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Thursday, 15 June 2017

एक कहानी : तीन किस्से

कहानियां लिखे एक  अरसा बीत गया है. पहले कहानियां  अपने आप दिमाग की फैक्ट्री से बनकर आती और  यहां की बोर्ड पर टाइप हो जातीं। अब फैक्ट्री बंद है और चालू  होने के ऐसे कोई आसार भी  नहीं दिखते। फिर भी यूँही रस्ते चलते, घूमते  फिरते, कहानियां  और उनके पात्र दिखाई दे जाते हैं ।  ऐसी ही एक कहानी और उसके मुख्य पात्र यानि कि  हीरो हीरोइन ( एक सुंदरी कन्या जो १६-१७ की होगी और एक भली सूरत वाला लड़का जो लगभग इतनी उम्र  का होगा)  मुझे एक झुग्गी बस्ती के  किनारे पर लगी काँटों  झाड़ियों की बाड़ पर खड़े मिले; (नहीं, खड़े नहीं थे;  असल में मोटर साइकिल पर सवार थे). या यूँ कहूँ कि  वो दोनों बस्ती के बच्चों से घिरे मिले या दिखे तो ज्यादा  सही रहेगा। लड़की ने स्लीवलेस टॉप के साथ  शॉर्ट्स पहने हुए थे और लड़का जीन्स शर्ट में काफी स्मार्ट लग रहा था.   अब आप इधर उधर दिमाग मत लगाइये और इस संभावित कहानी के उतने ही संभावित हीरो हीरोइन की कथा, गाथा, किस्से के तीन अलग अलग versions पढ़िए.  


कहानी १ 

"ए जसोदा मुझे भी  काम  दिला दे, झाड़ू पोछे का।"
"देखूं, बात करुँगी मम्मी जी से.  उनके लड़के के बंगले  पर ज़रूरत है."

"ए छोरा, तू ये गाड़ी कहाँ से लाया रे ?" 
"सेठ जी ने दी है, दुकान के काम के लिए। "
" बड़े ठाठ हैं रे तुम लोगों के आजकल। काय रे बिज्जू मेरे को भी कहीं लगवा दे ना तेरे सेठ के दूकान पे।"

"सेठ जी नए आदमी को आसानी से नहीं रखते।"
"तेरे को कैसे रख लिया रे?" 
"वो तो माँ ने मेमसाब से कह के ...." जसोदा मुस्कुराई। 
"और ये तेरी डिरेस, मेमसाब ने दी ?" 
"हाँ वो उनकी एक लड़की मेरे बराबर की है ना. उसी की है ये डेरेस।" 
"पुरानी तो नहीं लगती। "कौशल्या ने टॉप को हाथ लगा के कहा. फिर जसोदा की बाँहें छुई।  
"इत्ती चिकनी कैसे?" कौशल्या ने हैरानगी से पूछा।  
"वो क्रीम लगाती हूँ। "
"क्या क्रीम ? मेरे को भी लाके देगी ना ?" कौशल्या की आवाज़ में आशा है, अनुरोध है।  
"  तेरी माँ ने ठीक घर पकड़ा, क्यों रे बिज्जू ? लछमी को कित्ती पगार दे मेमसाब ? पांच हज़्ज़ार महीना और ऊपर से खाना कपडा ?" 
" ये अभी दो साल पहले तक लछमी यहीं हमारे साथ इधर  इसी मैदान में टपरे में रहती थी.  झाड़ू पोंछा करने वाली के ऐसे ठाठ। " कुछ आवाज़ें प्लास्टिक के टपरे के पीछे से उभरी।  
"ए जस्सू, तू भी झाड़ू पोंछा करे ?"
"नहीं, मैं  ..... खाना बनाती हूँ, बाहर से सामान लाना वगैरह । " जस्सू की आवाज़ अटकी लेकिन फिर संभल गई।  बिज्जू ने जस्सू को देखा। 
"सेठानी तो सुना है बिस्तरे से उठ भी नहीं सकती, उसी की सार संभाल, खिलाने पिलाने, सब काम के लिए जस्सू को रखा है सेठ ने, तभी तो इतने ऐश हैं इनके।" कुछ आवाज़ें राज़दार तरीके से उभरींऔर फिर दब गईं। 

"चलें, लेट हो रही है सेठ जी इंतज़ार कर रहे हैं। " सवालों की कतार वहीँ थम गई और मोटरसाइकल देखते देखते धूल  उड़ाती  भाग चली।  


कहानी २ 

" ऐ जस्सू ,  आज तू कित्ते दिन बाद आई। ये लड़का कौन है, तेरी सादी हो गई क्या ?"  लडकियां बच्चे हैरान है जस्सू की इस नई सज धज पर. 

" वो अच्छी नौकरी मिल गई है एक अस्पताल में, लिखा पढ़ी की।  ये मोहन है  मेरा धर्मेला भाई है, ये भी वहीँ नौकरी करता है । " आवाज़ तो मजबूत और विश्वास से भरी है जस्सू की।  

"ऐ जस्सू ,  ये कपडे बहुत सूंदर है ,  मेरे को भी ला दे ना , "  ...... शोभा ने टॉप का कोना पकड़ के इच्छाभरी निगाहों से जस्सू को देखा, हंसी और फिर अपनी चुन्नी  को कंधो  पर संभाला।

"हाँ ला दूंगी, तू भी मेरी तरह नौकरी कर ले,  उधर अस्पताल में जगह खाली है, बोल तेरी भी लगवाऊं नौकरी ?" खनकती आवाज़ है जस्सू की. 

" ऐ जस्सू पगार कित्ती है तेरी ? अस्पताल की नौकरी किसने दिलाई और कौनसे अस्पताल में ? तू तो दसवीं पास है और तेरी मां तो घास बेचे है  और बाप कमठे पर चौकीदार है। और ऐसे कपडे पहन के नौकरी करे है तू ? सच बोल।" एक आवाज़ टपरे के पीछे से झाँकने लगी. 

" दसवीं क्या कम होती है, किसी ने ही दिलाई नौकरी ; तुम्हारे क्या ? नर्स का काम भी सीख रही हूँ, सरकारी योजना में मुफ्त सिखाते हैं और हर महीने पैसे भी मिलते हैं." जस्सू की आवाज़ में एक लापरवाही और गुमान सा है।  

" ऐ छोरी, अस्पताल में नौकरी करे है कि और कोई काम ?  ये छोरा क्या काम करे  जो इत्ती महँगी गाडी चलावे  है ? उधर श्रमिकपुरा   में ही तो दो कमरा का किराए का मकान है तुम लोगों का, मैदान के पास कब्ज़े की ज़मीन पर। किराया  कित्ता है रे मकान का ? " एक तीखी, लम्बी और सख्त आवाज़ उभरी। 

जवाब शायद मिला था पर बच्चों के हंसने और मोटरसाइकिल पर घूमने की ज़िद की आवाज़ों के बीच  गुम हो गया. 




कहानी 3 

" Oh, Come on, चलो ना, किसी को कुछ देर की ख़ुशी देने में क्या हर्ज़ है ?"

" तुम्हारा ये एडवेंचर  अगर घर पे पता चल गया ना तो भाई और डैड will kill me."

"every time भाई और भाई का डर, don't  talk to  me."

" ok, चलो."

फ़ूड पैकेट्स और कुछ पुराने ऊनी कपड़ों की एक पोटली भी साथ ही चली. 

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"ऐ दीदी, कल भी लाएगी ना ये सारा खाना ?"
"और ये ऐसी डिरेस भी ला दे ना मेरे को. " महंगे लेकिन खूबसूरत टॉप का कोना किसी ने खींचा। 

"चलो अब बहुत हो गई तुम्हारी दरियादिली". 
"हाँ, हाँ चलते हैं. ऐ तुम लोग ऐसी ड्रेस पहनते हो क्या ? और पढ़ते क्यों नहीं हो ?" 

वही घिसे पिटे से किताबी सवाल हैं जिनमे बच्चे दिलचस्पी नहीं लेते। अपनी चुन्नी  संभालती  एक बड़ी लड़की बार बार उस सुकन्या की सुन्दर बाँहें छू कर देखती है कि  भगवान् ने कितने अलग ढंग से इसका रंग रूप और शरीर बनाया है, उसका क्यों ऐसा नहीं बनाया ? 

"दिमाग  ही ख़राब है तुम्हारा।" 
 मोटरसाइकिल अब तेज़ स्पीड से भाग रही थी. 


Friday, 22 April 2011

बिन्नी आखिर बिन्नी क्यों है ?

 बिन्नी आखिर बिन्नी क्यों है..वो और कुछ क्यों नहीं बन जाती.. कुछ भी, कैसी भी, लेकिन बिन्नी तो ना हो. क्योंकि उसके बिन्नी होने से लोगों को बड़ी तकलीफें, बड़ी  शिकायतें और...और पता नहीं क्या क्या हैं... उनके लिए बात करने का, सोचने का, चर्चा का सबसे  बड़ा मुद्दा ही यही है कि बिन्नी आखिर बिन्नी क्यों है ?? वो बिन्नी ही क्यों बनी हुई है ? आखिर कैसे अभी तक बिन्नी है...?? 

 अब आप पढने वाले  लोग ज्यादा परेशान  हो और बिन्नी का नाम-पता-ठिकाना , बायोडाटा जानने की इच्छा ज़ाहिर करें , इसके पहले मैं बता दूँ कि बिन्नी एक फिल्म में देखी थी, कैरेक्टर  का नाम बिन्नी था, एक्ट्रेस थीं अनीता कँवल  और उस फिल्म में भी यही सवाल था की..बिन्नी आखिर बिन्नी क्यों है???  
 भला बिन्नी के बारे में इतने सवाल क्यों हैं? चलिए जानने की कोशिश करते हैं...  

 बिन्नी के बारे में सबकी अलग-अलग राय है, कोई कहता है बड़ी ही नकचढ़ी है, पता नहीं खुद को कहाँ  की  महारानी समझती है , तो कोई कहता है कि बड़ी सीधी सादी सी है, कोई कोई लोग intellectual भी समझ बैठते हैं (वैसे इसमें उनकी कोई गलती नहीं, बिन्नी के शौक और आदतें ज़रा "हटके" किस्म  के हैं),  पर कुछ  लोग ये भी कहते हैं और सही ही कहते हैं  कि आज भी ५० साल पुराने ज़माने में जी रही है..   

बिन्नी की मम्मी का कहना है कि उन्होंने लाख कोशिशें की, कि ये लड़की बिन्नी ना बने पर as  usual  उनकी किसी ने नहीं  सुनी . बिन्नी के पापा का कहना है कि उन्हें अंदाज़ा नहीं था की ये लड़की बिन्नी बन जायेगी...पर अब तो बन गई सो बन गई ... अब ज़रा बिन्नी के करीबी दोस्तों की भी राय जान ली जाए...अब करीबी हैं  या दूर दराज के , ये तो ठीक से बिन्नी को भी नहीं पता, पर कुछ तो, कहीं तो हैं ये सब लोग...बहुत अधिकार से  अपनी  बात कहते हैं..कोई फरमाता है कि बहुत कर ली तुमने मनमर्जी, अब हम जो कहते हैं वो सुनो और मान लो, क्योंकि हमने दुनिया देखी  है और तुमने उस दुनिया की परछाईं भी नहीं  देखी  . ..हम जानते हैं कि  तुम से क्या होगा और क्या ना होगा..बेकार ऊँचे दर्जे की बहस में ना पड़ो..  ( और ठीक ही कहते हैं..बिन्नी ने सचमुच दुनिया नहीं देखी, लेकिन दुनिया ने ज़रूर बिन्नी को देखा है और लगभग हर संभव नज़र से परखा भी  है, अब इस जांच -परख में बिन्नी कितने नंबरों से पास या फेल हुई ये ना ही पूछिए..)

.एक ज़नाब हैं जिनकी नज़र  से बिन्नी संसार की सबसे  नादान, मूर्ख और यूँ कहें की सुपर फ्लॉप किस्सा है....बेचारी कुछ भी, कोई सा भी काम ठीक से  नहीं  कर सकती.. (अब बिन्नी मानती है  कि इन भाई साहब  की  कोई गलती नहीं, बिन्नी ने आजतक ऐसा  कोई तीर भी तो नहीं मारा कि लोगों की राय बदल सके..इसलिए वो चुप होकर सुन लेती है )..


और भी कई लोग हैं , पर बिन्नी को अभी ठीक से नहीं पता कि उन चेहरों , उन कहकहों , उन लफ़्ज़ों के पीछे क्या छिपा है..और बिन्नी को जानने में दिलचस्पी भी नहीं है..



 बिन्नी को नहीं बनना जो उसका मन नहीं चाहता  या वो वही करे जो लोग उसके लिए ठीक समझ रहे हैं  या लोगों को लगता है की अब बस यही और इतना ही ठीक है.. अब यहाँ बिन्नी को "साहब, बीबी और गुलाम" फिल्म का एक सीन याद आता है, जहां रहमान घर से निकल रहे हैं कहीं जाने के लिए और मीना कुमारी उनको रोक रही है.. रहमान कहते हैं कि, " छोटी बहू, तुम भी और बहुओं की तरह साड़ियाँ खरीदो... गहने बनवाओ..
तब मीना कुमारी कहती हैं.. "मैं और बहुओं जैसी नहीं हूँ जी ..मैं और बहुओं जैसी नहीं हूँ.. ?

रिश्तेदारों की नज़र में बिन्नी किसी के लिए ईर्ष्या की वजह, किसी के लिए gossip  का टॉपिक, किसी के लिए मज़ाक बनाने का उपयुक्त निशाना ..किसी के लिए उसका होना ना होना बराबर सा...यानि जितनी बड़ी दुनिया उसके उतने ही रंग--रूप..  अब ऐसा भी नहीं कि बिन्नी को इन सब चीज़ों की कोई परवाह ही नहीं...वैसे पहले तो कभी थी ही नहीं..पर अब होने लगी है..तो इसलिए जब बिन्नी बहुत ज्यादा परेशान हो जाती है तो थोड़ी देर के लिए  एक  अलग दुनिया में जो एलिस इन wonderland , मिकी माउस, टॉम एंड जेरी की है, वहाँ भाग जाती है...


हमेशा से ही बिन्नी देखती आई है कि यहाँ सब लोग, मतलब मम्मी-पापा, दोस्त, सब लोग उसे अलग-अलग directions में खींच रहे हैं ...कोई चाहता है ..बिन्नी तो बस ऐसी बने , वैसी बने , ये हो जाए, वो हो जाए...पता नहीं क्या हो जाए...पर मुसीबत ये रही कि बिन्नी इनमे से कुछ भी नहीं बन पाई ....क्यों???..क्योंकि उसकी नज़र का क्षितिज, उसकी आँखों का सपना कहीं और ही था...अब कहाँ था, ये तो बेचारी बिन्नी को भी ठीक से नहीं पता था...और यहीं गलती हो गई बिन्नी से, बिना रास्ता जाने, मंजिल ढूँढने की.

पर ये भी कौनसा  आसान काम था ...इस पूरी हायतौबा में हर कोई चाहता है कि बिन्नी उसके बताये हुए , तय किये हुए  सांचे में ढल जाए, फिट  हो जाए...और इसी कोशिश में सब लोग लगे हैं, मुसीबत तब आती है, जब ये सब के सब एक साथ, एक ही समय, बिन्नी को अलग-अलग directions  में खींचना और सांचे में पैक करना शुरू कर देते हैं..वो भी पूरे दमखम से ..अब बिन्नी कहाँ भाग जाए, तब उसका मन करता है कि सारे बंधन छुड़ा के भाग जाए कहीं, अकेले ही, दूर..कहीं भी..कुछ वक़्त के लिए ही सही ..पर ..कहीं ..चला जाए..

  अब यहाँ  एक गाना याद आ रहा है.. "हम तो भाई जैसे हैं, वैसे रहेंगे..अब कोई खुश हो या कोई रूठे ..इस बात पे चाहे हर बात टूटे ..समझे ना समझे कोई  ..हम यही कहेंगे.."...हाँ माना थोडा मनमानी जैसी बात है ये..पर अब क्या करें..आखिर बिन्नी है...इतनी आसानी से किसी की सुन ले तो फिर चाहिए ही क्या...ना हो सबको उससे इतनी शिकायतें, ना हो इतनी हाय तौबा, ना हो ये सारे  सवाल...

पर बिन्नी कहती है कि बिन्नी होने में क्या बुराई  है, हाँ मान लेते हैं कि दुनियादारी के लिहाज़ से तो किसी गोल, चौकोर, तिकोने या और किसी खांचे में तो फिट नहीं बैठती...पर फिर  भी  अगर बिन्नी, बिन्नी ही रहे तो किसी का ऐसा  क्या बिगड़ जाएगा..और बिगड़ता भी हो  तो बिन्नी को कौन फिकर पड़ी है..

आप कहेंगे कि ये बिन्नी बड़ी stubborn  और जिद्दी किस्म की लग रही है ..तो जवाब है हाँ,  थोड़ी तो जिद्दी है ही...इसमें तो कोई  शक ही नहीं ...फिर आप पूछेंगे कि आज अचानक बिन्नी को क्या ज़रुरत पड़ गई,  अपना किस्सा- कहानी सुनाने की.. तो इसका जवाब ये है  कि  ..हमेशा से  ही बिन्नी सबकी सुनती आई है, तो सोचा आज वो भी अपने मन की कह ले ..अब मन की करना तो मुश्किल काम है, पर मन की कहना आसान है, इस पर ना कोई रोक टोक है ना ही किसी को कोई ऐतराज़ ...आखिर democarcy है भाई..

अरे हाँ आप लोग कहीं ये तो नहीं  सोच रहे कि बिन्नी को दुनिया --जहान से  सिर्फ़ शिकायतें ही शिकायतें हैं...नहीं ऐसा कुछ नहीं ...हम सबको अपने तरीके से सोचने का हक है..हर किसी को अपने नज़रिए से  दुनिया को देखने और उसे अपने मन मुताबिक बनाने का भी हक है..और फिर जब बिन्नी को, बिन्नी होने का हक है तो बाकी लोगों को भी तो अपने अपने हक हैं.. पर मुश्किल तब हो जाती है, जब हम दूसरों के हक को स्वीकार ही नहीं कर पाते..लगता है कि बस जो हम सोच रहे हैं  वही सही है.. ..बिन्नी को किसी से शिकायत नहीं...जिसे जो अच्छा लगे उसे वो करने दो,  कहने दो...

..और बिन्नी को बिन्नी रहने दो...उसके लिए खुद को  बदल पाना ज़रा मुश्किल है..और इस तरह की खींचातानी से  तो वो नहीं बदलेगी.. वैसे भी बिन्नी हमेशा ही थोडा थोडा सबके मन मुताबिक  होने की, बनने की, कोशिश  करती रही, कि जिससे थोडा थोडा सब खुश हो जाएँ, लेकिन इस थोड़े बहुत के झमेले में कोई भी पूरी तरह से  खुश नहीं हो पाया और बिन्नी के खुद के खुश होने का तो सवाल यहाँ है ही नहीं ...इसलिए..अब बिन्नी  सोच रही  है कि अपनी donald  duck  वाली दुनिया में ही लौट चलें (काफी सुन्दर और सुकून भरी जगह है..आप भी कभी आइये..) .. ..