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Monday, 24 February 2020

उस पार ---3

लड़की एक  बार फिर से उसी  झील के किनारे बैठी है।  पानी में पैर  डुबोने  और छप  छप करें , का ख्याल आया लेकिन गंदले और काई जमे किनारे ने उसे दूर से ही छिटका दिया। पानी अब बहुत दूर तक खिसक गया था , झील के किनारे वाला हिस्सा सूख गया लगता है।  अब इसे  झील तो नहीं तालाब जैसा कुछ मान लें ऐसा ख्याल आया उसके मन में। उसका मन जो अब समय की धुरी पर चारों दिशाओं और चौदह भुवन को देख आया है ; उस मन में अब कोई कविता या संगीत नहीं उपज रहा।  बस केवल कुछ परिचित कुछ जाना पहचाना  चिन्ह दिख जाए तो यहां आने का सुकून  पूरा हो जाए।

'खरगोश अभी तक नहीं दिखा' , एक सवाल आकर टंग  गया हवा में।

"ऐसे उजाड़, सूखे में कौनसा खरगोश रह सकता है ?"  चौदह भुवन में से किसी एक भुवन ने उत्तर दिया।  
उसने खुद को देखा या हाथ लगा कर खुद को महसूस किया।   रूखे  टूटे बाल जो कंधे से नीचे तिनकों की तरह झूल रहे थे। चेहरे पर जगह जगह सूखा खुरदुरापन  महसूस हुआ।  फिर हाथ भींच कर उसने आस पास नज़र घुमाई।  वो जादू, वो रहस्य से भरे नज़ारे जो उसने देखे थे  इस जगह पर; कुछ नहीं था।  सूखी कांटे वाली झाड़ियाँ थीं,  पेड़ कहीं इधर उधर अकेले खड़े जैसे सोचते हों कि आखिर कौन उन्हें यहां छोड़ गया  और लेने कब आएगा ? कोई फूल पत्ता , हरी टहनियां और झुकी हुई डालियाँ  .....  यह सब कविता अब  यहां क्यों नहीं दिखती ?  

"खरगोश नहीं हैं क्या ?" 
"नहीं हैं। " फिर से किसी भुवन या दिशा  ने जवाब दिया  स्पष्ट ही सुनाई दिया उसे. उसे जिसका नाम शायद ,,,,, 

किसी के चलने  और धीरे धीरे पैर  रखने की आहट  है , शायद खरगोश !!! उसने पीछे मुड़  कर देखा, वही लड़का  वहाँ खड़ा है,  जहां तब पहली बार उसे आता देखा था। एक पहचानी हुई सूरत देख कर इंसान खुश हो जाता है या दुखी होता है या अपने में ही सिमटने की कोशिश करने लगता है ?? यह प्रश्न जगा।  

"तुम, जून ; तुम यहां वापिस कब आईं ?"
"क्यों नहीं आ सकती क्या ?"
"ऐसा कब कहा ?"
"पर इतने दिन तुम कहाँ थीं ?"
"मैं, मैं ... वहाँ उस पार से आगे , वहाँ ,,,,,"
जवाब अधूरा ही रहा।  वो तीर तीक्ष्ण दृष्टि जिसने कभी आगे बढ़ते पैरों के आवेग को रोक दिया था , वो दृष्टि अब झुकी हुई थी। 
"तुम कहाँ थीं ?" 
"तुम, तुम इतने दिन क्या करते रहे ?" पलट कर सवाल आया।  तीक्षणता  आसानी से जाती नहीं; यही तो धागा है जोड़े रखने का।  इस प्रतिप्रश्न ने पुराने उल्लास को जगा दिया।  
"मैं बहुत बहुत से कामों में उलझा था।  मुझे बहुत कुछ करना था। जाना था और पहाड़ पार करने थे।" लड़के का मन जाग उठा , हर वो बात बताने को जिसका कोई श्रोता अभी तक नहीं मिला है।  
"अच्छा, मुझे भी बहुत कुछ करना था। मैंने नदियां और समंदर पार किये। ये पेड़ कहाँ गए और वो खरगोश और वो फूल, वो झील का पानी ??? वो डालियाँ जिन पर मैंने झूला लगाया था। " लड़की ने कहीं दूर पहाड़ पर नज़र टिकाते कहा।  
"बहुत दिन हुए बरसात नहीं हुई। और पेड़ हमने काट दिए। "  क्या बस इतना ही  कहना है इसे , क्या यह मुझसे नहीं पूछेगी कि मैं कहाँ गया था और मैंने क्या देखा ? क्या वो अभी भी उस फूल को जो  झील में से निकाला था उसे याद कर रही है; यह सब ख्याल लड़के के मन में तैरने लगे.  
"क्यों !!!!" एक संवेग जगा लड़की के अंदर।  
"पहाड़ पर लकड़ी चाहिए  आग जलाने के लिए। " बेहद सपाट जवाब दिया उस लड़के ने। 
"आग तो हर जगह जल रही है।"
"तुमने फिर से उलझी हुई बातें करनी शुरू कर दी।  "
  " तुम यहां दुबारा कभी नहीं आये थे ?" 
"आता था, कभी कभी लकड़ियां काटने।   

लड़की ने उसकी तरफ अजब निगाह से देखा ; और आज पहली बार लड़के ने उसकी आँखों में देखने की कोशिश की. वहाँ अनसुने सवाल थे , आँखों के परदे के पीछे छिपे जवाब थे ; ना सुनी गई ख्वाहिशे और इच्छाएं थीं ; कामनाएं और  लालसाएं  जहां सो रही थीं गहरी नींद में।  इतना कुछ था वहाँ पर पहले कभी देखा नहीं।  अचानक लड़के को कुछ महसूस हुआ, उसे समझ आया कि अब कोई उलझन या दुविधा नहीं है ; यह उलझनें जिस अलबेले समय की थीं वो समय कब का बीत गया।  उसने ये भी जाना  कि अब वो लड़की महज वो अल्हड फूलों की बेल नहीं है जिसने उसने उस दिन देखा था , जिसके साथ झील के किनारे बैठ कर फूलों का संसार देखा था।  अब वो एक अलग दुनिया  लेकर आई है जिसमे उस लड़की के चेहरे के पीछे से एक औरत झाँक रही है।  लेकिन फिर ये और जाना कि अब  वो खुद भी बदल गया है,;  आश्चर्य और आवेगों का उसका वक़्त  भी गुजर गया है , अब उसमे बर्दाश्त और समझ आ गई है। अचानक उसने खुद से कहा ; 'अब तुम मुझे बहला नहीं सकोगी , अब मैं नाम चेहरे और रूप की दुनिया देख चुका। ' 
जो पता नहीं कहाँ से और कहाँ आगे जायेंगे 
एक सम्पूर्ण संसार बस गया उस एक निमिष में उन दोनों  के बीच।  समय का पहिया एक क्षणांश के लिए शायद थमा , कुछ देखा और फिर चल पड़ा , अनवरत अनंत की तरफ।  उस चलने को लड़की ने जान लिया।  

"अब मैं जाऊं ?"
"नहीं रुको,. " यह आदेश का स्वर था  जो पहली बार इस कायनात ने सुना  था।  एक मजबूत हड्डियों वाला हाथ आगे बढ़ा और उसने उस दुसरे उतने ही मजबूत लेकिन कोमल नसों वाले हाथ को थामा। 
लेकिन वो रुकी नहीं, रोक सकने  जितनी ताकत अभी उस हाथ में नहीं आई थी। लड़की को पता था कि इस मजबूत हाथ की ताकत  कितनी दूर कितने पास तक जा सकती है, इसलिए निश्चिन्त होकर  चलती गई एक नामालूम दिशा में।  एक पेड़ था उस चलने की दिशा में; कुछ पत्ते, टहनियों और सूखी डालियों को समेटे हुए।  वो बैठ गई वहाँ एक पत्थर पर; उस पेड़ के आस पास अब सिर्फ पत्थर थे जिनको शायद बैठने की गरज से ही वहाँ होना था।  एक फ्रेम था , जिसमे पत्थर हैं, पेड़ की सूखी झुर्रियों वाली डालियाँ हैं और पेड़ के नीचे  बैठे ये  मुसाफिर ; जो कहीं दूर रास्ते से आये हैं और अब किसी दूर देस को जायेंगे। यह सब समय का  एक फ्रेम था,  जिसमे ये सारे तय किरदार थे अपनी अपनी लाइन्स भूले हुए।

लड़की अभी भी सोच रही है कि यहां  क्यों  आ बैठी हूँ ? चली ही जाऊं ! और ये लड़का अब इतना अजनबी क्यों लग रहा है,  इसे अब चले ही  जाना चाहिए ; शायद इसके जाने के बाद मैं फिर से वो ढूंढ  सकूँ जिसके लिए यहां आई हूँ ? पर क्या ढूंढने आई हूँ ?  
'वो हंसी , वो फूलों की महक और सिंगार ; झील के पानी का जादू और उस पानी का ठंडा नशा जो चमड़ी को भेदता अंदर हड्डियों तक को भिगो देता है। ' फिर से कोई दिशा उसके पास आकर बुदबुदाई।  

"यहां, वो झुरमुट होते थे न, जिनमे खरगोश रहते थे।" 
" पता नहीं, मैंने तो  पहले भी कभी देखे नहीं थे। " लड़का अब थकने और ऊबने लगा था. क्यों बैठा है यहां ? ये कौन है जिसके लिए एक बार फिर  छलावे के फर्श पर चल रहा हूँ मैं ?

"वहाँ पहाड़ के पार एक झील है, वहाँ सुना है खरगोश भी हैं और वो सब फूल वगैरह भी. तुम वहाँ चली जाओ।"
पर लड़की  ने शायद सुना नहीं, वो कुछ बोल रही थी, " वो जादू, वो रंगीन नज़ारा ; वही सब देखने तो आई थी। नदी के इस पार ये था और उस पार मैं थी। तुमने पहाड़ के पार क्या देखा ? बताओ ?"  

और एक थकी निराश  जिज्ञासा ने  सिलसिला जगा दिया  किस्से और कहानी का। वक़्त का पैमाना रेत  गिराता  रहा,  कब फिर से हाथ  की अंगुलियां कंकड़ों से उलझती खुद में उलझीं ये सिर्फ वक़्त के कतरे ने देखा।  और शायद झील के किनारों ने भी देखा।  उन पथरीले किनारों ने फिर से पानी को आवाज़ दी। और देखते देखते एक रहस्य उस झील के भीतर से निकल  किनारों तक पहुँचने लगा।  लड़की के नज़र बेसाख्ता ही उस तरफ उठी और उसने पुकारा,

"अरे ये क्या है !!! देखो, क्या पानी बरसा है ? झील तो पानी से भरी दिख रही है !!!" लड़की के शरीर में जितना उत्साह और उल्लास का खून था वो सब इस वक़्त उसकी साँसों में भरा भाग रहा था।  

"कहाँ से आया पानी ?? तुम  फिर  से .."  लड़का अब की बार झुंझला गया।  मगर लड़की तो बगैर उसके जवाब  सुने दौड़ रही थी झील की तरफ, उसके ठन्डे पानी की छुअन की तरफ। 

"ये इतना पानी कहाँ से आया।  ये तो कब से सूखा ही पड़ा था ?"  संशय था, संदेह था और हैरानी की हद से भी ऊपर जाते सवाल थे लड़के के मन में।  उसके समझ में नहीं आता था कि  आखिर ये क्या गोरख धंधा है।  

"तुम कोई जादू मंत्र जानती हो क्या ? पिछली बार खरगोश थे , इस बार झील का पानी।  कौन हो, कहाँ से आई हो ?" 

"मैं, मैं तो उस पार ,,,,,,,,,,,,,," छप छप करते पैर थम गए। खिलखिलाहट लौट आई।  उपेक्षा लौट आई, बेपरवाही ने अपना चोला ओढ़ लिया। झील में  खूबसूरत फूल खिल रहे थे। 

"तुम, तुम जवाब दो ?" लड़के ने इस बार उस का हाथ ज़ोर से खींचा।  और उस सूखे उजाड़ बियाबान में पेड़ों पर डालियाँ फल रही थीं ,  लड़के के पैरों के नीचे नरम घास थी।  फूलों की बेलें महक रही थीं। 
लड़की ने मुस्कुरा कर ये सब देखा फिर मुड़ कर  लड़के की तरफ देखा।  जैसे पूछती हो,  तुम्हें रहस्य और जादू के संसार से इतनी हैरत क्यों है ??  इतने सवाल ही क्यों हैं, बस मान क्यों नहीं लेते कि  बस, ये है और यहां है।  

"मैं तुम्हारे लिए , उस दूर पहाड़ से बहती नदी के साथ आई  हूँ। चलो तुम्हें अब खरगोश दिखाऊं। " 

लड़के के माथे पर पानी की बूँदें थीं, उसकी सांस में तेजी और दिल में हज़ार बातें थी। मगर वहाँ  किसे परवाह थी;  उसका हाथ एक नर्म  हथेली ने थाम रखा था जिसमे गर्माहट थी एक पुराने परिचय की।  और वो दोनों चल रहे थे, उस  अनजानी  दिशा  और उस अनदेखे भुवन की तरफ।   

किसी ने पुकारा, आवाज़ दी।  लड़के के पैर  थमे , यह एक पहचानी आवाज़ का संकेत था।  कोई बुला रहा है उसे।  उसने लड़की की तरफ देखा और उसकी हथेली को कस के थामा  पर इतने में फूलों की वो बेल उसके ठन्डे हाथों से फिसलने  लगी।

"कहाँ जा रही हो ? रुको !!! "  

"वीरेन , क्या आज  भी  हम घूमने नहीं जाएंगे ? चलो ना, देखो हलकी हलकी बारिश हो रही है। "  और  वीरेन को किसी ने जगाया है।  

"तुम कब सोये ? उठो " 


Tuesday, 23 July 2019

Part 2 : वनीला कॉफ़ी




 "क्योंकि, मैं तुम्हारा  लौह आवरण उतरते देख रहा हूँ। "

'और तुम खुश हो रहे हो ?"

" नहीं, लेकिन इतना अंदाज़ा नहीं लगाया था मैंने।"

"किस बात  का अंदाज़ा ?"

"तो क्या अंदाज़ा था तुम्हारा ?"

"जो भी था, जाने दो। "

"मेरे ख्याल से एक एक कंकर  फेंकने के बजाय तुम पूरा पत्थर एक बार में ही पटक दो."

"तुम फिर फालतू सोचने लगीं, ऐसा कुछ नहीं कहा मैंने।'

"तुम बात को बदल सकते हो लेकिन उसका अर्थ नहीं बदल सकते।  शब्दों के अर्थ  उनके कहे जाने से ज्यादा गहरे होते हैं। "

"हो गई तुम्हारी फिलॉसोफी शुरू। "

"खैर."

"ये बारिश के छींटे खिड़की के कांच पर  ऐसे लगते हैं जैसे कांच में  जगह जगह छोटे महीन से  डिज़ाइन  आ गए  हो। "

"ये तुम्हारी नज़र है, मुझे तो सीधी सादी  बरसात की बूँदें ही दिख रही हैं। "

"हाँ, ये अब गोल बूँद ही दिख रही है। "

"तुम sci  fi  फिल्में बहुत देखती हो ना , उसी का असर है।  आजकल में कोई नई  फिल्म देखी ?"

"अरसा बीत गया फिल्म देखे तो। "

"क्यों , अब ये एक शौक भी बरसात में बह गया क्या तुम्हारा ? और तो कुछ तुम करती नहीं। "

"ऐसे ही, अब इच्छा  नहीं होती। "

"मतलब अब फिल्म देखने की भी कोई बाकायदा सिचुएशन होनी चाहिए। "

"अब तुम जो भी कहो। "

"मैंने बहुत से कहानी के थीम और बेस लाइन सोचे पर किसी को भी आगे नहीं बढ़ा पा रही हूँ। "

'क्योंकि तुम खुद आगे नहीं बढ़ रही हो।  सुनयना,  कहानी लिखने से ज्यादा कहानी जीना भी ज़रूरी है। "

"पर मैं कुछ लिखना चाहती हूँ , मुझे लगता है कि कहीं कोई सूत्र है जो मुझे मिल नहीं रहा या मैं देख नहीं पा रही।"

"वहम  है तुम्हारा। "

"चलो अब बारिश रुक ही गई। बाहर कितना पानी जमा हो गया है। "

"मौसम खुल गया है, चलो ड्राइव पर चलते हैं."

"तुम चलती हो या मैं अकेला ही निकल  जाऊं ?"

"रुको, मैं  आती हूँ। "

"आसमां ने खुश होकर रंग सा बिखेरा है। "

  "और कुछ नहीं तो अलग अलग गानों के टुकड़े जोड़ कर ही एक कहानी नुमा कुछ लिख मारो. तुम्हारा शौक पूरा हो जाएगा। "

"तुम फिर मजाक उड़ा रहे हो। मेरी समझ नहीं आ रहा कि आखिर अब इतने वक़्त बाद  तुम ठहरे पानी में कंकर फेंकने क्यों आये हो ? "

"मैं सिर्फ तुमको आज में खींचने की कोशिश कर रहा हूँ। और तुम इतनी चिढ क्यों रही हो. ? "

" तुम पहले ऐसे नहीं थे या  अब कोई नया बदलाव है ?  मुझे महसूस होता है कि तुम पहले ऐसे नहीं थे।  तुम्हारी भाषा ही बदल गई है।"

"कुछ नहीं बदला है सुनयना।  वक़्त के साथ हम सब ज्यादा परिपक़्व  और व्यावहारिक हो जाते हैं लेकिन तुम ओवर pampered रही हो इसलिए कोई भी नई  चीज़ तुम्हे आसानी से पसंद नहीं आती। come  out  of   your  shell . "

"तुम उन दिनों ज्यादा अच्छे इंसान थे। तब तुम्हारे पास वक़्त हुआ करता था।  अब तो तुम्हारा  वक़्त छतीस हज़ार कामों में फंसा है।"

'क्योंकि तब  मैंने कभी भी तुमको आइना दिखाने की कोशिश नहीं की। और सिर्फ यूँही इधर उधर की बातों के लिए वक़्त आजकल किसी के पास नहीं है।  और  तुम बार बार पलट कर उन पुराने दिनों में क्यों पहुँच जाती हो ?"


" ऐसा नहीं है। तुम्हारे हिसाब से तो परिपक्व होना मतलब सब तरह से इमोशंस को उठा कर ताक  पर रख देना।"

"अब तुम फिर वहीँ  पहुँच गईं। "

"रहने दो फालतू बहस है।  लम्हे फिल्म देखी  है तुमने ?"

"वो श्रीदेवी वाली ? इतनी पुरानी  फिल्म का अभी  यहां क्या काम है ?'

"एक  scene  है उसमे , जब वहीदा रहमान कहती है अनिल कपूर से  कि " हुकुम अब बड़े हो गए हैं और मेरा हाथ छोटा हो गया है."

"इसका क्या मतलब ?  तुम एक पूरी तरह से गैर ज़रूरी बात  को यहां quote  कर रही हो।  तुम वो डेन्यूब वाली बात ही करो।  तुम्हारा आवरण तुम्हारे इस बेसिर पैर की फ़िल्मी कल्पना से ज्यादा ठीक है। हाँ, कहानी वाली बात।  देखो इस बढ़िया मौसम और इन नज़ारों पर ही कुछ लिखो। "

"वो कोई आवरण नहीं है।  मैं सचमुच विएना देखना चाहती हूँ।  यूरोप का आर्किटेक्चर , वहाँ  का लोकल कल्चर  .... "

"अभी तुम ठहरे पानी की बात कर रही थीं और अभी दो घंटे पहले तुमको डेन्यूब सूझ रही थी।  क्या तुम सोचती हो कि डेन्यूब का पानी हज़ार साल से एक जैसा ही है ?  तुम जिस डेन्यूब को ढूंढ रही हो वो तुम्हारी एक पसंदीदा इमेजिनेशन है जिसे तुमने किताब में पढ़ा है और बस एक रोमांटिक सा ऑरा  बन गया। "

"ऐसा तुमको लगता है मुझे नहीं।  और कल्पना क्या कभी सच नहीं होती ? कोई ज़रूरी है कि जो आज दूर का ख्वाब है हमेशा  ऐसा ही रहेगा ? हो सकता है कि तुम को हंसी आ रही है पर ...

'तो चलो, कब फुर्सत है तुम्हें ? टिकट बुक करवानी होगी,  रहने का arrangement , सब देखना पड़ेगा  ना।  तुम को सुविधा से रहने की आदत है।"

"ऐसे अचानक  अभी ?"

"तो और कब ? वहीँ लिखना डेन्यूब पर कहानी।  यहां तो सूखी नदी पर कुछ लिखने का हाल बन नहीं रहा तुम्हारा। "

"बोलो ?"

"अच्छा, कॉफ़ी का कौनसा फ्लेवर पसंद है तुम्हे ? चॉकलेट, हेज़लनट, आयरिश या वनीला ?"


"वक़्त की क़ैद में है ज़िन्दगी , चंद  घड़ियाँ हैं जो आज़ाद हैं "

"कॉफ़ी का फ्लेवर साहब !!!"

"नहीं चाहिए। "

"वनीला से शुरू करो. बेसिक और मीठा  और खुशबू वाला। "






Image Courtesy : google









Sunday, 29 November 2015

ज़िन्दगी का खटराग --- 2

दिन गुज़रते हैं फिर भी वक़्त थमा  हुआ सा है.

ये एक अजीब मौसम है, इसमें दिन और रात का हिसाब आपस में गड्डमड्ड सा हो गया है. यहां उत्तरी ध्रुव की लम्बी रौशनियों वाली रातें भी हैं और  महासागर  के अथाह विस्तार जैसे  अनंत तक पसरे हुए दिन भी. कब और कहाँ से दिन की या रात की सीमा रेखा शुरू होती है, इसकी थाह पाना मुश्किल है.   इस मौसम को यहां किसने बुलाया, किसने रोक के रखा है. यहां  समय रबड़ की तरह फ़ैल भी गया है और रेत  की तरह हथेलियों से फिसल भी रहा है, फिर भी नए पुराने दिनों का फर्क पता नहीं चलता है. यहां रोज़ सुबह  चौराहों से कई रास्ते निकलते हैं जो कहीं नहीं पहुँचते बस  एक गोल घेरे जैसा चक्कर काट कर वापिस वहीँ पहुँच जाते हैं जहां से शुरू हुए थे.  यहां से कहीं नहीं जाया जा सकता और कोई कहीं से आ भी नहीं सकता।

घड़ी  की टिक टिक दिन और रात के प्रहर बीतने  की सूचना देती है लेकिन इस मौसम के बीतने के कोई आसार नहीं दिखते। ये एक लम्बी गर्मियों की तरह है जिसमे दिन कभी नहीं ढलता,  दोपहर सुबह से शुरू होकर अँधेरा घिरने के बाद भी कुछ देर तक बनी रहती है और घड़ी लम्बे  पॉज  लेकर चलती है.  और इस गर्म मौसम के पार कोई और मौसम है भी या नहीं इसकी भी कोई खबर नहीं। अक्सर इस थमे हुए दिनों वाले मौसम के लिए उस शख्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिसकी ज़िन्दगी में ये उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के छह छह  महीनो वाला मौसम आकर रुक गया है. पर अक्सर खुद उस शख्स को भी  नहीं होती कि आखिर इतनी तेज़ गति से भागने के बावजूद समय रुका क्यों है ?  अनंत तक फैले हुए ये दिन  किसी झिलमिलाती खुशनुमा साँझ तक  क्यों नहीं पहुँचते ?  यहां  रात को नींद में सपने क्यों नहीं आते ? यहां शाम कब आती है और कितने बजे आती है और कब ख़त्म हो जाती है, इसके बारे में घड़ी देख कर क्यों नहीं पता चलता ?

कलैंडर में तारीखें बदलती हैं लेकिन मौसम नहीं बदलता। दिन बीत जाता है लेकिन वक़्त थमा हुआ ही लगता  है.  उत्तरी रौशनियों के साये और महासागर के गहरे रंग कभी एक नया मौसम बना सकेंगे ? समय का एक नया आयाम ?  दिन और रात का कोई नया हिसाब जो चौबीस घंटो और सात, तीस, बावन, बारह और 365 की गिनती से अलग और घड़ी की पाबंदी से  दूर हो ? 






Friday, 29 August 2014

समय के संसार में

नरम हरी घास पर रखा हुआ हर कदम, एक ठंडी लहर उसके शरीर के अंदर भेज रहा था.  ऐसा लगता था कि  ओस  की नमी उसके पैरों से होते हुए थके हुए शरीर के हर हिस्से तक पहुँच रही थी, तेज़ धूप से जले हुए मन प्राण  को फिर से ऊर्जा मिल रही थी.

"ये सुबह को हरी घास पर घूमने वाला आईडिया शायद सही है." उसने सोचा और फिर उसकी नज़र  सामने लटकी घडी पर गई, सुबह के नौ बज कर पांच मिनट हुए थे. उसे फिर से नींद आने लगी और तभी उसे महसूस हुआ कि  वो चल नहीं रही, घास पर लेटी  हुई है.  उसने वापिस आँखें बंद कर ली. आँखों  पर नींद का बोझ अभी बाकी था और सुबह की ताज़ी हवा इस बोझ को नशे में बदल रही थी. अगले कितने मिनट नींद रही या नींद का नशा, इसका पता नहीं चल पाया।

आखिर आँखें खुलीं, और फिर से सीधे नज़र सामने घड़ी की तरफ गई, वहाँ अभी भी सुबह के नौ बज कर पांच मिनट हुए थे. उसने करवट बदली और देखा … एक आदमी जिसके लम्बे बाल उसके कन्धों तक बिखरे थे, वही पास में लेटा उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा रहा है. वो उठी; असहजता, अचरज, असुरक्षा, बहुत सारे ख्याल  एकसाथ आये  और लौट गए. 

"कौन हो तुम ?" 

"मैं तो हमेशा  तुम्हारे साथ, अंग संग चलता हूँ. तुम्हारी कलाई पर बंधा, दीवार पर लटका हुआ … मैं वही वक़्त हूँ जिसे देख कर, जिसका हिसाब लगा कर तुम रोज़ का शेड्यूल तय करती हो. भागती हो घड़ी  के कांटो के हिसाब से और रूकती हो मिनटों के हिसाब से." 

"ये मेरी जगह है. मैं यहां रहता हूँ. इसे मेरा घर समझ लो." वो बोलता गया. 

विश्वास कर सकने जैसी बात ये थी नहीं और विरोध करने के लिए तर्क उसे  सूझ नहीं पाया और इसलिए उसने तेज़ कदमो से चलना शुरू कर दिया। जहां तक नज़र जाती थी बस हरी घास का मैदान दिखाई देता था. एक ख्याल और मन में आया,  अगर ये एक मैदान है तो घडी किस दीवार पर लटकी है ?? उसने दुबारा मुड़  कर घड़ी को देखा और  इस बार गौर से देखा, नौ बज कर पांच मिनट। घड़ी की सुइयां थमी हुई थी.

" क्या मैं सपना देख रही हूँ ?? शायद हाँ …" 

घास के उस अनंत तक फैले मैदान पर चलते चलते उसने एक मेज़ के चारो ओर कुछ  लोगों को बैठे देखा। पास गई, और मुंह से चीख निकलते रह गई, वहाँ ऐलिस चाय की टेबल पर हैटर के साथ  बैठी थी और उनका साथ देने लिए cheshire  cat भी थी.  उसने विस्फारित आँखों से वक़्त नाम के  उस आदमी  को देखा, वक़्त ने उसे चुप रहने का इशारा किया और आगे चलता गया. 

फिर कहीं नज़र पड़ी ; वहाँ असलान और लूसी, प्रिंस कास्पियन के साथ घूम रहे थे. उनको ये चीखना पसंद आया या नहीं ये मालूम नहीं चल सका क्योंकि उन्होंने पलट कर उसकी तरफ देखा नहीं।     

" ये सब यहां कैसे आये, कौनसी जगह है ये ?? और मैं यहां कैसे आई ??" 

" इन सबको तुम अपने साथ ही लाइ हो,  ये सब, एलिस और उसका वंडरलैंड, नार्निया के राजा और रानी, तुम्हारी फंतासी का, तुम्हारे कल्पनालोक का  हिस्सा हैं, तुम्हारी पसंद हैं और शायद किसी दिन तुम नार्निया जाना भी चाहती हो. तुम यहां इसलिए हो क्योंकि  तुम आना चाहती थी यहां। देखना चाहती थी वो जगह जहां वक़्त रुक जाता है." वक़्त ने एक सांस में जवाब दिया। 

" ये सपना नहीं है गुड़िया, उस नीली डायरी में तुम्ही ने लिखा था ना कि भगवान  की बनाई हुई इतनी बड़ी दुनिया में वक़्त को ठहरने, रुकने और सुस्ताने को कोई जगह नहीं है क्या ??  तो लो, तुम आ गई यहां, जहां वक़्त भी ठहर जाता है, दो घड़ी आराम करने के लिए." 

"तुम नीली डायरी के बारे में क्या जानते हो ?" 

" तुम भूल रही हो, कि  मैं इस ब्रह्माण्ड के हर कोने में, हर पल मौजूद हूँ तो फिर तुम्हारी डायरी क्या मेरी नज़रों से छुपी रह सकती है? चलो आओ, तुम्हे कुछ दिखाऊं … "  

वो उसके पीछे चलने लगी,  हरी घास के अंतहीन  कालीन के एक हिस्से में कागज़ बिछे हुए  नज़र आये, पास गए तो समझ आया कि  असल में ये किताबें है जिनके पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे हैं.  थोड़ा और गौर से देखा, किताबें हर कहीं, ज़मीन पर हवा में तैरती हुई, पन्ने  बोलते हुए, अपनी कहानी सुनाते ....किताबों के अंदर की तसवीरें पन्नों से बाहर झांकती हुई  ....  कहीं एक पर्दा सा या दीवार सी खड़ी नज़र आई जिस पर तसवीरें और दृश्य चलते दिखे … 

"Ink-heart, Silver-tongue  " लड़की बुदबुदाई।

"एक और फैंटेसी, तुम फिल्में बहुत देखती हो ?" … वक़्त हंसा। एक नीली किताब हवा में तैरती हुई उन दोनों की तरफ आई.  ये किताब वही नीली डायरी है.

"ये सब किताबें और उनके पन्ने  ऐसे बिखरे हुए क्यों है ?" 

"ये  सब किताबें  दुनिया के हर कोने से यहां आई है, मेरा मतलब ब्रह्माण्ड के हर कोने से.  सभ्यताओं और बियाबानो का इतिहास बताती हैं,  मेरे  आज की तस्वीर  और मेरे आने वाले कदमों के संकेत मुझे बताती रहती हैं. इन्ही के ज़रिये मैं हर जगह हूँ  और सब कुछ देखता सुनता हूँ. " 

" तो फिर तुम आराम  कब करते हो ? मैंने तो डायरी  में ऐसी जगह के बारे में लिखा था जहां वक़्त भी आराम करता है, तुम तो लगता है कि  कभी सोते ही नहीं। यहां बैठे किताबें देखते या सुनते रहते हो …" 

" लगता है तुम्हारी मोटी  बुद्धि  है. क्या इतना भी नहीं जानती कि  फैंटेसी  की दुनिया में तुम्हारे संसार की घड़ियों के नियम नहीं चलते। इसलिए तो इतनी देर से वो घड़ी एक ही वक़्त दिखा रही है … नौ बज कर पांच मिनट।"

" दिन और रात, शाम और दोपहर वाले  हिसाब यहां नहीं है."

" अगर दिन रात का हिसाब  नहीं है तो फिर वो घड़ी ये नौ बज कर  …" बात अधूरी ही रह गई. 

"ये वक़्त, ये exact  वक़्त तुमने उस नीली डायरी में लिखा था, ठीक इसी वक़्त पर तुमने सोचा था कि  घड़ी  के कांटे थम क्यों नहीं जाते।" वक़्त ने एक रहस्य्मयी मुस्कान के साथ जवाब दिया। 

"अगर ये वक़्त, ये ऐलिस और असलान और ये जगह … सिर्फ मेरी ही कल्पना होने के कारण यहां  हैं तो फिर मेरी जगह अगर कोई और होता तो उसकी कल्पनायें ...." अबकी बार जान बूझ कर बात अधूरी छोड़ दी. 

वक़्त ने आगे कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसकी वही मुस्कराहट बनी  रही.

हरी घास के मैदान का ओर  छोर नहीं था  और चलने से वे दोनों थकते नहीं थे.  वक़्त की इस दुनिया के चमत्कार अभी बाकी थे.

"ये लोग कौन हैं और इस तरह क्यों यहां लेटे हैं?" 

"श्ह्ह, धीरे बोलो,  ये सब सो रहे हैं,  चलो यहां से,  इन्हे डिस्टर्ब मत करो अपने सवालों से." 

हवा में  स्थिर कुछ  मानव  शरीर, जैसे चैन से कोई अपने नरम गुदगुदे बिस्तर पर सो रहा हो वैसे हवा में ज़मीन से कुछ ऊपर वे सब सोये थे.   वक़्त उसे, उन लोगों से कुछ दूर ले गया.

" ये सब लोग अभी सो रहे हैं अपने घरों में. दुनिया के जिस भी हिस्से  में जब लोग सो जाते हैं तब मैं उन्हें यहां ले आता हूँ. ताकि उनकी नींदों में से कुछ हिस्सा चुरा सकूँ और  उस  कुछ देर के लिए मैं भी आराम कर लेता हूँ । तुम्हारे शब्दों में दो घड़ी सुस्ता  लेता हूँ. " 

"उनकी नींदों में वक़्त की सुइयां रुक जाती हैं और जितनी देर तक वे सोते हैं उतनी देर तक उनका वक़्त ठहर जाता है."

" क्या तुम उनकी परछाइयाँ यहां ले आते हो ?" उसने थोड़ा डर  कर पूछा।

" कुछ ऐसा ही समझ लो …" वक़्त ने हँसते हुए जवाब दिया लेकिन फिर थोड़ा संभल कर कहा, " ये परछाइयाँ नहीं है असल में ये उनका अवचेतन मन है जो सोये हुए शरीर में जाग उठा है." 

" वो इन्सेप्शन  फिल्म के जैसा ?" उसने थोड़ा दबी हुई आवाज़ में पूछा।

" इन्सेप्शन या मैट्रिक्स कहीं बाहर नहीं होता, वो हमारे ही अंदर, हमारे आस पास होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि  तुम सारा दिन   कम्प्यूटर, मोबाइल और पता नहीं कौन कौन सी मशीनों से और उनकी नित नई  तकनीक से इतना ज्यादा घिरे हो कि   जीवन के सीधे सरल रूप देख नहीं पाते। हर वो चीज़ जो आश्चर्यों से भरी है और तुम्हारी कल्पना से आगे की है  उसकी व्याख्या या तो इंटरनेट पर ढूंढते हो या  किसी फिल्म की कहानी से जोड़ देते हो."  वक़्त ने एक लम्बा और उबा देने वाला प्रवचन दिया। 
"लेकिन फिल्में भी तो आम ज़िन्दगी से ही निकलती हैं." उसने जवाब देने की सोची पर फिर चुप रह गई. 
"वैसे तुम्हारी ये जगह ब्रह्माण्ड के किस कोने में है, किस ग्रह  या गैलेक्सी में है ?" उसने तीखा सवाल किया। 

" हर कहीं, हमेशा तुम्हारी नज़रों के सामने, बस उसे देखने भर की देर है." वक़्त ने जवाब दिया।

"तो फिर मुझे या किसी और को आज तक कभी दिखी क्यों नहीं?" 

"क्योंकि इस से पहले कभी तुमने इसे देखने की कोशिश भी नहीं की." 

"तुम बात बदल रहे हो और मुझे अपनी इन रहस्य भरी बातों से बहलाने की कोशिश कर रहे हो." 

" ये ठहरी हुई वक़्त की  दुनिया हमेशा तुम्हारे आँखों के सामने होती है पर तुमको ठहरने की फुर्सत आमतौर होती नहीं।"  धीमी आवाज़ में जवाब आया.
" वो रंगीन रौशनी कैसी है और ये आवाज़ें कहाँ से आ रही हैं." अब उसने खुद ही  बात को  बदलते हुए सवाल किया और रौशनी की दिशा में इशारा भी किया।

" ये रौशनी तुम्हारी दुनिया से आ रही है, वो आवाज़ें घरों और सडकों पर पसरा शोर है जो अब तुम्हे वापिस बुला रहा है.  लौटने का समय हो गया है."  इतना कह कर वक़्त ने  हवा में लटकी घडी को देखा जो उनके साथ साथ चल रही थी. 

उस घडी में अब नौ बज कर दस मिनट हो रहे थे. 

घास का मैदान अब दीवारों और छत में तब्दील होने लगा.  


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Sunday, 1 June 2014

एक इंच मुस्कान : A review



एक इंच मुस्कान उपन्यास थोड़ा अनोखा सा है क्योंकि इसे दो लोगों ने मिल कर लिखा है; राजेंद्र यादव और  मन्नू भंडारी।  दो भिन्न व्यक्तित्व वाले लेखक, अलग अलग लेखन शैली लेकिन कहानी एक. इसमें कुल चौदह चैप्टर हैं, एक चैप्टर राजेंद्र यादव का तो दूसरा मन्नू भंडारी का. ज्ञानोदय  मैगज़ीन में धारावाहिक किश्तों के रूप में छपे इस  उपन्यास को एक प्रयोग के तौर पर भी देख सकते हैं कि  दो लेखक मिल कर एक कहानी पर काम करें और पाठक को  कहीं से ऐसा ना लगे कि  इसे दो अलग दृष्टिकोणों से लिखा गया है; पढ़ते वक़्त कहानी का सूत्र और संरचना कहीं टूटती बिखरती ना लगे. तो इस पैमाने पर ये उपन्यास बिलकुल खरा है इसमें दो राय नहीं है.

एक इंच मुस्कान कहानी है तीन लोगों की; "अमर" जो एक प्रतिष्ठित लेखक है, जिसकी एक अच्छी खासी फैन फॉलोइंग है और जिसके लिए लिखना ज़िन्दगी जीने का ही दूसरा नाम है, जिसका "धन न बैंकों में न मिलों  में, वह मेरे मस्तिष्क में है, मेरी कलम में है." 

एक रंजना है, जो अमर से प्यार करती है और अमर को भी उससे प्यार है. अमर के लिए घर, परिवार, शहर सब छोड़ आई, शादी की और सोचती है कि जो किया वो ठीक ही तो किया। पर कहीं उसे थोड़ी फ़िक्र भी है, " इन साहित्यकारों का कोई भरोसा नहीं। इन्हे एक पत्नी, एक प्रेयसी , एक प्रेरणा, न जाने कितनी कितनी लडकियां चाहिए।"

एक है अमला, किसी रईस खानदान की इकलौती बेटी है जिसे पति ने शादी के एक साल बाद  घर से निकाल दिया। ज़िन्दगी के इस बड़े झटके के बाद  भी उस मानिनी का "व्यक्तित्व  ऐसा है कि  आदमी एक बार देख ले तो ज़िन्दगी भर भूल नहीं सकता।"  जिसकी मुस्कान कुछ ऐसी सम्मोहिनी, मायावी  सी है कि जिसके जादू से कोई ज्यादा देर तक बच नहीं सकता।  एक बार तो पढ़ते समय, पाठक भी कल्पना करने को मजबूर हो जाता है कि  मन्नू भंडारी ने अमला के मुस्कुराने का जो ख़ास तरीका बताया है,  वो कैसा लगता होगा। 


अमला चाहती है कि  अमर लिखे और बहुत लिखे, "तुम्हारा लेखन साहित्य की एक उपलब्धि है".  अमला के साथ अमर की "मधुर मैत्री", लेखक और पाठक का रिश्ता रंजना की समझ से बाहर हो जाता है. "ये मित्र क्या होती है? या तो बहन होती है या भाभी।"   और लगभग पूरी कहानी अमर, रंजना, अमर के अंदर के लेखक और अमला के बीच की खींचातानी  और उतार चढ़ाव को बयान करती चलती है. 

अमर का चरित्र एक अजब उधेड़बुन  और असमंजस में फंसे रहने वाले व्यक्ति का है, सपनों और फिलॉसफी की दुनिया में रहने वाला इंसान। शायद इसके लिए उसे दोष भी नहीं दे सकते। एक तरफ उसे अपने अंदर के लेखक की चिंता है.…  "कलाकार तो धारा है, हर कहीं बहता है, जब तक गति है  तब तक कला है, फिर न गति रहेगी न कला, धारा तालाब हो जायेगी। रंजना और अमला ज़िन्दगी में बहुत आएँगी लेकिन न अमर  प्रतिभा आएगी ना प्रतिभा के स्फुरण के ये क्षण आएंगे।"  वहीँ दूसरी तरफ ऐसा जड़मूर्ख और स्वार्थी भी नहीं कि रंजना की तरफ से पूरी तरह मुंह फेर सके; अमला को लिखे पत्र में कहता है, "अपनी आत्मा और आत्मा के जो अंश है उन्हें धोखा देता रहूँ  और दोस्तों से लड़ता रहूँ?"  

पर फिर भी फैसला लेने और उस पर टिके  रहने   की क्षमता उसमे ज्यादा नहीं है. अमर की  इस मनस्थिति को उसका दोस्त टंडन सही पहचानता है और कहता है " कुछ  मिथ्या  धारणाएं हमें परम्परा से मिलती हैं  और हम उन्हें बिना जाँचे ज़िन्दगी भर पालते जाते हैं. एक मिथ ये है कि कलाकार को घर नहीं बसाना चाहिए, उसे दुखी और निर्धन ही होना चाहिए।"  अमर  रंजना से विवाह करना चाहता था लेकिन जब अमला ने साहित्य के प्रति फ़र्ज़ याद दिलाया तो फैसला बदल गया; "तुम्हारे जीवन की पूरक तुम्हारी कलाकृतियां ही होंगी, रंजना नहीं।"  

फैसला फिर बदला और रंजना से विवाह हुआ.  और ये विवाह ही दो ज़िन्दगियों, दो लोगों उनकी अलग ख्वाहिशों और लक्ष्यों  और दो  अलग अलग  विचारों की लड़ाई का मैदान बन गया. अमर भी अपने वर्तमान के बजाय दूर भविष्य की कल्पना कर रहा है, जब लोग सिर्फ उसकी कृतियों को जानेंगे और उसका व्यक्तिगत  या पारिवारिक जीवन कैसा था इसकी परवाह किसी को नहीं होगी। टॉलस्टॉय, चेखव, ग़ालिब  वगैरह उसे याद आते हैं। टंडन ने उसके लिए बिलकुल सही कहा कि,  "तेरे निर्णय तेरे अपने  नहीं है, वे निर्णय किसी देशी विदेशी लेखक  ने पहले से लेकर रखे हुए हैं और उन्हें अपनी ज़िन्दगी में लागू करके तू उन लोगों  की महानता  प्राप्त करने का संतोष पाता है. काश तू अपने निर्णय कामू या सार्त्र  की किताबों से न लेकर खुद ले सकता होता।"

अब यहां अमर और रंजना के संयुक्त जीवन के बारे में कुछ कहें या उसे समझें इसके पहले अमला को जानना बेहद ज़रूरी है; आखिर उपन्यास का टाइटल उसकी मुस्कुराहट के कारण ही रखा गया है. 

अमला अपने समय और परिस्थियों से आगे की औरत है जो खुल कर कहने साहस  रखती है कि, " जीवन का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी मेरे लिए सौभाग्य बन कर ही आया.  इन दस वर्षों में जो कुछ पाया, उसका लेखा  जोखा करती हूँ तो लगता है मैंने खोया कम पाया अधिक है."  शायद यही साहस उसका गर्व और अभिमान दोनों बन गया है. औरों से अलग, विशिष्ट होने की इच्छा, सारे बंधन तोड़ देने की महत्वाकांक्षा, मर्यादाओं को लांघ जाने का दुस्साहस।  "जल की एक उन्मुक्त धारा .... किसी एक की होकर नहीं रहना चाहती, रह भी नहीं सकती …  उसके लिए सब समान  हैं, वह सबके लिए  समान  हैं."  लेकिन इस महत्वाकांक्षा में बड़ी गहरी अभिलाषा भी छिपी है कि  सब उसका कहना मानें, उस पर मोहित हो, उसका जादू सब पर चले; अपनी बात को हर किसी से मनवा सके. पर खुद अमला पर किस का जादू नहीं चल सकेगा, वो किसी की  कोई बात नहीं मानेगी, किसी को अपने भीतर झाँकने या कुछ तलाशने की इज़ाज़त नहीं देगी। जिसका ये दृढ विश्वास है कि, " पति के अतिरिक्त भी संसार में बहुत कुछ ऐसा होता  है जो नारी जीवन को पूर्ण बना सकता है."   पर यही अमला कैलाश के साथ झगड़े, बरसों पुरानी मैत्री के टूटने और उसकी बेरुखी को सहन नहीं कर पाती। अपने ही मन की दबी हुई आवाज़ को अनसुना किये  इस बात से मन को तसल्ली देती है कि  अमर जैसा एक प्रसिद्ध लेखक उसके बीते जीवन की ट्रैजेडी और वर्तमान के इंद्रधनुषी रंगों पर एक उपन्यास लिखना चाहता है; कि  वो एक बड़े लेखक के सृजन की प्रेरणा है और  अमर को ये विश्वास है  कि  अमला के जीवन पर लिखी ये किताब  उसका मास्टरपीस होगी और उसे साहित्य के क्षेत्र में "अमर" बना देगी। अमला अपने मान और अहम को इस बात में ढूंढ रही है कि  अमर ने अपनी रचना उसके नाम पर समर्पित की है. पर क्या इतना ही  पर्याप्त है ?

रंजना एक साधारण सरल लड़की  है जिसके वही सीधे सादे सपने हैं कि पति हो, एक सुन्दर सजा संवरा  घर हो, शाम को पति पत्नी साथ घूमने जाएँ, ज्यादा से ज्यादा वक़्त साथ बिताएं, सिनेमा देखने जाएँ; अमला के शब्दों में "सुख की कितनी सरल परिभाषा है"।  लेकिन फिर भी कुछ असाधारण है रंजना में; उसके पास एक अच्छी नौकरी है, उसने घरवालों की मर्जी को दरकिनार कर अपनी पसंद से शादी की, वो भी ऐसे आदमी से जो फुल टाइम लेखक है, जिसके ना नौकरी का ठिकाना, ना रहने खाने का कोई ढंग. घर का बजट, सारे खर्चे रंजना की ज़िम्मेदारी हैं; पर फिर भी उसे शिकायत नहीं क्योंकि उसे अमर से प्यार है. (सुनने में अजीब है कि  आजकल के ज़माने में ये क्या आदर्शवादी किस्सा है पर इस कहानी का यही मुख्य बिंदु है) अमर अपनी इन कमज़ोरियों को अच्छे से जानता है और इसलिए रंजना का ये बिना टर्म्स एंड कंडीशंस वाला प्यार जिसमे वो खुद रंजना को कुछ दे  नहीं सकता, ना घर, न पैसा और ना वैसा समर्पित प्यार उसे परेशानी में ज्यादा डालता है और सुख की अनुभूति कम करवाता है । अमर की सुख की  परिभाषा भी रंजना  से अलग है, उसे एक बंधे बंधाये व्यवस्थित जीवन की आदत नहीं है, " सारे दिन को घडी के हिसाब से नहीं , भोजन नाश्ते के हिसाब से बाँट दिया गया है."  उसके लिए किसी  पुराने मित्र ( या मित्री)  से मिलना, पाठकों (जिसमे महिलाएं भी शामिल हैं) के प्रशंसा भरे पत्र, शाम होते ना होते  दोस्तों के साथ  निकल जाना; सुख के पैमाने हैं. 

और इसलिए अमला या शकुन या लेखन नहीं, सुख की यही अलग अलग परिभाषा;  अमर और रंजना के बीच दीवार की तरह खड़ी है और दोनों को दो अलग समान्तर रास्तों पर ले जाती है. इस बात को अमला का चरित्र  बड़े सुन्दर ढंग से परिभाषित करता है, "जो किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन का चरम सुख हो सकता है वही तुम्हे कष्ट दे रहा है… शायद अपने अपने व्यक्तित्व के एक सिरे पर  बहुत ही साधारण हैं, वही हवसें, वही इच्छाएं, वही कमज़ोरियाँ …" 


तो ये कहानी आखिर किस अंत पर पहुँचती है, शायद कहीं नहीं … अमर के अपने शब्दों में इस कथा का सार यही है कि  " यह उसके जीवन की विवशता है, ट्रेजेडी है कि  जो कुछ उसे प्राप्त है  नहीं पाती, अस्वीकार कर देती है और एक ऐसे अदेखे अनजाने सुख पीछे भागती है जो शायद उसे कभी प्राप्त नहीं होगा।"  ये कथन अमर और अमला दोनों की जीवन यात्रा पर सही बैठता है और  शायद यही वो सन्देश या जीवन  सत्य  है जो उपन्यास लिखने वालों ने इस सीधी  सरल कहानी  के ज़रिये  बताने की कोशिश की है.

P.S.  जिन लोगों ने मन्नू भंडारी की आत्मकथा पढ़ी है या जिनको मन्नू और राजेंद्र यादव के  वैवाहिक जीवन की जानकरी रही है वे लोग इस उपन्यास को उन दोनों की अपनी निजी ज़िन्दगी का लेख जोखा ही  मानेंगे; खुद मुझे भी यही लगा था लेकिन हमारे इस भ्रम  को मन्नू भंडारी ने दूर कर दिया है. उपन्यास के अंत में दोनों लेखकों  ने इस डेढ़ साल तक चले  "प्रयोग" पर  अपने विचार दो चैप्टर्स में  लिखे हैं जो इस किताब की  खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं और इसी में मन्नू भंडारी ने स्पष्ट कहा है कि  इस कहानी का उनके निजी  जीवन से कोई लेना देना नहीं। पर फिर भी मन मानता तो नहीं।  



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Tuesday, 20 August 2013

राधा बाई की लव स्टोरी --- पार्ट २

राधा की कोर्ट मैरिज में अभी कुछ वक़्त था .. लेकिन तब तक प्लानिंग भी तो करनी थी ना .. आखिर शादी होने वाली है। लेकिन तभी राधा ने फिर से ४ दिन की छुट्टी ली। पांचवे दिन देवी जी प्रकट हुई, आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई।

"अब क्या हुआ ?" 

" घर में बहुत झगडा हुआ था ?"  राधा जी उदास हैं।

और फिर जो किस्सा सुनाया गया वो इस तरह कि घर में इसी मुद्दे को लेकर हंगामा मचा  है, झगडा हो रहा है राधा और उसकी माँ के बीच और इसलिए राधा जी ने एलान किया है कि  वो खाना नहीं खायेंगी तब तक नहीं जब तक माँ,  हाँ  नहीं  कह देती और पिछले चार दिन से  सचमुच कुछ नहीं खाया ।

"क्या .. तू पागल हो गई है .." माताजी फिक्रमंद हैं।

"मैंने तो मन्नत मांग ली है, गाँठ बाँध ली है चुन्नी में ..तभी खाना खाऊँगी जब घरवाले मान जायेंगे।"

" खाना नहीं खाएगी तो क्या भूखी मरेगी?" 

"मैंने तो देखो मेहंदी में भी उसका नाम लिखवा  लिया है"   राधा देवी ने अपनी बायें  हाथ की हथेली आगे की … वहाँ लक्ष्मण नाम शोभायमान था. 

"अब अगर बच गई तो "उसकी" वर्ना भगवान् की, " राधा जी ने गहरी सांस ली.  

अब यकीन हो गया कि  कुछ  धमाकेदार होने वाला है.  और उसके लिए ज्यादा इंतज़ार भी नहीं करना पड़ा.  दो  दिन बाद  एक  नई  खबर आई ...

" माँ   मान गई है, कहती है कि लड़के वाले घर आये हमसे रिश्ते की बात  करने। अब परसों आयेंगे उसके घर से "सब लोग".  

"ये कैसे हो गया ??" 

" भगवान् ने सदबुद्धि  दी मेरी माँ  को, मेरी मन्नत पूरी हो गई, आज जाउंगी मंदिर प्रसाद चढाने।"


 उसके बाद शुरू हुआ सलाहों का दौर …. "अच्छी मिठाई और नमकीन मंगवा के रखना,  मेन  रोड वाली श्यामा स्वीट्स से लेना और उसी से गुड डे बिस्किट के पैकेट भी. और सुन तू अच्छी  सी ड्रेस पहनना। . है तेरे पास कोई ढंग की बढ़िया ड्रेस ??"   इस आखिरी सवाल ने मुझे चिंतित कर दिया, कहीं मेरी ही किसी ड्रेस का नंबर ना लग जाए ….  शुक्र था कि  राधा का जवाब हाँ में था.

"उसने मुझे कहा है कि   कोर्ट मैरिज करेंगे तो वो मुझे गोल बाज़ार ले जाएगा और वहाँ से नई  ड्रेस, पायल और मेकअप  का सामान खरीद कर देगा।" 

"वो सब जब होगा तब होगा , फिलहाल तो तू अच्छी ड्रेस पहन के ढंग से तैयार होना।" माताजी ने झिडकी और सीख दोनों एकसाथ  दी. 

फिर दो दिन इसी मुद्दे पर लम्बी और गंभीर किस्म  की वार्ताएं  हमारी डाइनिंग टेबल पर चलती रही. और फिर वो दिन भी आ गया, उस दिन राधा बाई ने छुट्टी ली ना सिर्फ उस दिन बल्कि उसके बाद तीन  दिन और भी. ज़ाहिर अब मेरे साथ माताजी का पारा  उसकी लगातार छुट्टियों की वजह से चढ़ने भी लगा और साथ ही चिंता भी बढ़ने लगी कि  आखिर हुआ क्या। … 

तो आखिर पर्दा उठा,  राधा देवी आई, बैठी और बिना पूछे ही उन्होंने सारा किस्सा शुरू से आखिर तक कह सुनाया। आप भी सुनिये लेकिन संक्षेप में।  

"उस दिन " राधा की होने वाली ससुराल का पूरा कुनबा आया, सास, ससुर,  उनके दोनों सुपुत्र, तीन सुपुत्रियाँ अपने पति-बच्चों समेत. वे लोग आये, लेकिन राधा की माँ ने उनमे से किसी से भी बात नहीं की, पानी तक नहीं पूछा, वे लोग काफी देर रुके, लेकिन ना माँ ने और ना राधा के पिता ने उनसे एक बार भी बात की. राधा ने ही उन्हें खिलाया पिलाया (बड़ी मिन्नतें मनुहार करके ). जाते जाते परिवार के मर्दों ने यही कहा कि उन्हें क्या अपमानित करने के लिए बुलाया गया ? औरतों का रुख फिर भी थोडा सहानुभूति का था. यहाँ तक आते आते राधा का रोना शुरू हो गया, उसने किस्मत को कोसा, अपने नसीब को, अपनी माँ को भी. हमारी माताजी ने उसे तसल्ली दी, चाय पिलाई, बिस्कुट खिलाये, राधा जी का चित्त स्वस्थ हुआ और चुन्नी में एक गाँठ और बाँध के वो फिर से अपने काम में लगी.

लेकिन अब मामला गंभीर हो चला था. राधा की शादी तो दूर उसकी  लव स्टोरी ही खटाई में पड़ती दिख रही थी. और फिर करीब दस दिन और बीत गए,इस  बीच लक्षमण दास का कोई  फोन नहीं  आया और जब राधा ने फोन किये तो उसने ज्यादा बात ही नहीं की. राधा परेशान थी, क्योंकि लक्ष्मण अब या तो फोन उठा नहीं रहा या फिर बाद में बात करने का कह कर काट देता है..

"उसका भाई कहता है कि  ऐसी लड़की को घर में ब्याह के नहीं लाना जिसकी माँ ने हमारी इतनी बेईज्ज़ती की."  राधा उवाच।

" फिर अब लक्ष्मण क्या कहता है?" माताजी उवाच. 

"वो कुछ नहीं कह रहा, लेकिन मैंने उसे समझाया है कि शादी तो  मुझे करनी है, मैं तो तैयार हूँ ना, माँ ना माने  तो ना माने"  राधा का सोत्साह जवाब.  

"तेरी माँ क्या कहती है ?" माताजी गंभीर हो चली हैं.

"माँ तो कहती है कि  अगर मैंने उस से शादी की तो मुझसे सारे रिश्ते तोड़ लेगी और मुझे कभी घर नहीं आने देगी, मेरी बहन शोभा भी यही कहती है."  राधा की आवाज़ भी अब उदास हो गई. 

"फिर तो सोच समझ के ही कदम उठाना, अगर लक्षमण भी अपनी बात से फिर गया तो तू कहाँ जायेगी।" 

"नहीं, मुझे विश्वास है, "उसने मुझे कहा है, वादा किया है, अमावस को छुट्टी होती है, उस दिन हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे, उसने वकील से बात कर ली है … गोल बाज़ार जाकर  … " राधा फिर से सुख सपनों में खो गई.

दिन पर दिन बीते, अमावस भी आई और निकल गई पर  उस दिन राधा देर से आई  और कई दिन बाद हमने राधा को बहुत खुश देखा …मोबाइल में रेडियो फुल वॉल्यूम चल रहा था. कारण पूछने की नौबत नहीं आई, राधा धम्म से कुर्सी खींच कर बैठ गई और बोली...  " आज तो हम पिक्चर  जाने वाले थे. उसने फोन किया था दो दिन पहले कि  … वो फिल्म आई है ना आशिकी २  … वो दिखाने ले जाएगा, लेकिन आज उसके पिता जी की तबियत अचानक बिगड़ गई तो उनको लेके अस्पताल गया है, मुझे रास्ते में मिला था तब बताया।  राम करे जल्दी ठीक हो मेरे ससुर जी." 

माताजी और मैं मुंह और कान दोनों खोल कर ये सब सुन रहे थे और सोच रहे थे कि  कहानी में ये नया ट्विस्ट कैसे आ गया.  

  
 To Be Continued ...

Photo Courtesy :-- Google 


Final Part of the Story can be read Here









Thursday, 15 August 2013

चलो कही चलते हैं

ज़िन्दगी तू  मुझसे खफा और मैं तुझसे 

ज़िन्दगी तू मुझसे परेशान और मैं तुझसे 

ज़िन्दगी तुझे मैं नापसंद और मुझे तू पसंद नहीं 

ज़िन्दगी तू मेरी आकांक्षाओं, महत्वकांक्षाओ और सपनों से परेशान  और मैं तेरी लगाईं हुई बंदिशों से 

ज़िन्दगी मैं तुझसे थक गई हूँ और तू तो  जाने कब से मुझसे थक कर अपना हाथ छुड़ा चुकी है.

ज़िन्दगी  तू मेरी नित नई  इच्छाओं के कभी ना खुटने वाले खजाने से झुंझलाई हुई है और मैं तेरे मन के रीते हुए घड़े को देखकर रोये जाती हूँ.
ज़िन्दगी ना तूने मुझसे कुछ पाया और  ना मुझे कुछ दिया 

ज़िन्दगी  ना  जाने कैसे हर रोज़ हम एक दूसरे  का  साथ हँसते हँसते  निभाये जा रहे हैं 

ज़िन्दगी हर रोज़ तू उसी पुराने रास्ते पर मुझे उठाये ले चलती है और हर सुबह मैं एक नए रास्ते की तलाश में अलग अलग दिशाओं में भागती  जाती हूँ  … लौट आने के लिए उसी पुराने रास्ते पर.

ज़िन्दगी तू मुझसे खफा और मैं तुझसे  फिर भी हम चले जा रहे हैं एक साथ, एक ही रास्ते पर अलग अलग मंजिलों की तरफ  ….  जानते  हुए कि रास्ते का अंत नहीं और मंजिल का कोई नाम कोई ठिकाना नहीं फिर भी हम चले जाते हैं।


Friday, 19 July 2013

उस पार --- भाग 2

  हालांकि ये   स्थिति भी ज्यादा देर  तक  नहीं  ठहर सकी .. उसने  खुद को एकबारगी फिर से फूलों की टहनियों और उस खरगोश की तलाश में व्यस्त कर लिया। पर जाने क्यों वो उत्साह अब मंद पड़  गया था।  और तभी उसकी आँखें जा टिकीं उस "फूल" पर .. वही जो झील में था .. अब भी वहीँ था .. उसे वो फूल चाहिए था ..बस चाहिए था .. लेकिन कैसे मिले .. दूर था .. "उह्ह किसे परवाह है .. मुझे चाहिए बस " .. उसने सोचा। 

उसने यहाँ वहाँ देखना और  तलाशना शुरू किया शायद कुछ   मिल जाए .. थोड़ी देर बाद उसे किसी पेड़ की एक टूटी  हुई लेकिन कुछ लम्बी टहनी या डाल  जैसा मिल गया .. "शायद ये  काम  कर जाए". 

उस टहनी को थामे वो पानी में उतरी .. पानी ठंडा था, इसके अलावा झील की तली काफी चिकनी और फिसलन भरी भी  थी .. इसलिए वो धीरे धीरे सावधानी से कदम बढ़ा रही थी .. और अब काफी हद तक पानी के भीतर थी। वो सब फूलों के गहने, जो उसने पहन रखे थे, अब धीरे धीरे ढीले होकर खुलने लगे थे और पानी की सतह पे बिखरने लगे थे  सिर्फ वो फूलों का ताज उसके सर पर  अभी  तक खिला  हुआ था लेकिन उसने खुद ही उसे हटा  दिया। अचानक से उसे  कुछ महसूस हुआ ... ठंडा पानी .. जिसकी  छुअन बेहद रहस्यमय थी ..एक मदहोश कर देने वाला नशा उस पर छा  रहा था .. उसने खुद को खो जाने दिया .. उस जादुई लम्हे और उस अलौकिक अनुभव में .. गहरे तक डूब जाने दिया खुद को  ..पानी जैसे उसके शरीर की बाहरी परत को भेदता हुआ अन्दर तक समा रहा था .. उसकी आत्मा को भिगो रहा था ..कुछ वक़्त  तक  वो ऐसे ही रही .. पानी में ..  उस वजह को भी भूल गई जो (फूल) उसे यहाँ पानी के भीतर लेकर आया था .

कुछ देर बाद अचानक जैसे वो नींद से जागी .. एक ख्याल उसके दिमाग में आया और उसे थोडा डर  लगा .. वो उस जादुई दुनिया से बाहर निकल आई .. उसने अपने होश संभाले और एक बार फिर  से उस फूल की तरफ देखा .. धीरे से .. ध्यान से उसने अपने हाथ में थामी हुई टहनी को आगे बढाया और उस फूल को उसके डंठल के साथ खींचा .. दो चार कोशिशों  के बाद उसने फूल को अपनी तरफ खींच लिया और डंठल समेत तोड़ भी लिया और फिर वो झील से बाहर निकल आई।


वो फूल, दुसरे आम फूलों से कुछ ज्यादा ही बड़ा था .. उसकी खुशबू , लड़की के मन मस्तिष्क पर छाने लगी थी या शायद अब भी वो उस रहस्य के आवरण में खोई हुई थी,  उसे महसूस  कर रही थी । उसने  अपने बालों का एक ढीला सा जूडा सा बनाया और वो फूल उसमे लगा दिया ..और फिर दुबारा झील की तरफ गई .. झील के आईने में खुद को देखा .. फूल उसके बालों में बेहद खूबसूरत लग रहा था या  ये महज़ उसकी कल्पना थी जो उस फूल को  और उसे भी  खूबसूरत बना रही थी ? उसे मालूम नहीं था   

और तभी एक बार फिर से उसने वो खरगोश देखा .. पेड़ के पास जाने क्या कर रहा था .. दोनॊ को एक एक दूसरे की उपस्थिति का पूरा अहसास था और दोनों एक दूसरे से कभी नज़रें मिलाते तो कभी नज़रें चुराते .. लड़की मुस्कुरा रही थी और खरगोश  अपनी चमकीली आँखें झपका रहा था। कुछ देर  बाद  खरगोश  पेड़ों के एक झुरमुट की और भाग चला .. जिज्ञासा,  लड़की को खरगोश के पीछे ले गई .. उस झुरमुट के अन्दर .. 

और क्या था वहाँ  .. वहाँ तीन चार खरगोश और भी थे।  उसने अपने चारों और देखा और उसका चेहरा चमक उठा बच्चों जैसी ख़ुशी और उत्साह से .. एक बार फिर से उसके मन  मस्तिष्क और उसकी आत्मा  झूम उठी उस नज़ारे को देखकर, भूल गई कि थोड़ी देर पहले क्या था, क्या नहीं था ..  और फिर अगले कुछ ही क्षणों में लड़की ने उन नर्म नाजुक छोटे दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर दिया या उन्होंने उसका हाथ थाम लिया,  कह पाना मुश्किल है .. लेकिन इतना ज़रूर था कि  एक दुसरे का साथ उन्हें बहुत पसंद आ रहा था और वो उसका पूरा मज़ा ले रहे थे। कुछ घंटे और बीत गए .. वो भूल गई, समय को, समय के बंधनों को और शेष जगत को .. यहाँ तक कि  उसे नींद आ गई .. नींद में उसे ख्वाब आ रहे थे .. ख्वाब "उस पार" के, ख्वाब परछाइयों के, प्रतिबिम्बों के और हाँ खरगोशों के भी। 

अचानक एक तेज़ आवाज़ ने उस जगह की खामोशी को तोडा .. कोई पुकार रहा है .. वो जाग गई ..  

"ये किस  किस्म का शोर है?" वो बुदबुदाई और झील की तरफ  लौटी। 

वो लड़का, वोही .. यहाँ वहाँ घूम रहा था .. सब तरफ उसका नाम पुकारता ढूंढ रहा था .. 

"जून .. जून .. कहाँ हो तुम ?" 

वो उसे वापिस आया  देख कर हैरान थी .. कुछ देर यूँही खामोश खड़ी  रही और उसकी हरकतों को देखती रही। 

आखिर लड़के की नज़र उस पर पड़ी .. " तो तुम यहाँ हो " .. लड़का उसे देख कर खुश था ... हालाँकि वो हांफ रहा था लेकिन एक बड़ी सी मुस्कान उसके चेहरे पर बिखर गई। लड़की ने इसे देखा, समझा और  उसकी तरफ बढ़ आई .. वो अब भी उसे आश्चर्य से देख रही थी। 

"कुछ बोलो ना .. मैंने तो सोचा था कि  तुम अब तक जा चुकी होंगी लेकिन देखता हूँ कि  तुम अब भी .."

"हाँ मैं यहीं थी .." लड़की ने धीरे से जवाब दिया। लड़के ने उस अनकही ख़ुशी को और उस छुपाये गए उत्साह  को देख लिया था ..जान लिया था, समझ लिया था जो उसके शब्दों के पीछे से झाँक रहा था। 

"तो तुम वापिस कैसे आ गए .. मैंने सोचा था कि  तुम चले गए हो, तुम्हारे लोग तुम्हे बुला रहे थे ना .."


"हाँ, कुछ काम था, पर मैंने कर लिया और वापिस आ गया .. ये देखने कि  क्या तुम अब भी यहीं हो या .."  अब उसकी साँसे सामान्य होने लगी थी। 

वो उसके शब्दों को गौर से सुन रही थी ..

"तो क्या कर रही थी तुम इतनी देर  तक ..और डर  नहीं लगा तुम्हे". 

"डर  किस बात का ?" 

"ये जगह, बिलकुल अकेले .."  लड़के ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया और अचानक जोर से चिल्ला कर पूछा ... "वो सारे फूल कहाँ गए?" 

पहले तो वो हंसी,  फिर थोडा रुक कर उसने कहा .. " चले गए, खो गए". 

"खो गए?? कहाँ?"  वो कुछ समझ नहीं पाया .. हज़ारों ख्याल उसके मन को झिंझोड़ने लगे। 

लेकिन लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी, उसकी आँखें एक रहस्यपूर्ण  तरीके से चमक  रही थी, कुछ देर तक खामोश रही वो जैसे कोई बड़ा राज़ छुपा रही हो, फिर एक बार  खिलखिलाई और उसने वही जवाब दोहरा दिया .. " खो गये." 

लड़का अब् भी  उलझन में था .. कुछ पूछना चाहता था लेकिन जानता नहीं  था कि  कैसे पूछे ..

"क्या तुमने इसे नहीं देखा ?" लड़की ने अपने बालों में लगे फूल की तरफ इशारा किया .. उसका चेहरा अब एक विजेता के जैसी ख़ुशी से दमक रहा था।  एक पल को लड़का कुछ समझ नहीं पाया लेकिन फिर अगले ही क्षण उसने झील की तरफ देखा (झील ज्यादा दूर नहीं थी ) और फिर उस फूल की तरफ .. .

"तुमने ये कैसे किया .."? लड़के की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गई। 

वो मुस्कुराई .. "बस कर लिया ... मैं पानी में गई, और फूल को एक  टूटी टहनी की मदद से तोड़ लिया।"  वो  ऐसे  बता रही थी  जैसे कोई छोटा बच्चा स्कूल में  होमवर्क के लिए मिली तारीफ़ के बारे में बता रहा  हो।     

  "तुम पागल हो हो ..?? पानी में गई !!!!!!!!!!!!"

"हाँ .." उसने लापरवाही से जवाब दिया।

"तुम पागल हो, बिलकुल पागल. ये  खतरनाक हो सकता था .. तुम जानती नहीं क्या ?"

" ऐसा कुछ भी नहीं था,  ना तो ये कोई बड़ा खतरनाक  काम था और ना ही इसमें कोई परेशानी लगी।" 

लड़की की आवाज़ में एक लापरवाही और उपेक्षा सी थी उसके सवालों के लिये. और शायद इसलिए, लड़के ने कहे गए शब्दों से कहीं  ज्यादा सुना और जितना उसके कहने का अर्थ था उस से कहीं  ज्यादा समझा भी. और अब लड़के का उत्साह और ख़ुशी जो उस से  मिलने पर  था, अब फीका पड़ने लगा. 

लेकन इस सबसे बेखबर वो अब फिर से पेड़ों के झुरमुट की ओर  जा रही थी।     

"अब तुम कहाँ जा रही हो?" वो अब भी उलझन से घिरा था। 


"मैं ... मैं वो ..मैं तुम्हे कुछ दिखाना चाहती हूँ ..चलो .. चलो ना ".

लड़के ने हालाँकि आगे कुछ नहीं पूछा और वो उसके पीछे चलता गया लेकिन अब दिल में एक भारीपन था. और अब वो दोनों झुरमुट के पास थे. लगा जैसे लड़की थोड़ी निराश सी हुई हो, खरगोश और उनका कोई नामोनिशान आस पास नहीं था। 

"वो खरगोश कहाँ गए?" 

"कौनसे खरगोश?"

"यहीं तो थे, उन्ही के साथ तो मैं पूरा वक़्त खेल रही थी जब तुम यहाँ नहीं थे".  

अब लड़का थोडा और हैरान परेशान हो गया .. "मैंने तो यहाँ कभी कोई खरगोश नहीं देखे." 

'पर वो यहीं थे ..अच्छा  चलो रहने दो .. ज़रा इसे देखो  तो .." 

लड़की अब एक बड़े से  बरगद के पेड़ की तरफ गई और पेड़ से लटकती उसकी लम्बी जड़ों के एक जोड़े को थाम लिया, जो बिलकुल एक कुदरत के बनाये झूले जैसा लग रहा था। वो उस पर बैठ गई और धीरे धीरे झूलने लगी .. झूला गति पकड़ने लगा .. ऊपर उठता हुआ और फिर नीचे आता हुआ ..

"अरे, ध्यान से, कहीं गिर ना जाओ". लड़का परेशान था।

लड़की हंसी .. और उस लम्हे में लगा जैसे कोई झरना बह निकला  हो ... ऊँचे पहाड़ों से गिरता हुआ .. आश्चर्य के साथ लड़का उसे फिर से देख रहा था .. " तुम पागल हो .."


झूले की गति अब काफी बढ़ गई थी पर जैसे इतना काफी नहीं था .. लड़की ने अब उन टहनियों के झूले को गोल घेरे में घुमा के झूलना शुरू किया  और लड़का अब पूरी तरह अचंभित था .. उस लड़की की हंसी और उमंगें जैसे हवा में चुम्बकीय तरंगें पैदा कर रही थी और हर उस चीज़ को अपने में समाती जा रही थी जो वक़्त के उस लम्हे में, धरती के उस टुकड़े पर मौजूद था। लेकिन लगता नहीं था कि  लड़की को इस सबका भान था, वो तो सिर्फ झूलने का आनद ले रही थी। लड़के ने महसूस किया वो अपनी आँखें नहीं हटा पा रहा उस से .. उस लड़की से .. या शायद वो हटाना ही नहीं चाहता .. जो भी था .. लड़की ने इस बात को समझ लिया। 

लड़की ने उसकी आँखों को देखा .. उनमे लालसाएं थीं, आकांक्षाएं थीं, महत्वाकांक्षाएं थी, अपेक्षाएं थीं और … और बहुत कुछ  था … और उसकी आँखों में लड़के ने एक  सपना देखा जो झिलमिलाते हुए पर्दों के पीछे छिपा था . वो आगे बढा … 

"तुमने अभी तक मेरा  नाम नहीं पूछा". 

"मैं जानती हूँ तुम्हारा नाम ।" एक और बेपरवाह जवाब. 

" तुम जानती हो !!!!!!!!!!!!,  लेकिन  मैंने तो  तुम्हे नहीं बताया, फिर कैसे । कैसे तुम जानती हो ?"  लड़का अब उसके ठीक  सामने आकर खड़ा हो गया. 
  
"क्या …"  एक क्षण के लिए उसकी हंसी रुक गई और वो निरुत्तर हो गई. 

लड़के ने अपना सवाल दोहराया … लड़की की मुस्कान फिर से लौट आई. दूर अज्ञात क्षितिज को देखते हुए उसने कहा …

" तुम्हारा नाम छलावा  है … तुम्हारा नाम है सतरंगी आभास, भ्रम, तृष्णा … "

लड़के ने झूले को कस कर पकड़ लिया और उसकी तरफ देखने लगा  लेकिन लड़की ने  कोमलता से उसका हाथ हटाया और रुक चुके झूले से उठ खड़ी हुई. 

लड़का खामोश था लेकिन शायद कुछ  कहना चाहता था. 

लड़की ने सुन लिया … वो मुड़ी … लेकिन ये क्या … 

हर चीज़ … उसके चारों ओर, वो लड़का … सब कुछ एक भंवर में समाता और गायब होता जा रहा था.  वो डर कर चीखी … उसने अपना हाथ आगे बढाया शायद कुछ थामने के लिए या पकड़ने के लिए … लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. 


"रुकॊऒऒओ … " उसकी साँसे तेज़ तेज़ चल रही थी पसीने से नहा  गई थी वो. 

" बिटिया, सोना … क्या हुआ  … कुछ नहीं बस एक बुरा सपना ही था, शांत हो जा".  ये उसके माता पिता थे.   

और तभी उसके सेलफोन की रिंग टोन बज उठी … "छोटी सी कहानी से बारिशों के पानी से सारी वादी भर गई … " 






Sunday, 2 December 2012

ज़िन्दगी आधी हकीकत आधा फ़साना : अंतिम भाग



घर, मम्मी पापा,  ऋचा,  दोस्त ....और फिर .. 

और फिर .. वही चौराहा ..वे भिखारी .. और फिर यहाँ  ये आश्रम की दुनिया .. 

अपना मन पढने की कोशिश कर रहा है वीरेन, क्यों आया था यहाँ .. क्या हासिल करने .. क्या साबित करने ? किसको दिखाने बताने या साबित करने के लिए ?  क्या सच में सिर्फ सत्य की तलाश या संसार से वैराग्य या फिर  उस के बहाने अपनी ही  कोई  कमी या दुःख जिसे ढकने या छिपाने के लिए वो यहाँ चला आया ..याद आया वीरेन को, किस तरह अपने मन की कुंठा, हताशा, डर और उलझनों को दूर हटाने के लिए, उनसे जीतने के लिए वो आश्रम जाकर धर्म और भगवान् के साए में छिपने की कोशिश करता था।  

सबसे दूर जाने की कोशिश में "सब कुछ" के कितना पास आ गया। 


 उसे महसूस हुआ कि  दुनिया को मोक्ष या  अध्यात्म का रास्ता दिखाना उसकी ख्वाहिश नहीं थी .. लोगों को ज्ञान देना भी उसका शौक नहीं था .. ना उसे कोई साधु  या महात्मा या संत जैसा कुछ बनना था, जिसने अपने लिए वैराग्य और ईश्वर  की आराधना, पंथ का प्रचार .. इस सब को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लिया है।  लोगों के आंसू पोंछने या उनके दुखों को दूर कर सके ऐसी उसके पास कोई जादू की छड़ी भी नहीं है और ना वो खुद को उसके काबिल समझता है।  तो फिर क्या करने आया था यहाँ .. "दुनिया से भागने .. अपना मुंह छुपाने" .. स्वामी अमृतानंद के शब्द कानों में गूंजने लगे .. "हमारा आश्रम दुनिया से भागने वालों के लिए सर छुपाने की जगह नहीं है".  त्याग-तपस्या-संयम-परमार्थ .. सब अचानक कोरे शब्द बन गए।     एक बार फिर वीरेन आईने  में खुद को तलाश कर रहा है।  

अपने लिए शांति तलाश कर रहा था, मन का सुकून जो खो गया गया था .. उसे फिर से पाने के लिए .. अन्दर एक प्यास थी जो रेगिस्तान की तरह फ़ैल रही थी उसे बुझाने, शांत करने के लिए आश्रम जाता था वीरेन .. दिन  वहाँ बैठा रहता था कि जो शांति बाहर कहीं  नहीं  है वो शायद आश्रम की चार दीवारों के भीतर  और इन  तस्वीरों से छनकर आती रौशनी के ज़रिये उस तक पहुँच जाए ..

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वीरेन एक बार फिर स्वामी प्रकाशानंद के सामने खड़ा है .. वातावरण काफी शांत और थोडा बोझिल है। 

" ..तो अब क्या चाहिए ?" स्वामी प्रकाशानंद कुर्सी पर बैठे, कोहनी टिकाये, कहीं खाली दीवार को देख रहे थे या सोच रहे थे .. वीरेन को पता नहीं ..  

"इजाजत". 

"तुम हमारी मर्ज़ी से आये नहीं थे ...अपने मन से आये थे और अपने मन से जा भी रहे हो .. तुम इस जगह के लिए नहीं बने वीरेन ..यही नाम है ना तुम्हारा।"  (आज पहली बार पंथ में दीक्षित होने के बाद स्वामी जी ने उसे  "वीरेन" कह कर बुलाया था वर्ना हमेशा राम ही कहते रहे ) 

"मैं मानता हूँ कि  मैं आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा और मेरे कारण आश्रम को काफी शर्मिंदगी भी झेलनी होगी" ..वाक्य अधूरा रह गया .. स्वामी प्रकाशंद ने एक हाथ उठा कर उसे रोका ...      

"नहीं वीरेन, कैसी शर्मिंदगी, हमारा पंथ और इसके आदर्श  दुनियादारी की इस निंदा स्तुति से बहुत ऊँचे हैं ..हमने यहाँ लोगों को खुश रखने के लिए दूकान नहीं सजा रखी  है कि  उनके कहे सुने की परवाह करें .. तुम्हारे जाने से हमें फर्क नहीं पड़ेगा .. तुमसे बेहतर और तुम जैसे हमारे पास और बहुत साधू साध्वियां हैं जो पूरे समर्पण और श्रद्धा से पंथ को आगे बढ़ा रहे हैं ...लेकिन तुम्हारा भटकाव तुम्हे अभी और कहाँ कहाँ ले जाएगा ये मैं नहीं जानता .. हाँ तुम्हे और तुम्हारे उद्देश्य को परखने में हमने भूल की .. स्वामी अमृतानंद ने भूल की .. पर यही विधि का लेखा था ..पर अब तुम जाओ .. अपना रास्ता तलाश करो .. " 

उन्होंने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठा दिया .. वीरेन उनके पैरों पर झुका .."भगवान् तुम्हें शांति और सदबुद्धि  दें" .

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मनाली ... 2 साल बाद 

"ये हमारा ब्लूप्रिंट है इस पूरे प्रोजेक्ट का ... एक  IT सेण्टर,  एक Geo -Thermal  एनर्जी प्लांट, एक कम्युनिटी सेंटर  और हाँ एक स्कूल।"

"सर, मिस्टर बैनर्जी आज आ नहीं पाए हैं इसलिए उनकी जगह उनके असिस्टें

ट वीरेन सिंह  आपको आईटी सेण्टर के प्लान की प्रेजेंटेशन देंगे।" 

वीरेन अब घर लौट आया है ...ज़िन्दगी अब एक नए रास्ते पर चल रही है, एक नई  पहचान, एक नए उद्देश्य और एक नए सपने के साथ ...  मंजिल अभी भी अनजानी है, दूर है पर अब मन आज़ाद पंछी है .. जिसके मज़बूत  पंखों  की उड़ान अभी बस शुरू ही हुई है। 


   Image Courtesy : Google

 3rd Part of the Story is Here

Wednesday, 28 November 2012

ज़िन्दगी आधी हकीकत आधा फ़साना : भाग 3


पर अब जो आदेश आ गया है तो जाना ही है ... आखिर यही तो मूल आधार है इस पंथ का, उनके संगठन की मजबूती का ... आदेश की पालना हर हाल में, बिलकुल फौजी अनुशासन .. 

अब वीरेन को भेजा गया रायगढ़, उड़ीसा का एक शहर .. इस जगह का कभी नाम भी उसने नहीं सुना था पर अब वहाँ आश्रम है और आध्यात्म की रौशनी को इन धुर आदिवासी इलाकों तक ले जाना ही है ... शुरू में सामंजस्य बिठाने में दिक्कत आई .. भाषा और उसका बोलने का लहजा बिलकुल अजनबी, फिर यहाँ आकर तो ऐसा लगा कि  सचमुच भारत के किसी दूरस्थ कोने में आ गए हैं .. जो ना पूरी तरह शहर है और ना गाँव .. काफी पुराना पर अब नया बनने  का प्रयास करता हुआ .. अपने पिछले अनुभव से वीरेन  ने काफी कुछ   सीख लिया था .. उसे पता था कि अलग अलग  लोग उसे देखकर, उसके तौर  तरीके देखकर कैसी प्रतिक्रियाएं देंगे।  और इस बार वो रमण भाई जैसे लोगों के लिए भी मानसिक रूप से तैयार ही है। 

आते ही पहला काम उसने  सेवा समिति के सदस्यों   से मिलने का किया, मालूम पड़ा कि  यहाँ समिति उतनी सक्रिय और मज़बूत नहीं, ज़रूरत मुताबिक़ कुछ लोगों को बुला लिया जाता है काम करवाने या हाथ बंटाने के लिए और उनमे भी जो आ पाएं। ये स्थिति वीरेन को मनमाफिक लगी , न किसी का बेवजह दखल और ना कोई नियंत्रण। चटपट उसने अपनी तरफ से  सेवा समिति  बना ली ..जिसमे रोज़ आने वाले कुछ लड़के शामिल थे और कुछेक ऐसे उम्रदराज लोगों को रखा गया जो सक्रियता से काम कर सकें।  शुरुआत बढ़िया हुई, रोज़ के कामों के लिए अलग अलग लोगों को नियत कर दिया गया कि  कौन  क्या सेवा संभालेगा  .. पंथ के कुछ पहले के महात्माओं की पुण्यतिथि के लंगर और  कुछ त्योहारों के प्रीतिभोज को सुव्यवस्थित तरीके से संभाला गया .. ऐसा लगा कि  उस छोटे से आश्रम में वीरेन ने जान फूंक दी है .. लड़कों का उत्साह बढ़ा और  उनका आश्रम आना भी .. बड़े बुजुर्गों को और कुछ नहीं तो छोटी उम्र के इस नए साधु का सबको साथ लेकर चलना ही अच्छा लगा .. औरतें तो खैर उसकी कम उम्र देख के ही अगाध श्रद्धा से नतमस्तक हो लेतीं।  यहाँ का माहौल गुजरात से बेहतर है, ऐसा वीरेन को .. ओह नहीं, राम को लगने लगा था ..

"ये भी कोई तरीका है काम करने का .. जो अनुभवी बुजुर्ग हैं उनको एक किनारे कर के ये लड़के दोनों वक़्त आरती के समय और बाकी कामों में भी  हुडदंग मचाये रहते हैं .. ना किसी से व्यवहार की तमीज है ना बड़ों का सम्मान।"

"सब राम दादा की मेहरबानी है  जो इन लडको को इतना  चढ़ा रखा है .. अब कौन कहे .."

"अभी चन्द्रदर्शन वाले  दिन जो प्रीतिभोज हुआ था उसमे और उसके पहले जो  तीन दिन का विशेष सत्संग कार्यक्रम था उसकी तैयारियों में ही कौनसी हमारी सलाह ली या बुलाया ... ये लड़के ही सब कर लेंगे".


"मेरी समझ में नहीं आता कि  ये सोमेश्वर अंकल हर काम में दखल  क्यों देते हैं .. हर बात में इनकी सलाह लेना ज़रूरी है क्या ? हर बात में टोकते रहेंगे .."

"अरे इनको अब कोई काम तो है नहीं, घर पर फ्री बैठे रहते हैं .. और इनके अलावा बाकी लोग, ये किशनदास, रामसुख जी और इनका पूरा ग्रुप .."

दो महीने बीते और आश्रम अच्छा खासा जोर आज़माइश का मंच बन गया .. लड़कों को बुजुर्गों का कहा सुना पसंद नहीं और बुजुर्गों को  अपना थोडा सा भी महत्व कम होना पसंद नहीं ..

खैर गलती थोड़ी वीरेन की भी है ही .. उसे अपनी उम्र के लडको का साथ ज्यादा सुविधाजनक लगता है, उनको समझाना या किसी काम के लिए कहना बजाय  अपने से कहीं बड़े उम्रदराज लोगों को कुछ समझाना ... पर अब खींचातानी रोज़ का किस्सा बन गई , आरती का थाल  उठाने से लेकर साफ़ सफाई तक के छोटे मोटे कामों में भी बहस होने लगी ... सही गलत, ठीक से नहीं करते, आश्रम के गेट पर खड़े ये लड़के क्या करते हैं, लोगों को परेशान कर रखा है वगैरह वगैरह .. अब तो हाल यहाँ तक पहुँच गया कि  कुछ प्रौढ़ लोगों ने तो नियमित आना भी छोड़ दिया ..


साल भर तक वीरेन मदारी की तरह रस्सी पर संतुलन साधने की कोशिश करता रहा उसकी समझ में नहीं आता था कि आखिर इतनी छोटी मोटी  चीज़ों के लिए लोग इतना क्यों झगड़ रहे हैं।। क्या फर्क पड़  जाएगा अगर आरती का थाल इसने या उसने उठाया  या वो नहीं उठा सका .. या कौनसा आसमान  टूट पड़ा अगर रसोई में प्रसाद की ज़िम्मेदारी किसी को मिली या किसी को ना मिली। पर इन सब फालतू मसलों  का हल कभी नहीं निकला ... आखिर उसने खुद ही स्वामी प्रकाशानंद से कहकर रायगढ़  से पिंड छुड़ाया ..

अबकी बार उसे छः छः महीने के लिए दो तीन आश्रमों में भेजा गया .. वहाँ उन शहरों में आश्रम की नई  इमारतों  का निर्माण चल रहा था या फिर पुरानी  वाली का रेनोवेशन .. और वीरेन को इसमें super-wiser  की ज़िम्मेदारी संभालनी थी .. स्वामी प्रकाशानंद  का ख्याल था कि  वीरेन की इंजीनियरिंग की डिग्री और आर्किटेक्चर में उसकी दिलचस्पी इस काम  के लिए बिलकुल उपयुक्त ही है और उनको लग भी रहा था कि  वीरेन अभी तक खुद को नए माहौल और एक पूरे आश्रम को संभालने की  गुरु गंभीर ज़िम्मेदारी के लिए तैयार कर नहीं पाया सो उसके लिए इस तरह के काम फिलहाल के लिए ठीक रहेंगे।     उम्मीद के मुताबिक़ वीरेन ने काम संभाला भी ..और सच में उसे लगा कि  ये काम उस अध्यात्म की रौशनी फैलाने वाला या पथ प्रदर्शक की भूमिका वाले काम से तो बेहतर है। स्वामी जी ने उसे बताया  भी था कि  इस तरह के निर्माण और रेनोवेशन के काम तो हमेशा किसी ना किसी शहर में चलते ही रहते हैं .. तो वीरेन को इसमें अपने लिए  अच्छी  खासी गुंजाइश दिखी .. पर अभी इस ख्याली पुलाव का चूल्हा जलना बाकी था ..


रेनोवेशन का काम पूरा हुआ और नई इमारत  के उदघाटन के लिए  आश्रम की एक वरिष्ठ साध्वी को बुलाया  जाना तय हुआ। उनको दो दिन रहना था और इस पूरे आयोजन की व्यवस्था के लिए कुछ लोगों को आश्रम के मुख्यालय से भेजा गया। वे आये  और बाकी सारे काम खुद संभाले, वीरेन को एक अलग ही ज़िम्मेदारी दे दी। कुछ रसीद बुक दी गई कि  इनके ज़रिये श्रद्धालु लोगों से चंदा लिया जाए और फिर हर रसीद बुक का नकद सहित हिसाब वहाँ से आये एक साधु  को देना होगा।  वीरेन ने सेवा समिति के कुछ लोगों को, जिनके लिए लगता था कि   ऐसा "वसूली" का काम वे कर सकते हैं, और जो पहले भी ये काम कर चुके थे,  उनको रसीद बुक थमा दी।  काम शुरू भी हो गया, चंदे की रकम के बारे में काफी उत्साहजनक खबरें भी मिलने लगीं।


आखिर उदघाटन  का आयोजन हुआ और पूरी भव्यता से हुआ .. दो दिन में जाने कितने सौ या हज़ार लोग आये, कितनी रसीदें बनी .. वीरेन को हिसाब करना ही मुश्किल हो गया।  आयोजन ख़त्म होने के बाद उसने उन रसीदों का हिसाब सेवा समिति वालों से  माँगा , लेकिन उल्टा जवाब आया कि  इसका हिसाब  तो सीधे  ही स्वामी निरंजन को दे दिया गया .. पर वीरेन का दिमाग संतुष्ट नहीं हुआ .. "निरंजन तो  समारोह के अगले दिन दोपहर तक लौट गया फिर इन लोगों ने हिसाब कब दिया .. इतना कैश कैसे और  कब  ले जाया गया" .  निरंजन को फोन करके पूछा तो जवाब आया कि  ..." अरे उन सबको  कह दिया है  कि  वे लोग इस पैसे को सीधे आश्रम के बैंक अकाउंट में जमा करवा दें .. अब तुम सोचो राम,  वक़्त कहाँ था  इतनी सब रसीदों  का हिसाब किताब देखने  का ..."

"पर मुझसे कहते तो मैं ही देख लेता "

"अरे रहने दो, क्यों बेकार अपना दिमाग खपाते हो, ये सब लोग हर बार ही ऐसे समारोहों में चन्दा इकट्ठा करते हैं, अपने आप करा देंगे ज़मा।"

वीरेन अब भी निश्चिन्त नहीं हुआ ..पर सावधानी बरतते हुए उसने समिति के एक सदस्य से उन रसीदों और चन्दे की रकम के बारे में पूछा  और पता चला ... "इन रसीदों का कभी कोई पक्का हिसाब नहीं लिया जाता, चंदा इकट्ठा करने वाले एक मोटा मोटा आंकड़ा बता देते हैं निरंजन जी को या और किसी को इसके आगे कोई ज्यादा पूछताछ नहीं होती ... कभी पैसा इकट्ठा करने वाला बैंक में जमा करा देता है तो  कभी यहीं आश्रम की पेटी में डाल  देते हैं तो कभी ..." आगे का वाक्य जान बूझ कर अधूरा छोड़ दिया गया। फिर कहने वाला कुछ संभला और अपनी बात पूरी की ... "वैसे जो लोग चन्दा इकट्ठा करते हैं वो सब स्वामी निरंजन के अच्छे परिचित है .. सब जिम्मेदार लोग ही हैं।"

वीरेन को कुछ समझ आया और जो कुछ ना समझ आया तो उस पर विश्वास भी न आया कि  भगवान् के दरवाजे पर तो कोई ऐसा धोखाधड़ी या कपट नहीं कर सकता।
फिर उसे याद आया, जगदलपुर के दिनों की एक घटना, जब गुरुपूनम की  वार्षिक सेवा  ली जा रही थी और उसे निर्देश मिले  थे कि जो लोग लम्बे समय से काफी कम अंशदान दे रहे हैं, उन्हें उनका अंश बढाने के लिए "प्रेरित" किया जाए और "सेवा" की राशि  को बढाने के प्रयास किये जाएँ। और उसी "प्रेरणा" वाले काम के दौरान एक दिन सत्संग ख़त्म होने के बाद एक उम्रदराज आदमी जिसकी उम्र शायद 60 पार रही होगी ... रुक गया .. कुछ कहना था उसे ..

"राम दादा, आपसे एक बात कहनी थी, थोडा समझने की कोशिश करिए, मैं रिटायर हूँ, पेंशन मिलती है, मेरा और मेरी बीवी की दवाइयों का खर्चा ही भारी पड़ता है .." वीरेन कुछ समझ ही नहीं पा रहा था कि  मामला क्या है ..." मैं ये बढ़ी  हुई सेवा का पैसा नहीं दे सकूंगा, इसे कुछ कम कर दें .. वैसे भी मैं और मेरी बीवी अलग अलग चंदा और उसके अलावा भी कई तरह की सेवा तो देते ही हैं".

वीरेन उस झुर्रियों भरे, उम्र के असर से थके  और बोझिल  चेहरे को देखता रहा .. उसकी आवाज़ में झिझक, मजबूरी और  अपनी असमर्थता को छुपा ना पाने की लाचारी .. सब कुछ साफ़  सुनाई पड़ता था .. वीरेन ने उसकी बात मन ली और आगे से उसे किस तरह की सेवा के लिए ज्यादा कुछ कहना या किसी तरह की बढ़ोतरी के लिए "प्रेरित" करना का इरादा भी छोड़ दिया।  और वो अकेला ही क्या ऐसे और भी कई परिवार थे जिनको प्रेरित करना वीरेन को अपने बूते के बाहर लगा ..


कुछ और महीने ऐसे ही इस उस आश्रम में भटकते हुए गुज़रे .. फिर दिवाली के त्यौहार पर उसे आश्रम मुख्यालय  पर बुलाया गया ..  अकेला वीरेन ही नहीं, उसके कई और संगी साथी, नए-पुराने , वरिष्ठ-कनिष्ठ, अनेक  साधु -महात्मा भी वहाँ आये, ये एक साधारण सा रिवाज था कि आश्रम के  हर एक साधू को (औरत या मर्द) सभी को साल में कम से एक बार तो यहाँ आना ही होता था .


यहाँ वीरेन को ऐसा लगता  है जैसे भटकता हुआ  मन  किसी ठिकाने पहुँच रहा हो .. वहाँ सब अपने जैसे ही लगते हैं (या शायद सब एक दुसरे से अलग हैं)
एक दोपहर सब लोग थोड़ी फुर्सत में थे।  हर कोई अपने अलग अनुभव बता रहा था .. पर अचानक एक विषय छिड़ गया जिसमे सबकी एक सी  दिलचस्पी नज़र आई .. मुद्दा था ..  आश्रमों का मासिक और वार्षिक revenue ..और उसे बढाने या नई  ऊँचाइयों तक ले जाने में उन सबका योगदान .. निश्चित रूप से कई लोगों के पास बताने के लिए काफो अच्छे आंकड़े थे .. लेकिन वीरेन को इसमें कुछ भी समझ नहीं आया, वो उठा और सीधा गया स्वामी प्रकाशानंद से मिलने। जिन्होंने अपने व्यस्त रूटीन के बावजूद उसे बुला लिया।

"हम क्या बनिए हैं या गल्ले के व्यापारी ?"
निश्चित रूप से ऐसे किसी सवाल या मुद्दे की अपेक्षा स्वामी जी को नहीं थी।


"क्या हुआ है?"

"तो फिर ये सब क्या है, हमारा काम अध्यात्म का सन्देश आम लोगों तक ले जाना है या फिर उनसे धर्म के और पुण्य के नाम पर पैसा लेना और इसी को अपनी उपलब्धि मान कर उसका बखान करना।"

स्वामी प्रकाशानंद पहले थोड़ी देर तक वीरेन  के चेहरे को देखते रहे फिर  एक गहरी नज़र से शून्य में निहारते हुए बोले .." मुझे पता है कि  सब चीज़ें, सब कुछ ठीक नहीं चल रहा हमारे यहाँ। कुछ गंभीर समस्याएं जड़ जमाने लगी  हैं। हम अपने लोगों को सिखा समझा सकते हैं पर बाहर वालों को नहीं। अपने लोगों में भी कितने हैं जो पूरे समर्पण से शब्दश: "आसन" की आज्ञा का पालन करते हैं?"

"दरअसल राम, समस्या ये है कि इतने लम्बे चौड़े संगठन को चलाने और इसकी सार सस्म्भाल के लिए पैसा तो चाहिए और वो आता भी बहुत है पर ज़ाहिर सी बात है कि  वो पैसा अपने साथ अपने सारे रंग--रूप, चाल-चलन और रास रंग लेकर आता है।  पैसा देने वाले और उसे लेने वाले, हर कोई सोचता है उसके पास कुछ पॉवर है, कुछ सामर्थ्य, कुछ उपलब्धि .... लेकिन बेटा  वो दोनों गलत हैं क्योंकि ये पैसा आता है आश्रम की सामर्थ्य के कारण, उसकी उपलब्धियों के कारण पर कई लोग ये मान लेते हैं कि  इन सब उपलब्धियों का माध्यम और आधार उनकी उपस्थिति है। उन्होंने व्यक्ति को संगठन से और साधारण मानव को एक असाधारण परम सत्ता से ऊँचा मान लिया है ... "

शायद अभी स्वामी जी और भी कुछ समझाते पर समय नहीं था उनके पास पर एक प्रश्न का समय ज़रूर था .." राम, तुम ये बताओ कि  क्या तुम अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से निभा पा रहे हो?"  जवाब सुनने का  समय नहीं था उनके पास पर वीरेन को जवाब ज़रूर चाहिए था।

क्या सोच कर आया था कि  संन्यास जीवन की दशा-दिशा सब कुछ बदल डालेगा .. और शायद ये भी सोचा था कि  खुद वीरेन भी इस दुनिया को कुछ बदल देगा या कोई ऐसी उपलब्धि हासिल कर दिखाएगा ...  " larger than Life"... जैसी। पर ऐसा तो कहीं कुछ होता नहीं दिखाई देता।  पर फिर मन को यही सोच कर तसल्ली देने की कोशिश की कि  अभी यहाँ आये वक़्त ही कितना हुआ है और फिर  वो कुछ हासिल करने नहीं  "सब कुछ" को छोड़ देने के लिए .. हर ख्वाहिश, हर लालसा को परे हटा कर, हर कामना को पीछे छोड़  कहीं आगे बढ़ने के  लिए यहाँ आया है .. कुछ पाने के लिए नहीं, सब कुछ को लुटा देने के लिए ... शायद खुद को भी मिटा कर एक  नया जीवन लेने के लिए ..

और भी बहुत सारी  ऊँची बातें वीरेन के मन में चलती रहीं।

समारोह समाप्त हुआ और अबकी बार वीरेन को फिर नई जगह भेज दिया गया। यहाँ  भी कुछ  रेनोवेशन का काम था और आश्रम भी संभालना था। वैसे ये तो नहीं  कह सकते  की सभी जगहों पर एक सा माहौल या एक जैसे ही लोग है .. सब जगह एक जैसी ही उठा पटक मची हो .. वैसा कुछ नहीं लेकिन फिर भी एक बात साफ़ दिखती है कि   अक्सर ये आश्रम या इस तरह के संगठनों की स्थानीय शाखाएं किसी एक या कुछ लोगों के लिए  अपना एक छोटा मोटा अधिकार क्षेत्र बनाने का और उसके ज़रिये अपने को सामाजिक दायरे में ऊँचा उठाने का साधन बन जाते हैं। लोग मान  के चलते हैं कि  उनके बिना या उनके कुछ किये बिना इस संस्था संगठन का काम चल नहीं सकता और इसलिए हर छोटे बड़े, मामूली, गैर मामूली काम पर अपनी पैनी नज़र और कठोर पकड़  रखना उनकी आदत बन चुका  है ..वीरेन ने अब इस पर ध्यान   देना और किसी तरह का "सुधार" या  "परिवर्तन" का ख्याल भी दिमाग से निकाल  दिया। 


इस नए आश्रम में आये भी कुछ महीने हो गए .. एकदिन किसी के घर जाना हुआ .. परिवार  के एक सदस्य को विशेष रूप  से बुलाकर वीरेन से मिलवाया गया .. एक तेईस या चौबीस साल का लड़का ... लड़के के पिता चाहते थे कि  वीरेन  उनके बेटे को आश्रम आने और इश्वर में आस्था जगाने के लिए कुछ समझाए, कुछ उपदेश ही दे .. वीरेन ने थोड़ी बहुत कोशिश की भी .. कुछ रटे  रटाये से शब्द कहे लेकिन असर हुआ ऐसा लगा नहीं .. लड़के ने आँखें नीचे कर के सुन लिया, सर हिला दिया .. जैसे इंतज़ार कर रहा हो कि  कब ये भाषण ख़त्म हो और वो पिंड छुड़ा के भागे। वीरेन ने भी इशारा समझा और अपनी बात को इतना कह कर समेटा कि  कभी वक़्त निकाल कर आश्रम आया करो और कुछ नहीं तो मुझसे मिलने ही आ जाओ।

कुछ दिन बाद वही लड़का आश्रम में दिखा, किसी के साथ आया था .. वीरेन को  लगा "भाषण असर कर गया शायद".  उसने लड़के को अपने कमरे में बुलाया .. सोचा थोडा और समझाए, कुछ ज्ञान की रौशनी उस तक पहुंचा सके। थोड़ी देर तक तो जैसे तैसे वो सुनता रहा .. फिर उसने थोड़ी तीखी आवाज़ में सवाल किया ..." आपको तो बहुत आस्था है ना इन तस्वीरों और इस भगवान् में ..आपकी हर ख्वाहिश इस दरवाजे पर पूरी हुई होगी ना ..पर मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है .. ना आस्था ना श्रद्धा .. आपके इस भगवान् ने  आज तक कभी मेरी एक बात भी नहीं सुनी .. मेरी तो आवाज़ भी कभी इसको सुनाई नहीं देती होगी ... वक़्त ही कहाँ है आपके इस तस्वीरों वाले  भगवान् को हम आम लोगों की  बात सुनने का .. कभी एयर कंडिशन्ड हॉल से बाहर निकल कर देखा है ???" लड़का शायद गुस्से में था ..आगे और भी बोलता पर वीरेन ने रोका, समझाने के मूड से कुछ कहा भी .. पर लड़का सुनने के मूड में नही था ..बोलता गया ..

"संन्यास लेकर यहाँ आश्रम में बैठकर उपदेश  देना आसान  है, आम लोगों की तरह्  ज़िन्दगी जीना मुश्किल है, ना आपके ऊपर कोई ज़िम्मेदारी है सिवाय इस आश्रम के और ना किसी को आपसे कोई उम्मीदें या अपेक्षाएं हैं .. ना आपको आने वाले कल की फिकर ना आज के दिन की चिंता .. बस यहाँ बैठ कर लोगों से  कहना कि  भगवान् के लिए भी वक़्त निकालो .. क्या हो जाएगा उस से .. ज़िन्दगी की सब समस्याएं सुलझ जायेंगी, कम हो जायेंगी ? कोई समाधान  निकलेगा ? कुछ नहीं होता ..कहते रहिये आप .."

लड़का अभी और चिल्लाता या बोलता पर कुछ लोगों ने आकर उसे शांत करवाया और जिसके साथ आया वो वीरेन से माफ़ी मांगते हुए उसे वहाँ से ले गया।

इतने सब के बीच वीरेन चुपचाप खड़ा रहा .. एक तूफ़ान फिर से  आकर गुज़र गया और किसी को खबर भी ना हुई।  उसके बाद किसी काम में मन नहीं लगा .. रात हुई, वीरेन आकर प्रार्थना  हॉल में बैठ गया, देखता रहा उन तस्वीरों को,  महंगे फ्रेम में मढ़ी  हुई,  बड़ी-बड़ी प्रभावशाली  तसवीरें .. जिनके बारे में वो लड़का कहे जा रहा था .. पर याद नहीं कि  उसके exact  लफ्ज़ क्या थे। खुद से सवाल करने लगा वीरेन .. एक बार फिर .. आज चार साल होने को आये हैं .. नया जीवन अब पुराना हो चला है .. एक नज़र पीछे मुड  के देखता है तो सबकुछ एक फिल्म की तरह आँखों के आगे चलने लगता है ...

To  Be  Continued ...



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