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Wednesday, 10 June 2020

वनीला कॉफ़ी -- 3

"दो सदियों के संगम पर मिलने आये हैं, एक समय लेकिन दो सदियां , दो सदियां ". 

"तुम गाने भी इतने बोरिंग और डिप्रेसिंग किस्म के गाती  हो कि  मेरा मन होता है  कि अभी यहां से भाग जाऊं !!"

"क्यों, इतना अच्छा गाना है।  तुम्हें क्या पसंद है ?"

"कुछ भी, थोड़ा lively, कुछ full  of spirit जैसा। "

"तो हाई स्कूल musicals कैसा रहेगा ? पर मुझे वो गाना नहीं आता। "

"अब मैंने हाई स्कूल musicals  के लिए तो नहीं कहा ना !!"

" खैर, तुम यहां इस छोटे शहर में क्यों आये ?"

"अब ये तुम्हारा छोटा बड़ा शहर बीच में कहाँ से आया ? हम लोग तो कुछ गाने की बात कर रहे थे। "

'लेकिन हम कोई अंताक्षरी नहीं खेल रहे कि  और कोई बात बीच  में नहीं कही जा सकती। "

"ओके, i  Surrender .  मैं यहां डेजर्ट सफारी के लिए आया हूँ, कंपनी ने मुझे पेड हॉलीडेज पर यहां भेज दिया।  मुझे कहा कि  भाई गौरव, तुम हमारे बड़े ही काबिल एम्प्लॉई हो  तो जाओ और ऐश करो। और बस, मैंने कहा कि  मुझे ये सूखा रेगिस्तान और ये पुराने  महल हवेलियां और ये शानदार हेरिटेज होटल्स देखने हैं, घूमने हैं तो उन्होंने मेरे लिए टिकट करवा दी और रहने को कुछ allowance भी  दे दिया।  गाडी मैं अपनी लाया ही हूँ।  " 

"बस इसलिए या और भी कोई  बहाना है तुम्हारे पास ?" 

"बहाना !!!! सुनयना, तुम क्या कोई खास बहाना सुनना चाहती हो ?"

"नहीं, मैं सिर्फ कोशिश कर रही हूँ कि  समझ सकूँ तुम्हारे यहां आने की असली वजह क्या है ? तुम्हारी अच्छी खासी कॉस्मो सिटी लाइफ के बीच ये ट्रैन का छोटा स्टेशन कैसे आ गया ? " 

"ऐसे ही,  यहां से  कुछ नए बड़े रास्ते भी निकल सकते हैं।"

 "आज हम मैरिएट जायेंगे। मैं बोर हो गया तुम्हारे इन हेरिटेज होटल्स का इंटीरियर देख देख कर। "

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"तुम, तुमको याद है कि एक बार तुमने मुझसे कहा था कि, तुम्हारे लिए मसूरी से थोड़ी बर्फ और पहाड़ लेकर आऊं।  पहाड़ का नज़ारा और पता नहीं क्या क्या कबाड़। 
"अब कबाड़ है तो तुम  क्यों याद कर रहे हो ? और मुझे क्यों बता रहे हो ? 

"पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, सुरमई उजाला है, चम्पई अँधेरा है।"

"तुम्हारी वो एक्स .. फ्रेंड, रिद्धि   वो अभी वहीँ है या कहीं  दूसरे  शहर शिफ्ट हो गई ?"

"वो एक साल पहले ऑस्ट्रेलिया  चली गई। बात होती है  पर अब वो वहीँ सेटल्ड है  फ़िलहाल के लिए  और मैं  शायद कनाडा जाऊँगा अगले साल।  और कोई जानकारी चाहिए मोहतरमा आपको ? वैसे, आपका क्या चल रहा है, आप का क्या मूड है ? कब तक आप ऐसे कहानी लिखने में और कहानी का थीम ढूंढने में ....? "

"अब तुम अपनी असहजता को मेरी तरफ मोड़ रहे हो। तुम  अब तक चार या पांच  बार डेटिंग एंड मीटिंग एंड कोर्टशिप के किस्से मुझे बता चुके हो  और फिर भी मुझसे पूछ ऐसे रहे हो जैसे  तुमने बड़े  अच्छे ढंग से ..... "

"मैं  तुम्हारी तरह  खुद को दायरों में बिना वजह के क़ैद नहीं रखता।  सुनयना, तुम्हें नहीं  लगता कि  तुम खुद की ही खींची हुई  बॉउंड्रीज़ में बंद हो और बाहर देखना भी नहीं चाहती। "

"तो तुम्हारी तरह इस  टेबल से उस टेबल तक, इस मेनू कार्ड से उस मेनू कार्ड तक एक एंडलेस तलाश में घूमते  रहे ? ये ठीक लगता है तुम्हें ?"

"क्या मेनू कार्ड और कौनसी टेबल ? तुम क्या कहना चाहती हो ? तुम कहना चाहती हो की मैं यूँही टाइम पास कर रहा था और फ़्लर्ट कर रहा था !!!!!! और चार पांच बार कौनसा कैलकुलेशन किया तुमने ?? ज़रा बताओ ? किस किस की बात कर रही हो तुम ? अगर तुम रिद्धि की बात कर रही हो तो उस वक़्त हम लोग सीरियस थे पर उसके पेरेंट्स नहीं माने। जो कोशिश कर सकता था वो की ही थी।  तिशा  अपने बॉयफ्रेंड से शादी करना चाहती थी और ये उसने मुझे बहुत बाद में बताया जब ऑलमोस्ट सब फाइनल हो चुका  था। मैं इस अधूरे मन वाले रिश्ते को ज़िन्दगी भर नहीं झेल सकता था। "

"मुझे तो नहीं लगता कि  रिद्धि के लिए तुमने कोशिश की थी, वर्ना वो ऑस्ट्रेलिया क्यों जाती  और रही बात तिशा की,  तो तुम्हीं ने बताया था कि  उसने अभी तक शादी नहीं की है। "

"तिशा, अपनी ज़िन्दगी में आराम से है, किस से शादी करेगी, नहीं करेगी ये मेरा सिरदर्द नहीं  है। मेरी उस से कभी कभी बात होती है, पार्टीज में, पब में मिलते हैं कभी कभी।  बस। कोई ज़रूरी है कि  हम उसी रास्ते वापिस जाएँ ?" 

"तुमने  तिशा  से  नहीं पूछा, हो सकता है कि ... ?"

"सुनयना, तुम ये ज़रूरत से ज्यादा  ही फ़िल्मी कहानी बनाने की सोच रही हो। "

"मुझे लगता है कि, it was all your fault . And even after those experiences, you are still wandering and roaming around. It doesn't seem that you have learnt anything."

"What learnt, and what fault are you talking about ? what are you trying to say ? and what are those 4-5 times !!! will you please bother to explain ? I am losing my patience, be clear with your words. There is a limit for everything."

"How do I know, last month, you were talking about a dinner date and all ... I guessed you might have found a new girlfriend. am I right ?"

 "dinner date !!! I used to hang out with my friends and colleagues for dinner and parties; how can it be called a Date ?? and even if I am having a new girlfriend then how it is related with my past relationships ? However, Sunayana, I am not having any girlfriend these days. How did you reached to this conclusion of wandering and all ?"

"And if you are trying to blame me for all those things which were out of my control or where I had a little role to manage the situation then it is your own bias, your own judgmental mindset. You have always been rude and harsh with me; you think I am some sort of romeo ... is this what you think about me ??? I do not expect any answer." Anger mounted in his mind and a flow of unexpected thoughts rolled out from his mouth.

"I never wanted to say this, thought it will hurt you and I really never wanted to do that. But I think if you continued this type of behavior;  this being rude and judgmental to other people's lives and giving your half-baked opinion  on their relationship matters, provided that you never had been in any relationship before; how can you even imagine or understand about all this love and romance and emotions that get attached with all these things."

"What do you mean by rude, harsh and judgmental ?? I was trying to understand... why are you venting on  me ? what wrong did I said ? was it so wrong to ask  about your past relationships ?"

"You don't want to understand, you only want baseless allegations and negative points. we better not talk about this, I already said you won't be able to handle it;  but Sunayana, you are not a little kid. And with this arrogance, I fear you will end up destroying your future if ever happened relationships, in fact you will ruin things with your judgmental attitude." 

"I never thought my words are hurting you this much. I bothered you a lot. I was not aware..."

"Yes, it does hurt when you speak such harsh words. And these useless vanilla talks are useless, why the hell did you started it, why are you interested in my relationships." His voice tone was rough.

"I will not bother you from now onward, I want to go home." With a choking voice she spoke. 

"Ok."

"Can't I get a cab or auto ?"

"What cab auto you want !!!! we came here together and I will drop you home. Get in the car. "

"No, I will go myself." Moist eyes yet a firm slow voice.

"Don't create scene here and get in the car." Every word was spoken with a strong tone.

 "Will you not stop crying?" His anger was now turning into frustration and helplessness.

With this question the timid sound of tears stopped. A harsh silence prevailed between them.

She turned her face towards window and set her gaze in a vacuum. The car was running at a faster pace and so does the feelings of heart.

"Say something, Sunayana ...."

"Being quiet and bearing with this was an easy thing." he murmured and stared hard at the road.

finally, the destination arrived. She got out of the car and stepped towards the gate. With a decision of Not Bothering Back.



To Be Continued ...

Part 1
  







Monday, 18 November 2013

राधा बाई की लव स्टोरी --- अंतिम भाग

इस से पहले कि कोई सवाल जवाब हो, राधा ने खुद ही बताना शुरू किया कि पिछले कुछ दिन से लगातार  लक्ष्मण फोन पर उस से बात कर रहा था  और शादी के लिए तैयार हो गया है. उसने वकील से बात भी कर ली है और अब दिन भी तय हो गया है.

"क्याआअ, तूने शादी की तारीख भी तय कर ली." माताजी अभी तक इस आकस्मिक ट्विस्ट को  सम्भाल नहीं पा रही थी.

"मैंने नहीं किया, लक्ष्मण ने सब ठीक कर दिया है." राधा ने शर्माते हुए कहा.

"तो तू कब शादी कर रही है?" मुझे नई बाई ढूंढने की फिकर हो रही थी.

"इसी  महीने की छब्बीस को." राधा ने एक चौड़ी मुस्कराहट के साथ जवाब दिया।


"इतनी जल्दी !!!!!!! तू मज़ाक कर रही है ?"  माताजी के चेहरे पर थोड़ी चिंता दिखी।

"नहीं,  सब तय कर लिया है. मैं दो या तीन दिन पहले से ही काम छोड़ दूँगी। अभी घर में किसी को  कुछ नहीं बताया और ना बताउंगी। उनको पता चलेगा तो मेरा घर से निकलना ही बंद कर देंगे। आप भी किसी से कुछ मत कहना,  किसी से भी नहीं।" आखिरी शब्दों में राधा का डर , उसकी आशंकाएं और आने वाले समय की चुनौतियां साफ़ सुनाई दे रही थी.

मैं और मम्मी कई सवाल  पूछते रहे पर कोई  सीधा सरल जवाब नहीं मिला और सारा मामला किसी  मोटे भारी परदे के पीछे छिपा सा लगने लगा. राधा घर से भाग कर, छुप कर शादी कर रही है, कोर्ट मैरिज कर रही है। ... पर, लेकिन, किन्तु और साथ में परन्तु की पूंछ। …

 इसके बाद घटनाचक्र बहुत तेज़ी से चलता गया, दिन बीते और आखिर छब्बीस तारीख वाला हफ्ता भी आ गया. और जैसा राधा ने कहा था, चौबीस तारीख को हम  इंतज़ार करते रहे पर वो नहीं आई और उसके बाद भी नहीं। राधा के बारे में कोई खबर या कोई बात भी सुनने  को नहीं मिली सिवाय उस खोजबीन अभियान के जो छब्बीस तारीख के बाद उसके घरवालों ने शुरू किया। जिन घरों में वो काम करती थी, उन सबके यहाँ फोन करके पूछा गया. जानते सभी थे कि वो कहाँ और किसके साथ और क्यों गई होगी पर मानने को कोई तैयार ना था.

राधा गई और उसकी शादी हुई या नहीं अगर हुई तो आगे क्या हुआ, ससुराल कैसा है, पति कैसा है और सबसे बड़ी बात राधा खुद कहाँ और कैसी है इस बात कि कोई खबर अगले तीन चार महीनों तक किसी को नहीं मिली।  मम्मी अक्सर याद करती कि राधा का ना जाने क्या हुआ.

आखिरकार  एक दिन फोन आया, राधा ने  महज़ दो मिनट बात की और कहा कि वो जल्दी ही  मिलने आएगी। पर वो जल्दी वाला वक़्त उसके बाद भी एक महीने तक नहीं आया.

दीवाली से  कुछ पहले राधा का फिर से फोन आया, इस बार उसने वादा किया कि वो ज़रूर मिलने आएगी।  और सचमुच वो आई, दीवाली के अगले दिन और अकेले नहीं अपने पति के साथ आई. लाल रंग का राजस्थानी बेस पहने हुए, हल्का मेकअप, हाथों में लाल सुनहरी रंग वाली चूड़ियाँ और तो और राधा के चेहरे  की रंगत भी कुछ निखरी हुई सी लगी.  मम्मी ने हर तरह से उन दोनों की  मेहमान नवाजी की. राधा ने शर्माते हुए मुझसे रसोई में आकर पूछा कि "दीदी, लक्ष्मण  को देखा? कैसा लगा ?" 

राधा के पूछने से पहले ही मैंने लक्ष्मण को गेट से अंदर आते देखा था, दुबला पतला, गहरे सांवले रंग का आदमी  जो शायद अट्ठाइस या उन्नतीस का होगा या शायद इस से एकाध वर्ष आगे पीछे। दोनों जोड़े में अच्छे लग रहे थे.  एक नज़र देखने से सबकुछ भरा पूरा और सामान्य से कुछ ज्यादा ही अच्छा जान पड़  रहा था.



 और फिर  राधा से बतियाते हुए इस अजीब लव स्टोरी के रंग बिरंगे  पहलू सामने  आये. 

विश्वास  करना मुश्किल था, लेकिन ऐसा सम्भव नहीं ये भी नहीं कहा जा सकता था. राधा ने बताया कि उसकी शादी के बाद उसकी माँ ने पुलिस थाने  में शिकायत दर्ज करवाई कि राधा घर से गहने चुरा कर ले गई है, लक्ष्मण  और उसके घर वाले राधा को जबर्दस्ती ले गए हैं, वगेरह।. उसके पति को धमकियां दी गई कि वो राधा को वापिस भेज दे वर्ना बुरे नतीजे हो सकते हैं. कई हफ़्तों तक ये मामला चला, थाने  के कई चक्कर काटने और कागज़ी खानापूरी के बाद  कुछ ले देकर राधा के ससुराल वालों ने मामला रफा दफा करवाया। 

"लेकिन तेरी माँ ने पुलिस में चोरी की  रिपोर्ट क्यों की?"  मैंने पूछा।

"हमारे गाँव और जाति  में रिवाज है कि शादी के वक़्त लड़के वाले लड़की वालों को रुपये  देते है।  कई बार लाख दो लाख तक मिल जाता है. लेकिन मैंने अपनी मर्ज़ी से शादी की, इसलिए घर वालों को कुछ नहीं मिला।"

इस तरह का रिवाज कुछ आदिवासी इलाकों में है ये तो मैं जानती थी पर राधा के गाँव में भी ऐसा कुछ है ये पहली बार पता चला. खैर, कहानी अभी और आगे थी. 

"मेरी बहन शोभा ने भी मेरे घर से जाने के तीन चार दिन बाद भाग कर शादी कर ली. पर उसकी शादी गाँव के ही लड़के से हुई और उन्होंने मेरी माँ को एक लाख रुपये  दिए है.  मेरा रिश्ता जिस बूढ़े से तय किया था वो दो लाख देने वाला था पर मैं पहले ही घर से भाग गई." इतना सब बताते हुए राधा के चेहरे पर एक गर्व की  चमक और आवाज़ में जीत की खनक थी. 

"पर अब मैं खुश हूँ, ससुराल बहुत अच्छा है." मुस्कुराते हुए उसने अपनी कहानी पूरी की. 

ज़ाहिर है ये सुनकर माँ को तसल्ली हुई. पर अभी कुछ परतें और बाकी थी.

लेकिन जाने से पहले राधा ने मम्मी से अपने आधे महीने की  तनख्वाह के पैसे मांगे, ये कहकर कि उसे रुपयों की  बड़ी ज़रूरत है.  सुनकर थोडा अजीब तो लगा कि जब उसका पति अच्छा कमाता है तब उसे एक छोटी सी रकम की  क्या ज़रूरत, खैर उस समय रुपये  दे दिए गए. 

उस दिन मम्मी पूरे वक़्त राधा के बारे में ही बोलती रही। … "बढई  का काम है, कह रही थी कि महीने के  नौ दस हज़ार कमा लेता है." 

"अगर सच में इतना  कमाता है  तो इस तरह चार सौ रुपये के लिए नहीं कहती।" मेरी आवाज़ तीखी और संदेह से भरी थी. 

अगले दिन राधा फिर से आई, बिना फोन किये, अचानक ही दोपहर के तीन बजे. सीधे मम्मी के पास गई। . 

"मेरा एक काम कर दो, मुझे तुरंत दो हज़ार रुपयों की  सख्त ज़रूरत है, मेरे ससुराल वालों के गाँव जाना है. मुझे किसी भी हालत में अभी पैसे चाहिए।" 

कुछ देर तक मैंने उसे टालने की  कोशिश की लेकिन मम्मी को यकीन था कि उसे सचमुच किसी बहुत बड़ी और गम्भीर वजह से रुपयों की ज़रूरत है, इसलिए दे देने चाहिए।  मैंने बात घुमाने कि गरज से पूछा कि जब तेरा पति इतना कमा रहा है तो फिर उधार  लेने की  क्या ज़रूरत पड़ी वो भी  त्यौहार के समय?? 

जवाब मिला कि आजकल काम ज़रा मंदा चल रहा है, जैसे ही नया काम मिलेगा वो तुरंत रूपये  लौटा देगी या फिर " आप अपने घर में लकड़ी का जो  काम अधूरा पड़ा है वो करवा लेना उस से, हिसाब पूरा हो जाएगा।"  

राधा का ये हिसाब मेरी समझ में नहीं आया, लेकिन मम्मी का चेहरा देख कर आखिर उसे पांच सौ रुपये देने पर सहमति बनी. वो भी इस वादे पर कि वो ये रुपये  और उसके पहले के उधार लिए हुए एक हज़ार रुपये जो उसने शादी से काफी पहले लिए थे, सब एक साथ चुका  देगी , इस महीने के आखिर तक. 

राधा के जाने के बाद कहीं ना कहीं इतना तो समझ आ ही गया कि वो "खुद का काम, दुकान और नौकर, अमावस को नौकरों की  मजदूरी का हिसाब, महीने के नौ हज़ार की  कमाई" सब केवल बातें थी, कथाएं थी.  क्योंकि इस बार राधा खुद ही बता गई थी कि लक्ष्मण किसी सेठ  के यहाँ काम करता है, जिसके पास  इस बार कोई बड़ा काम हाथ में ना होने की वजह से, उसके ज्यादातर मजदूर खाली बैठे हैं. और यही वजह थी कि त्यौहार के दिन राधा माताजी को मिलने नहीं केवल अपने बकाया पैसे लेने आई थी. इस बात का अहसास होने  पर कि राधा अपने पुराने लगाव के  कारण नहीं सिर्फ रुपयों कि ज़रूरत के चलते मिलने आई थी, माताजी का मूड थोडा उखड़ा सा रहा; पर उन्हें अभी भी विश्वास  है कि जैसे ही स्थितियां सामान्य होंगी,  राधा उनसे मिलने  वापिस आएगी और  उधार लिए रुपये भी दे जायेगी।


और अब एक बार फिर से राधा की  कोई खबर नहीं है. मुझे यकीन है कि वे रुपये अब डूबत खाते में जा चुके हैं.   हमें अभी तक नई बाई भी नहीं  मिली है, तलाश ज़ारी है.  


Image Courtesy --- Google


First Part of the Story can be read Here

 Second Part of the Story can be read Here

Tuesday, 20 August 2013

राधा बाई की लव स्टोरी --- पार्ट २

राधा की कोर्ट मैरिज में अभी कुछ वक़्त था .. लेकिन तब तक प्लानिंग भी तो करनी थी ना .. आखिर शादी होने वाली है। लेकिन तभी राधा ने फिर से ४ दिन की छुट्टी ली। पांचवे दिन देवी जी प्रकट हुई, आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई।

"अब क्या हुआ ?" 

" घर में बहुत झगडा हुआ था ?"  राधा जी उदास हैं।

और फिर जो किस्सा सुनाया गया वो इस तरह कि घर में इसी मुद्दे को लेकर हंगामा मचा  है, झगडा हो रहा है राधा और उसकी माँ के बीच और इसलिए राधा जी ने एलान किया है कि  वो खाना नहीं खायेंगी तब तक नहीं जब तक माँ,  हाँ  नहीं  कह देती और पिछले चार दिन से  सचमुच कुछ नहीं खाया ।

"क्या .. तू पागल हो गई है .." माताजी फिक्रमंद हैं।

"मैंने तो मन्नत मांग ली है, गाँठ बाँध ली है चुन्नी में ..तभी खाना खाऊँगी जब घरवाले मान जायेंगे।"

" खाना नहीं खाएगी तो क्या भूखी मरेगी?" 

"मैंने तो देखो मेहंदी में भी उसका नाम लिखवा  लिया है"   राधा देवी ने अपनी बायें  हाथ की हथेली आगे की … वहाँ लक्ष्मण नाम शोभायमान था. 

"अब अगर बच गई तो "उसकी" वर्ना भगवान् की, " राधा जी ने गहरी सांस ली.  

अब यकीन हो गया कि  कुछ  धमाकेदार होने वाला है.  और उसके लिए ज्यादा इंतज़ार भी नहीं करना पड़ा.  दो  दिन बाद  एक  नई  खबर आई ...

" माँ   मान गई है, कहती है कि लड़के वाले घर आये हमसे रिश्ते की बात  करने। अब परसों आयेंगे उसके घर से "सब लोग".  

"ये कैसे हो गया ??" 

" भगवान् ने सदबुद्धि  दी मेरी माँ  को, मेरी मन्नत पूरी हो गई, आज जाउंगी मंदिर प्रसाद चढाने।"


 उसके बाद शुरू हुआ सलाहों का दौर …. "अच्छी मिठाई और नमकीन मंगवा के रखना,  मेन  रोड वाली श्यामा स्वीट्स से लेना और उसी से गुड डे बिस्किट के पैकेट भी. और सुन तू अच्छी  सी ड्रेस पहनना। . है तेरे पास कोई ढंग की बढ़िया ड्रेस ??"   इस आखिरी सवाल ने मुझे चिंतित कर दिया, कहीं मेरी ही किसी ड्रेस का नंबर ना लग जाए ….  शुक्र था कि  राधा का जवाब हाँ में था.

"उसने मुझे कहा है कि   कोर्ट मैरिज करेंगे तो वो मुझे गोल बाज़ार ले जाएगा और वहाँ से नई  ड्रेस, पायल और मेकअप  का सामान खरीद कर देगा।" 

"वो सब जब होगा तब होगा , फिलहाल तो तू अच्छी ड्रेस पहन के ढंग से तैयार होना।" माताजी ने झिडकी और सीख दोनों एकसाथ  दी. 

फिर दो दिन इसी मुद्दे पर लम्बी और गंभीर किस्म  की वार्ताएं  हमारी डाइनिंग टेबल पर चलती रही. और फिर वो दिन भी आ गया, उस दिन राधा बाई ने छुट्टी ली ना सिर्फ उस दिन बल्कि उसके बाद तीन  दिन और भी. ज़ाहिर अब मेरे साथ माताजी का पारा  उसकी लगातार छुट्टियों की वजह से चढ़ने भी लगा और साथ ही चिंता भी बढ़ने लगी कि  आखिर हुआ क्या। … 

तो आखिर पर्दा उठा,  राधा देवी आई, बैठी और बिना पूछे ही उन्होंने सारा किस्सा शुरू से आखिर तक कह सुनाया। आप भी सुनिये लेकिन संक्षेप में।  

"उस दिन " राधा की होने वाली ससुराल का पूरा कुनबा आया, सास, ससुर,  उनके दोनों सुपुत्र, तीन सुपुत्रियाँ अपने पति-बच्चों समेत. वे लोग आये, लेकिन राधा की माँ ने उनमे से किसी से भी बात नहीं की, पानी तक नहीं पूछा, वे लोग काफी देर रुके, लेकिन ना माँ ने और ना राधा के पिता ने उनसे एक बार भी बात की. राधा ने ही उन्हें खिलाया पिलाया (बड़ी मिन्नतें मनुहार करके ). जाते जाते परिवार के मर्दों ने यही कहा कि उन्हें क्या अपमानित करने के लिए बुलाया गया ? औरतों का रुख फिर भी थोडा सहानुभूति का था. यहाँ तक आते आते राधा का रोना शुरू हो गया, उसने किस्मत को कोसा, अपने नसीब को, अपनी माँ को भी. हमारी माताजी ने उसे तसल्ली दी, चाय पिलाई, बिस्कुट खिलाये, राधा जी का चित्त स्वस्थ हुआ और चुन्नी में एक गाँठ और बाँध के वो फिर से अपने काम में लगी.

लेकिन अब मामला गंभीर हो चला था. राधा की शादी तो दूर उसकी  लव स्टोरी ही खटाई में पड़ती दिख रही थी. और फिर करीब दस दिन और बीत गए,इस  बीच लक्षमण दास का कोई  फोन नहीं  आया और जब राधा ने फोन किये तो उसने ज्यादा बात ही नहीं की. राधा परेशान थी, क्योंकि लक्ष्मण अब या तो फोन उठा नहीं रहा या फिर बाद में बात करने का कह कर काट देता है..

"उसका भाई कहता है कि  ऐसी लड़की को घर में ब्याह के नहीं लाना जिसकी माँ ने हमारी इतनी बेईज्ज़ती की."  राधा उवाच।

" फिर अब लक्ष्मण क्या कहता है?" माताजी उवाच. 

"वो कुछ नहीं कह रहा, लेकिन मैंने उसे समझाया है कि शादी तो  मुझे करनी है, मैं तो तैयार हूँ ना, माँ ना माने  तो ना माने"  राधा का सोत्साह जवाब.  

"तेरी माँ क्या कहती है ?" माताजी गंभीर हो चली हैं.

"माँ तो कहती है कि  अगर मैंने उस से शादी की तो मुझसे सारे रिश्ते तोड़ लेगी और मुझे कभी घर नहीं आने देगी, मेरी बहन शोभा भी यही कहती है."  राधा की आवाज़ भी अब उदास हो गई. 

"फिर तो सोच समझ के ही कदम उठाना, अगर लक्षमण भी अपनी बात से फिर गया तो तू कहाँ जायेगी।" 

"नहीं, मुझे विश्वास है, "उसने मुझे कहा है, वादा किया है, अमावस को छुट्टी होती है, उस दिन हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे, उसने वकील से बात कर ली है … गोल बाज़ार जाकर  … " राधा फिर से सुख सपनों में खो गई.

दिन पर दिन बीते, अमावस भी आई और निकल गई पर  उस दिन राधा देर से आई  और कई दिन बाद हमने राधा को बहुत खुश देखा …मोबाइल में रेडियो फुल वॉल्यूम चल रहा था. कारण पूछने की नौबत नहीं आई, राधा धम्म से कुर्सी खींच कर बैठ गई और बोली...  " आज तो हम पिक्चर  जाने वाले थे. उसने फोन किया था दो दिन पहले कि  … वो फिल्म आई है ना आशिकी २  … वो दिखाने ले जाएगा, लेकिन आज उसके पिता जी की तबियत अचानक बिगड़ गई तो उनको लेके अस्पताल गया है, मुझे रास्ते में मिला था तब बताया।  राम करे जल्दी ठीक हो मेरे ससुर जी." 

माताजी और मैं मुंह और कान दोनों खोल कर ये सब सुन रहे थे और सोच रहे थे कि  कहानी में ये नया ट्विस्ट कैसे आ गया.  

  
 To Be Continued ...

Photo Courtesy :-- Google 


Final Part of the Story can be read Here









Thursday, 4 July 2013

Before I Die

Before I Die, Let Me Sing One Last Time

Before I Die, Let Me Dance One Last Time 

Before I die, Let Me Laugh Freely One Last Time

Before I Die, Let Me Smile One Last Time

Before I Die, Let Me Explore Those Lofty Heights One First and Last Time

Before I Die, Let Me Touch That Blue Sky One First and Last Time

Before I Die, Let Me Spread My Wings and Fly To The Unknown Horizons One Last Time 

Before I Die, Let Me Sleep On Clouds One First and Last Time

Before I Die, Let Me Awake With A Golden Morning One First and Last Time

Before I Die, Let Me Feel that Beautiful Night Which Would Not Bring Sorrows One First And Last Time

Before I Die, Let Me Fall in Love One First and  Last Time

Before I Die, Let Me Feel the Rain Drops on My Cheeks One Last Time

Before I Die, Let Me Lost in Your Arms One First and Last Time So That I Could Never Return Back

Before I Die, Let me Kiss You One First and Last Time So That I Can Sleep Peacefully 

before I Die, Let Me ... Let Me Live One First and Last Time With My Volition and Will

Wednesday, 7 November 2012

That wasn't ...

That wasn't Love .... You know this.

That wasn't Love, when you said that "I Love You". 

That wasn't Love, when you said that "I want to be with You only".

That wasn't Love, when you said that "I want to spend My whole Life with You". 

That wasn't Love, when you said all those sweet words to me ... You know this.. don't You? 

That wasn't Love, when you said that "I will always be with You.. I always want to be with you.."

That wasn't Love, when you said that "You got to Believe Me..."

What Kind of Love it was, when You don't wanted to Know ME but to Appreciate My Outer Skin only..   

That wasn't Love, when You told  ME and when you did not... and When you Left the Sentence Unfinished...


You wanted to be Understood .. I wanted to be Listened

You wanted to be Trusted.. I wanted to be Patient..  

You spoke, I spoke .. None listened.. 

You wanted to Win, I wanted to Lose..

Neither You Won Nor I Lost..

Your plush Rainbow dreams had no place for my  Rough and Bumpy wishes..

What kind of Love it was, when You Couldn't sense the Pain behind my Laughter.. 


That wasn't Love.. and I was well aware of that.. still wanted to sail along with the waves...

That wasn't Love.. I could see the barren land beneath the flower beds ... I could see the pronged thorns crawling around ...

That wasn't Love... I could sense the shriveled and artificial  words .. 

That wasn't Love ... Those Old Words... have lost their warmth and freshness ..

What kind of Love was Yours that it's Heat never would have been able to Melt my Heart.. 



That wasn't Love .. Yes I knew that.. yet wanted to let myself get wet in the shower of  emotions and impulses... 

That wasn't Love... That wasn't Love… That was a  Pretense  of  Love…