Monday, 21 February 2022
Goodbye My Dear Dream.
Monday, 25 May 2020
जगाये रखने के सफर पर
अब याद कुछ नहीं आता। याद करते , याद रखते, मैं भी थक गई। याद का ठेका अकेले मेरा तो है नहीं।
मुझे अब कोई याद नहीं करता। मेरे बारे में वे every small little things भी अब कोई नहीं बताता, जानता। और मुझे इसमें कुछ भी नया, अनोखा, अजब नहीं लगता।
यह बरसों की याद, शताब्दियों का संसार और रिवाज हैं। यह इक्कीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशक हैं। ये प्रयोग और अनुभव के दिन हैं, लकीरों को लांघने के दुस्साहस के सफर हैं।
और मैं याद रखने और याद आने के कारोबार पर मिट्टी बिछाती जा रही हूं। क्या कोई देख रहा है ? कोई जान रहा है कि मिट्टी की परत हर रोज एक अंगुल ऊपर उठ रही है?
मैं लकीरों और उनकी बनाई ज्योमेट्री को मिटोरती जा रही हूं। यह उत्तर होगा उस औपचारिक याद को जो यदा कदा शिष्टाचार वश या दिखावे वश जागती है। जिसकी उपेक्षा करने के लिए सहस्त्राब्दी का इंतज़ार करना होता है।
और फिर मेरी आँखों में नींद भर आती है। यह आभासी सत्य पर विश्वास करने के दिन हैं।
मेरी नींद इस सतरंगी आभास में फिर से खुलती है। यहां हर निषेध एक निमंत्रण है, मुझे याद दिलाने के लिए कि मेरा स्वागत है, नए सफर पर नई शताब्दी में नए परिचय के साथ।
Tuesday, 26 August 2014
Alternate The End of : The Saree Saga .. An old memoir
“Calm down, you will be fine, no one saw you falling in mud”, mini sympathize with me, but I was not in a mood to listen her.
“what!!! Was that me?...Excuse me, my leg..” but before I finish my sentence, Yamini shouted, “oh yes your leg, as if it is such an important news that you have to tell each and everyone in this world”. I did not said anything after that..in fact, we both remained quite after that and meanwhile Veeren bhaiya came and started driving car. As the car started running, the cool and refreshing breeze started flowing our anger and stretched nerves also started to calm down. Yamini and I look to each other, smiled and than broke in to a laughter….Friday, 22 August 2014
The Saree Saga .. An old memoir
First she smiled and then started speaking with a very sweet and soft voice, “listen yaar, I want you girls to wear saree on my wedding”. Now that was the moment when I almost jumped from my seat, and expressed in above manner. While divya continued with her sweet tone, “Oh come on’, its my wedding, and once I will go to my in-law’s house then when I will get a chance to see you people in such a traditional dress-up. There is Mini, who always wear western outfits and you…who always follows her own style”. With these words of hers’ my eyes and mouth both fall wide open and my eyes filled with so many emotions at a time such as anger, surprise and awfulness.
Both of us reached at venue separately, but at same time. I was highly surprised to see Yamini in saree. It was the first time when I saw her in saree, she was looking gorgeous. Her magenta chiffon saree with golden zari border was catching everyone’s attention. Obviously she did not like my saree style. But first we went to meet divya; she was sitting in a separate room inside the marriage hall building. She was looking extremely pretty in the orange-peach bridal costume. Then, Yamini took me to another room for resetting my saree, according to her it was completely messy or that was I who made it messy. (I don’t know exactly) she rearranged the pallu and put lots of safety pins here and there on saree to make it tight fit. I looked myself in a mirror and felt satisfied.Tuesday, 1 April 2014
एक नाम एक पहचान : कुछ मालूम सा कुछ नामालूम सा
कई तरह के नाम सोचे गए.
नाम चुनने की बहस का अंत पार ना देख कर पंडित ने फिलहाल काम चलाने के लिए जन्म कुंडली में मेरा नाम भारती लिख दिया (और अगर ये नाम ही फाइनल हो जाता तो वो पंडित मेरे हाथ से नहीं बच सकता था, पक्का)!!!! लेकिन फिर आखिर पापा ने "भावना" नाम ढूंढ निकला और ये सोच कर कि भुवनेश्वरी जैसे भारी भरकम नाम को टक्कर दे सके जैसा यही एक नाम बचा है इस भ अक्षर पर और इसको फाइनल कर दिया ( पर कुंडली में भारती ही चलता रहा क्योंकि पंडित जी ने अमेंडमेंट करने से मना कर दिया)
मैंने हज़ार कोशिशें की, नए नए सुन्दर नाम सुझाये कि ये रख दिया जाए या वो नाम रख दो; पर ये हो ना सका। ये कसरत बहुत सालों तक चली, इन फैक्ट मुझे याद है कि हमारे पड़ोस में एक दीदी रहती थी जो लगभग हर रोज़ मुझे नए, अनोखे और फैशनेबुल नाम बताया करती थी और हम लोग इस बात पर लम्बी चर्चा भी करते थे कि कौनसा नाम ज्यादा अच्छा लगेगा या ज्यादा सोफिस्टिकेटेड लगेगा। दीदी को सचमुच मेरे लिए एक अच्छा नाम ढूंढने की फिकर थी इसलिए जब भी हम मिलते थे तो वो मुझसे हमेशा पूछती थी कि "कल जो नाम पसंद किये थे वो रख लिया ? मम्मी पापा ने भी पसंद किया?" लेकिन हर बार जवाब ना में होता था तो हम लोग फिर से नए नाम ढूंढने के महाभियान में जुट जाते थे ....
Saturday, 8 February 2014
कहानी का किस्सा
कभी कभी ऐसा होता है कि कोई किताब, कोई कहानी या कोई किस्सा हमारी अपनी ज़िन्दगी के किसी बीते हुए हिस्से को फिर से दोहरा जाता है और तब लगता है कि "अरे ये तो मैं ही हूँ या मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ करता था." सर्दियों की सुबह की गुनगुनी धूप जैसी यादें, बतकहियां और कहकहे .... सदियों की एक ऐसी ही सुबह और बारिश मे भीगा ऐसा ही एक दिन स्म्रतियों में एक बार फिर से जाग गया. निखिल सचान की किताब "नमक स्वादानुसार" (कहानी संग्रह) की पहली कहानी है "परवाज" ; दो स्कूली बच्चों नानू और सुब्बु की कहानी, उनके साथ साथ देसी कॉमिक्स के सुपर हीरो ध्रुव, अजूबा, जादुई दुनिया के किस्सों, रहस्य रोमांच की कहानियों और कल्पना की एक ऐसी ऊँची उड़ान की यात्रा जिसका मज़ा हम बड़े होने (पढ़िए समझदार ) के बाद नहीं ले सकते। इस कहानी से मुझे भी कुछ याद आ गया, तीन लडकियां, एक बड़ी बाकी दोनों छोटी, जो बड़ी थी उसे कॉमिक्स पढ़ने का बहुत शौक था, इतना कि उसके तकिये के नीचे, चादर की सलवटों में कॉमिक्स, बालहंस, नंदन वगैरह छुपी हुई मिल जाती थी (ख़ास तौर पर जब वो बीमार पड़ती थी तब उसके चाचा और पिता उसके लिए ये कॉमिक्स लाया करते थे और चुपके से तकिये के नीचे रख देते थे कि कहीं माँ को पता ना चल जाए). दोनों छोटी लड़कियों के घर में कॉमिक्स तो दूर किसी किस्म की पत्रिका, पुस्तक का प्रवेश लगभग निषेध ही था. कॉमिक्स पर तो हर बच्चे का हक़ है, बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी और साबू, ताऊ जी और उनका रुमझुम, बालहंस की परी कथाएं और चम्पक वन के जानवर; ये सबके दोस्त है ना, मेरे, तुम्हारे और आपके भी तो .... और इसलिए वो बड़ी लड़की उन दोनों छोटी लड़कियों (जो सिर्फ दो कक्षा छोटी थी) को कॉमिक्स में पढ़ी हुई कहानियाँ सुनाया करती थी, सबसे ज्यादा उनको परियों की कहानिया अच्छी लगती थी, कभी कभी माइथोलॉजी से या राजा रानी और उनके राजकुमार और राजकुमारियों की भी कहानिया उठा ली जाती। कहानियों का सिलसिला चलता ही रहता था.
घर का कोई शांत कोना, जहां बड़े लोगों का आम तौर पर काम नहीं पड़ता और जहां बहुत छोटे बच्चे आकर तंग नहीं करते )अगर करें तो उनको किसी ना किसी बहाने से तुरंत रवाना कर दिया जाता था ) … ऐसी ही किसी कोने में घुस कर वो तीनो बैठती और कहानियों का सिलसिला चल पड़ता, एक एक कहानी कई दिनों तक चलती, सुबह स्कूल जाते समय कहानी सुनाई जा रही है, लौट रहे हैं तब भी बैग और बोतल सम्भालते कहानी का प्रवाह कायम है. ज़रा दोपहर की धूप कम हुई नहीं कि कहने वाली और सुन ने वालियां दोनों तयशुदा जगह पर हाज़िर। जब शाम रात में बदलने वाली होती तब दोनों घरों से आवाज़ आने लगती; और तब इंतज़ार होता कि कब "लाइट जायेगी" जी हाँ, बाकायदा कहीं से एक देवता ढूंढ निकाले गए जिनका काम था रात को लाइट गुल कर देना, उनको प्रार्थनाएं की जाती कि लाइट जाए और ज्यादा देर तक जाए ताकि वे लोग घर के बाहर गेट पर लटकते हुए अपना कहानियों का सिलसिला आगे बढ़ा सकें। अक्सर इन कहानियों का कोई विशेष सर पैर, आदि अंत नहीं होता था, कई बार तीन चार कहानियाँ एक में ही मिक्स कर दी जाती पर फिर भी ना तो कहानी सुनाने वाले को अपनी क्षमता पर कोई वहम हुआ और ना कभी सुनने वालियां बोर हुईं। यहाँ तक कि कभी कहानी के तर्कहीन या बेसिरपैर के गड़बड़ झाले पर भी कोई सवाल नहीं उठता था. श्रोता इतने धीर और एकाग्र होकर कहानी सुनते कि किसी भी बड़े लेखक या किस्सागो को जलन हो सकती थी.
Tuesday, 23 April 2013
Hello...
Thursday, 16 August 2012
सपनों के पंख
सुबह ८:१५
.. अब ना वो समय लौटेगा, ना उसमे देखे हुए सपने कभी पूरे हो सकते हैं.. रीमा भी अब ज़िन्दगी के अल्बम की एक पुरानी फोटो हो गई है.. गुज़रे वक़्त के एक टुकड़े का चेहरा.. कभी वक़्त साथ नहीं देता .. कभी ज़िन्दगी साथ नहीं देती और कभी हम खुद भी अपना साथ नहीं देते
- this liking somebody on internet
- developing some kind of love for somebody whom u never met nor even heard her voice""what!!!! SOME KIND OF LOVE!!!!!! excuse me, what the hell do you think about me and my feelings?????
- there is no as such feeling for u from my side
- u could be a good frnd
- but thats it.. nothing more..
Ok..u go with your life,- U go damn lady
- Who cares...Once u will see in life, that there is some life even in this virtual world which is real.. not fake.. then you will realize.. till then leave..
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