने वक़्त की याद को भी फाड़ कर फेंक दे।  पर यादें ज़रा मजबूत किस्म के पदार्थ की बनी होती हैं कि जितना ज़ोर लगाते हैं उतनी ही ज्यादा फैलती और बिखरती जाती हैं पारे की तरह। जाने कौनसे कागज़ या प्लास्टिक या मिटटी या धातु की बनी होती हैं  


फिर घूम फिर कर,  ये सब फिलोसोफी भूल कर ,  प्रतीक कुछ दिन-हफ्ते  सुमित के साथ  उसके दूकान पर बैठा ;  वक़्त गुज़ारने के लिए या कुछ सीखने के लिए  काम भी किया लेकिन दुकान पर सेठ नौकर का रिश्ता अलग है और जीजा साले का अलग है।  कुछ महीने तक एक दोस्त की ट्रेवल एंड टूर एजेंसी में  भी भागीदार बना और फिर जो पैसा कमाया उस से  दोस्त खुद ही टूर करने हांगकांग निकल गया और प्रतीक जोधपुर के उसके ऑफिस को ताला  लगा कर वापिस घर बैठ गया। और अब खाली बैठा घर में मम्मी की रसोई में हेल्प करता है।   क्या हेल्प करता है या रसोई को   बिगाड़ता है ये अभी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है।  पर कुछ तो खटर  पटर  करता ही है रसोई में।  वक़्त गुजारने का अपना अपना शगल है साहब। पैसा जेब  में हो  तो शगल और शौक के खर्चे उठाये जा सकते  खाली जेब हो तो सारे शौक  शगल दिमागी फितूर कहलाते हैं।

क्यों,  क्या कहते हैं आप ?? 

"यार ये जो छोटे मोटे  फ़ूड स्टाल  खड़े रहते हैं जगह जगह , इनकी मेनू लिस्ट भी सिंपल है और ज्यादा लम्बी नहीं है फिर भी कितनी भीड़ रहती है इनके यहां।" पिज़्ज़ा का स्लाइस खाते खाते प्रतीक ने उन सब ठेले वालों रेहड़ी वालों को गौर से देखा जो इस खूबसूरत बगीचे को चारों तरफ से एक गोल बाजार की तरह घेरे हुए थे।  क्या नहीं मिलता इन छोटे से फ़ूड काउंटर्स पर ;  पिज़्ज़ा, हक्का नूडल्स,  मचुरियन, चिली पनीर, स्प्रिंग रोल्स, मोमोज़, फ्राइड राइस और अपने हिंदुस्तानी चटपटे स्नैक्स की तो बहार है।  पाव  भाजी से लेकर वड़ा  पाव और पानी पूरी से लेकर छोले कुल्छे।  

"यार सीधी बात है कि  लागत बेहद  कम है जिस से कीमत भी बहुत वाजिब हो जाती है  और लिमिटेड आइटम एक रेहड़ी वाला  बेचता है तो ऐसा कोई सामान की बर्बादी भी नहीं और इसलिए पब्लिक भीड़ लगाती है। ये पिज़्ज़ा यहां साठ  रूपए में मिलता है वहाँ  रेस्टोरेंट में डेढ़ सौ में पड़ेगा, डोसा सांभर ये लोग तीस चालीस रूपए में दे देते हैं और रेस्त्रो वाला सौ में देगा।"  आशीष, प्रतीक का बेरोजगारी के  दिनों का साथी है, यहीं इधर ही कहीं  गली मोहल्ले में रहता है। 

"पर यार क्वालिटी और कुकिंग स्टाइल प्लस एम्बिएंस ...."

" जिसको हफ्ते में तीन दिन बाहर खाना है उसके  लिए तो ये ठेले ही बढ़िया हैं. और तू बोल क्या कमी है इस सिंपल चीज़ पिज़्ज़ा में, रोस्ट अच्छा किया हुआ है और टेस्ट भी ठीक है। अब तू वापिस अपने दुबई वाले मोड में मत घुस जाना। "

"बात तो सही है तेरी।"  इतने काम दाम में  मार्गरिटा पिज़्ज़ा मिलेगा क्या ? प्रतीक को फिर से उन यादों पर झुंझलाहट आई जो उसे किसी पिज़्ज़ा ब्रांड आउटलेट की तरफ खींचती थी।

 प्रतीक का ध्यान अब उस किचन नाम की जगह पर था जहां अभी सैंडविच तैयार किया जा रहा था, एक तरफ तवे पर भाजी गरम हो रही थी और पाव सेके जा रहे थे , मेयोनेज़ का डब्बा वापिस किनारे पर रखा जा चुका  था ।  उसने गौर से उस काउंटर को देखा, एक तरफ  ओवन रखा था जिसमे  सैंडविच पिज़्ज़ा रोस्ट होते हैं और बिजली का कनेक्शन पास की दुकान से लिया गया है।  फिर उसने उन लड़को की तरफ देखा जो इस किचन को चला रहे थे;  एकदम एक्सपर्ट कुक की   तरह काम करते हुए ,  जिनके कपड़ों पर तेल मसालों के दाग हैं , किसी एक ने ऐप्रन भी डाल रखा है गले में।  प्रतीक ने उस शाम वहाँ खड़े खड़े  ग्राहकों की संख्या और उनके ऑर्डर्स  का एक मोटा मोटा  हिसाब लगाया और फिर एक गहरी सांस ली।  


"अपना घर इधर मेन रोड पर होने के कारण सारा दिन गाड़ियों का शोर, धुंआ ही पीछा नहीं छोड़ता। " 

मम्मी की नींद डिस्टर्ब हो गई क्योंकि बाहर एक ट्रक और फिर कुछ बसें तेज़ हॉर्न बजाती बसें  एक के बाद एक निकली। ये घर प्रतीक के पापा ने जब ख़रीदा था तब यहाँ से  करीब एक किलोमीटर की दूरी पर कुछेक सरकारी दफ्तर थे और बाकी सब तरफ  घर बने थे।  अब यहां सड़क पर आमने सामने  एक व्यस्त  बाजार, बस स्टैंड,  बैंक, मिठाई की दुकानें, एक सरकारी डिस्पेंसरी और एक बड़ा होटल  भी   बन गया है।  एकाध कैफ़े टाइप रेस्टोरेंट भी खुल गए हैं , आइस क्रीम पार्लर भी हैं।  


रसोई 


घर के बाहर के बरामदे नुमा हिस्से को टीन शेड से कवर किया गया, कुछ कुर्सी टेबल लगाईं गई, एक काउंटर लगाया है और काउंटर के पीछे पर्दा है जिसके पीछे रसोई है।  बाहर एक  साइन बोर्ड सड़क पे लगा दिया गया है, "भाई की रसोई" . मेनू कार्ड जो एक कागज़ पर छापा है जिसे लेमिनेट करवा दिया गया है,   काउंटर पे रखा है और ऐसे कुछ और मेनू  टेबल्स पे भी रखे हैं।  मेनू के व्यंजन वहीँ हैं, सैंडविच, पिज़्ज़ा, पाव भाजी, चाउमीन वगैरह और हाँ प्रतीक ने कुछ वैरायटी भी दी है. "शाही सब्ज़ियां" और थाली यानी केवल फ़ास्ट फ़ूड ही नहीं पूरा भोजन का इंतज़ाम है ; वैसे सब्ज़ियां भी सीमित हैं, शाही पनीर, दाल फ्राई, मौसमी हरी सब्ज़ियां, गट्टे की सब्ज़ी  वगैरह।  

जैसे तैसे रसोई चल ही निकली, रोज के हज़ार  बारह सौ का गल्ला हो जाता है. प्रतीक ने मार्केट रिसर्च की और अपने शाही पनीर का दाम  साठ रूपए का हाफ प्लेट कर दिया जिसमे इतना पनीर और ग्रेवी देता है कि दो आदमी पेट भर के खा सकें।  दाल और भाजी भी महज़  चालीस रूपए   में इतनी कि दो जनो का पेट भी भरे और जेब भी राजी रहे।

बस केवल एक बात अजीब थी कि प्रतीक उस ढाबे के सस्ते और सादे सेटअप में फिट नहीं था क्योंकि वो चाह के भी  ना तो ढाबे वालों जैसा दीखता है  ना उसके हाव भाव और बोल चाल  में ढाबा समा पाया। ग्राहकों से उतना ही बोलता है जितना बोलने भर से काम चल जाए  और वो भी अपनी उसी खास धीमी  आवाज़ में।  कपडे आज भी सलीके से, और खुद के कद काठी पर फबने वाले ही पहनता है;  यूँ खड़ा रहे तो लोग उसे ही ग्राहक समझ बैठते हैं  पर फिर जब आगे बढ़ कर प्रतीक उनसे पूछता है कि ,  " हाँ, क्या चाहिए आपको?"  तब ग्राहक समझ पाते हैं !!!!  पर खाना प्रतीक अच्छा बनाता  है।  ग्राहक भी इस बात को प्रतीक से ज्यादा समझते हैं  और इसलिए ये ढाबा तो  सस्ता सा  लगता लेकिन मालिक ज़रा  महंगा सा  और ढाबे वाला नहीं लगता।

खैर।

"बेटा,  अब ये रिश्ता ठीक ही लग रहा है , अब मैं तो थक गई हूँ।  और इन लोगों ने खुद आगे बढ़ के बात चलाई  है, लड़की की फोटो भी साथ भिजवाई  है।  देख ज़रा , ज़रा सांवली है और थोड़ी वजन में भी तुझसे ज्यादा लग रही है  पर ठीक है।  इसके घरवालों ने कहा है कि अगर कभी भविष्य में तू अपने इस रेस्टोरेंट को और अच्छा बनाना चाहे तो वे लोग मदद भी करेंगे। "

 ये आखरी बात ज़रा हल्की आवाज़ में कही थी मम्मी ने , क्योंकि इस एक बात के पीछे ये सच भी छिपा है कि  प्रतीक का ढाबा अभी इतना नहीं  चलता कि अपने दम  पर वो इसका विस्तार कर सके।  कुर्सियों के सीट कवर अब थोड़े मटमैले हो गए हैं और मेनू कार्ड का  लेमिनेट भी ज़रा गन्दा सा हो गया है।  पर फिर भी काम तो चल ही रहा है। प्रतीक ने तस्वीर को सरसरी नज़र से देखा फिर उस नाम को फेसबुक  ढूंढा।   वहाँ और भी तसवीरें थीं; एक ज़रा सांवली रंगत वाली ज़रा मोटी  और चेहरे में एक तीखापन और अजीब सा हल्कापन लिए एक लड़की।  प्रतीक को अपने नफीस अंदाज़ की याद एक  बार भी नहीं आई और उसने हाँ कह दी।  

शुभ विवाह के बाद अब प्रतीक की पत्नी ज्योति भी रेस्टोरेंट के काम में हाथ बंटाती है।  परदे के पीछे की रसोई में वो भी प्रतीक के साथ खाना बनाती है और प्रतीक खुद सर्व करता है , बहुत से लोग पैक करवा के ले जाते हैं और बहुत से यहीं खाते हैं।  ज्योति को देख कर  लोगों को लगता है कि वो इस ढाबे की मालकिन है, उसका चेहरा और व्यक्तित्व इस ढाबे को आत्मसात कर  गया है और ढाबे के लिए  प्रतीक  के बजाय ज्योति को अपना  कहना ज्यादा आसान था।   






  







  

Thursday, 15 June 2017

एक कहानी : तीन किस्से

कहानियां लिखे एक  अरसा बीत गया है. पहले कहानियां  अपने आप दिमाग की फैक्ट्री से बनकर आती और  यहां की बोर्ड पर टाइप हो जातीं। अब फैक्ट्री बंद है और चालू  होने के ऐसे कोई आसार भी  नहीं दिखते। फिर भी यूँही रस्ते चलते, घूमते  फिरते, कहानियां  और उनके पात्र दिखाई दे जाते हैं ।  ऐसी ही एक कहानी और उसके मुख्य पात्र यानि कि  हीरो हीरोइन ( एक सुंदरी कन्या जो १६-१७ की होगी और एक भली सूरत वाला लड़का जो लगभग इतनी उम्र  का होगा)  मुझे एक झुग्गी बस्ती के  किनारे पर लगी काँटों  झाड़ियों की बाड़ पर खड़े मिले; (नहीं, खड़े नहीं थे;  असल में मोटर साइकिल पर सवार थे). या यूँ कहूँ कि  वो दोनों बस्ती के बच्चों से घिरे मिले या दिखे तो ज्यादा  सही रहेगा। लड़की ने स्लीवलेस टॉप के साथ  शॉर्ट्स पहने हुए थे और लड़का जीन्स शर्ट में काफी स्मार्ट लग रहा था.   अब आप इधर उधर दिमाग मत लगाइये और इस संभावित कहानी के उतने ही संभावित हीरो हीरोइन की कथा, गाथा, किस्से के तीन अलग अलग versions पढ़िए.  


कहानी १ 

"ए जसोदा मुझे भी  काम  दिला दे, झाड़ू पोछे का।"
"देखूं, बात करुँगी मम्मी जी से.  उनके लड़के के बंगले  पर ज़रूरत है."

"ए छोरा, तू ये गाड़ी कहाँ से लाया रे ?" 
"सेठ जी ने दी है, दुकान के काम के लिए। "
" बड़े ठाठ हैं रे तुम लोगों के आजकल। काय रे बिज्जू मेरे को भी कहीं लगवा दे ना तेरे सेठ के दूकान पे।"

"सेठ जी नए आदमी को आसानी से नहीं रखते।"
"तेरे को कैसे रख लिया रे?" 
"वो तो माँ ने मेमसाब से कह के ...." जसोदा मुस्कुराई। 
"और ये तेरी डिरेस, मेमसाब ने दी ?" 
"हाँ वो उनकी एक लड़की मेरे बराबर की है ना. उसी की है ये डेरेस।" 
"पुरानी तो नहीं लगती। "कौशल्या ने टॉप को हाथ लगा के कहा. फिर जसोदा की बाँहें छुई।  
"इत्ती चिकनी कैसे?" कौशल्या ने हैरानगी से पूछा।  
"वो क्रीम लगाती हूँ। "
"क्या क्रीम ? मेरे को भी लाके देगी ना ?" कौशल्या की आवाज़ में आशा है, अनुरोध है।  
"  तेरी माँ ने ठीक घर पकड़ा, क्यों रे बिज्जू ? लछमी को कित्ती पगार दे मेमसाब ? पांच हज़्ज़ार महीना और ऊपर से खाना कपडा ?" 
" ये अभी दो साल पहले तक लछमी यहीं हमारे साथ इधर  इसी मैदान में टपरे में रहती थी.  झाड़ू पोंछा करने वाली के ऐसे ठाठ। " कुछ आवाज़ें प्लास्टिक के टपरे के पीछे से उभरी।  
"ए जस्सू, तू भी झाड़ू पोंछा करे ?"
"नहीं, मैं  ..... खाना बनाती हूँ, बाहर से सामान लाना वगैरह । " जस्सू की आवाज़ अटकी लेकिन फिर संभल गई।  बिज्जू ने जस्सू को देखा। 
"सेठानी तो सुना है बिस्तरे से उठ भी नहीं सकती, उसी की सार संभाल, खिलाने पिलाने, सब काम के लिए जस्सू को रखा है सेठ ने, तभी तो इतने ऐश हैं इनके।" कुछ आवाज़ें राज़दार तरीके से उभरींऔर फिर दब गईं। 

"चलें, लेट हो रही है सेठ जी इंतज़ार कर रहे हैं। " सवालों की कतार वहीँ थम गई और मोटरसाइकल देखते देखते धूल  उड़ाती  भाग चली।  


कहानी २ 

" ऐ जस्सू ,  आज तू कित्ते दिन बाद आई। ये लड़का कौन है, तेरी सादी हो गई क्या ?"  लडकियां बच्चे हैरान है जस्सू की इस नई सज धज पर. 

" वो अच्छी नौकरी मिल गई है एक अस्पताल में, लिखा पढ़ी की।  ये मोहन है  मेरा धर्मेला भाई है, ये भी वहीँ नौकरी करता है । " आवाज़ तो मजबूत और विश्वास से भरी है जस्सू की।  

"ऐ जस्सू ,  ये कपडे बहुत सूंदर है ,  मेरे को भी ला दे ना , "  ...... शोभा ने टॉप का कोना पकड़ के इच्छाभरी निगाहों से जस्सू को देखा, हंसी और फिर अपनी चुन्नी  को कंधो  पर संभाला।

"हाँ ला दूंगी, तू भी मेरी तरह नौकरी कर ले,  उधर अस्पताल में जगह खाली है, बोल तेरी भी लगवाऊं नौकरी ?" खनकती आवाज़ है जस्सू की. 

" ऐ जस्सू पगार कित्ती है तेरी ? अस्पताल की नौकरी किसने दिलाई और कौनसे अस्पताल में ? तू तो दसवीं पास है और तेरी मां तो घास बेचे है  और बाप कमठे पर चौकीदार है। और ऐसे कपडे पहन के नौकरी करे है तू ? सच बोल।" एक आवाज़ टपरे के पीछे से झाँकने लगी. 

" दसवीं क्या कम होती है, किसी ने ही दिलाई नौकरी ; तुम्हारे क्या ? नर्स का काम भी सीख रही हूँ, सरकारी योजना में मुफ्त सिखाते हैं और हर महीने पैसे भी मिलते हैं." जस्सू की आवाज़ में एक लापरवाही और गुमान सा है।  

" ऐ छोरी, अस्पताल में नौकरी करे है कि और कोई काम ?  ये छोरा क्या काम करे  जो इत्ती महँगी गाडी चलावे  है ? उधर श्रमिकपुरा   में ही तो दो कमरा का किराए का मकान है तुम लोगों का, मैदान के पास कब्ज़े की ज़मीन पर। किराया  कित्ता है रे मकान का ? " एक तीखी, लम्बी और सख्त आवाज़ उभरी। 

जवाब शायद मिला था पर बच्चों के हंसने और मोटरसाइकिल पर घूमने की ज़िद की आवाज़ों के बीच  गुम हो गया. 




कहानी 3 

" Oh, Come on, चलो ना, किसी को कुछ देर की ख़ुशी देने में क्या हर्ज़ है ?"

" तुम्हारा ये एडवेंचर  अगर घर पे पता चल गया ना तो भाई और डैड will kill me."

"every time भाई और भाई का डर, don't  talk to  me."

" ok, चलो."

फ़ूड पैकेट्स और कुछ पुराने ऊनी कपड़ों की एक पोटली भी साथ ही चली. 

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"ऐ दीदी, कल भी लाएगी ना ये सारा खाना ?"
"और ये ऐसी डिरेस भी ला दे ना मेरे को. " महंगे लेकिन खूबसूरत टॉप का कोना किसी ने खींचा। 

"चलो अब बहुत हो गई तुम्हारी दरियादिली". 
"हाँ, हाँ चलते हैं. ऐ तुम लोग ऐसी ड्रेस पहनते हो क्या ? और पढ़ते क्यों नहीं हो ?" 

वही घिसे पिटे से किताबी सवाल हैं जिनमे बच्चे दिलचस्पी नहीं लेते। अपनी चुन्नी  संभालती  एक बड़ी लड़की बार बार उस सुकन्या की सुन्दर बाँहें छू कर देखती है कि  भगवान् ने कितने अलग ढंग से इसका रंग रूप और शरीर बनाया है, उसका क्यों ऐसा नहीं बनाया ? 

"दिमाग  ही ख़राब है तुम्हारा।" 
 मोटरसाइकिल अब तेज़ स्पीड से भाग रही थी. 


Sunday, 2 August 2015

भगवान है कहाँ रे तू ....

"बरसात के दिनों में लोगो का ट्रैफिक सेंस और ट्रैफिक मैनर्स सब जाग जाते हैं", 

आगे वाली कार ने इंडिकेटर दिया और धीरे धीरे टर्न हुई, साथ वाला बाइकर भी मुड़ने के लिए हाथ से इशारा कर रहा था और रश्मी की कार का स्टीयरिंग बाईं तरफ मुड़ने लगा. उसने पास वाली सीट पर रखे पूजा के सामान वाली डलिया को देखा। आटे का दीपक, एक छोटी डिब्बी में देसी घी, और एक कागज़ में सिमटे हुए थोड़े से हरे मूंग के दाने और गुड़ की एक डली। गाडी एक मिठाई की दुकान के बाहर रुकी। और अब दस मिनट बाद उस डलिया में मिठाई का छोटा डिब्बा भी जगह बनाये बैठा था. 

"किस मूर्ख ने कहा था कि  बारिश के दिनों में उसके शहर का नज़ारा बिलकुल किसी वाटर कलर पेंटिंग जैसा हो जाता है, ज़रा यहां आकर देखो तो पता चले कि …"  बरसात में भीगी मिट्टी जो अब सडकों पर खड्डों के आस पास फिसलन के रूप में सुशोभित थी, उसको देख कर  रश्मी को अपने नए शलवार सूट  के रंग रूप की फ़िक्र होने लगी. चूड़ी बाजार वाले विनायक मंदिर के बाहर जैसे तैसे पार्किंग की  जगह मिली। रश्मी ने पूजा वाली डलिया संभाली और दुपट्टा सिर पर रखते हुए तेज़ कदमों से मंदिर के भीतर चली गई.

"अब ये तीसरा बुधवार हो गया." उसने खुद से कहा, कार का स्टीयरिंग इस वक़्त सिविल लाइन्स की खुली सडकों पर पंख तौल रहा था.  "अब थोड़ी देर में ऑफिस होगा और मैं और वही सब रोज़ के किस्से" … रश्मी ने स्पीड कम कर दी, उसे कहीं जाने की या पहुँचने की जल्दी नहीं है.  इसके बजाय वो याद करने की कोशिश कर रही है कि अगले बुधवार विघ्नविनाशक को क्या खिलाना है कि  झट से प्रसन्न हो जाए.  जैसा अनीता ने बताया था, पहले हफ्ते मोतीचूर के लड्डू, दुसरे हफ्ते में बूंदी के लड्डू, तीसरे में ये मोदक और अब चौथे हफ्ते में चांदी का वरक लगा पान .... और पांचवे हफ्ते में .... यानि आखिरी हफ्ते में रोली उनकी सूंड में कस  के बाँध आनी है, जिस से कि  उनको याद रहे … 

तीन हफ्ते बाद 

दृश्य एक 
"तो कोई प्रोग्रेस है उस मैटर में ?"  गीता ने कॉफ़ी के साथ चिप्स कुतरते हुए पूछा। 
रश्मी ने ना में सर हिला दिया। ये सवाल अब उसे हद दर्जे तक चिढ़ा देता है लेकिन गीता को वो कुछ नहीं कह सकती।

 दृश्य दो 

"मैंने तुझे कहा था ना कि रिशु को इक्कीस सोमवार शिव पार्वती वाले मंदिर में भेजना और साथ में बताशे का प्रसाद और .... "  कमला बुआ का ख्याल है कि रश्मी इक्कीस में से सिर्फ पांच छह बार ही गई होगी 
"दीदी, रिशु गई थी और उसने सात मंगलवार मंदिर के पीपल पेड़ की परिक्रमा भी की थी और पांच बुधवार गणेश जी को हरी दूब भी और वो .... मम्मी उसकी तरफ से सफाई दे रही है या उसकी मेहनत और लगन  के बारे में बता रही है ये रिशु यानी मिस रश्मी की समझ से बाहर है.

"रिशु, तू लड्डू कौनसी  दुकान से लेती है ?" 
" ये बाहर मैन  रोड पर है ना श्याम स्वीट्स, वहीँ से … क्यों ?" 
"बस यही गड़बड़ हुई है, तभी मैं कहूँ, ऐसा कैसे हो सकता है ? मैंने आज तक जिन लड़कियों को ये उपाय बताया सबका रिश्ता तीसरे या चौथे हफ्ते में तय हो गया, बस तेरा ही नहीं हुआ. अरे ये श्याम स्वीट्स के लड्डू बेकार हैं,  देसी घी कम और डालडा ज्यादा होता है. वो गोपाल मिष्ठान भंडार से लेने चाहिए थे लड्डू,  मोतीचूर के ऐसे लड्डू बनाता है कि  मुंह में रखते ही घुल जाए."  

" ये श्याम स्वीट्स वाला तो लड्डू तौलते टाइम थोड़ा भी एक्स्ट्रा वजन होने पर लड्डू में से टुकड़ा तोड़ लेता है." छोटा गगन भी अब अपना ज्ञान बताने में पीछे क्यों रहे. रश्मी अपने घर के  इस छोटे शैतान को घूर रही है. 

" क्या !!!!!!!! खंडित प्रसाद !!!!!!!! राम राम … तभी मैं कहूँ, शारदा कि  रश्मी का काम अब तक क्यों नहीं हुआ. एक तो डालडा के लड्डू ऊपर से खंडित भी. अब ऐसे तो विनायक जी कैसे प्रसन्न होंगे ????"  कमला बुआ ने पांच परमेश्वर स्टाइल में अपनी अंतिम राय दे डाली। 

शारदा यानी रिशु की मम्मी के माथे पर लकीरें दिख रही हैं,  "इतने हफ़्तों की मेहनत पर पानी फिर गया सिर्फ इस श्याम स्वीट्स वाले के कारण। लेकिन इस लड़की में भी अक्ल नहीं है, कहीं और से लड्डू नहीं ले सकती थी, पूरा शहर घूमती फिरती है अपनी गाडी में. और सब दुकाने क्या बंद पड़ी रहती हैं." 

"गणेश जी को बताना चाहिए था ना कि  उनको कौनसी दुकान के लड्डू पसंद है, अब मुझे कोई सपना आएगा क्या … " रिशु झुंझला रही है. ये क्या मुसीबत है, आस्था से ज्यादा प्रसाद और उसकी क्वालिटी इम्पोर्टेन्ट हो गई है आजकल, ये देवी देवता भी काफी choosy हो गए हैं.

दृश्य तीन 
"और सुनाओ, कोई नई खबर."  व्हाट्सप्प पर एक मैसेज फ़्लैश हुआ.

"वही सब रूटीन लाइफ है यार, नया क्या होगा। तुम बताओ, तुमको तो अच्छी जगह पोस्टिंग मिल गई है. कोई एप्रोच या यूँही … " ? 

"अरे बहुत पापड बेले हैं इसके लिए, दो साल से तो घर से दूर इस जंगल में पड़ा था. भगवान से लेकर इंसान तक सबकी मन्नतें मांगी, तब जाकर काम हुआ." 

"अच्छा, और प्रसाद  में क्या चढ़ाया ?" रश्मी को श्याम स्वीट्स के डालडा वाले लड्डू याद आ रहे हैं  जिनके कारण उसकी सारी मेहनत बेकार गई. 

"प्रसाद तो यार कई तरह का चढ़ाना पड़ता है. गए वो ज़माने जब वो बूंदी के लड्डू से काम चल जाता था. अब तो भगवन भी रोज़ यही एक जैसा खा खा के बोर हो गए हैं."
  
"हाँ, पर गणेश जी को तो आज भी वही लड्डू ही चाहिए।" 

"किसने कहा ?? तुम ना रश्मी  इस मामले में एकदम इडियट हो. अरे भगवान को भी वैरायटी पसंद होती है. उनको रोज़ कुछ नया खिलाओ,अलग अलग मिठाई से लेकर पिज़्ज़ा और ब्राऊनी …सब चीज़ टेस्ट करवाओ भगवान को, तभी प्रसन्न होंगे और वरदान देंगे। अब ऐसे सूखे लड्डू खिलाने और  काम करवाने के दिन तो चले गए." 

व्हाट्सप्प वाले ने रश्मी के ज्ञान चक्षु खोल दिए. इतना डिटेल में तो कभी सोचा ही नहीं था. प्रसाद तो यही लड्डू, मावे की मिठाई वगेरह ही सुना था लेकिन  अब भगवान भी मॉडर्न हो गए हैं तो उनकी पसंद भी बदल गई होगी। 

दृश्य चार 

" सुन रिशु, तेरे ऑफिस जाने के रास्ते में ये लिंक रोड वाला कबाड़ी मार्किट आता है ना."?
" हाँ क्यों, कुछ काम है ? क्या देना है कबाड़ी वाले को ?"
" अरे देना कुछ नहीं है, सुन कमला का फोन आया था, उसने  बताया कि  वहाँ कबाड़ियों की दूकान  के बीच में एक छोटा मंदिर बना हुआ है जिसकी बड़ी मान्यता है और .... "

"मैंने तो आज दिन तक उस रास्ते में कोई मंदिर नहीं देखा ?"  रिशु खीज रही है कमला बुआ की इस भारत एक खोज पर और अब उसे पता है कि  आगे क्या आदेश मिलेगा।

"अरे छोटा सा कोई मंदिर बताया है दुकानो के बीच में. तू एक बार जाके देख तो सही …  क्या पता …"

" जिस से शादी करने के लिए मैं इतने सब जतन  कर रही हूँ, कुछ उसको भी फ़िक्र है या नहीं। उसको  शादी करनी है मुझसे इसी  जन्म में  या नहीं ?? ऐसा कहाँ का  राजकुमार है ?? ये सब क्या मेरे अकेले की ही सिरदर्दी है ?? अब यही काम रह गए हैं,  कबाड़ियों की दुकानो के बीच मंदिर ढूँढती फिरुँ मैं।"  रश्मी के गुस्से के आगे कबाड़ी बाजार वाला मंदिर और उसके देवता फ़िलहाल बिहाइंड दी कर्टेन हो गए हैं. 

दृश्य पांच 

" सुन रिशु, तू एक बार मेरी बात मान के देख, आखिर इसमें हर्ज़ क्या है, जहां इतनी जगहों पर तू मन से या बेमन से गई है वहाँ एक और सही. समस्या का समाधान होने से मतलब है।" गीता समझाना चाहती है और  मनवाना भी चाहती है. 

"मैं इन सब rituals से और इन बेसिर पैर की बातों से तंग आ गई हूँ. यहां हर कोई सलाह देने बैठा है, हर कोई अपने आज़माये या बिना आज़माये तरीके मुझे बताता फिरता है. और अब तो मुझे इस आडम्बर से नफरत हो गई है."

"मैं सब समझती हूँ रिशु पर दुनिया हमारे हिसाब से तो नहीं चलती ना, अब आडम्बर है या और कुछ, एक बार फिर से विश्वास करके देख. कौन जाने इस बार …"

(इच्छा नहीं है एक बार फिर इस रास्ते जाने की  लेकिन बहस करने की भी इच्छा नहीं है और दूसरा  रास्ता भी क्या है. ये भी कर के देख ही लो. )   

तो अब रश्मी और गीता बैठे हैं पुराने शहर की गलियों के अंदर एक पुराने से मंदिर में जो पुजारी का घर भी है. सुना है कि यहां  सिर्फ शादी की तारीख ही बताई जाती है अगर और कोई सवाल या ख्वाहिश हो तो किसी और मंदिर में जाइए। इस जगह तो केवल इसी एक समस्या का समाधान मिलेगा। आपसे बस इतनी ही अपेक्षा है कि अपनी श्रद्धा मुताबिक एक लिफाफा रख जाइए  माँ पार्वती के चरणों में और फिर बस इंतज़ार करिये कि  कब माँ आप पर कृपा फरमाती हैं. वैसे पुजारी का दावा है कि  आज दिन तक उसने जाने कितने ही लोगो के ब्याह की तारीख बताई और उस तारीख तक या उसके कुछ आगे पीछे उनका विवाह हुआ भी है.  उसकी शर्त भी यही है कि  अगर आपका "काम" ना हो तो बेझिझक अपना लिफाफा वापिस ले जाइए। 

तो अब यहां आस्था की एक और परीक्षा है.

छह महीने  बाद 

"बेटा रश्मी, 23 सितम्बर तो कल बीत गई, आप अपना लिफाफा वापिस ले जा सकती हैं." 

"रहने दीजिये ना अंकल, लिफ़ाफ़े का ऐसा क्या है, मुझे वापिस नहीं ले जाना। आप मंदिर के किसी काम में लगा देना।" 

"नहीं बेटा, आप इसे वापिस ले जाएँ।" 


दृश्य छह 

"तो अब, ये उपाय भी नाकाम ही रहा." मम्मी उदास सी बैठी हैं और कमला बुआ फोन पर किसी से बात कर रही हैं.

"सुन रिशु, तेरे बाँए अंगूठे की छाप  चाहिए एक सफ़ेद कागज़ पर." कमला बुआ थोड़ी जल्दी में लग रही हैं. और उसी जल्दी में रिशु के ऑफिस बैग से इंक पैड निकाला गया और उसके अंगूठे की छाप ली गई.


कुछ घंटे बाद 

"हाँ, तो बैठ अब यहां मेरे पास, देख ये जो लाल किताब वाले  पंडित हैं ना ये अंगूठे की छाप देख कर समस्या का हल बताते हैं और समस्या क्या आदमी का भूत भविष्य वर्तमान सब बता देते हैं. पूरे दो हज़ार दिए हैं, अब तेरा घर बस जाए गुड़िया। 
सुन,  इन्होने कुछ बहुत सटीक उपाय बताये हैं और ये CD भी दी है इसमें सब रिकॉर्ड है जो उन्होंने तेरे बारे में बताया। उन्होंने कहा है कि तुझ पर पिछले जन्म का एक बड़ा भारी दोष है जिसके निवारण के लिए पुष्कर जाकर पूजा करवानी होगी और उसके अलावा भी कुछ उपाय करने होंगे। क्या करना है कैसे  CD में रिकॉर्ड है." 
कमला बुआ की डीवीडी फुल स्विंग पर चालू थी.

"एक तो हर शुक्रवार को देवी के मंदिर में पीले नींबू पर कुंकुम लगा कर ऐसे नौ  नींबू ले जाने हैं , नींबू आधे कटे होने चाहिए और … "

"हर बुधवार गणेश जी को …"

"हर पूर्णिमा को भगवान शिव का दूध से अभिषेक और …"  

छन्नन की आवाज़ हुई, रश्मी के हाथ से चाय का कप गिर गया है.

"हाय, इतनी ज़रूरी बात के बीच ये क्या अपशगुन …"  

Image Courtesy : Jai Google Baba 

 P.S.  : सात आसमान से आगे बैठे परम पिता अब मेहरबानी करके मुझ पर गुस्सा ना होना, मैं तो पहले से ही तुम्हारे बनाये नियम कायदों से परेशान हूँ. :) :) :)