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Monday, 24 February 2020

उस पार ---3

लड़की एक  बार फिर से उसी  झील के किनारे बैठी है।  पानी में पैर  डुबोने  और छप  छप करें , का ख्याल आया लेकिन गंदले और काई जमे किनारे ने उसे दूर से ही छिटका दिया। पानी अब बहुत दूर तक खिसक गया था , झील के किनारे वाला हिस्सा सूख गया लगता है।  अब इसे  झील तो नहीं तालाब जैसा कुछ मान लें ऐसा ख्याल आया उसके मन में। उसका मन जो अब समय की धुरी पर चारों दिशाओं और चौदह भुवन को देख आया है ; उस मन में अब कोई कविता या संगीत नहीं उपज रहा।  बस केवल कुछ परिचित कुछ जाना पहचाना  चिन्ह दिख जाए तो यहां आने का सुकून  पूरा हो जाए।

'खरगोश अभी तक नहीं दिखा' , एक सवाल आकर टंग  गया हवा में।

"ऐसे उजाड़, सूखे में कौनसा खरगोश रह सकता है ?"  चौदह भुवन में से किसी एक भुवन ने उत्तर दिया।  
उसने खुद को देखा या हाथ लगा कर खुद को महसूस किया।   रूखे  टूटे बाल जो कंधे से नीचे तिनकों की तरह झूल रहे थे। चेहरे पर जगह जगह सूखा खुरदुरापन  महसूस हुआ।  फिर हाथ भींच कर उसने आस पास नज़र घुमाई।  वो जादू, वो रहस्य से भरे नज़ारे जो उसने देखे थे  इस जगह पर; कुछ नहीं था।  सूखी कांटे वाली झाड़ियाँ थीं,  पेड़ कहीं इधर उधर अकेले खड़े जैसे सोचते हों कि आखिर कौन उन्हें यहां छोड़ गया  और लेने कब आएगा ? कोई फूल पत्ता , हरी टहनियां और झुकी हुई डालियाँ  .....  यह सब कविता अब  यहां क्यों नहीं दिखती ?  

"खरगोश नहीं हैं क्या ?" 
"नहीं हैं। " फिर से किसी भुवन या दिशा  ने जवाब दिया  स्पष्ट ही सुनाई दिया उसे. उसे जिसका नाम शायद ,,,,, 

किसी के चलने  और धीरे धीरे पैर  रखने की आहट  है , शायद खरगोश !!! उसने पीछे मुड़  कर देखा, वही लड़का  वहाँ खड़ा है,  जहां तब पहली बार उसे आता देखा था। एक पहचानी हुई सूरत देख कर इंसान खुश हो जाता है या दुखी होता है या अपने में ही सिमटने की कोशिश करने लगता है ?? यह प्रश्न जगा।  

"तुम, जून ; तुम यहां वापिस कब आईं ?"
"क्यों नहीं आ सकती क्या ?"
"ऐसा कब कहा ?"
"पर इतने दिन तुम कहाँ थीं ?"
"मैं, मैं ... वहाँ उस पार से आगे , वहाँ ,,,,,"
जवाब अधूरा ही रहा।  वो तीर तीक्ष्ण दृष्टि जिसने कभी आगे बढ़ते पैरों के आवेग को रोक दिया था , वो दृष्टि अब झुकी हुई थी। 
"तुम कहाँ थीं ?" 
"तुम, तुम इतने दिन क्या करते रहे ?" पलट कर सवाल आया।  तीक्षणता  आसानी से जाती नहीं; यही तो धागा है जोड़े रखने का।  इस प्रतिप्रश्न ने पुराने उल्लास को जगा दिया।  
"मैं बहुत बहुत से कामों में उलझा था।  मुझे बहुत कुछ करना था। जाना था और पहाड़ पार करने थे।" लड़के का मन जाग उठा , हर वो बात बताने को जिसका कोई श्रोता अभी तक नहीं मिला है।  
"अच्छा, मुझे भी बहुत कुछ करना था। मैंने नदियां और समंदर पार किये। ये पेड़ कहाँ गए और वो खरगोश और वो फूल, वो झील का पानी ??? वो डालियाँ जिन पर मैंने झूला लगाया था। " लड़की ने कहीं दूर पहाड़ पर नज़र टिकाते कहा।  
"बहुत दिन हुए बरसात नहीं हुई। और पेड़ हमने काट दिए। "  क्या बस इतना ही  कहना है इसे , क्या यह मुझसे नहीं पूछेगी कि मैं कहाँ गया था और मैंने क्या देखा ? क्या वो अभी भी उस फूल को जो  झील में से निकाला था उसे याद कर रही है; यह सब ख्याल लड़के के मन में तैरने लगे.  
"क्यों !!!!" एक संवेग जगा लड़की के अंदर।  
"पहाड़ पर लकड़ी चाहिए  आग जलाने के लिए। " बेहद सपाट जवाब दिया उस लड़के ने। 
"आग तो हर जगह जल रही है।"
"तुमने फिर से उलझी हुई बातें करनी शुरू कर दी।  "
  " तुम यहां दुबारा कभी नहीं आये थे ?" 
"आता था, कभी कभी लकड़ियां काटने।   

लड़की ने उसकी तरफ अजब निगाह से देखा ; और आज पहली बार लड़के ने उसकी आँखों में देखने की कोशिश की. वहाँ अनसुने सवाल थे , आँखों के परदे के पीछे छिपे जवाब थे ; ना सुनी गई ख्वाहिशे और इच्छाएं थीं ; कामनाएं और  लालसाएं  जहां सो रही थीं गहरी नींद में।  इतना कुछ था वहाँ पर पहले कभी देखा नहीं।  अचानक लड़के को कुछ महसूस हुआ, उसे समझ आया कि अब कोई उलझन या दुविधा नहीं है ; यह उलझनें जिस अलबेले समय की थीं वो समय कब का बीत गया।  उसने ये भी जाना  कि अब वो लड़की महज वो अल्हड फूलों की बेल नहीं है जिसने उसने उस दिन देखा था , जिसके साथ झील के किनारे बैठ कर फूलों का संसार देखा था।  अब वो एक अलग दुनिया  लेकर आई है जिसमे उस लड़की के चेहरे के पीछे से एक औरत झाँक रही है।  लेकिन फिर ये और जाना कि अब  वो खुद भी बदल गया है,;  आश्चर्य और आवेगों का उसका वक़्त  भी गुजर गया है , अब उसमे बर्दाश्त और समझ आ गई है। अचानक उसने खुद से कहा ; 'अब तुम मुझे बहला नहीं सकोगी , अब मैं नाम चेहरे और रूप की दुनिया देख चुका। ' 
जो पता नहीं कहाँ से और कहाँ आगे जायेंगे 
एक सम्पूर्ण संसार बस गया उस एक निमिष में उन दोनों  के बीच।  समय का पहिया एक क्षणांश के लिए शायद थमा , कुछ देखा और फिर चल पड़ा , अनवरत अनंत की तरफ।  उस चलने को लड़की ने जान लिया।  

"अब मैं जाऊं ?"
"नहीं रुको,. " यह आदेश का स्वर था  जो पहली बार इस कायनात ने सुना  था।  एक मजबूत हड्डियों वाला हाथ आगे बढ़ा और उसने उस दुसरे उतने ही मजबूत लेकिन कोमल नसों वाले हाथ को थामा। 
लेकिन वो रुकी नहीं, रोक सकने  जितनी ताकत अभी उस हाथ में नहीं आई थी। लड़की को पता था कि इस मजबूत हाथ की ताकत  कितनी दूर कितने पास तक जा सकती है, इसलिए निश्चिन्त होकर  चलती गई एक नामालूम दिशा में।  एक पेड़ था उस चलने की दिशा में; कुछ पत्ते, टहनियों और सूखी डालियों को समेटे हुए।  वो बैठ गई वहाँ एक पत्थर पर; उस पेड़ के आस पास अब सिर्फ पत्थर थे जिनको शायद बैठने की गरज से ही वहाँ होना था।  एक फ्रेम था , जिसमे पत्थर हैं, पेड़ की सूखी झुर्रियों वाली डालियाँ हैं और पेड़ के नीचे  बैठे ये  मुसाफिर ; जो कहीं दूर रास्ते से आये हैं और अब किसी दूर देस को जायेंगे। यह सब समय का  एक फ्रेम था,  जिसमे ये सारे तय किरदार थे अपनी अपनी लाइन्स भूले हुए।

लड़की अभी भी सोच रही है कि यहां  क्यों  आ बैठी हूँ ? चली ही जाऊं ! और ये लड़का अब इतना अजनबी क्यों लग रहा है,  इसे अब चले ही  जाना चाहिए ; शायद इसके जाने के बाद मैं फिर से वो ढूंढ  सकूँ जिसके लिए यहां आई हूँ ? पर क्या ढूंढने आई हूँ ?  
'वो हंसी , वो फूलों की महक और सिंगार ; झील के पानी का जादू और उस पानी का ठंडा नशा जो चमड़ी को भेदता अंदर हड्डियों तक को भिगो देता है। ' फिर से कोई दिशा उसके पास आकर बुदबुदाई।  

"यहां, वो झुरमुट होते थे न, जिनमे खरगोश रहते थे।" 
" पता नहीं, मैंने तो  पहले भी कभी देखे नहीं थे। " लड़का अब थकने और ऊबने लगा था. क्यों बैठा है यहां ? ये कौन है जिसके लिए एक बार फिर  छलावे के फर्श पर चल रहा हूँ मैं ?

"वहाँ पहाड़ के पार एक झील है, वहाँ सुना है खरगोश भी हैं और वो सब फूल वगैरह भी. तुम वहाँ चली जाओ।"
पर लड़की  ने शायद सुना नहीं, वो कुछ बोल रही थी, " वो जादू, वो रंगीन नज़ारा ; वही सब देखने तो आई थी। नदी के इस पार ये था और उस पार मैं थी। तुमने पहाड़ के पार क्या देखा ? बताओ ?"  

और एक थकी निराश  जिज्ञासा ने  सिलसिला जगा दिया  किस्से और कहानी का। वक़्त का पैमाना रेत  गिराता  रहा,  कब फिर से हाथ  की अंगुलियां कंकड़ों से उलझती खुद में उलझीं ये सिर्फ वक़्त के कतरे ने देखा।  और शायद झील के किनारों ने भी देखा।  उन पथरीले किनारों ने फिर से पानी को आवाज़ दी। और देखते देखते एक रहस्य उस झील के भीतर से निकल  किनारों तक पहुँचने लगा।  लड़की के नज़र बेसाख्ता ही उस तरफ उठी और उसने पुकारा,

"अरे ये क्या है !!! देखो, क्या पानी बरसा है ? झील तो पानी से भरी दिख रही है !!!" लड़की के शरीर में जितना उत्साह और उल्लास का खून था वो सब इस वक़्त उसकी साँसों में भरा भाग रहा था।  

"कहाँ से आया पानी ?? तुम  फिर  से .."  लड़का अब की बार झुंझला गया।  मगर लड़की तो बगैर उसके जवाब  सुने दौड़ रही थी झील की तरफ, उसके ठन्डे पानी की छुअन की तरफ। 

"ये इतना पानी कहाँ से आया।  ये तो कब से सूखा ही पड़ा था ?"  संशय था, संदेह था और हैरानी की हद से भी ऊपर जाते सवाल थे लड़के के मन में।  उसके समझ में नहीं आता था कि  आखिर ये क्या गोरख धंधा है।  

"तुम कोई जादू मंत्र जानती हो क्या ? पिछली बार खरगोश थे , इस बार झील का पानी।  कौन हो, कहाँ से आई हो ?" 

"मैं, मैं तो उस पार ,,,,,,,,,,,,,," छप छप करते पैर थम गए। खिलखिलाहट लौट आई।  उपेक्षा लौट आई, बेपरवाही ने अपना चोला ओढ़ लिया। झील में  खूबसूरत फूल खिल रहे थे। 

"तुम, तुम जवाब दो ?" लड़के ने इस बार उस का हाथ ज़ोर से खींचा।  और उस सूखे उजाड़ बियाबान में पेड़ों पर डालियाँ फल रही थीं ,  लड़के के पैरों के नीचे नरम घास थी।  फूलों की बेलें महक रही थीं। 
लड़की ने मुस्कुरा कर ये सब देखा फिर मुड़ कर  लड़के की तरफ देखा।  जैसे पूछती हो,  तुम्हें रहस्य और जादू के संसार से इतनी हैरत क्यों है ??  इतने सवाल ही क्यों हैं, बस मान क्यों नहीं लेते कि  बस, ये है और यहां है।  

"मैं तुम्हारे लिए , उस दूर पहाड़ से बहती नदी के साथ आई  हूँ। चलो तुम्हें अब खरगोश दिखाऊं। " 

लड़के के माथे पर पानी की बूँदें थीं, उसकी सांस में तेजी और दिल में हज़ार बातें थी। मगर वहाँ  किसे परवाह थी;  उसका हाथ एक नर्म  हथेली ने थाम रखा था जिसमे गर्माहट थी एक पुराने परिचय की।  और वो दोनों चल रहे थे, उस  अनजानी  दिशा  और उस अनदेखे भुवन की तरफ।   

किसी ने पुकारा, आवाज़ दी।  लड़के के पैर  थमे , यह एक पहचानी आवाज़ का संकेत था।  कोई बुला रहा है उसे।  उसने लड़की की तरफ देखा और उसकी हथेली को कस के थामा  पर इतने में फूलों की वो बेल उसके ठन्डे हाथों से फिसलने  लगी।

"कहाँ जा रही हो ? रुको !!! "  

"वीरेन , क्या आज  भी  हम घूमने नहीं जाएंगे ? चलो ना, देखो हलकी हलकी बारिश हो रही है। "  और  वीरेन को किसी ने जगाया है।  

"तुम कब सोये ? उठो " 


Friday, 19 July 2013

उस पार --- भाग 2

  हालांकि ये   स्थिति भी ज्यादा देर  तक  नहीं  ठहर सकी .. उसने  खुद को एकबारगी फिर से फूलों की टहनियों और उस खरगोश की तलाश में व्यस्त कर लिया। पर जाने क्यों वो उत्साह अब मंद पड़  गया था।  और तभी उसकी आँखें जा टिकीं उस "फूल" पर .. वही जो झील में था .. अब भी वहीँ था .. उसे वो फूल चाहिए था ..बस चाहिए था .. लेकिन कैसे मिले .. दूर था .. "उह्ह किसे परवाह है .. मुझे चाहिए बस " .. उसने सोचा। 

उसने यहाँ वहाँ देखना और  तलाशना शुरू किया शायद कुछ   मिल जाए .. थोड़ी देर बाद उसे किसी पेड़ की एक टूटी  हुई लेकिन कुछ लम्बी टहनी या डाल  जैसा मिल गया .. "शायद ये  काम  कर जाए". 

उस टहनी को थामे वो पानी में उतरी .. पानी ठंडा था, इसके अलावा झील की तली काफी चिकनी और फिसलन भरी भी  थी .. इसलिए वो धीरे धीरे सावधानी से कदम बढ़ा रही थी .. और अब काफी हद तक पानी के भीतर थी। वो सब फूलों के गहने, जो उसने पहन रखे थे, अब धीरे धीरे ढीले होकर खुलने लगे थे और पानी की सतह पे बिखरने लगे थे  सिर्फ वो फूलों का ताज उसके सर पर  अभी  तक खिला  हुआ था लेकिन उसने खुद ही उसे हटा  दिया। अचानक से उसे  कुछ महसूस हुआ ... ठंडा पानी .. जिसकी  छुअन बेहद रहस्यमय थी ..एक मदहोश कर देने वाला नशा उस पर छा  रहा था .. उसने खुद को खो जाने दिया .. उस जादुई लम्हे और उस अलौकिक अनुभव में .. गहरे तक डूब जाने दिया खुद को  ..पानी जैसे उसके शरीर की बाहरी परत को भेदता हुआ अन्दर तक समा रहा था .. उसकी आत्मा को भिगो रहा था ..कुछ वक़्त  तक  वो ऐसे ही रही .. पानी में ..  उस वजह को भी भूल गई जो (फूल) उसे यहाँ पानी के भीतर लेकर आया था .

कुछ देर बाद अचानक जैसे वो नींद से जागी .. एक ख्याल उसके दिमाग में आया और उसे थोडा डर  लगा .. वो उस जादुई दुनिया से बाहर निकल आई .. उसने अपने होश संभाले और एक बार फिर  से उस फूल की तरफ देखा .. धीरे से .. ध्यान से उसने अपने हाथ में थामी हुई टहनी को आगे बढाया और उस फूल को उसके डंठल के साथ खींचा .. दो चार कोशिशों  के बाद उसने फूल को अपनी तरफ खींच लिया और डंठल समेत तोड़ भी लिया और फिर वो झील से बाहर निकल आई।


वो फूल, दुसरे आम फूलों से कुछ ज्यादा ही बड़ा था .. उसकी खुशबू , लड़की के मन मस्तिष्क पर छाने लगी थी या शायद अब भी वो उस रहस्य के आवरण में खोई हुई थी,  उसे महसूस  कर रही थी । उसने  अपने बालों का एक ढीला सा जूडा सा बनाया और वो फूल उसमे लगा दिया ..और फिर दुबारा झील की तरफ गई .. झील के आईने में खुद को देखा .. फूल उसके बालों में बेहद खूबसूरत लग रहा था या  ये महज़ उसकी कल्पना थी जो उस फूल को  और उसे भी  खूबसूरत बना रही थी ? उसे मालूम नहीं था   

और तभी एक बार फिर से उसने वो खरगोश देखा .. पेड़ के पास जाने क्या कर रहा था .. दोनॊ को एक एक दूसरे की उपस्थिति का पूरा अहसास था और दोनों एक दूसरे से कभी नज़रें मिलाते तो कभी नज़रें चुराते .. लड़की मुस्कुरा रही थी और खरगोश  अपनी चमकीली आँखें झपका रहा था। कुछ देर  बाद  खरगोश  पेड़ों के एक झुरमुट की और भाग चला .. जिज्ञासा,  लड़की को खरगोश के पीछे ले गई .. उस झुरमुट के अन्दर .. 

और क्या था वहाँ  .. वहाँ तीन चार खरगोश और भी थे।  उसने अपने चारों और देखा और उसका चेहरा चमक उठा बच्चों जैसी ख़ुशी और उत्साह से .. एक बार फिर से उसके मन  मस्तिष्क और उसकी आत्मा  झूम उठी उस नज़ारे को देखकर, भूल गई कि थोड़ी देर पहले क्या था, क्या नहीं था ..  और फिर अगले कुछ ही क्षणों में लड़की ने उन नर्म नाजुक छोटे दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर दिया या उन्होंने उसका हाथ थाम लिया,  कह पाना मुश्किल है .. लेकिन इतना ज़रूर था कि  एक दुसरे का साथ उन्हें बहुत पसंद आ रहा था और वो उसका पूरा मज़ा ले रहे थे। कुछ घंटे और बीत गए .. वो भूल गई, समय को, समय के बंधनों को और शेष जगत को .. यहाँ तक कि  उसे नींद आ गई .. नींद में उसे ख्वाब आ रहे थे .. ख्वाब "उस पार" के, ख्वाब परछाइयों के, प्रतिबिम्बों के और हाँ खरगोशों के भी। 

अचानक एक तेज़ आवाज़ ने उस जगह की खामोशी को तोडा .. कोई पुकार रहा है .. वो जाग गई ..  

"ये किस  किस्म का शोर है?" वो बुदबुदाई और झील की तरफ  लौटी। 

वो लड़का, वोही .. यहाँ वहाँ घूम रहा था .. सब तरफ उसका नाम पुकारता ढूंढ रहा था .. 

"जून .. जून .. कहाँ हो तुम ?" 

वो उसे वापिस आया  देख कर हैरान थी .. कुछ देर यूँही खामोश खड़ी  रही और उसकी हरकतों को देखती रही। 

आखिर लड़के की नज़र उस पर पड़ी .. " तो तुम यहाँ हो " .. लड़का उसे देख कर खुश था ... हालाँकि वो हांफ रहा था लेकिन एक बड़ी सी मुस्कान उसके चेहरे पर बिखर गई। लड़की ने इसे देखा, समझा और  उसकी तरफ बढ़ आई .. वो अब भी उसे आश्चर्य से देख रही थी। 

"कुछ बोलो ना .. मैंने तो सोचा था कि  तुम अब तक जा चुकी होंगी लेकिन देखता हूँ कि  तुम अब भी .."

"हाँ मैं यहीं थी .." लड़की ने धीरे से जवाब दिया। लड़के ने उस अनकही ख़ुशी को और उस छुपाये गए उत्साह  को देख लिया था ..जान लिया था, समझ लिया था जो उसके शब्दों के पीछे से झाँक रहा था। 

"तो तुम वापिस कैसे आ गए .. मैंने सोचा था कि  तुम चले गए हो, तुम्हारे लोग तुम्हे बुला रहे थे ना .."


"हाँ, कुछ काम था, पर मैंने कर लिया और वापिस आ गया .. ये देखने कि  क्या तुम अब भी यहीं हो या .."  अब उसकी साँसे सामान्य होने लगी थी। 

वो उसके शब्दों को गौर से सुन रही थी ..

"तो क्या कर रही थी तुम इतनी देर  तक ..और डर  नहीं लगा तुम्हे". 

"डर  किस बात का ?" 

"ये जगह, बिलकुल अकेले .."  लड़के ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया और अचानक जोर से चिल्ला कर पूछा ... "वो सारे फूल कहाँ गए?" 

पहले तो वो हंसी,  फिर थोडा रुक कर उसने कहा .. " चले गए, खो गए". 

"खो गए?? कहाँ?"  वो कुछ समझ नहीं पाया .. हज़ारों ख्याल उसके मन को झिंझोड़ने लगे। 

लेकिन लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी, उसकी आँखें एक रहस्यपूर्ण  तरीके से चमक  रही थी, कुछ देर तक खामोश रही वो जैसे कोई बड़ा राज़ छुपा रही हो, फिर एक बार  खिलखिलाई और उसने वही जवाब दोहरा दिया .. " खो गये." 

लड़का अब् भी  उलझन में था .. कुछ पूछना चाहता था लेकिन जानता नहीं  था कि  कैसे पूछे ..

"क्या तुमने इसे नहीं देखा ?" लड़की ने अपने बालों में लगे फूल की तरफ इशारा किया .. उसका चेहरा अब एक विजेता के जैसी ख़ुशी से दमक रहा था।  एक पल को लड़का कुछ समझ नहीं पाया लेकिन फिर अगले ही क्षण उसने झील की तरफ देखा (झील ज्यादा दूर नहीं थी ) और फिर उस फूल की तरफ .. .

"तुमने ये कैसे किया .."? लड़के की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गई। 

वो मुस्कुराई .. "बस कर लिया ... मैं पानी में गई, और फूल को एक  टूटी टहनी की मदद से तोड़ लिया।"  वो  ऐसे  बता रही थी  जैसे कोई छोटा बच्चा स्कूल में  होमवर्क के लिए मिली तारीफ़ के बारे में बता रहा  हो।     

  "तुम पागल हो हो ..?? पानी में गई !!!!!!!!!!!!"

"हाँ .." उसने लापरवाही से जवाब दिया।

"तुम पागल हो, बिलकुल पागल. ये  खतरनाक हो सकता था .. तुम जानती नहीं क्या ?"

" ऐसा कुछ भी नहीं था,  ना तो ये कोई बड़ा खतरनाक  काम था और ना ही इसमें कोई परेशानी लगी।" 

लड़की की आवाज़ में एक लापरवाही और उपेक्षा सी थी उसके सवालों के लिये. और शायद इसलिए, लड़के ने कहे गए शब्दों से कहीं  ज्यादा सुना और जितना उसके कहने का अर्थ था उस से कहीं  ज्यादा समझा भी. और अब लड़के का उत्साह और ख़ुशी जो उस से  मिलने पर  था, अब फीका पड़ने लगा. 

लेकन इस सबसे बेखबर वो अब फिर से पेड़ों के झुरमुट की ओर  जा रही थी।     

"अब तुम कहाँ जा रही हो?" वो अब भी उलझन से घिरा था। 


"मैं ... मैं वो ..मैं तुम्हे कुछ दिखाना चाहती हूँ ..चलो .. चलो ना ".

लड़के ने हालाँकि आगे कुछ नहीं पूछा और वो उसके पीछे चलता गया लेकिन अब दिल में एक भारीपन था. और अब वो दोनों झुरमुट के पास थे. लगा जैसे लड़की थोड़ी निराश सी हुई हो, खरगोश और उनका कोई नामोनिशान आस पास नहीं था। 

"वो खरगोश कहाँ गए?" 

"कौनसे खरगोश?"

"यहीं तो थे, उन्ही के साथ तो मैं पूरा वक़्त खेल रही थी जब तुम यहाँ नहीं थे".  

अब लड़का थोडा और हैरान परेशान हो गया .. "मैंने तो यहाँ कभी कोई खरगोश नहीं देखे." 

'पर वो यहीं थे ..अच्छा  चलो रहने दो .. ज़रा इसे देखो  तो .." 

लड़की अब एक बड़े से  बरगद के पेड़ की तरफ गई और पेड़ से लटकती उसकी लम्बी जड़ों के एक जोड़े को थाम लिया, जो बिलकुल एक कुदरत के बनाये झूले जैसा लग रहा था। वो उस पर बैठ गई और धीरे धीरे झूलने लगी .. झूला गति पकड़ने लगा .. ऊपर उठता हुआ और फिर नीचे आता हुआ ..

"अरे, ध्यान से, कहीं गिर ना जाओ". लड़का परेशान था।

लड़की हंसी .. और उस लम्हे में लगा जैसे कोई झरना बह निकला  हो ... ऊँचे पहाड़ों से गिरता हुआ .. आश्चर्य के साथ लड़का उसे फिर से देख रहा था .. " तुम पागल हो .."


झूले की गति अब काफी बढ़ गई थी पर जैसे इतना काफी नहीं था .. लड़की ने अब उन टहनियों के झूले को गोल घेरे में घुमा के झूलना शुरू किया  और लड़का अब पूरी तरह अचंभित था .. उस लड़की की हंसी और उमंगें जैसे हवा में चुम्बकीय तरंगें पैदा कर रही थी और हर उस चीज़ को अपने में समाती जा रही थी जो वक़्त के उस लम्हे में, धरती के उस टुकड़े पर मौजूद था। लेकिन लगता नहीं था कि  लड़की को इस सबका भान था, वो तो सिर्फ झूलने का आनद ले रही थी। लड़के ने महसूस किया वो अपनी आँखें नहीं हटा पा रहा उस से .. उस लड़की से .. या शायद वो हटाना ही नहीं चाहता .. जो भी था .. लड़की ने इस बात को समझ लिया। 

लड़की ने उसकी आँखों को देखा .. उनमे लालसाएं थीं, आकांक्षाएं थीं, महत्वाकांक्षाएं थी, अपेक्षाएं थीं और … और बहुत कुछ  था … और उसकी आँखों में लड़के ने एक  सपना देखा जो झिलमिलाते हुए पर्दों के पीछे छिपा था . वो आगे बढा … 

"तुमने अभी तक मेरा  नाम नहीं पूछा". 

"मैं जानती हूँ तुम्हारा नाम ।" एक और बेपरवाह जवाब. 

" तुम जानती हो !!!!!!!!!!!!,  लेकिन  मैंने तो  तुम्हे नहीं बताया, फिर कैसे । कैसे तुम जानती हो ?"  लड़का अब उसके ठीक  सामने आकर खड़ा हो गया. 
  
"क्या …"  एक क्षण के लिए उसकी हंसी रुक गई और वो निरुत्तर हो गई. 

लड़के ने अपना सवाल दोहराया … लड़की की मुस्कान फिर से लौट आई. दूर अज्ञात क्षितिज को देखते हुए उसने कहा …

" तुम्हारा नाम छलावा  है … तुम्हारा नाम है सतरंगी आभास, भ्रम, तृष्णा … "

लड़के ने झूले को कस कर पकड़ लिया और उसकी तरफ देखने लगा  लेकिन लड़की ने  कोमलता से उसका हाथ हटाया और रुक चुके झूले से उठ खड़ी हुई. 

लड़का खामोश था लेकिन शायद कुछ  कहना चाहता था. 

लड़की ने सुन लिया … वो मुड़ी … लेकिन ये क्या … 

हर चीज़ … उसके चारों ओर, वो लड़का … सब कुछ एक भंवर में समाता और गायब होता जा रहा था.  वो डर कर चीखी … उसने अपना हाथ आगे बढाया शायद कुछ थामने के लिए या पकड़ने के लिए … लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. 


"रुकॊऒऒओ … " उसकी साँसे तेज़ तेज़ चल रही थी पसीने से नहा  गई थी वो. 

" बिटिया, सोना … क्या हुआ  … कुछ नहीं बस एक बुरा सपना ही था, शांत हो जा".  ये उसके माता पिता थे.   

और तभी उसके सेलफोन की रिंग टोन बज उठी … "छोटी सी कहानी से बारिशों के पानी से सारी वादी भर गई … "