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Wednesday, 1 April 2020

मूर्ख होने का विज्ञान 

फिल्में देखने का शौक फिर से जागा है और इसलिए रोज की एक फिल्म  देखने पर कमर बाँध रखी है।  और उसमे भी  sci  fi  और fantasy  वाली फिल्में मुझे ज्यादा पसंद हैं।  तो इसी जोश के चलते इंटरस्टेलर,  एड अस्त्रा और क्रिस्टोफर रोबिन समेत कुछ फिल्में देखीं और फिर विचारों का रेला चल निकला।  

आदमी को कितना दूर जाना पड़ता है, कहीं पास पहुँचने के लिए ?  कितने  सौ या हज़ार किलोमीटर चलना या दौड़ना पड़ता है ? जिस दीवार और छत से बाहर निकल कर आदमी चलना शुरू करता है अंतत: वहीँ  वपिस लौट आता है या लौट आने को उसका इरादा और मजबूत होता जाता है।  यानी जितना ही दूर गए उतना ही वापिस आने की इच्छा ज़ोर होती गई।  यह  गोरखधंधा ही सारे एक्सपेडिशन्स या एडवेंचर्स की जड़ है !!! 
ये सवाल मुझे इसलिए सूझ रहा है कि  आज अप्रैल फूल का दिन है , मूर्ख दिवस !!! याद होगा हम सबको कि  कैसे एक  ज़माने में इस दिन का हफ्ता भर पहले से इंतज़ार होता था और योजनाएं बनाई जाती थीं कि  कैसे अपने पडोसी, रिश्तेदार या मित्रों को "फूल" बनाया जाए. कैसे लोग बड़ी सावधानी बरता करते थे।  साबुन के टुकड़ों को टॉफ़ी चॉकलेट के रैपर में लपेट के डब्बे में रख के दिया जाता था , नकली फल थैले  में रख के दिए जाते थे, लड्डू में लाल मिर्च भरी  जाती थी, चाय में नमक या मिर्च कुछ मिलाया जाता था।  यही तो मनोरंजन था उस  वक़्त जब मोबाइल नहीं था , कंप्यूटर भी नहीं था।  

तो अब अप्रैल फूल इसमें आने जाने की कथा में कैसे जुड़ गया ??  ऐसे जुड़ा कि इंटरस्टेलर  और एड अस्त्रा  एक ऐसे वक़्त की कथा सुना  रही हैं जब दुनिया के पास तकनीक तो ऊँचे से ऊँचे दर्जे की होगी पर मजबूरियां भी उतनी ही ऊँची होगी।  कभी धरती का बैलेंस बिगड़ा होगा तो कभी आसमान आग बरसायेगा।  और इसलिए मानव का नाम और निशान बचाये रखने की खातिर अंतिम सीमा के परे इंसान को जाना होगा।  आज जिस चीज़ पर हम विश्वास नहीं कर सकते कि  ऐसा कोई तकनीक हो  सकती है या ऐसी भी कभी परिस्थिति हो सकेगी ?!!! यह सोचना या मानना भी मूर्ख हो सकने का प्रमाण माना  जा सकता है।  लेकिन ये फिल्में कहती हैं की ऐसा हो क्यों नहीं सकता ?? यह "क्यों "  सवाल ही अंतर है मूर्ख और समझदार के बीच।  कल्पना ही तो करनी है कि  ऐसा कुछ  अघट  भी  घट  सकता है धरती पर !!!! कोरोना ने हमें समझाया कि  हाँ हो सकता है,  इंसान अपने घर में  बंद रहने को मजबूर हो सकता है. वो सारी  फिल्में जो आपने देखीं  जिसमे ज़ोंबी, वायरस , एलियन  और अलाना और फलाना थे वो सब हो सकता है। यहां आकर समझदारी और मूर्खता के किरदार बदल  जाते है। क्रिस्टोफर रोबिन देखते वक़्त भी यही ख्याल आया कि  हंड्रेड एकर वुड्स की तरफ जो रास्ता और दरवाजा  जिस पेड़ की खोह से होकर खुलता है, उस पेड़ और उस दरवाजे को देख पाना किसी समझदार के बस की बात नहीं।  इसे देखने के लिए  आपको विश्वास की और खाली कोरे दिमाग की ज़रूरत है। जहां तर्क और  स्थापित ज्ञान  रुकने को कहता है, वहाँ से एक दरवाजा खुलता है जो एक ऐसी दुनिया में जाता है जहां तर्क की कोई खास जगह नहीं है, जहां बुद्धि केवल नाप तौल और ऊँचा नीचे का साधन नहीं हैं, जहां नफा और नुकसान का कायदा भी नहीं है।  

क्रिस्टोफर रोबिन में में एक दृश्य है, जब पूह और उसके साथी लंदन जा रहे हैं तब पिगलेट रुकता है और झिझक रहा है जाने से, तब पूह कहता है,  कि  पिगलेट हमें वहाँ तुम्हरी ज़रूरत होगी, हमें हमेशा तुम्हारी ज़रूरत होगी। और तब पिगलेट थोड़ा खुश सा होता हुआ  अभी भी डरता हुआ सा कहता है, अच्छा ज़रूरत है मेरी ; ठीक है तो फिर चलो।  ये पिगलेट हम सब हैं ;  किसी ऐसे विन्नी the  पूह  की उस आवाज़ की ज़रूरत है जो ये कहे कि  हमें तुम्हारी ज़रूरत हमेशा होगी।  क्योंकि आदमी अकेला नहीं रह सकता इसलिए ये जो जगह जगह छोटे झुण्ड और ग्रुप से दिखते  हैं ना गली , मोहल्ले, दफ्तर , बाजार  सब जगह पर, ये सब पिगलेट और पूह  के संवाद का  ही पसारा  है।  कोई नहीं चाहता कि उसे मूर्ख समझा जाए या "फूल" बना दिया जाए या "फूल" माना जाए ;  और खुद को "फूल" कहलाने से बचाने के लिए ही पूह चाहिए जो  खुद को मूर्ख मान ले  और आपको बुद्धिमान होने का अहसास दिलाये। 
भला खिलोने भी बोल सकते हैं या आपकी तलाश में आपको ढूंढते हुए आप  तक पहुँच सकते हैं  ?? कोई समझदारी इसे स्वीकार नहीं कर सकती लेकिन कल्पना की दुनिया में ये हो  सकता है।  एक सपाट कोरी स्लेट की दुनिया में ये हो सकता है।  

  इंटरस्टेलर  में एक दृश्य है जिसमे कूपर  ब्रह्माण्ड के आखिरी संभव कोने तक जाकर फिर एक पांच आयामी  संसार के ज़रिये  अपनी बेटी के कमरे में पहुँचता है और तब वो कहता है कि  समय  और समाधान  दोनों हमेशा से इस छोटी लड़की के कमरे में मौजूद थे।  यह ग्रेविटी की विसंगति और  कुछ नहीं केवल एक संकेतक थी किसी के यहां होने की जो उसी समय कहीं और भी है।  एस्ट्रोफिजिक्स की यह भाषा और  सिंद्धांत सुनते देखते समय एक आम दर्शक अचंभित होता है और उसकी बुद्धि बिना सवाल किये  केवल स्वीकार करती है कि  जो कहा जा रहा है वह सही सत्य है।  तब हम अपने समझदारी के लबादे को भूल जाते हैं क्योंकि आखिरकार  मनोरंजन के लिए  सिनेमा देख रहे  हैं,  हमने टिकट ख़रीदा, पैसे दिए हैं।  उस समय अपने को मूर्ख मानने या अज्ञानी मानने में हमें झिझक नहीं होती क्योंकि तब हम एक बड़ी भीड़ में शामिल हैं।  जब सारे अज्ञानी हैं तो हम कौनसे अलग हैं !!!!!   



फिर ख्याल आया कि  नई  समझदारी जो  सितारों के पार जाने की बात कहती है वही समझदारी याद  दिलाती है कि  इंसान  सिर्फ एक वल्नरेबल  बीइंग है।  ह्यूमन बीइंग।  एड अस्त्रा में एक दृश्य है जहां ब्रैड पिट Neptun के दो  महीने के सफर पर अकेला जा रहा है तब वो कहता है कि  मैं हमेशा सोचता था कि  मुझे अकेला रहना पसंद है लेकिन ऐसा नहीं है और वो रोता है  अपने अकेले होने के  ख्याल पर। इसी  फिल्म का एक और दृश्य है लगभग आखिरी दृश्य जहां  लीमा प्रोजेक्ट के स्टेशन से निकल कर स्पेस वाक करते हुए उसे अपने शटल में वापिस जाना है ; उसके सामने  और कुछ नहीं का विस्तार है ;  अँधेरे में चमकता ब्रह्माण्ड  और उस शून्य में एक अकेला आदमी ; यहां अस्तित्व है कोई नहीं के होने का ; कोई भी नहीं  केवल आप हैं और आपकी मूर्खता या समझदारी जो भी गठरी आप उठा के लाये हैं।  

 एक और  दृश्य है जहां वो मंगल पर पहुंचा है और कहता है कि  ये मैं कहाँ जा रहा हूँ ? सूर्य से दूर, रौशनी से दूर, धरती से दूर।  यह धरती से दूरी है जो इंसान बरसों में, उम्र के साल के हिसाब से और समय के धीमे या तेज़ होने के हिसाब से  नापता है।  इंटरस्टेलर में कूपर  नई  दुनिया की खोज में इसलिए निकला है कि  अपने बच्चों  को , सबको  इस नष्ट होते ग्रह  से निकाल कर ले जाए एक हरे भरे संसार में जहां आदमी फिर से दुनिया बसाएगा।  और इसलिए वे लोग एक मिनट एक घंटा सब कुछ नाप रहे हैं ; 124 साल का कूपर आखिर लौटता है धरती पर  फिर से  उस दुनिया तक पहुँचने के लिए जहां इंसान के लिए एक नई  दुनिया बस रही  है।  

एक और फिल्म देखी , "सर्चिंग ",  हमारे पास महँगी टेक्नोलॉजी वाले बढ़िया गैजेट हैं , हम नियमित फेस टाइम और texting  करते हैं लेकिन हम आमने सामने बात नहीं कर पाते. जितनी ऊर्जा टाइप करने और वीडियो कॉल में लगाते हैं  उतना तो किसी को जाकर मिलने या बतियाने में भी नहीं लगाते।  ये  बेहद दक्ष तकनीक आपके कब कहाँ होने को एक सेकंड में बता देती है।  आपकी ब्राउज़िंग हिस्ट्री आपके बहुत से गतिविधियों को बता देती है।  कब किस से क्या बात की। .. सब रिकॉर्ड है यहां साइबर स्पेस में , बस नहीं है तो इंसान के पास असल ज़िन्दगी में कोई नहीं  है जिस  से बात की जाए बिना झिझके बिना डरे , बिना कुछ फ़िक्र चिंता कि  कहीं ये मुझे मूर्ख  ना समझ ले !! कहीं मुझ पर मूर्ख होने का लेबल ना लग जाए; इसलिए हम भागते फिरते हैं पिगलेट होने के लिए।  आदमी की तलाश में तकनीक बेहद मददगार है लेकिन जब वो आदमी आपके सामने है आस पास कहीं बैठा है तब उसके पास आप  क्यों नहीं गए ??? इस फिल्म का एक दृश्य है जहां मार्गोट की तलाश का ट्रेंड हैश टैग twitter पर चल रहा है , यूट्यूब पर वीडियो हैश टैग किये जा रहे हैं वो साथ पढ़ने वाले जिन्होंने कभी उसके साथ बैठ  कर खाना भी नहीं  खाया वे लोग बड़ी ही इमोशनल पोस्ट इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर अपलोड करते हैं कैप्शंस देते हैं।  उस लड़की को हर कोई याद कर रहा है और आंसू बहती फोटो अपलोड कर  रहा है जिसको कभी उन्होंने शायद क्लास में देखा भी नहीं होगा  या अनदेखा कर दिया होगा।  न्यूज़ चैनल को एक दिलचस्प खबर मिली हुई है जिसके दर्शक हैं और बाजार को एक मुद्दा मिला  हुआ है जिसे एन  कैश  किया जा सकता है।  

और अब मूर्ख दिवस की शुभकामनायें  
 



Image Courtesy : Google

Sunday, 15 March 2015

चिट्ठियों के पुल Part 2

तीसरी चिट्ठी 

तुमको मेरी हर बात किसी फंतासी वर्ल्ड का किस्सा ही क्यों लगती है ?  मैं क्या यहां परियो की कहानी सुनाने बैठी हूँ, मैं हमारी यानी  तुम्हारी और मेरी बात कर रही हूँ  और तुम इसे मेरी डे ड्रीमिंग और ज़रूरत से ज्यादा सेंसिटिव होने  की आदत कहते हो.  ये सब सुन कर लगता है कि मैं और तुम धरती के दो अलग किनारो पर खड़े हैं,  ठीक ही तो है … ज़सूम और बरसूम। 

खैर तुम्हारी बात को ज़रा और साबित करने के लिए तुम्हे कुछ और बताऊँ , हर  रोज़ जब मैं ड्राइव कर रही होती हूँ तब मुझे ऐसा लगता है कि  तुम पास बैठे हो और मैं तुमसे बातें किये जा रही हूँ, है ना दिलचस्प बात.  पता है मुझे,  तुम फिर कहोगे कि  मेरा crack up  हो रहा है. पर क्या करू, तू  ना सही तेरी बातें ही सही … इसलिए खुद को ये अहसास दिलाये रखती हूँ कि  तुम दूर नहीं यही आस पास हो. क्या तुमने भी कभी ऐसा किया है ? जानती हूँ कभी नहीं किया होगा, कर ही नहीं सकते, ऐसी बेसिर पैर की हरकत के लिए तुम्हारे पास वक़्त भी कहाँ है, जब यहां आने के लिए वक़्त नहीं तो assumptions और presumption  के लिए कहाँ से वक़्त मिले … 

एक और बात बताऊ, अब तुम कहोगे कि  मेरी बातों का अंत नहीं पर  और किसको मैं ये सब बता सकती हूँ.  मुझे कह लेने दो, कभी कभी मुझे डर लगता है …  बहुत सारा … और  तब मैं किसी को ये बता नहीं सकती कि मैं  अंदर से कितनी डरी  हुई  हूँ,  तब मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है और मैं खुद से ही बातें करने लगती हूँ.  इसलिए तो हर बार तुमसे पूछती हूँ कि  कब आओगे ? 

कल सेंट्रल पार्क गई थी, यूँही अकेले, बस मन हो गया हरी हरी घास  पर नंगे पैर चलने का और एक कप कॉफ़ी पीने का. उस वक़्त वहाँ कैफ़े में बैठे कॉफ़ी पीते हुए तुम  बहुत याद आये.  वहाँ बैठे खिलखिलाते लड़के लड़कियों के ग्रुप कितने बेफिक्र, ज़िन्दगी की आने वाली ज़िम्मेदारियों और दुश्वारियों से अनजान अपने अपने साथियों के साथ कितने खुश खुश कहकहे लगा रहे थे. तब लगा कि  कॉफ़ी का कप,  टेबल पर बैठा  कितना अकेला और बेचारा सा लग रहा है जबकि कॉफ़ी  पर चोको पाउडर छिड़का गया है और ऊपर की क्रीम वाली परत पर एक नफीस  डिज़ाइन बनी  हुई है.  

 अच्छा एक दिलचस्प बात बताऊँ तुम्हे, अभी पिछले हफ्ते एक वेडिंग रिसेप्शन  में सज धज के जाना हुआ, कार मैं ही चला रही थी और अचानक से मैंने कुछ सुना, गियर बदलते वक़्त कलाई को जो झटका लगता है उसके कारण हाथ में पहनी चूड़ियाँ खनकने लगते थे. ये किसी धुन का एक टुकड़ा कहीं गिर गया  हो, पियानो पर बजता संगीत का एक अधूरा नोट या बरसात की रिमझिम के बीच बैकग्राउंड में बजता संगीत,  ऐसा कुछ  लग रहा था. तुमने कभी ध्यान दिया है ऐसी आवाज़ों पर ?? अब तुम कहो  कि मैं फिर से तुमको भावुकता में घसीट रही हूँ पर असल में, मैं कुछ और बात कहने के लिए भूमिका बाँध रही थी. कल फेसबुक पर किसी की वाल पर पढ़ा कि  प्यार एक जादुई अहसास है लेकिन मुझे लगता है कि ये एक illusion है जो दिखाई तो  नहीं देता पर इसके होने का अहसास हम खुद को दिलाये रखते हैं या कभी कभी ज़िन्दगी कुछ सिंबॉलिक तरीकों से इसकी मौजूदगी का अहसास हमें करवाती है. चूड़ियों की खनक का संगीत मुझे तीसरे चौथे गियर की स्पीड और ब्रेक के झटकों के बीच सुनाई दिया, क्या ये भी एक Illusion नहीं है ??  

शायद तुम ठीक ही कहते हो कि मैं फिलॉसॉफी और व्यवहारिकता का और बचपने और मैच्योरिटी का एक अजीब कार्टून या मॉकटेल सा बन गई हूँ. सच कहूँ तो मुझे भी यही लगता  है. खैर, ये किस्सा छोडो, अब चिट्ठी काफी लम्बी हो गई है. फिर बात करेंगे।   




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अमृता ने अपनी डायरी बंद की और उसे टेबल के ऊपर वाले शेल्फ में सलीके से रखा. खिड़कियों और दरवाजों के बाहर चाँद और तारों वाली रात अब पूरी तरह रौशन थी.

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" यार, ये तो बहुत बोरिंग सी कहानी है,  मुझे इसकी थीम ही नहीं जमी. काफी confusing  और  अजीब किस्म की है, मुझे नहीं लगता कि  ज्यादातर पाठक इसे समझ पाएंगे।" 

"इसे कहानी तो कह ही नहीं सकते, ये तो एक  मेमॉयर किस्म की चीज़ या कुछ निबंध जैसा है." 

"लेकिन इस पर एक प्ले बना सकते हैं, मेरा मतलब सिंगल करैक्टर वाला प्ले। क्या ख्याल है ?" 

" मेरे ख्याल से तो इसे दुबारा लिखो और अबकी बार इसमें कुछ दोतरफा  कन्वर्सेशन भी डालो, शायद तब ये बेहतर लगने लगे." 

"देखते हैं, अभी कुछ सोचा नहीं है."  


The First part of The Story is Here


Sunday, 17 August 2014

Escape to Nowhere

She was running…Speedily...without any pause.. She was just running fast. Why, what was the reason? Don’t know, all she knew that she was running. The way she was running, anyone could reach to a conclusion that she might be in a hurry to reach somewhere, or maybe she was trying to run away from something, but if she wanted to run away then too she was not looking backward. Whatever was it…her speed was quite fast and her breath were also running fast.

That road where she was running was vacant, desolate and quiet. A long and steady road doesn’t know from where it started off and where it will end up.  Her eyes were looking into a distant vacuum (which was extended on that long road), towards a distant and endless path.
The two things that were breaking the silence of that road were, first, the noise of her running and second her heart beat which was beating so fast that it was sounding like an air pump.

Finally, she got tired off, her legs were badly paining, as if someone has squeezed out all their strength. She stopped in the middle of the road, her heart was breathing fast, she knelt down a bit and put hands on the knees, and then again she stood up straight. She looked all around in all possible directions and to that possible extent where her sight could reach. Nothing was there, neither human being nor any other creature nor any green stuff. It was all quiet, empty and sterile.

Then her eyes fell on a big stone, kept on the other side of the road. She walked slowly towards that stone. Her breath was now getting normal. She sat on the stone in a careless position. She locked her hands with each other; her hair were swinging all over her face, neck and shoulders. She then turned down her face; tightly closed her hands that were already tangled with each other and thereafter two drops of tear dropped` from her eyes and flowed down her cheeks....for the  next few moments tears continuously flowed. Then, she suddenly came back in her sense and wiped out the tears and looked around, nobody was there to see her crying. For a moment she felt relaxed.
But on the next moment she couldn't control herself and once again broke up in tears. Her cry was noiseless, eyes were shading tears, but she did not even scream for a single time. A lump of emotions and grief in her chest was trying to come out with a big bellow, but each time she was swallowing it back. She covered her face with hands and closed her lips tightly and folded them inside, but no longer she could keep them in that position; still she succeeded in keeping her tears flowing silent.

She did not know for how long she cried in that manner; all she knows that she cried…. While sitting on that stone.
Finally her tears dried up and she stopped crying. Can’t say whether she gets tired off with crying and she did not have anymore strength to cry or there were no more tears left in her eyes. She stood up and took a sigh and started walking back on the road. She was going back to the way from where she came. However, this time her feet were slow, as if there was no hurry to reach anywhere; she was walking carelessly. This time on the road she came across some people, going on their ways; both sides saw each other and moved on their ways respectively.

She was walking slowly…..and  even more slowly as if she did not want to finish the journey, as if she was not willing to reach the destination. However, she reached there and now she was standing outside the house. She opened the main gate in a very slow manner and then closed it with the same pace, so that nobody can listen or notice her arrival. She then entered into the house and looked here and there. Everything was the same and at its place as she left them. Somebody was reading newspaper, someone was watching TV and she could smell the aroma of food being cooked in the kitchen. Nobody noticed her presence nor saw her. She quietly went into her room and fell down on bed and pretends as if she is sleeping. But before entering the room she felt that perhaps somebody asked her, ”where were you, what were you doing?” but those words disappeared in air as soon as they encountered with her ears.

Once again two drops emerged at the corners of her eyes and flowing through cheeks, fell on pillow.
Her mother came into the room and stood near her bed,” lunch is ready, will you eat now?” she removed her tears quickly and very cleverly also, then she replied in a stable voice, “No, later, I am not hungry.” She said those words without changing her posture on bed side.  Her mother stood there for few moments and then left the room with mumbling some words that she couldn't listen clearly or may be she didn't want to listen.
She came back into her world and again started crying, swallowing own screams and yells, the pillow was getting wet and so her face.




Image Courtesy: Google

P.S. This is an old post, originally written Here
Please bear with the poor English grammar as I haven't checked it with any grammar tool.


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Sunday, 1 June 2014

एक इंच मुस्कान : A review



एक इंच मुस्कान उपन्यास थोड़ा अनोखा सा है क्योंकि इसे दो लोगों ने मिल कर लिखा है; राजेंद्र यादव और  मन्नू भंडारी।  दो भिन्न व्यक्तित्व वाले लेखक, अलग अलग लेखन शैली लेकिन कहानी एक. इसमें कुल चौदह चैप्टर हैं, एक चैप्टर राजेंद्र यादव का तो दूसरा मन्नू भंडारी का. ज्ञानोदय  मैगज़ीन में धारावाहिक किश्तों के रूप में छपे इस  उपन्यास को एक प्रयोग के तौर पर भी देख सकते हैं कि  दो लेखक मिल कर एक कहानी पर काम करें और पाठक को  कहीं से ऐसा ना लगे कि  इसे दो अलग दृष्टिकोणों से लिखा गया है; पढ़ते वक़्त कहानी का सूत्र और संरचना कहीं टूटती बिखरती ना लगे. तो इस पैमाने पर ये उपन्यास बिलकुल खरा है इसमें दो राय नहीं है.

एक इंच मुस्कान कहानी है तीन लोगों की; "अमर" जो एक प्रतिष्ठित लेखक है, जिसकी एक अच्छी खासी फैन फॉलोइंग है और जिसके लिए लिखना ज़िन्दगी जीने का ही दूसरा नाम है, जिसका "धन न बैंकों में न मिलों  में, वह मेरे मस्तिष्क में है, मेरी कलम में है." 

एक रंजना है, जो अमर से प्यार करती है और अमर को भी उससे प्यार है. अमर के लिए घर, परिवार, शहर सब छोड़ आई, शादी की और सोचती है कि जो किया वो ठीक ही तो किया। पर कहीं उसे थोड़ी फ़िक्र भी है, " इन साहित्यकारों का कोई भरोसा नहीं। इन्हे एक पत्नी, एक प्रेयसी , एक प्रेरणा, न जाने कितनी कितनी लडकियां चाहिए।"

एक है अमला, किसी रईस खानदान की इकलौती बेटी है जिसे पति ने शादी के एक साल बाद  घर से निकाल दिया। ज़िन्दगी के इस बड़े झटके के बाद  भी उस मानिनी का "व्यक्तित्व  ऐसा है कि  आदमी एक बार देख ले तो ज़िन्दगी भर भूल नहीं सकता।"  जिसकी मुस्कान कुछ ऐसी सम्मोहिनी, मायावी  सी है कि जिसके जादू से कोई ज्यादा देर तक बच नहीं सकता।  एक बार तो पढ़ते समय, पाठक भी कल्पना करने को मजबूर हो जाता है कि  मन्नू भंडारी ने अमला के मुस्कुराने का जो ख़ास तरीका बताया है,  वो कैसा लगता होगा। 


अमला चाहती है कि  अमर लिखे और बहुत लिखे, "तुम्हारा लेखन साहित्य की एक उपलब्धि है".  अमला के साथ अमर की "मधुर मैत्री", लेखक और पाठक का रिश्ता रंजना की समझ से बाहर हो जाता है. "ये मित्र क्या होती है? या तो बहन होती है या भाभी।"   और लगभग पूरी कहानी अमर, रंजना, अमर के अंदर के लेखक और अमला के बीच की खींचातानी  और उतार चढ़ाव को बयान करती चलती है. 

अमर का चरित्र एक अजब उधेड़बुन  और असमंजस में फंसे रहने वाले व्यक्ति का है, सपनों और फिलॉसफी की दुनिया में रहने वाला इंसान। शायद इसके लिए उसे दोष भी नहीं दे सकते। एक तरफ उसे अपने अंदर के लेखक की चिंता है.…  "कलाकार तो धारा है, हर कहीं बहता है, जब तक गति है  तब तक कला है, फिर न गति रहेगी न कला, धारा तालाब हो जायेगी। रंजना और अमला ज़िन्दगी में बहुत आएँगी लेकिन न अमर  प्रतिभा आएगी ना प्रतिभा के स्फुरण के ये क्षण आएंगे।"  वहीँ दूसरी तरफ ऐसा जड़मूर्ख और स्वार्थी भी नहीं कि रंजना की तरफ से पूरी तरह मुंह फेर सके; अमला को लिखे पत्र में कहता है, "अपनी आत्मा और आत्मा के जो अंश है उन्हें धोखा देता रहूँ  और दोस्तों से लड़ता रहूँ?"  

पर फिर भी फैसला लेने और उस पर टिके  रहने   की क्षमता उसमे ज्यादा नहीं है. अमर की  इस मनस्थिति को उसका दोस्त टंडन सही पहचानता है और कहता है " कुछ  मिथ्या  धारणाएं हमें परम्परा से मिलती हैं  और हम उन्हें बिना जाँचे ज़िन्दगी भर पालते जाते हैं. एक मिथ ये है कि कलाकार को घर नहीं बसाना चाहिए, उसे दुखी और निर्धन ही होना चाहिए।"  अमर  रंजना से विवाह करना चाहता था लेकिन जब अमला ने साहित्य के प्रति फ़र्ज़ याद दिलाया तो फैसला बदल गया; "तुम्हारे जीवन की पूरक तुम्हारी कलाकृतियां ही होंगी, रंजना नहीं।"  

फैसला फिर बदला और रंजना से विवाह हुआ.  और ये विवाह ही दो ज़िन्दगियों, दो लोगों उनकी अलग ख्वाहिशों और लक्ष्यों  और दो  अलग अलग  विचारों की लड़ाई का मैदान बन गया. अमर भी अपने वर्तमान के बजाय दूर भविष्य की कल्पना कर रहा है, जब लोग सिर्फ उसकी कृतियों को जानेंगे और उसका व्यक्तिगत  या पारिवारिक जीवन कैसा था इसकी परवाह किसी को नहीं होगी। टॉलस्टॉय, चेखव, ग़ालिब  वगैरह उसे याद आते हैं। टंडन ने उसके लिए बिलकुल सही कहा कि,  "तेरे निर्णय तेरे अपने  नहीं है, वे निर्णय किसी देशी विदेशी लेखक  ने पहले से लेकर रखे हुए हैं और उन्हें अपनी ज़िन्दगी में लागू करके तू उन लोगों  की महानता  प्राप्त करने का संतोष पाता है. काश तू अपने निर्णय कामू या सार्त्र  की किताबों से न लेकर खुद ले सकता होता।"

अब यहां अमर और रंजना के संयुक्त जीवन के बारे में कुछ कहें या उसे समझें इसके पहले अमला को जानना बेहद ज़रूरी है; आखिर उपन्यास का टाइटल उसकी मुस्कुराहट के कारण ही रखा गया है. 

अमला अपने समय और परिस्थियों से आगे की औरत है जो खुल कर कहने साहस  रखती है कि, " जीवन का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी मेरे लिए सौभाग्य बन कर ही आया.  इन दस वर्षों में जो कुछ पाया, उसका लेखा  जोखा करती हूँ तो लगता है मैंने खोया कम पाया अधिक है."  शायद यही साहस उसका गर्व और अभिमान दोनों बन गया है. औरों से अलग, विशिष्ट होने की इच्छा, सारे बंधन तोड़ देने की महत्वाकांक्षा, मर्यादाओं को लांघ जाने का दुस्साहस।  "जल की एक उन्मुक्त धारा .... किसी एक की होकर नहीं रहना चाहती, रह भी नहीं सकती …  उसके लिए सब समान  हैं, वह सबके लिए  समान  हैं."  लेकिन इस महत्वाकांक्षा में बड़ी गहरी अभिलाषा भी छिपी है कि  सब उसका कहना मानें, उस पर मोहित हो, उसका जादू सब पर चले; अपनी बात को हर किसी से मनवा सके. पर खुद अमला पर किस का जादू नहीं चल सकेगा, वो किसी की  कोई बात नहीं मानेगी, किसी को अपने भीतर झाँकने या कुछ तलाशने की इज़ाज़त नहीं देगी। जिसका ये दृढ विश्वास है कि, " पति के अतिरिक्त भी संसार में बहुत कुछ ऐसा होता  है जो नारी जीवन को पूर्ण बना सकता है."   पर यही अमला कैलाश के साथ झगड़े, बरसों पुरानी मैत्री के टूटने और उसकी बेरुखी को सहन नहीं कर पाती। अपने ही मन की दबी हुई आवाज़ को अनसुना किये  इस बात से मन को तसल्ली देती है कि  अमर जैसा एक प्रसिद्ध लेखक उसके बीते जीवन की ट्रैजेडी और वर्तमान के इंद्रधनुषी रंगों पर एक उपन्यास लिखना चाहता है; कि  वो एक बड़े लेखक के सृजन की प्रेरणा है और  अमर को ये विश्वास है  कि  अमला के जीवन पर लिखी ये किताब  उसका मास्टरपीस होगी और उसे साहित्य के क्षेत्र में "अमर" बना देगी। अमला अपने मान और अहम को इस बात में ढूंढ रही है कि  अमर ने अपनी रचना उसके नाम पर समर्पित की है. पर क्या इतना ही  पर्याप्त है ?

रंजना एक साधारण सरल लड़की  है जिसके वही सीधे सादे सपने हैं कि पति हो, एक सुन्दर सजा संवरा  घर हो, शाम को पति पत्नी साथ घूमने जाएँ, ज्यादा से ज्यादा वक़्त साथ बिताएं, सिनेमा देखने जाएँ; अमला के शब्दों में "सुख की कितनी सरल परिभाषा है"।  लेकिन फिर भी कुछ असाधारण है रंजना में; उसके पास एक अच्छी नौकरी है, उसने घरवालों की मर्जी को दरकिनार कर अपनी पसंद से शादी की, वो भी ऐसे आदमी से जो फुल टाइम लेखक है, जिसके ना नौकरी का ठिकाना, ना रहने खाने का कोई ढंग. घर का बजट, सारे खर्चे रंजना की ज़िम्मेदारी हैं; पर फिर भी उसे शिकायत नहीं क्योंकि उसे अमर से प्यार है. (सुनने में अजीब है कि  आजकल के ज़माने में ये क्या आदर्शवादी किस्सा है पर इस कहानी का यही मुख्य बिंदु है) अमर अपनी इन कमज़ोरियों को अच्छे से जानता है और इसलिए रंजना का ये बिना टर्म्स एंड कंडीशंस वाला प्यार जिसमे वो खुद रंजना को कुछ दे  नहीं सकता, ना घर, न पैसा और ना वैसा समर्पित प्यार उसे परेशानी में ज्यादा डालता है और सुख की अनुभूति कम करवाता है । अमर की सुख की  परिभाषा भी रंजना  से अलग है, उसे एक बंधे बंधाये व्यवस्थित जीवन की आदत नहीं है, " सारे दिन को घडी के हिसाब से नहीं , भोजन नाश्ते के हिसाब से बाँट दिया गया है."  उसके लिए किसी  पुराने मित्र ( या मित्री)  से मिलना, पाठकों (जिसमे महिलाएं भी शामिल हैं) के प्रशंसा भरे पत्र, शाम होते ना होते  दोस्तों के साथ  निकल जाना; सुख के पैमाने हैं. 

और इसलिए अमला या शकुन या लेखन नहीं, सुख की यही अलग अलग परिभाषा;  अमर और रंजना के बीच दीवार की तरह खड़ी है और दोनों को दो अलग समान्तर रास्तों पर ले जाती है. इस बात को अमला का चरित्र  बड़े सुन्दर ढंग से परिभाषित करता है, "जो किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन का चरम सुख हो सकता है वही तुम्हे कष्ट दे रहा है… शायद अपने अपने व्यक्तित्व के एक सिरे पर  बहुत ही साधारण हैं, वही हवसें, वही इच्छाएं, वही कमज़ोरियाँ …" 


तो ये कहानी आखिर किस अंत पर पहुँचती है, शायद कहीं नहीं … अमर के अपने शब्दों में इस कथा का सार यही है कि  " यह उसके जीवन की विवशता है, ट्रेजेडी है कि  जो कुछ उसे प्राप्त है  नहीं पाती, अस्वीकार कर देती है और एक ऐसे अदेखे अनजाने सुख पीछे भागती है जो शायद उसे कभी प्राप्त नहीं होगा।"  ये कथन अमर और अमला दोनों की जीवन यात्रा पर सही बैठता है और  शायद यही वो सन्देश या जीवन  सत्य  है जो उपन्यास लिखने वालों ने इस सीधी  सरल कहानी  के ज़रिये  बताने की कोशिश की है.

P.S.  जिन लोगों ने मन्नू भंडारी की आत्मकथा पढ़ी है या जिनको मन्नू और राजेंद्र यादव के  वैवाहिक जीवन की जानकरी रही है वे लोग इस उपन्यास को उन दोनों की अपनी निजी ज़िन्दगी का लेख जोखा ही  मानेंगे; खुद मुझे भी यही लगा था लेकिन हमारे इस भ्रम  को मन्नू भंडारी ने दूर कर दिया है. उपन्यास के अंत में दोनों लेखकों  ने इस डेढ़ साल तक चले  "प्रयोग" पर  अपने विचार दो चैप्टर्स में  लिखे हैं जो इस किताब की  खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं और इसी में मन्नू भंडारी ने स्पष्ट कहा है कि  इस कहानी का उनके निजी  जीवन से कोई लेना देना नहीं। पर फिर भी मन मानता तो नहीं।  



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Friday, 19 July 2013

उस पार --- भाग 2

  हालांकि ये   स्थिति भी ज्यादा देर  तक  नहीं  ठहर सकी .. उसने  खुद को एकबारगी फिर से फूलों की टहनियों और उस खरगोश की तलाश में व्यस्त कर लिया। पर जाने क्यों वो उत्साह अब मंद पड़  गया था।  और तभी उसकी आँखें जा टिकीं उस "फूल" पर .. वही जो झील में था .. अब भी वहीँ था .. उसे वो फूल चाहिए था ..बस चाहिए था .. लेकिन कैसे मिले .. दूर था .. "उह्ह किसे परवाह है .. मुझे चाहिए बस " .. उसने सोचा। 

उसने यहाँ वहाँ देखना और  तलाशना शुरू किया शायद कुछ   मिल जाए .. थोड़ी देर बाद उसे किसी पेड़ की एक टूटी  हुई लेकिन कुछ लम्बी टहनी या डाल  जैसा मिल गया .. "शायद ये  काम  कर जाए". 

उस टहनी को थामे वो पानी में उतरी .. पानी ठंडा था, इसके अलावा झील की तली काफी चिकनी और फिसलन भरी भी  थी .. इसलिए वो धीरे धीरे सावधानी से कदम बढ़ा रही थी .. और अब काफी हद तक पानी के भीतर थी। वो सब फूलों के गहने, जो उसने पहन रखे थे, अब धीरे धीरे ढीले होकर खुलने लगे थे और पानी की सतह पे बिखरने लगे थे  सिर्फ वो फूलों का ताज उसके सर पर  अभी  तक खिला  हुआ था लेकिन उसने खुद ही उसे हटा  दिया। अचानक से उसे  कुछ महसूस हुआ ... ठंडा पानी .. जिसकी  छुअन बेहद रहस्यमय थी ..एक मदहोश कर देने वाला नशा उस पर छा  रहा था .. उसने खुद को खो जाने दिया .. उस जादुई लम्हे और उस अलौकिक अनुभव में .. गहरे तक डूब जाने दिया खुद को  ..पानी जैसे उसके शरीर की बाहरी परत को भेदता हुआ अन्दर तक समा रहा था .. उसकी आत्मा को भिगो रहा था ..कुछ वक़्त  तक  वो ऐसे ही रही .. पानी में ..  उस वजह को भी भूल गई जो (फूल) उसे यहाँ पानी के भीतर लेकर आया था .

कुछ देर बाद अचानक जैसे वो नींद से जागी .. एक ख्याल उसके दिमाग में आया और उसे थोडा डर  लगा .. वो उस जादुई दुनिया से बाहर निकल आई .. उसने अपने होश संभाले और एक बार फिर  से उस फूल की तरफ देखा .. धीरे से .. ध्यान से उसने अपने हाथ में थामी हुई टहनी को आगे बढाया और उस फूल को उसके डंठल के साथ खींचा .. दो चार कोशिशों  के बाद उसने फूल को अपनी तरफ खींच लिया और डंठल समेत तोड़ भी लिया और फिर वो झील से बाहर निकल आई।


वो फूल, दुसरे आम फूलों से कुछ ज्यादा ही बड़ा था .. उसकी खुशबू , लड़की के मन मस्तिष्क पर छाने लगी थी या शायद अब भी वो उस रहस्य के आवरण में खोई हुई थी,  उसे महसूस  कर रही थी । उसने  अपने बालों का एक ढीला सा जूडा सा बनाया और वो फूल उसमे लगा दिया ..और फिर दुबारा झील की तरफ गई .. झील के आईने में खुद को देखा .. फूल उसके बालों में बेहद खूबसूरत लग रहा था या  ये महज़ उसकी कल्पना थी जो उस फूल को  और उसे भी  खूबसूरत बना रही थी ? उसे मालूम नहीं था   

और तभी एक बार फिर से उसने वो खरगोश देखा .. पेड़ के पास जाने क्या कर रहा था .. दोनॊ को एक एक दूसरे की उपस्थिति का पूरा अहसास था और दोनों एक दूसरे से कभी नज़रें मिलाते तो कभी नज़रें चुराते .. लड़की मुस्कुरा रही थी और खरगोश  अपनी चमकीली आँखें झपका रहा था। कुछ देर  बाद  खरगोश  पेड़ों के एक झुरमुट की और भाग चला .. जिज्ञासा,  लड़की को खरगोश के पीछे ले गई .. उस झुरमुट के अन्दर .. 

और क्या था वहाँ  .. वहाँ तीन चार खरगोश और भी थे।  उसने अपने चारों और देखा और उसका चेहरा चमक उठा बच्चों जैसी ख़ुशी और उत्साह से .. एक बार फिर से उसके मन  मस्तिष्क और उसकी आत्मा  झूम उठी उस नज़ारे को देखकर, भूल गई कि थोड़ी देर पहले क्या था, क्या नहीं था ..  और फिर अगले कुछ ही क्षणों में लड़की ने उन नर्म नाजुक छोटे दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर दिया या उन्होंने उसका हाथ थाम लिया,  कह पाना मुश्किल है .. लेकिन इतना ज़रूर था कि  एक दुसरे का साथ उन्हें बहुत पसंद आ रहा था और वो उसका पूरा मज़ा ले रहे थे। कुछ घंटे और बीत गए .. वो भूल गई, समय को, समय के बंधनों को और शेष जगत को .. यहाँ तक कि  उसे नींद आ गई .. नींद में उसे ख्वाब आ रहे थे .. ख्वाब "उस पार" के, ख्वाब परछाइयों के, प्रतिबिम्बों के और हाँ खरगोशों के भी। 

अचानक एक तेज़ आवाज़ ने उस जगह की खामोशी को तोडा .. कोई पुकार रहा है .. वो जाग गई ..  

"ये किस  किस्म का शोर है?" वो बुदबुदाई और झील की तरफ  लौटी। 

वो लड़का, वोही .. यहाँ वहाँ घूम रहा था .. सब तरफ उसका नाम पुकारता ढूंढ रहा था .. 

"जून .. जून .. कहाँ हो तुम ?" 

वो उसे वापिस आया  देख कर हैरान थी .. कुछ देर यूँही खामोश खड़ी  रही और उसकी हरकतों को देखती रही। 

आखिर लड़के की नज़र उस पर पड़ी .. " तो तुम यहाँ हो " .. लड़का उसे देख कर खुश था ... हालाँकि वो हांफ रहा था लेकिन एक बड़ी सी मुस्कान उसके चेहरे पर बिखर गई। लड़की ने इसे देखा, समझा और  उसकी तरफ बढ़ आई .. वो अब भी उसे आश्चर्य से देख रही थी। 

"कुछ बोलो ना .. मैंने तो सोचा था कि  तुम अब तक जा चुकी होंगी लेकिन देखता हूँ कि  तुम अब भी .."

"हाँ मैं यहीं थी .." लड़की ने धीरे से जवाब दिया। लड़के ने उस अनकही ख़ुशी को और उस छुपाये गए उत्साह  को देख लिया था ..जान लिया था, समझ लिया था जो उसके शब्दों के पीछे से झाँक रहा था। 

"तो तुम वापिस कैसे आ गए .. मैंने सोचा था कि  तुम चले गए हो, तुम्हारे लोग तुम्हे बुला रहे थे ना .."


"हाँ, कुछ काम था, पर मैंने कर लिया और वापिस आ गया .. ये देखने कि  क्या तुम अब भी यहीं हो या .."  अब उसकी साँसे सामान्य होने लगी थी। 

वो उसके शब्दों को गौर से सुन रही थी ..

"तो क्या कर रही थी तुम इतनी देर  तक ..और डर  नहीं लगा तुम्हे". 

"डर  किस बात का ?" 

"ये जगह, बिलकुल अकेले .."  लड़के ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया और अचानक जोर से चिल्ला कर पूछा ... "वो सारे फूल कहाँ गए?" 

पहले तो वो हंसी,  फिर थोडा रुक कर उसने कहा .. " चले गए, खो गए". 

"खो गए?? कहाँ?"  वो कुछ समझ नहीं पाया .. हज़ारों ख्याल उसके मन को झिंझोड़ने लगे। 

लेकिन लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी, उसकी आँखें एक रहस्यपूर्ण  तरीके से चमक  रही थी, कुछ देर तक खामोश रही वो जैसे कोई बड़ा राज़ छुपा रही हो, फिर एक बार  खिलखिलाई और उसने वही जवाब दोहरा दिया .. " खो गये." 

लड़का अब् भी  उलझन में था .. कुछ पूछना चाहता था लेकिन जानता नहीं  था कि  कैसे पूछे ..

"क्या तुमने इसे नहीं देखा ?" लड़की ने अपने बालों में लगे फूल की तरफ इशारा किया .. उसका चेहरा अब एक विजेता के जैसी ख़ुशी से दमक रहा था।  एक पल को लड़का कुछ समझ नहीं पाया लेकिन फिर अगले ही क्षण उसने झील की तरफ देखा (झील ज्यादा दूर नहीं थी ) और फिर उस फूल की तरफ .. .

"तुमने ये कैसे किया .."? लड़के की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गई। 

वो मुस्कुराई .. "बस कर लिया ... मैं पानी में गई, और फूल को एक  टूटी टहनी की मदद से तोड़ लिया।"  वो  ऐसे  बता रही थी  जैसे कोई छोटा बच्चा स्कूल में  होमवर्क के लिए मिली तारीफ़ के बारे में बता रहा  हो।     

  "तुम पागल हो हो ..?? पानी में गई !!!!!!!!!!!!"

"हाँ .." उसने लापरवाही से जवाब दिया।

"तुम पागल हो, बिलकुल पागल. ये  खतरनाक हो सकता था .. तुम जानती नहीं क्या ?"

" ऐसा कुछ भी नहीं था,  ना तो ये कोई बड़ा खतरनाक  काम था और ना ही इसमें कोई परेशानी लगी।" 

लड़की की आवाज़ में एक लापरवाही और उपेक्षा सी थी उसके सवालों के लिये. और शायद इसलिए, लड़के ने कहे गए शब्दों से कहीं  ज्यादा सुना और जितना उसके कहने का अर्थ था उस से कहीं  ज्यादा समझा भी. और अब लड़के का उत्साह और ख़ुशी जो उस से  मिलने पर  था, अब फीका पड़ने लगा. 

लेकन इस सबसे बेखबर वो अब फिर से पेड़ों के झुरमुट की ओर  जा रही थी।     

"अब तुम कहाँ जा रही हो?" वो अब भी उलझन से घिरा था। 


"मैं ... मैं वो ..मैं तुम्हे कुछ दिखाना चाहती हूँ ..चलो .. चलो ना ".

लड़के ने हालाँकि आगे कुछ नहीं पूछा और वो उसके पीछे चलता गया लेकिन अब दिल में एक भारीपन था. और अब वो दोनों झुरमुट के पास थे. लगा जैसे लड़की थोड़ी निराश सी हुई हो, खरगोश और उनका कोई नामोनिशान आस पास नहीं था। 

"वो खरगोश कहाँ गए?" 

"कौनसे खरगोश?"

"यहीं तो थे, उन्ही के साथ तो मैं पूरा वक़्त खेल रही थी जब तुम यहाँ नहीं थे".  

अब लड़का थोडा और हैरान परेशान हो गया .. "मैंने तो यहाँ कभी कोई खरगोश नहीं देखे." 

'पर वो यहीं थे ..अच्छा  चलो रहने दो .. ज़रा इसे देखो  तो .." 

लड़की अब एक बड़े से  बरगद के पेड़ की तरफ गई और पेड़ से लटकती उसकी लम्बी जड़ों के एक जोड़े को थाम लिया, जो बिलकुल एक कुदरत के बनाये झूले जैसा लग रहा था। वो उस पर बैठ गई और धीरे धीरे झूलने लगी .. झूला गति पकड़ने लगा .. ऊपर उठता हुआ और फिर नीचे आता हुआ ..

"अरे, ध्यान से, कहीं गिर ना जाओ". लड़का परेशान था।

लड़की हंसी .. और उस लम्हे में लगा जैसे कोई झरना बह निकला  हो ... ऊँचे पहाड़ों से गिरता हुआ .. आश्चर्य के साथ लड़का उसे फिर से देख रहा था .. " तुम पागल हो .."


झूले की गति अब काफी बढ़ गई थी पर जैसे इतना काफी नहीं था .. लड़की ने अब उन टहनियों के झूले को गोल घेरे में घुमा के झूलना शुरू किया  और लड़का अब पूरी तरह अचंभित था .. उस लड़की की हंसी और उमंगें जैसे हवा में चुम्बकीय तरंगें पैदा कर रही थी और हर उस चीज़ को अपने में समाती जा रही थी जो वक़्त के उस लम्हे में, धरती के उस टुकड़े पर मौजूद था। लेकिन लगता नहीं था कि  लड़की को इस सबका भान था, वो तो सिर्फ झूलने का आनद ले रही थी। लड़के ने महसूस किया वो अपनी आँखें नहीं हटा पा रहा उस से .. उस लड़की से .. या शायद वो हटाना ही नहीं चाहता .. जो भी था .. लड़की ने इस बात को समझ लिया। 

लड़की ने उसकी आँखों को देखा .. उनमे लालसाएं थीं, आकांक्षाएं थीं, महत्वाकांक्षाएं थी, अपेक्षाएं थीं और … और बहुत कुछ  था … और उसकी आँखों में लड़के ने एक  सपना देखा जो झिलमिलाते हुए पर्दों के पीछे छिपा था . वो आगे बढा … 

"तुमने अभी तक मेरा  नाम नहीं पूछा". 

"मैं जानती हूँ तुम्हारा नाम ।" एक और बेपरवाह जवाब. 

" तुम जानती हो !!!!!!!!!!!!,  लेकिन  मैंने तो  तुम्हे नहीं बताया, फिर कैसे । कैसे तुम जानती हो ?"  लड़का अब उसके ठीक  सामने आकर खड़ा हो गया. 
  
"क्या …"  एक क्षण के लिए उसकी हंसी रुक गई और वो निरुत्तर हो गई. 

लड़के ने अपना सवाल दोहराया … लड़की की मुस्कान फिर से लौट आई. दूर अज्ञात क्षितिज को देखते हुए उसने कहा …

" तुम्हारा नाम छलावा  है … तुम्हारा नाम है सतरंगी आभास, भ्रम, तृष्णा … "

लड़के ने झूले को कस कर पकड़ लिया और उसकी तरफ देखने लगा  लेकिन लड़की ने  कोमलता से उसका हाथ हटाया और रुक चुके झूले से उठ खड़ी हुई. 

लड़का खामोश था लेकिन शायद कुछ  कहना चाहता था. 

लड़की ने सुन लिया … वो मुड़ी … लेकिन ये क्या … 

हर चीज़ … उसके चारों ओर, वो लड़का … सब कुछ एक भंवर में समाता और गायब होता जा रहा था.  वो डर कर चीखी … उसने अपना हाथ आगे बढाया शायद कुछ थामने के लिए या पकड़ने के लिए … लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. 


"रुकॊऒऒओ … " उसकी साँसे तेज़ तेज़ चल रही थी पसीने से नहा  गई थी वो. 

" बिटिया, सोना … क्या हुआ  … कुछ नहीं बस एक बुरा सपना ही था, शांत हो जा".  ये उसके माता पिता थे.   

और तभी उसके सेलफोन की रिंग टोन बज उठी … "छोटी सी कहानी से बारिशों के पानी से सारी वादी भर गई … "