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Tuesday, 15 February 2022

भद्र लोक वाली महिला

"An Exotic Woman, A Delusional Woman, asking for Attention."  This is how I would like to start  my Blabber.


कुछ दो या तीन बरस हुए मुझे मेरे जन्मदिन पर एक नोटबुक तोहफे में मिली, जिसका कवर देखते ही मेरा मन उस पर अटक गया।  और साहब यह लीजिये उस कवर पर जो तमाम तस्वीरों के ठीक बीच में एक ब्लैक एंड वाइट ज़माने की जो दो भद्र लोक वाली महिलाओं की एक क्लिप थी, उसका मैंने आदि से लेकर अंत तक का विश्लेषण कर डाला।  अगर आप कोशिश करें तो उस तस्वीर को गूगल पर भी तलाश कर सकते हैं ; दरअसल उस ज़माने में यानि अँगरेज़ साहबों वाले दिनों में इन्हें "नाच गर्ल्स" कहा जाता था।  आम जनता, रईस, ज़मींदार,  साहब बाबू लोग तवायफ और कंजरी वगैरह कहा करते थे।  तो पूछिए या सोचिये कि आखिर आज मुझको यह क्या फफूंद आन  पड़ी, जो मैं इस अजीब से मुद्दे को यहां घसीटे जा रही हूँ।  दरअसल इस नोटबुक के शुरुआत के पन्नों में पाकीज़ा फिल्म का एक क्लासिक रंगीन पोस्टर है और उस में फिल्म के बारे में तवायफों के बारे में कुछ अंग्रेजी में विवरण वर्णन है. बस वही वर्णनं मुझे क्लिक कर गया।  


यह कहता है, "An Elegant Companion and A Potential Lover, A Glamorous Woman; well versed in poetry, music and dance. And my fellow citizens, this is what a woman would become when she doesn't get married till a certain age. Everybody around her acquaintance, looks at her or treats her as an opportunity to grab for . But Nobody bothers to see her as An Ultimate Choice or An Only Option. What an Irony !!!!!!


लेकिन अब इस एलिगेंट कम्पैनियन की भी एक उम्र है, एक वक़्त है, उस वक़्त की दहलीज के पार ना कोई कम्पैनियन है ना कोई लवर है ना कोई पहचान।  केवल एक कांटेक्ट लिस्ट है मोबाइल में, मुंह चिढ़ाती हुई सी।  ये बताती हुई कि किस कदर फ़िज़ूल लोगों की भीड़ है दुनिया में ; और मोहतरमा आप भी इस फ़िज़ूल भीड़ का ही एक बेहद नामालूम सा हिस्सा हैं। 
अब फैसला करिये कि आपको क्या बनना है ? किसी पैसे वाले का एलिगेंट कम्पैनियन,  या एक delusional ग्लैमरस भद्र लोक की attention  seeker , attention giver !!!! क्या सोच रखा है ?? कहाँ से यह अल्टीमेट चॉइस वाला ख्याली पुलाव दिमाग में घुस गया ? ऐसी भी क्या एलिगेंट या पोटेंशियल हैं ? यहां देखो, गली गली, सड़क चौराहे पर पोटेंशियल वालों की भीड़ लगी है।  

कहीं कोई आपके exotic होने को आपका ध्यान खींचने का तरीका समझ  लेगा तो क्या करियेगा ? क्या जवाब  दीजियेगा ? क्यों अपना ही मजाक बनाने पर तुली हैं !!! कुछ अपने ओहदे का, समाज में जो नाम है उसका ज़रा लिहाज़ करिये।  ज़माने की शराफत से चलिए, किसी दूर पास के  रिश्तेदार के किसी बच्चे पर अपनी करियर की मेहनत वाली कमाई खर्च करिये, उसे अपना वारिस या उत्तराधिकारी मान ही लीजिये।  वह जेवर जो कभी आपके लिए गढवाये थे वह अब किसी रिश्ते की भांजी भतीजी के ब्याह में उसे पहना कर दुनियादारी की तारीफ बटोरिये। क्योंकि अब यही तो तकाजा है दुनिया का।  

Who Am I ; Who Are You ? 
One Whom I like, treats me as a scapegoat. The Another One I like Thinks I am A Delusional Woman asking for Attention; an impossible thing.

P.S. --- This is a Blabber and not a Serious Work. Smile. 




Wednesday, 10 June 2020

वनीला कॉफ़ी -- 3

"दो सदियों के संगम पर मिलने आये हैं, एक समय लेकिन दो सदियां , दो सदियां ". 

"तुम गाने भी इतने बोरिंग और डिप्रेसिंग किस्म के गाती  हो कि  मेरा मन होता है  कि अभी यहां से भाग जाऊं !!"

"क्यों, इतना अच्छा गाना है।  तुम्हें क्या पसंद है ?"

"कुछ भी, थोड़ा lively, कुछ full  of spirit जैसा। "

"तो हाई स्कूल musicals कैसा रहेगा ? पर मुझे वो गाना नहीं आता। "

"अब मैंने हाई स्कूल musicals  के लिए तो नहीं कहा ना !!"

" खैर, तुम यहां इस छोटे शहर में क्यों आये ?"

"अब ये तुम्हारा छोटा बड़ा शहर बीच में कहाँ से आया ? हम लोग तो कुछ गाने की बात कर रहे थे। "

'लेकिन हम कोई अंताक्षरी नहीं खेल रहे कि  और कोई बात बीच  में नहीं कही जा सकती। "

"ओके, i  Surrender .  मैं यहां डेजर्ट सफारी के लिए आया हूँ, कंपनी ने मुझे पेड हॉलीडेज पर यहां भेज दिया।  मुझे कहा कि  भाई गौरव, तुम हमारे बड़े ही काबिल एम्प्लॉई हो  तो जाओ और ऐश करो। और बस, मैंने कहा कि  मुझे ये सूखा रेगिस्तान और ये पुराने  महल हवेलियां और ये शानदार हेरिटेज होटल्स देखने हैं, घूमने हैं तो उन्होंने मेरे लिए टिकट करवा दी और रहने को कुछ allowance भी  दे दिया।  गाडी मैं अपनी लाया ही हूँ।  " 

"बस इसलिए या और भी कोई  बहाना है तुम्हारे पास ?" 

"बहाना !!!! सुनयना, तुम क्या कोई खास बहाना सुनना चाहती हो ?"

"नहीं, मैं सिर्फ कोशिश कर रही हूँ कि  समझ सकूँ तुम्हारे यहां आने की असली वजह क्या है ? तुम्हारी अच्छी खासी कॉस्मो सिटी लाइफ के बीच ये ट्रैन का छोटा स्टेशन कैसे आ गया ? " 

"ऐसे ही,  यहां से  कुछ नए बड़े रास्ते भी निकल सकते हैं।"

 "आज हम मैरिएट जायेंगे। मैं बोर हो गया तुम्हारे इन हेरिटेज होटल्स का इंटीरियर देख देख कर। "

''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''"

"तुम, तुमको याद है कि एक बार तुमने मुझसे कहा था कि, तुम्हारे लिए मसूरी से थोड़ी बर्फ और पहाड़ लेकर आऊं।  पहाड़ का नज़ारा और पता नहीं क्या क्या कबाड़। 
"अब कबाड़ है तो तुम  क्यों याद कर रहे हो ? और मुझे क्यों बता रहे हो ? 

"पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, सुरमई उजाला है, चम्पई अँधेरा है।"

"तुम्हारी वो एक्स .. फ्रेंड, रिद्धि   वो अभी वहीँ है या कहीं  दूसरे  शहर शिफ्ट हो गई ?"

"वो एक साल पहले ऑस्ट्रेलिया  चली गई। बात होती है  पर अब वो वहीँ सेटल्ड है  फ़िलहाल के लिए  और मैं  शायद कनाडा जाऊँगा अगले साल।  और कोई जानकारी चाहिए मोहतरमा आपको ? वैसे, आपका क्या चल रहा है, आप का क्या मूड है ? कब तक आप ऐसे कहानी लिखने में और कहानी का थीम ढूंढने में ....? "

"अब तुम अपनी असहजता को मेरी तरफ मोड़ रहे हो। तुम  अब तक चार या पांच  बार डेटिंग एंड मीटिंग एंड कोर्टशिप के किस्से मुझे बता चुके हो  और फिर भी मुझसे पूछ ऐसे रहे हो जैसे  तुमने बड़े  अच्छे ढंग से ..... "

"मैं  तुम्हारी तरह  खुद को दायरों में बिना वजह के क़ैद नहीं रखता।  सुनयना, तुम्हें नहीं  लगता कि  तुम खुद की ही खींची हुई  बॉउंड्रीज़ में बंद हो और बाहर देखना भी नहीं चाहती। "

"तो तुम्हारी तरह इस  टेबल से उस टेबल तक, इस मेनू कार्ड से उस मेनू कार्ड तक एक एंडलेस तलाश में घूमते  रहे ? ये ठीक लगता है तुम्हें ?"

"क्या मेनू कार्ड और कौनसी टेबल ? तुम क्या कहना चाहती हो ? तुम कहना चाहती हो की मैं यूँही टाइम पास कर रहा था और फ़्लर्ट कर रहा था !!!!!! और चार पांच बार कौनसा कैलकुलेशन किया तुमने ?? ज़रा बताओ ? किस किस की बात कर रही हो तुम ? अगर तुम रिद्धि की बात कर रही हो तो उस वक़्त हम लोग सीरियस थे पर उसके पेरेंट्स नहीं माने। जो कोशिश कर सकता था वो की ही थी।  तिशा  अपने बॉयफ्रेंड से शादी करना चाहती थी और ये उसने मुझे बहुत बाद में बताया जब ऑलमोस्ट सब फाइनल हो चुका  था। मैं इस अधूरे मन वाले रिश्ते को ज़िन्दगी भर नहीं झेल सकता था। "

"मुझे तो नहीं लगता कि  रिद्धि के लिए तुमने कोशिश की थी, वर्ना वो ऑस्ट्रेलिया क्यों जाती  और रही बात तिशा की,  तो तुम्हीं ने बताया था कि  उसने अभी तक शादी नहीं की है। "

"तिशा, अपनी ज़िन्दगी में आराम से है, किस से शादी करेगी, नहीं करेगी ये मेरा सिरदर्द नहीं  है। मेरी उस से कभी कभी बात होती है, पार्टीज में, पब में मिलते हैं कभी कभी।  बस। कोई ज़रूरी है कि  हम उसी रास्ते वापिस जाएँ ?" 

"तुमने  तिशा  से  नहीं पूछा, हो सकता है कि ... ?"

"सुनयना, तुम ये ज़रूरत से ज्यादा  ही फ़िल्मी कहानी बनाने की सोच रही हो। "

"मुझे लगता है कि, it was all your fault . And even after those experiences, you are still wandering and roaming around. It doesn't seem that you have learnt anything."

"What learnt, and what fault are you talking about ? what are you trying to say ? and what are those 4-5 times !!! will you please bother to explain ? I am losing my patience, be clear with your words. There is a limit for everything."

"How do I know, last month, you were talking about a dinner date and all ... I guessed you might have found a new girlfriend. am I right ?"

 "dinner date !!! I used to hang out with my friends and colleagues for dinner and parties; how can it be called a Date ?? and even if I am having a new girlfriend then how it is related with my past relationships ? However, Sunayana, I am not having any girlfriend these days. How did you reached to this conclusion of wandering and all ?"

"And if you are trying to blame me for all those things which were out of my control or where I had a little role to manage the situation then it is your own bias, your own judgmental mindset. You have always been rude and harsh with me; you think I am some sort of romeo ... is this what you think about me ??? I do not expect any answer." Anger mounted in his mind and a flow of unexpected thoughts rolled out from his mouth.

"I never wanted to say this, thought it will hurt you and I really never wanted to do that. But I think if you continued this type of behavior;  this being rude and judgmental to other people's lives and giving your half-baked opinion  on their relationship matters, provided that you never had been in any relationship before; how can you even imagine or understand about all this love and romance and emotions that get attached with all these things."

"What do you mean by rude, harsh and judgmental ?? I was trying to understand... why are you venting on  me ? what wrong did I said ? was it so wrong to ask  about your past relationships ?"

"You don't want to understand, you only want baseless allegations and negative points. we better not talk about this, I already said you won't be able to handle it;  but Sunayana, you are not a little kid. And with this arrogance, I fear you will end up destroying your future if ever happened relationships, in fact you will ruin things with your judgmental attitude." 

"I never thought my words are hurting you this much. I bothered you a lot. I was not aware..."

"Yes, it does hurt when you speak such harsh words. And these useless vanilla talks are useless, why the hell did you started it, why are you interested in my relationships." His voice tone was rough.

"I will not bother you from now onward, I want to go home." With a choking voice she spoke. 

"Ok."

"Can't I get a cab or auto ?"

"What cab auto you want !!!! we came here together and I will drop you home. Get in the car. "

"No, I will go myself." Moist eyes yet a firm slow voice.

"Don't create scene here and get in the car." Every word was spoken with a strong tone.

 "Will you not stop crying?" His anger was now turning into frustration and helplessness.

With this question the timid sound of tears stopped. A harsh silence prevailed between them.

She turned her face towards window and set her gaze in a vacuum. The car was running at a faster pace and so does the feelings of heart.

"Say something, Sunayana ...."

"Being quiet and bearing with this was an easy thing." he murmured and stared hard at the road.

finally, the destination arrived. She got out of the car and stepped towards the gate. With a decision of Not Bothering Back.



To Be Continued ...

Part 1
  







Saturday, 8 February 2020

चूड़ियाँ


"ऐ मन्नू, मुझे देर हो जाएगी,  तू ये पैकेट रख।  मुझे शाम को दे देना। "
" क्या है इसमें ? चूड़ियां !!!  ये औरतों की चीज़ें मैं कहाँ रखूं ? तू ले जा। "
"मुझे देर हो रही ऑफिस के लिए , वहाँ ड्यूटी पर कहाँ रखूंगी।  तू रख, शाम को बस स्टैंड पर पकड़ा देना।  मेरे को  गाँव जाना है. "

"  कुशियो  तू ले जाना याद से नहीं तो मैं इधर उधर फेंक दूंगा। "

"कुसमा !!! नाम तो सही ले, दिवालका। "

" जा रे "

  ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
"ऐ मन्नू तू आया क्यों नहीं बस स्टैंड पर ? फोन भी नहीं उठाया। मेरी चूड़ियां तो यहीं रह गई ? इतना सा काम भी नहीं संभला तेरे से।"
"अरे काम में फंस गया था, ज़रूरी जाना पड़ा। फोन की बैटरी ही खत्म हो गई थी। कल ला दूंगा।"
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"  ऐ मन्नू, तू मेरी चूड़ियां कब वापिस देगा , अब  ऐसा कर तू ही रख ले।  घर में मम्मी  या किसी बहन को दे देना।मेरे गाँव के ब्याह शादी तो सब  निपट गए ,  अब कहाँ पहनूंगी  चूड़ियां ?  इतनी महँगी !! ढाई सौ रूपए का सेट ख़रीदा था। "

"अरे मैंने वो तेरा पैकेट अटाले में कहीं  धर  दिया कि कोई देखे नहीं।  अब तो मैं भूल गया कि कहाँ रखा है। "

''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

"ऐ मन्नू,  तूने वो  चूड़ियां कहाँ  रखी  ? ढूंढी कि  नहीं ?"
"अरे कंजूस काकी, तू ढाई सौ रूपए मेरे से ले लेना जब मेरी नौकरी लगे।  अब मैं कहाँ अटाले में ढूंढने जाऊं  स्टोर रूम में ज्यादा छानबीन करूँगा तो घरवाले पूछेंगे नहीं क्या ?"
"कब लगेगी तेरी नौकरी और तब तक मेरे तो पैसे डूब गए."
"अरे देखना IAS नहीं तो RAS  बन ही जाऊँगा , एकाध साल में। "
"मन्नू तेरे कोई भरोसा नहीं। मेरी तो छोटी सी प्राइवेट  नॉकरी है।"
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

बरस दो बरस बीत चला 

" ऐ मन्नू ये चूड़ियां तो देखी  हुई लग रही। "
"हाँ वहीँ पैकेट है न. देख कितना संभाल के रखा हुआ था. ढूंढा फिर। "
"अरे दिवालिया,  कम  से कम आज तो  नई  ले आता।  ये फिर बाद में दे देता। "
"क्यों इसमें क्या खराबी है,  अरे मिनकी ये भी एकदम नई  है, एकदम कोरी है, किसी ने नहीं पहनी।  पूरे ढाई सौ रूपए की है। "
"पर आज तो तू मुझे प्रोपोज़ कर रहा है ना , आज तो,,,,,,,,,,,,,,"
"कुशियो,  अब नई  पर फिर से पैसे क्यों खर्च करूं !!!"
"तू ज़िन्दगी भर दिवालका  ही रहेगा "
"ये तो देख कि  संभाल के रखा हुआ था ,,,,,,,,,,,,,,,"
"मेरा माथा, कुसुुुम नाम है ,,,,,,,,,,,"








Tuesday, 23 July 2019

Part 2 : वनीला कॉफ़ी




 "क्योंकि, मैं तुम्हारा  लौह आवरण उतरते देख रहा हूँ। "

'और तुम खुश हो रहे हो ?"

" नहीं, लेकिन इतना अंदाज़ा नहीं लगाया था मैंने।"

"किस बात  का अंदाज़ा ?"

"तो क्या अंदाज़ा था तुम्हारा ?"

"जो भी था, जाने दो। "

"मेरे ख्याल से एक एक कंकर  फेंकने के बजाय तुम पूरा पत्थर एक बार में ही पटक दो."

"तुम फिर फालतू सोचने लगीं, ऐसा कुछ नहीं कहा मैंने।'

"तुम बात को बदल सकते हो लेकिन उसका अर्थ नहीं बदल सकते।  शब्दों के अर्थ  उनके कहे जाने से ज्यादा गहरे होते हैं। "

"हो गई तुम्हारी फिलॉसोफी शुरू। "

"खैर."

"ये बारिश के छींटे खिड़की के कांच पर  ऐसे लगते हैं जैसे कांच में  जगह जगह छोटे महीन से  डिज़ाइन  आ गए  हो। "

"ये तुम्हारी नज़र है, मुझे तो सीधी सादी  बरसात की बूँदें ही दिख रही हैं। "

"हाँ, ये अब गोल बूँद ही दिख रही है। "

"तुम sci  fi  फिल्में बहुत देखती हो ना , उसी का असर है।  आजकल में कोई नई  फिल्म देखी ?"

"अरसा बीत गया फिल्म देखे तो। "

"क्यों , अब ये एक शौक भी बरसात में बह गया क्या तुम्हारा ? और तो कुछ तुम करती नहीं। "

"ऐसे ही, अब इच्छा  नहीं होती। "

"मतलब अब फिल्म देखने की भी कोई बाकायदा सिचुएशन होनी चाहिए। "

"अब तुम जो भी कहो। "

"मैंने बहुत से कहानी के थीम और बेस लाइन सोचे पर किसी को भी आगे नहीं बढ़ा पा रही हूँ। "

'क्योंकि तुम खुद आगे नहीं बढ़ रही हो।  सुनयना,  कहानी लिखने से ज्यादा कहानी जीना भी ज़रूरी है। "

"पर मैं कुछ लिखना चाहती हूँ , मुझे लगता है कि कहीं कोई सूत्र है जो मुझे मिल नहीं रहा या मैं देख नहीं पा रही।"

"वहम  है तुम्हारा। "

"चलो अब बारिश रुक ही गई। बाहर कितना पानी जमा हो गया है। "

"मौसम खुल गया है, चलो ड्राइव पर चलते हैं."

"तुम चलती हो या मैं अकेला ही निकल  जाऊं ?"

"रुको, मैं  आती हूँ। "

"आसमां ने खुश होकर रंग सा बिखेरा है। "

  "और कुछ नहीं तो अलग अलग गानों के टुकड़े जोड़ कर ही एक कहानी नुमा कुछ लिख मारो. तुम्हारा शौक पूरा हो जाएगा। "

"तुम फिर मजाक उड़ा रहे हो। मेरी समझ नहीं आ रहा कि आखिर अब इतने वक़्त बाद  तुम ठहरे पानी में कंकर फेंकने क्यों आये हो ? "

"मैं सिर्फ तुमको आज में खींचने की कोशिश कर रहा हूँ। और तुम इतनी चिढ क्यों रही हो. ? "

" तुम पहले ऐसे नहीं थे या  अब कोई नया बदलाव है ?  मुझे महसूस होता है कि तुम पहले ऐसे नहीं थे।  तुम्हारी भाषा ही बदल गई है।"

"कुछ नहीं बदला है सुनयना।  वक़्त के साथ हम सब ज्यादा परिपक़्व  और व्यावहारिक हो जाते हैं लेकिन तुम ओवर pampered रही हो इसलिए कोई भी नई  चीज़ तुम्हे आसानी से पसंद नहीं आती। come  out  of   your  shell . "

"तुम उन दिनों ज्यादा अच्छे इंसान थे। तब तुम्हारे पास वक़्त हुआ करता था।  अब तो तुम्हारा  वक़्त छतीस हज़ार कामों में फंसा है।"

'क्योंकि तब  मैंने कभी भी तुमको आइना दिखाने की कोशिश नहीं की। और सिर्फ यूँही इधर उधर की बातों के लिए वक़्त आजकल किसी के पास नहीं है।  और  तुम बार बार पलट कर उन पुराने दिनों में क्यों पहुँच जाती हो ?"


" ऐसा नहीं है। तुम्हारे हिसाब से तो परिपक्व होना मतलब सब तरह से इमोशंस को उठा कर ताक  पर रख देना।"

"अब तुम फिर वहीँ  पहुँच गईं। "

"रहने दो फालतू बहस है।  लम्हे फिल्म देखी  है तुमने ?"

"वो श्रीदेवी वाली ? इतनी पुरानी  फिल्म का अभी  यहां क्या काम है ?'

"एक  scene  है उसमे , जब वहीदा रहमान कहती है अनिल कपूर से  कि " हुकुम अब बड़े हो गए हैं और मेरा हाथ छोटा हो गया है."

"इसका क्या मतलब ?  तुम एक पूरी तरह से गैर ज़रूरी बात  को यहां quote  कर रही हो।  तुम वो डेन्यूब वाली बात ही करो।  तुम्हारा आवरण तुम्हारे इस बेसिर पैर की फ़िल्मी कल्पना से ज्यादा ठीक है। हाँ, कहानी वाली बात।  देखो इस बढ़िया मौसम और इन नज़ारों पर ही कुछ लिखो। "

"वो कोई आवरण नहीं है।  मैं सचमुच विएना देखना चाहती हूँ।  यूरोप का आर्किटेक्चर , वहाँ  का लोकल कल्चर  .... "

"अभी तुम ठहरे पानी की बात कर रही थीं और अभी दो घंटे पहले तुमको डेन्यूब सूझ रही थी।  क्या तुम सोचती हो कि डेन्यूब का पानी हज़ार साल से एक जैसा ही है ?  तुम जिस डेन्यूब को ढूंढ रही हो वो तुम्हारी एक पसंदीदा इमेजिनेशन है जिसे तुमने किताब में पढ़ा है और बस एक रोमांटिक सा ऑरा  बन गया। "

"ऐसा तुमको लगता है मुझे नहीं।  और कल्पना क्या कभी सच नहीं होती ? कोई ज़रूरी है कि जो आज दूर का ख्वाब है हमेशा  ऐसा ही रहेगा ? हो सकता है कि तुम को हंसी आ रही है पर ...

'तो चलो, कब फुर्सत है तुम्हें ? टिकट बुक करवानी होगी,  रहने का arrangement , सब देखना पड़ेगा  ना।  तुम को सुविधा से रहने की आदत है।"

"ऐसे अचानक  अभी ?"

"तो और कब ? वहीँ लिखना डेन्यूब पर कहानी।  यहां तो सूखी नदी पर कुछ लिखने का हाल बन नहीं रहा तुम्हारा। "

"बोलो ?"

"अच्छा, कॉफ़ी का कौनसा फ्लेवर पसंद है तुम्हे ? चॉकलेट, हेज़लनट, आयरिश या वनीला ?"


"वक़्त की क़ैद में है ज़िन्दगी , चंद  घड़ियाँ हैं जो आज़ाद हैं "

"कॉफ़ी का फ्लेवर साहब !!!"

"नहीं चाहिए। "

"वनीला से शुरू करो. बेसिक और मीठा  और खुशबू वाला। "






Image Courtesy : google









Monday, 3 July 2017

प्रतीक : एक कथा

दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट  

"फ्लाइट  आने में अभी और कितनी देर है ?" उसने अपने आप से पूछा।

सिक्योरिटी चेक का कॉल आने पर थोड़ी राहत महसूस हुई।  अचानक ये मुल्क, ये खूबसूरत आसमान छूता,  सपनों की दुनिया जैसा ये शहर ,  अब उसके लिए बिलकुल अजनबी हो गया था। एकदम अचानक से कि आज सुबह आप सो कर उठे और आपको बताया गया कि चलो सामान बाँध लो , जाने का वक़्त आ गया और  बंजारे का सफर अब फिर से शुरू हुआ ही चाहता है। उसे अभी ऐसी कोई जल्दी नहीं थी यहां से जाने की ; वो अब खुद को यहीं का रहवासी मांनने लग गया था।  उसके  लिए बंजारे वाला जीवन अब  समाप्त हो चुका  था और ठहराव वाला मोड़ जिंदगी में बस अभी आया ही था।  उसके लिए जिसका नाम प्रतीक था।  उसने आस पास देखा कितने सारे लोग खड़े थे,  दिल्ली जाने वाली फ्लाइट के इंतज़ार में , उसके जैसे लोग।  पर नहीं, सब उसके जैसे कहाँ है ?  प्रतीक भीड़ में होकर भी भीड़ नहीं है।  

ये 2009  का दुबई है, जब इकनोमिक क्राइसिस ने दुनिया  की  इस तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, स्काई स्क्रैपर्स के मुल्क, शॉपिंग और टूरिस्ट  डेस्टिनेशन के लिए मशहूर  और रियल एस्टेट के स्वर्ग को हिला डाला था।  अखबार और न्यूज़ चैनल बता रहे हैं कि  बड़ी बड़ी रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनियां अपने कर्मचारियों को काम से निकाल रही हैं, घर वापिस भेज रही हैं।  प्रतीक भी घर जा रहा है।  लगभग सात साल इस स्वर्ग में बिताये हैं, अब वहाँ घर वापिस जाकर क्या करेगा ? उसके लिए अब नौकरी, पैसा, करियर, अलाना फलाना , लक्ज़री, सोसाइटी , सब कुछ यहीं दुबई में था।  अब वो "दुबई पलट "  बन गया था।  थोड़े दिन के लिए या कुछेक हफ़्तों के लिए घर लौटना और फिर  वापिस उड़ जाना अपने स्वर्ग में।  और अब इस तरह अचानक घर वापसी का  फरमान, नौकरी से निकाला  जाना , एक  बोल्ट फ्रॉम दि ब्लू की तरह था।

हिंदुस्तान के रेगिस्तानी कोने में फैला उसका शहर ; अब उसके लिए कोई आकर्षण नहीं जगाता था , वहाँ रह कर इतना पैसा और ऐसे ठाट बाट कमाए जा सकते हैं ?  क्या अब कोई नौकरी वहाँ ऐसी मिलेगी जिसमे इतनी तनख्वाह हो या कोई बिज़नेस करेगा ? ये बहुत बड़ा और भयानक सा सवाल था।  और जिसका जवाब धुल भरी सड़कों और  चिलचिलाती धूप में ढूंढ़ना प्रतीक के लिए किसी आपदा या विपदा से कम नहीं था।  

"सब बेकार बातें हैं, अभी तो मेरा वीसा भी साल भर के लिए वैलिड है अभी दो महीना पहले ही तो renew  करवाया था।  और क्या क्राइसिस !! चार छह महीने में सब सही हो जायेगा।  आखिर ये शेख लोग कुछ तो करेंगे ही। जनरल  मैनेजर भी बोल रहा था कि तेरे को वापिस बुला लूँगा।" 


दो महीने बाद : घर यानी जोधपुर 

" अरे यही एक नौकरी गई है दुनिया के सारे रास्ते तो बंद नहीं हो गए हैं। नौकरी के ऑफर तो आये ही हैं , मैं ही ज्वाइन  नहीं कर रहा हूँ  . तुम थोड़ा धीरज रखो। "

' कब तक धीरज रखूं, जब सगाई हुई थी तब तुम दुबई में सत्तर हज़ार महीने वाली नौकरी कर रहे थे और अब 15 -20  हज़ार वाली नौकरी की बात कर रहे हो। " 

"तुम आखिर  क्या कहना चाहती हो ? मुझे भी  चिंता है  कोशिश कर रहा हूँ कि  जैसे ही हालात सुधर जाएँ तो  चला जाऊँगा। " 

" रहने दो , कुछ नहीं होने का । "  और फोन कट गया।  

थोड़े दिन और कुछ बोझिल हफ्ते बीते।  फिर महीने भी बीते। इन्ही  दिन हफ़्तों के बीच  प्रतीक की सगाई टूट गई क्योंकि सौभाग्यकांक्षिणी को अपने भावी सौभाग्य की बेहद फिक्र थी ।  पंद्रह बीस हज़ार वाली नौकरी  प्रतीक को अब रास आ नहीं रही और एक लोकल कॉलेज के M B A  को पचास हज़ार जोधपुर तो क्या जयपुर में भी नहीं मिलेंगे।  

"दोबारा दुबई चला जाऊं ? वीसा अभी वैलिड है कोशिश  करूँगा तो नौकरी का कुछ जुगाड़ बैठ जाएगा और अब तो सात आठ महीने हो गए हैं मेरे कुछ फ्रेंड्स तो चले भी गए वापिस।  अब तो हालात सुधर रहे हैं। " 

एक सांस में सारी  कथा बांच दी प्रतीक ने और नेहा के पतिदेव सुमित यानी प्रतीक के जीजा जो फुटवियर का होलसेल व्यापार करते हैं  मुंह खोले चाय का कप हाथ में लिए धैर्य की पूंछ पकडे,  सुनने और समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

" यहीं मेरे साथ बिज़नेस कर लो फुटवियर का , क्यों इतना परेशान होते हो। साल दो साल में  जम जायेगा बिज़नेस।  अब देखो बैठे बैठे इतने महीने भी तो निकाल दिए ना। "

"अभी कहाँ इतना कमाया है कि बिज़नेस सेट करने के लिए पैसे  ब्लॉक कर दूँ।  ये तो अभी दो साल हुए जो ये कंपनी ज्वाइन की थी , इसके पहले तो कम ही थी सैलरी , फिर घर बनवाया  और भी खर्चे ... " प्रतीक का मन नहीं हो रहा था इतना सब बोलने का पर बोलना पड़  रहा था।  

तो फिर तय हो गया, प्रतीक वापिस दुबई जाएगा। 

दिल्ली एयरपोर्ट पर एक बार वापिस फ्लाइट के इंतज़ार में खड़ा  है  प्रतीक।  लगता है कि अपनी पहली नौकरी के लिए, पहली "मुसाफिरी" ( समुद्र  यात्रा ) के लिए जा रहा है। एक बार फिर अपने उसी स्वर्ग में वापिस जाना  जहां से कुछ महीने पहले इसलिए निकलना पड़ा कि कंपनी ने ही नौकरी से निकाल दिया था. तो अब दूसरी कंपनी  ने दुबारा नौकरी दी है, बैग में सारे कागज़ हैं  और उन कागज़ों में प्रतीक की सारी  समस्याओं ,  ख्वाहिशों और ख्वाबो की चाबियां  छिपी हैं. प्रतीक के मन में  उत्सुकता है, घबराहट है और बहुत जल्दी है , कि  बस एक बार वापिस नौकरी पे लग जाऊं।  इस बार मार्केटिंग की नौकरी मिली है, पूरे गल्फ और एशियाई बाज़ारों में घूमना पड़ेगा।  प्रतीक को अलग अलग मुल्कों की खूबसूरती इस वक़्त दिल्ली  एयर पोर्ट पर ही बिखरी दिखाई दे रही है। 

साल भर बाद 

"दुबई का नाम सुनते ही लोग दस शर्तें लगा देते हैं।  शादी के बाद साथ ले जाएगा कि  नहीं ? लड़की को वहाँ नौकरी करनी पड़ेगी ? और जब से ये दुबई की अर्थव्यवस्था में गिरावट हुई है तब से लोग  अब दुबई के नाम से ही बिदक जाते हैं।" 

"पैसे भी तो दुबई से ही मिल रहे हैं।  वहाँ इंडिया में कौन दे रहा इतनी तनख्वाह ?"  प्रतीक झुंझला रहा है।  

"बेटा, यहीं कोई बिज़नेस कर लेता या नहीं,  मन नहीं है तेरा यहां रहने का ?"  माँ  क्या कहे ,  एक तरफ लगता है कि  लड़का लौट आये फिर चिंता है कि यहां कोई भविष्य फिलहाल तो दिखाई नहीं देता।  अभी कुछ साल वहीँ रह के कमा ले फिर तो आखिर आना ही है।  पर आजकल दुबई सेटल्ड लड़कों के लिए लड़की तलाशना बड़ी मुसीबत हो गई है।  गए वो ज़माने जब दुबई के नाम से ही रिश्ता आ जाता था , अब तो आया रिश्ता भी  दुबई का नाम से ही ...
दुबई अब सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं है , क्या पता कब निकाल दें ? या ना भी निकाले पर आखिर कभी  तो छोड़ना पड़ेगा ही; अब सारी  ज़िन्दगी वहाँ रहना तो अच्छे भले के बस  नहीं।  सुना है वहाँ बच्चों की पढ़ाई, अस्पताल के खर्चे और घर के किराए बहुत महंगे हैं।  

दो साल बीते  

"पिंटू तू जल्दी घर आ।  पापा की तबियत ठीक नहीं , अस्पताल एडमिट कराया है कल रात , तू आ जाएगा तो मम्मी को हिम्मत बंधेगी। " सुमित ने  फोन पर इस से ज्यादा और कुछ नहीं कहा।  

दुबई से जोधपुर तक  समंदर और ज़मीन की  जो दूरी है उसे प्रतीक ने इतनी तेज़ी से पार किया कि लगता है कि कहीं कोई दूरी है ही नहीं।   तीन दिन के बाद धरती और आसमान के बीच जो दूरी है उसे प्रतीक के पापा ने पार किया बगैर किसी जल्दी के।  

अब आगे क्या ... दुबई अब बहुत दूर हो गया है। घर खाली हो जाएगा मम्मी के लिए अगर प्रतीक दुबई चला गया। 

बिज़नेस वो भी फुटवियर का,  जिस से अभी तक प्रतीक बचता आया था क्योंकि बिज़नेस का कोई खास अनुभव नहीं और पूँजी गंवाने का डर  भी है। कहना आसान है लेकिन बाजार में स्पर्धा में टिकना बेहद मुश्किल।  पर अब इस बाजार के समंदर में कूदने के अलावा कोई और  चारा भी नहीं।  सुमित के साथ माल खरीदी और फिर रिटेलर को सप्लाई के तौर तरीके, व्यापार का रंग और ढंग सब कुछ ध्यान से सीखा प्रतीक ने।  महीनों की "ट्रेनिंग"  और  "प्रैक्टिकल"  के बाद  अब प्रतीक ने खुद का रिटेल काउंटर यानी दुकान शुरू की है, शहर के एक सबसे व्यस्त बाज़ार में जहां  फैशन के ट्रेंड शुरू होते और ख़त्म होते हैं।  यहां किराया ही इतना महंगा है दूकान का लेकिन फिर नाम भी है कि इस "बाजार" में दूकान है।  

दिन चलने लगे , हफ्ते और महीने भी चले गए। सात आठ महीने बीत चले । सुमित काम सिखा सकता था, बिज़नेस का हुनर नहीं। दूकान नहीं चली, पंडित ज्योतिषी कहते हैं कि चमड़ा या जूता जैसी चीज़ का कारोबार प्रतीक को नहीं फल सकता इसलिए .... इसलिए इस दुकान के साथ साथ प्रतीक ने अपनी जमा पूँजी का एक बड़ा हिस्सा  घाटे में डुबा दिया।  अब, जेब खाली है।  शादी के लिए रिश्ते,  जब दूकान शुरू की थी तब आया करते थे लेकिन तब बिज़नेस जमाने के चक्कर में प्रतीक टाल  गया  और जैसे जैसे दूकान के घाटे में होने की बात फैलनी शुरू हुई तो सब रिश्ते उड़न छू हो गए।  

अब फिर से प्रतीक घर बैठा है। वापिस नौकरी की तलाश की लेकिन फिर वही पुराना  खटराग कि  15-20 हज़ार मिलेंगे मुश्किल से और खटना पड़ेगा 12 -16  घंटे। नौकरी है या कि बंधुआ मजदूरी और उस पर सेठ की डाँट फटकार भी सहो। अब इतना त्याग प्रतीक से हो  नहीं  पाता है।

कभी कभी पुरानी तसवीरें देखता है, जब दुबई में था तब कैसा था ....  एकदम गोरा गुलाबी रंग, हलकी सी दाढ़ी रखता था। उस चेहरे से नज़रें आसानी से हटती नहीं थी। हलकी धीमी आवाज़ और यूँ सामने देखते हुए भी कहीं दूर देखती हुई नज़रें ... ये प्रतीक का सिग्नेचर स्टाइल था।  और अब .... अब भी कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है।  आस पास के दूकानदार ही कहते थे कि प्रतीक गल्ले पे बैठने वाला बनिया नहीं किसी बड़ी फर्म के सजे धजे दफ्तर में बैठा सेठ साहब लगता है। पर अब लगने से क्या होता है। वक़्त बदल गया है और वक़्त ने प्रतीक को भी बदल दिया है पर आवाज़ और चाल ढाल की नफासत नहीं बदली है। कहीं कुछ तो बचा रहे।

पर अब बचा ही क्या है जो इस वहां को पाले रखा जाए कि "हम" कुछ अलग हैं।

साधारण होना और वो भी भीड़ में शामिल होना कितना आसान और सुविधाजनक है ये बात पहली बार प्रतीक को समझ आई।  कम्बख्त इतनी देर से समझ आई कि  प्रतीक का  मन किया कि उस पुराने वक़्त की याद को भी फाड़ कर फेंक दे।  पर यादें ज़रा मजबूत किस्म के पदार्थ की बनी होती हैं कि जितना ज़ोर लगाते हैं उतनी ही ज्यादा फैलती और बिखरती जाती हैं पारे की तरह। जाने कौनसे कागज़ या प्लास्टिक या मिटटी या धातु की बनी होती हैं  


फिर घूम फिर कर,  ये सब फिलोसोफी भूल कर ,  प्रतीक कुछ दिन-हफ्ते  सुमित के साथ  उसके दूकान पर बैठा ;  वक़्त गुज़ारने के लिए या कुछ सीखने के लिए  काम भी किया लेकिन दुकान पर सेठ नौकर का रिश्ता अलग है और जीजा साले का अलग है।  कुछ महीने तक एक दोस्त की ट्रेवल एंड टूर एजेंसी में  भी भागीदार बना और फिर जो पैसा कमाया उस से  दोस्त खुद ही टूर करने हांगकांग निकल गया और प्रतीक जोधपुर के उसके ऑफिस को ताला  लगा कर वापिस घर बैठ गया। और अब खाली बैठा घर में मम्मी की रसोई में हेल्प करता है।   क्या हेल्प करता है या रसोई को   बिगाड़ता है ये अभी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है।  पर कुछ तो खटर  पटर  करता ही है रसोई में।  वक़्त गुजारने का अपना अपना शगल है साहब। पैसा जेब  में हो  तो शगल और शौक के खर्चे उठाये जा सकते  खाली जेब हो तो सारे शौक  शगल दिमागी फितूर कहलाते हैं।

क्यों,  क्या कहते हैं आप ?? 

"यार ये जो छोटे मोटे  फ़ूड स्टाल  खड़े रहते हैं जगह जगह , इनकी मेनू लिस्ट भी सिंपल है और ज्यादा लम्बी नहीं है फिर भी कितनी भीड़ रहती है इनके यहां।" पिज़्ज़ा का स्लाइस खाते खाते प्रतीक ने उन सब ठेले वालों रेहड़ी वालों को गौर से देखा जो इस खूबसूरत बगीचे को चारों तरफ से एक गोल बाजार की तरह घेरे हुए थे।  क्या नहीं मिलता इन छोटे से फ़ूड काउंटर्स पर ;  पिज़्ज़ा, हक्का नूडल्स,  मचुरियन, चिली पनीर, स्प्रिंग रोल्स, मोमोज़, फ्राइड राइस और अपने हिंदुस्तानी चटपटे स्नैक्स की तो बहार है।  पाव  भाजी से लेकर वड़ा  पाव और पानी पूरी से लेकर छोले कुल्छे।  

"यार सीधी बात है कि  लागत बेहद  कम है जिस से कीमत भी बहुत वाजिब हो जाती है  और लिमिटेड आइटम एक रेहड़ी वाला  बेचता है तो ऐसा कोई सामान की बर्बादी भी नहीं और इसलिए पब्लिक भीड़ लगाती है। ये पिज़्ज़ा यहां साठ  रूपए में मिलता है वहाँ  रेस्टोरेंट में डेढ़ सौ में पड़ेगा, डोसा सांभर ये लोग तीस चालीस रूपए में दे देते हैं और रेस्त्रो वाला सौ में देगा।"  आशीष, प्रतीक का बेरोजगारी के  दिनों का साथी है, यहीं इधर ही कहीं  गली मोहल्ले में रहता है। 

"पर यार क्वालिटी और कुकिंग स्टाइल प्लस एम्बिएंस ...."

" जिसको हफ्ते में तीन दिन बाहर खाना है उसके  लिए तो ये ठेले ही बढ़िया हैं. और तू बोल क्या कमी है इस सिंपल चीज़ पिज़्ज़ा में, रोस्ट अच्छा किया हुआ है और टेस्ट भी ठीक है। अब तू वापिस अपने दुबई वाले मोड में मत घुस जाना। "

"बात तो सही है तेरी।"  इतने काम दाम में  मार्गरिटा पिज़्ज़ा मिलेगा क्या ? प्रतीक को फिर से उन यादों पर झुंझलाहट आई जो उसे किसी पिज़्ज़ा ब्रांड आउटलेट की तरफ खींचती थी।

 प्रतीक का ध्यान अब उस किचन नाम की जगह पर था जहां अभी सैंडविच तैयार किया जा रहा था, एक तरफ तवे पर भाजी गरम हो रही थी और पाव सेके जा रहे थे , मेयोनेज़ का डब्बा वापिस किनारे पर रखा जा चुका  था ।  उसने गौर से उस काउंटर को देखा, एक तरफ  ओवन रखा था जिसमे  सैंडविच पिज़्ज़ा रोस्ट होते हैं और बिजली का कनेक्शन पास की दुकान से लिया गया है।  फिर उसने उन लड़को की तरफ देखा जो इस किचन को चला रहे थे;  एकदम एक्सपर्ट कुक की   तरह काम करते हुए ,  जिनके कपड़ों पर तेल मसालों के दाग हैं , किसी एक ने ऐप्रन भी डाल रखा है गले में।  प्रतीक ने उस शाम वहाँ खड़े खड़े  ग्राहकों की संख्या और उनके ऑर्डर्स  का एक मोटा मोटा  हिसाब लगाया और फिर एक गहरी सांस ली।  


"अपना घर इधर मेन रोड पर होने के कारण सारा दिन गाड़ियों का शोर, धुंआ ही पीछा नहीं छोड़ता। " 

मम्मी की नींद डिस्टर्ब हो गई क्योंकि बाहर एक ट्रक और फिर कुछ बसें तेज़ हॉर्न बजाती बसें  एक के बाद एक निकली। ये घर प्रतीक के पापा ने जब ख़रीदा था तब यहाँ से  करीब एक किलोमीटर की दूरी पर कुछेक सरकारी दफ्तर थे और बाकी सब तरफ  घर बने थे।  अब यहां सड़क पर आमने सामने  एक व्यस्त  बाजार, बस स्टैंड,  बैंक, मिठाई की दुकानें, एक सरकारी डिस्पेंसरी और एक बड़ा होटल  भी   बन गया है।  एकाध कैफ़े टाइप रेस्टोरेंट भी खुल गए हैं , आइस क्रीम पार्लर भी हैं।  


रसोई 


घर के बाहर के बरामदे नुमा हिस्से को टीन शेड से कवर किया गया, कुछ कुर्सी टेबल लगाईं गई, एक काउंटर लगाया है और काउंटर के पीछे पर्दा है जिसके पीछे रसोई है।  बाहर एक  साइन बोर्ड सड़क पे लगा दिया गया है, "भाई की रसोई" . मेनू कार्ड जो एक कागज़ पर छापा है जिसे लेमिनेट करवा दिया गया है,   काउंटर पे रखा है और ऐसे कुछ और मेनू  टेबल्स पे भी रखे हैं।  मेनू के व्यंजन वहीँ हैं, सैंडविच, पिज़्ज़ा, पाव भाजी, चाउमीन वगैरह और हाँ प्रतीक ने कुछ वैरायटी भी दी है. "शाही सब्ज़ियां" और थाली यानी केवल फ़ास्ट फ़ूड ही नहीं पूरा भोजन का इंतज़ाम है ; वैसे सब्ज़ियां भी सीमित हैं, शाही पनीर, दाल फ्राई, मौसमी हरी सब्ज़ियां, गट्टे की सब्ज़ी  वगैरह।  

जैसे तैसे रसोई चल ही निकली, रोज के हज़ार  बारह सौ का गल्ला हो जाता है. प्रतीक ने मार्केट रिसर्च की और अपने शाही पनीर का दाम  साठ रूपए का हाफ प्लेट कर दिया जिसमे इतना पनीर और ग्रेवी देता है कि दो आदमी पेट भर के खा सकें।  दाल और भाजी भी महज़  चालीस रूपए   में इतनी कि दो जनो का पेट भी भरे और जेब भी राजी रहे।

बस केवल एक बात अजीब थी कि प्रतीक उस ढाबे के सस्ते और सादे सेटअप में फिट नहीं था क्योंकि वो चाह के भी  ना तो ढाबे वालों जैसा दीखता है  ना उसके हाव भाव और बोल चाल  में ढाबा समा पाया। ग्राहकों से उतना ही बोलता है जितना बोलने भर से काम चल जाए  और वो भी अपनी उसी खास धीमी  आवाज़ में।  कपडे आज भी सलीके से, और खुद के कद काठी पर फबने वाले ही पहनता है;  यूँ खड़ा रहे तो लोग उसे ही ग्राहक समझ बैठते हैं  पर फिर जब आगे बढ़ कर प्रतीक उनसे पूछता है कि ,  " हाँ, क्या चाहिए आपको?"  तब ग्राहक समझ पाते हैं !!!!  पर खाना प्रतीक अच्छा बनाता  है।  ग्राहक भी इस बात को प्रतीक से ज्यादा समझते हैं  और इसलिए ये ढाबा तो  सस्ता सा  लगता लेकिन मालिक ज़रा  महंगा सा  और ढाबे वाला नहीं लगता।

खैर।

"बेटा,  अब ये रिश्ता ठीक ही लग रहा है , अब मैं तो थक गई हूँ।  और इन लोगों ने खुद आगे बढ़ के बात चलाई  है, लड़की की फोटो भी साथ भिजवाई  है।  देख ज़रा , ज़रा सांवली है और थोड़ी वजन में भी तुझसे ज्यादा लग रही है  पर ठीक है।  इसके घरवालों ने कहा है कि अगर कभी भविष्य में तू अपने इस रेस्टोरेंट को और अच्छा बनाना चाहे तो वे लोग मदद भी करेंगे। "

 ये आखरी बात ज़रा हल्की आवाज़ में कही थी मम्मी ने , क्योंकि इस एक बात के पीछे ये सच भी छिपा है कि  प्रतीक का ढाबा अभी इतना नहीं  चलता कि अपने दम  पर वो इसका विस्तार कर सके।  कुर्सियों के सीट कवर अब थोड़े मटमैले हो गए हैं और मेनू कार्ड का  लेमिनेट भी ज़रा गन्दा सा हो गया है।  पर फिर भी काम तो चल ही रहा है। प्रतीक ने तस्वीर को सरसरी नज़र से देखा फिर उस नाम को फेसबुक  ढूंढा।   वहाँ और भी तसवीरें थीं; एक ज़रा सांवली रंगत वाली ज़रा मोटी  और चेहरे में एक तीखापन और अजीब सा हल्कापन लिए एक लड़की।  प्रतीक को अपने नफीस अंदाज़ की याद एक  बार भी नहीं आई और उसने हाँ कह दी।  

शुभ विवाह के बाद अब प्रतीक की पत्नी ज्योति भी रेस्टोरेंट के काम में हाथ बंटाती है।  परदे के पीछे की रसोई में वो भी प्रतीक के साथ खाना बनाती है और प्रतीक खुद सर्व करता है , बहुत से लोग पैक करवा के ले जाते हैं और बहुत से यहीं खाते हैं।  ज्योति को देख कर  लोगों को लगता है कि वो इस ढाबे की मालकिन है, उसका चेहरा और व्यक्तित्व इस ढाबे को आत्मसात कर  गया है और ढाबे के लिए  प्रतीक  के बजाय ज्योति को अपना  कहना ज्यादा आसान था।   






  







  

Thursday, 15 June 2017

एक कहानी : तीन किस्से

कहानियां लिखे एक  अरसा बीत गया है. पहले कहानियां  अपने आप दिमाग की फैक्ट्री से बनकर आती और  यहां की बोर्ड पर टाइप हो जातीं। अब फैक्ट्री बंद है और चालू  होने के ऐसे कोई आसार भी  नहीं दिखते। फिर भी यूँही रस्ते चलते, घूमते  फिरते, कहानियां  और उनके पात्र दिखाई दे जाते हैं ।  ऐसी ही एक कहानी और उसके मुख्य पात्र यानि कि  हीरो हीरोइन ( एक सुंदरी कन्या जो १६-१७ की होगी और एक भली सूरत वाला लड़का जो लगभग इतनी उम्र  का होगा)  मुझे एक झुग्गी बस्ती के  किनारे पर लगी काँटों  झाड़ियों की बाड़ पर खड़े मिले; (नहीं, खड़े नहीं थे;  असल में मोटर साइकिल पर सवार थे). या यूँ कहूँ कि  वो दोनों बस्ती के बच्चों से घिरे मिले या दिखे तो ज्यादा  सही रहेगा। लड़की ने स्लीवलेस टॉप के साथ  शॉर्ट्स पहने हुए थे और लड़का जीन्स शर्ट में काफी स्मार्ट लग रहा था.   अब आप इधर उधर दिमाग मत लगाइये और इस संभावित कहानी के उतने ही संभावित हीरो हीरोइन की कथा, गाथा, किस्से के तीन अलग अलग versions पढ़िए.  


कहानी १ 

"ए जसोदा मुझे भी  काम  दिला दे, झाड़ू पोछे का।"
"देखूं, बात करुँगी मम्मी जी से.  उनके लड़के के बंगले  पर ज़रूरत है."

"ए छोरा, तू ये गाड़ी कहाँ से लाया रे ?" 
"सेठ जी ने दी है, दुकान के काम के लिए। "
" बड़े ठाठ हैं रे तुम लोगों के आजकल। काय रे बिज्जू मेरे को भी कहीं लगवा दे ना तेरे सेठ के दूकान पे।"

"सेठ जी नए आदमी को आसानी से नहीं रखते।"
"तेरे को कैसे रख लिया रे?" 
"वो तो माँ ने मेमसाब से कह के ...." जसोदा मुस्कुराई। 
"और ये तेरी डिरेस, मेमसाब ने दी ?" 
"हाँ वो उनकी एक लड़की मेरे बराबर की है ना. उसी की है ये डेरेस।" 
"पुरानी तो नहीं लगती। "कौशल्या ने टॉप को हाथ लगा के कहा. फिर जसोदा की बाँहें छुई।  
"इत्ती चिकनी कैसे?" कौशल्या ने हैरानगी से पूछा।  
"वो क्रीम लगाती हूँ। "
"क्या क्रीम ? मेरे को भी लाके देगी ना ?" कौशल्या की आवाज़ में आशा है, अनुरोध है।  
"  तेरी माँ ने ठीक घर पकड़ा, क्यों रे बिज्जू ? लछमी को कित्ती पगार दे मेमसाब ? पांच हज़्ज़ार महीना और ऊपर से खाना कपडा ?" 
" ये अभी दो साल पहले तक लछमी यहीं हमारे साथ इधर  इसी मैदान में टपरे में रहती थी.  झाड़ू पोंछा करने वाली के ऐसे ठाठ। " कुछ आवाज़ें प्लास्टिक के टपरे के पीछे से उभरी।  
"ए जस्सू, तू भी झाड़ू पोंछा करे ?"
"नहीं, मैं  ..... खाना बनाती हूँ, बाहर से सामान लाना वगैरह । " जस्सू की आवाज़ अटकी लेकिन फिर संभल गई।  बिज्जू ने जस्सू को देखा। 
"सेठानी तो सुना है बिस्तरे से उठ भी नहीं सकती, उसी की सार संभाल, खिलाने पिलाने, सब काम के लिए जस्सू को रखा है सेठ ने, तभी तो इतने ऐश हैं इनके।" कुछ आवाज़ें राज़दार तरीके से उभरींऔर फिर दब गईं। 

"चलें, लेट हो रही है सेठ जी इंतज़ार कर रहे हैं। " सवालों की कतार वहीँ थम गई और मोटरसाइकल देखते देखते धूल  उड़ाती  भाग चली।  


कहानी २ 

" ऐ जस्सू ,  आज तू कित्ते दिन बाद आई। ये लड़का कौन है, तेरी सादी हो गई क्या ?"  लडकियां बच्चे हैरान है जस्सू की इस नई सज धज पर. 

" वो अच्छी नौकरी मिल गई है एक अस्पताल में, लिखा पढ़ी की।  ये मोहन है  मेरा धर्मेला भाई है, ये भी वहीँ नौकरी करता है । " आवाज़ तो मजबूत और विश्वास से भरी है जस्सू की।  

"ऐ जस्सू ,  ये कपडे बहुत सूंदर है ,  मेरे को भी ला दे ना , "  ...... शोभा ने टॉप का कोना पकड़ के इच्छाभरी निगाहों से जस्सू को देखा, हंसी और फिर अपनी चुन्नी  को कंधो  पर संभाला।

"हाँ ला दूंगी, तू भी मेरी तरह नौकरी कर ले,  उधर अस्पताल में जगह खाली है, बोल तेरी भी लगवाऊं नौकरी ?" खनकती आवाज़ है जस्सू की. 

" ऐ जस्सू पगार कित्ती है तेरी ? अस्पताल की नौकरी किसने दिलाई और कौनसे अस्पताल में ? तू तो दसवीं पास है और तेरी मां तो घास बेचे है  और बाप कमठे पर चौकीदार है। और ऐसे कपडे पहन के नौकरी करे है तू ? सच बोल।" एक आवाज़ टपरे के पीछे से झाँकने लगी. 

" दसवीं क्या कम होती है, किसी ने ही दिलाई नौकरी ; तुम्हारे क्या ? नर्स का काम भी सीख रही हूँ, सरकारी योजना में मुफ्त सिखाते हैं और हर महीने पैसे भी मिलते हैं." जस्सू की आवाज़ में एक लापरवाही और गुमान सा है।  

" ऐ छोरी, अस्पताल में नौकरी करे है कि और कोई काम ?  ये छोरा क्या काम करे  जो इत्ती महँगी गाडी चलावे  है ? उधर श्रमिकपुरा   में ही तो दो कमरा का किराए का मकान है तुम लोगों का, मैदान के पास कब्ज़े की ज़मीन पर। किराया  कित्ता है रे मकान का ? " एक तीखी, लम्बी और सख्त आवाज़ उभरी। 

जवाब शायद मिला था पर बच्चों के हंसने और मोटरसाइकिल पर घूमने की ज़िद की आवाज़ों के बीच  गुम हो गया. 




कहानी 3 

" Oh, Come on, चलो ना, किसी को कुछ देर की ख़ुशी देने में क्या हर्ज़ है ?"

" तुम्हारा ये एडवेंचर  अगर घर पे पता चल गया ना तो भाई और डैड will kill me."

"every time भाई और भाई का डर, don't  talk to  me."

" ok, चलो."

फ़ूड पैकेट्स और कुछ पुराने ऊनी कपड़ों की एक पोटली भी साथ ही चली. 

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"ऐ दीदी, कल भी लाएगी ना ये सारा खाना ?"
"और ये ऐसी डिरेस भी ला दे ना मेरे को. " महंगे लेकिन खूबसूरत टॉप का कोना किसी ने खींचा। 

"चलो अब बहुत हो गई तुम्हारी दरियादिली". 
"हाँ, हाँ चलते हैं. ऐ तुम लोग ऐसी ड्रेस पहनते हो क्या ? और पढ़ते क्यों नहीं हो ?" 

वही घिसे पिटे से किताबी सवाल हैं जिनमे बच्चे दिलचस्पी नहीं लेते। अपनी चुन्नी  संभालती  एक बड़ी लड़की बार बार उस सुकन्या की सुन्दर बाँहें छू कर देखती है कि  भगवान् ने कितने अलग ढंग से इसका रंग रूप और शरीर बनाया है, उसका क्यों ऐसा नहीं बनाया ? 

"दिमाग  ही ख़राब है तुम्हारा।" 
 मोटरसाइकिल अब तेज़ स्पीड से भाग रही थी. 


Friday, 12 June 2015

ज़िन्दगी का खटराग

काश कि  एक बोहेमियन जैसी ज़िन्दगी होती। 


ये ख्याल अचानक आया कि  काश ऐसा बंजारों जैसा जीवन होता, एक अनवरत यात्रा, जिसका कोई ठौर ठिकाना, ठहराव, कोई मकान या निशान नहीं होता। सिर्फ ज़रूरत भर का सामान और साथ चल सके जितने ही रिश्ते … जब तक चलते रहे तब तक ज़िन्दगी और जब थम जाए तब  … 

ये जो ज़माने भर का खटराग हमने अपने आस पास फैला रखा है ... सजे संवरे  घर, करीने से संजोये गए रिश्ते, दफ्तर और दोस्तों की बतकहियाँ, महफिलें और कहकहे …यह सब हम अपने कन्धों पे उठाये फिर रहे हैं, कितना बोझ …दुनियावी तौर तरीकों और कायदों का बोझ,  कि  जिस समाज में रहते हो वहाँ के सलीके को सीखो। 

और अक्सर इस बोझ से थककर  कभी हम पहाड़, नदी, समंदर का किनारा तलाशते हैं तो कभी  अगला जन्म सुधारने की कसरत में लग जाते हैं. यानी एक नया खटराग पालने लगते हैं.      

अगर मुझसे पूछिए तो मेरी ज़िन्दगी में बोहेमियन हो सकने जैसा कोई मौका मौजूद नहीं है. यहां व्यस्तताए हैं, ज़िम्मेदारियाँ और कमिटमेंट्स हैं, हर ख्वाहिश के पूरे हो सकने का सामान मौजूद है लेकिन बस यही एक इच्छा कि  एक लम्बी ना ख़त्म होने वाली सड़क हो और उस पर हम चुपचाप चलते जाए. 

कहने को ये भी कहा जा सकता है कि  ये बोहेमियन होना कौन बड़ी बात है,  अकेले दुनिया से भागकर अपने में जीना तो कोई भी कर ले; दुनिया में रहकर यहां की ज़िम्मेदारियाँ निभाओ, जो लिया है उसे वापिस सूद समेत लौटाओ। और ये क्या अजब सा शौक पाला  है, बोहेमियन या बंजारा होने का ?? समझदार, दुनियादार लोग ऐसे खटराग नहीं पालते।

इस बंजारे वाले खटराग को मैं अपने जीवन के बीत रहे वक़्त में देखती हूँ, रोज़; क्षण प्रतिक्षण। ये कुछ इस तरह बीत रहा है कि  मुझे इसके चलने-रुकने का अहसास लगातार होता रहता है लेकिन मैं लगातार इस से ग़ाफ़िल होने का नाटक करती रहती हूँ. ये ऐसी दोहरी ज़िन्दगी है जो एक ही साथ दो अलग दिशाओं में चल रही है, एक तरफ अपने बोहेमियन होने के अहसास के साथ और दुसरे अपने सभ्य सामाजिक पैमानों पर संभल कर कदम ताल करती हुई.  मेरे ख्याल से हम सब दोहरी ज़िंदगियाँ जीते हैं, या नहीं ??? कौन जाने। 
मैं तो जी ही रही हूँ. अंदर से मुझमे कुछ दबा छिपा है जो ज़ोरों से चीख रहा है, बाहर निकलने को छटपटा रहा है और बाहर से मैं हंसती, खिलखिलाती, मुस्कुराहटें बिखेरती  और मासूमियत और नफासत छलकाती, लहकती फिरती हूँ. हर रोज़ कितने झूठ बोलती हूँ मैं खुद से और कितने सच छिपाती हूँ मैं दूसरों से.       

Sunday, 1 June 2014

एक इंच मुस्कान : A review



एक इंच मुस्कान उपन्यास थोड़ा अनोखा सा है क्योंकि इसे दो लोगों ने मिल कर लिखा है; राजेंद्र यादव और  मन्नू भंडारी।  दो भिन्न व्यक्तित्व वाले लेखक, अलग अलग लेखन शैली लेकिन कहानी एक. इसमें कुल चौदह चैप्टर हैं, एक चैप्टर राजेंद्र यादव का तो दूसरा मन्नू भंडारी का. ज्ञानोदय  मैगज़ीन में धारावाहिक किश्तों के रूप में छपे इस  उपन्यास को एक प्रयोग के तौर पर भी देख सकते हैं कि  दो लेखक मिल कर एक कहानी पर काम करें और पाठक को  कहीं से ऐसा ना लगे कि  इसे दो अलग दृष्टिकोणों से लिखा गया है; पढ़ते वक़्त कहानी का सूत्र और संरचना कहीं टूटती बिखरती ना लगे. तो इस पैमाने पर ये उपन्यास बिलकुल खरा है इसमें दो राय नहीं है.

एक इंच मुस्कान कहानी है तीन लोगों की; "अमर" जो एक प्रतिष्ठित लेखक है, जिसकी एक अच्छी खासी फैन फॉलोइंग है और जिसके लिए लिखना ज़िन्दगी जीने का ही दूसरा नाम है, जिसका "धन न बैंकों में न मिलों  में, वह मेरे मस्तिष्क में है, मेरी कलम में है." 

एक रंजना है, जो अमर से प्यार करती है और अमर को भी उससे प्यार है. अमर के लिए घर, परिवार, शहर सब छोड़ आई, शादी की और सोचती है कि जो किया वो ठीक ही तो किया। पर कहीं उसे थोड़ी फ़िक्र भी है, " इन साहित्यकारों का कोई भरोसा नहीं। इन्हे एक पत्नी, एक प्रेयसी , एक प्रेरणा, न जाने कितनी कितनी लडकियां चाहिए।"

एक है अमला, किसी रईस खानदान की इकलौती बेटी है जिसे पति ने शादी के एक साल बाद  घर से निकाल दिया। ज़िन्दगी के इस बड़े झटके के बाद  भी उस मानिनी का "व्यक्तित्व  ऐसा है कि  आदमी एक बार देख ले तो ज़िन्दगी भर भूल नहीं सकता।"  जिसकी मुस्कान कुछ ऐसी सम्मोहिनी, मायावी  सी है कि जिसके जादू से कोई ज्यादा देर तक बच नहीं सकता।  एक बार तो पढ़ते समय, पाठक भी कल्पना करने को मजबूर हो जाता है कि  मन्नू भंडारी ने अमला के मुस्कुराने का जो ख़ास तरीका बताया है,  वो कैसा लगता होगा। 


अमला चाहती है कि  अमर लिखे और बहुत लिखे, "तुम्हारा लेखन साहित्य की एक उपलब्धि है".  अमला के साथ अमर की "मधुर मैत्री", लेखक और पाठक का रिश्ता रंजना की समझ से बाहर हो जाता है. "ये मित्र क्या होती है? या तो बहन होती है या भाभी।"   और लगभग पूरी कहानी अमर, रंजना, अमर के अंदर के लेखक और अमला के बीच की खींचातानी  और उतार चढ़ाव को बयान करती चलती है. 

अमर का चरित्र एक अजब उधेड़बुन  और असमंजस में फंसे रहने वाले व्यक्ति का है, सपनों और फिलॉसफी की दुनिया में रहने वाला इंसान। शायद इसके लिए उसे दोष भी नहीं दे सकते। एक तरफ उसे अपने अंदर के लेखक की चिंता है.…  "कलाकार तो धारा है, हर कहीं बहता है, जब तक गति है  तब तक कला है, फिर न गति रहेगी न कला, धारा तालाब हो जायेगी। रंजना और अमला ज़िन्दगी में बहुत आएँगी लेकिन न अमर  प्रतिभा आएगी ना प्रतिभा के स्फुरण के ये क्षण आएंगे।"  वहीँ दूसरी तरफ ऐसा जड़मूर्ख और स्वार्थी भी नहीं कि रंजना की तरफ से पूरी तरह मुंह फेर सके; अमला को लिखे पत्र में कहता है, "अपनी आत्मा और आत्मा के जो अंश है उन्हें धोखा देता रहूँ  और दोस्तों से लड़ता रहूँ?"  

पर फिर भी फैसला लेने और उस पर टिके  रहने   की क्षमता उसमे ज्यादा नहीं है. अमर की  इस मनस्थिति को उसका दोस्त टंडन सही पहचानता है और कहता है " कुछ  मिथ्या  धारणाएं हमें परम्परा से मिलती हैं  और हम उन्हें बिना जाँचे ज़िन्दगी भर पालते जाते हैं. एक मिथ ये है कि कलाकार को घर नहीं बसाना चाहिए, उसे दुखी और निर्धन ही होना चाहिए।"  अमर  रंजना से विवाह करना चाहता था लेकिन जब अमला ने साहित्य के प्रति फ़र्ज़ याद दिलाया तो फैसला बदल गया; "तुम्हारे जीवन की पूरक तुम्हारी कलाकृतियां ही होंगी, रंजना नहीं।"  

फैसला फिर बदला और रंजना से विवाह हुआ.  और ये विवाह ही दो ज़िन्दगियों, दो लोगों उनकी अलग ख्वाहिशों और लक्ष्यों  और दो  अलग अलग  विचारों की लड़ाई का मैदान बन गया. अमर भी अपने वर्तमान के बजाय दूर भविष्य की कल्पना कर रहा है, जब लोग सिर्फ उसकी कृतियों को जानेंगे और उसका व्यक्तिगत  या पारिवारिक जीवन कैसा था इसकी परवाह किसी को नहीं होगी। टॉलस्टॉय, चेखव, ग़ालिब  वगैरह उसे याद आते हैं। टंडन ने उसके लिए बिलकुल सही कहा कि,  "तेरे निर्णय तेरे अपने  नहीं है, वे निर्णय किसी देशी विदेशी लेखक  ने पहले से लेकर रखे हुए हैं और उन्हें अपनी ज़िन्दगी में लागू करके तू उन लोगों  की महानता  प्राप्त करने का संतोष पाता है. काश तू अपने निर्णय कामू या सार्त्र  की किताबों से न लेकर खुद ले सकता होता।"

अब यहां अमर और रंजना के संयुक्त जीवन के बारे में कुछ कहें या उसे समझें इसके पहले अमला को जानना बेहद ज़रूरी है; आखिर उपन्यास का टाइटल उसकी मुस्कुराहट के कारण ही रखा गया है. 

अमला अपने समय और परिस्थियों से आगे की औरत है जो खुल कर कहने साहस  रखती है कि, " जीवन का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी मेरे लिए सौभाग्य बन कर ही आया.  इन दस वर्षों में जो कुछ पाया, उसका लेखा  जोखा करती हूँ तो लगता है मैंने खोया कम पाया अधिक है."  शायद यही साहस उसका गर्व और अभिमान दोनों बन गया है. औरों से अलग, विशिष्ट होने की इच्छा, सारे बंधन तोड़ देने की महत्वाकांक्षा, मर्यादाओं को लांघ जाने का दुस्साहस।  "जल की एक उन्मुक्त धारा .... किसी एक की होकर नहीं रहना चाहती, रह भी नहीं सकती …  उसके लिए सब समान  हैं, वह सबके लिए  समान  हैं."  लेकिन इस महत्वाकांक्षा में बड़ी गहरी अभिलाषा भी छिपी है कि  सब उसका कहना मानें, उस पर मोहित हो, उसका जादू सब पर चले; अपनी बात को हर किसी से मनवा सके. पर खुद अमला पर किस का जादू नहीं चल सकेगा, वो किसी की  कोई बात नहीं मानेगी, किसी को अपने भीतर झाँकने या कुछ तलाशने की इज़ाज़त नहीं देगी। जिसका ये दृढ विश्वास है कि, " पति के अतिरिक्त भी संसार में बहुत कुछ ऐसा होता  है जो नारी जीवन को पूर्ण बना सकता है."   पर यही अमला कैलाश के साथ झगड़े, बरसों पुरानी मैत्री के टूटने और उसकी बेरुखी को सहन नहीं कर पाती। अपने ही मन की दबी हुई आवाज़ को अनसुना किये  इस बात से मन को तसल्ली देती है कि  अमर जैसा एक प्रसिद्ध लेखक उसके बीते जीवन की ट्रैजेडी और वर्तमान के इंद्रधनुषी रंगों पर एक उपन्यास लिखना चाहता है; कि  वो एक बड़े लेखक के सृजन की प्रेरणा है और  अमर को ये विश्वास है  कि  अमला के जीवन पर लिखी ये किताब  उसका मास्टरपीस होगी और उसे साहित्य के क्षेत्र में "अमर" बना देगी। अमला अपने मान और अहम को इस बात में ढूंढ रही है कि  अमर ने अपनी रचना उसके नाम पर समर्पित की है. पर क्या इतना ही  पर्याप्त है ?

रंजना एक साधारण सरल लड़की  है जिसके वही सीधे सादे सपने हैं कि पति हो, एक सुन्दर सजा संवरा  घर हो, शाम को पति पत्नी साथ घूमने जाएँ, ज्यादा से ज्यादा वक़्त साथ बिताएं, सिनेमा देखने जाएँ; अमला के शब्दों में "सुख की कितनी सरल परिभाषा है"।  लेकिन फिर भी कुछ असाधारण है रंजना में; उसके पास एक अच्छी नौकरी है, उसने घरवालों की मर्जी को दरकिनार कर अपनी पसंद से शादी की, वो भी ऐसे आदमी से जो फुल टाइम लेखक है, जिसके ना नौकरी का ठिकाना, ना रहने खाने का कोई ढंग. घर का बजट, सारे खर्चे रंजना की ज़िम्मेदारी हैं; पर फिर भी उसे शिकायत नहीं क्योंकि उसे अमर से प्यार है. (सुनने में अजीब है कि  आजकल के ज़माने में ये क्या आदर्शवादी किस्सा है पर इस कहानी का यही मुख्य बिंदु है) अमर अपनी इन कमज़ोरियों को अच्छे से जानता है और इसलिए रंजना का ये बिना टर्म्स एंड कंडीशंस वाला प्यार जिसमे वो खुद रंजना को कुछ दे  नहीं सकता, ना घर, न पैसा और ना वैसा समर्पित प्यार उसे परेशानी में ज्यादा डालता है और सुख की अनुभूति कम करवाता है । अमर की सुख की  परिभाषा भी रंजना  से अलग है, उसे एक बंधे बंधाये व्यवस्थित जीवन की आदत नहीं है, " सारे दिन को घडी के हिसाब से नहीं , भोजन नाश्ते के हिसाब से बाँट दिया गया है."  उसके लिए किसी  पुराने मित्र ( या मित्री)  से मिलना, पाठकों (जिसमे महिलाएं भी शामिल हैं) के प्रशंसा भरे पत्र, शाम होते ना होते  दोस्तों के साथ  निकल जाना; सुख के पैमाने हैं. 

और इसलिए अमला या शकुन या लेखन नहीं, सुख की यही अलग अलग परिभाषा;  अमर और रंजना के बीच दीवार की तरह खड़ी है और दोनों को दो अलग समान्तर रास्तों पर ले जाती है. इस बात को अमला का चरित्र  बड़े सुन्दर ढंग से परिभाषित करता है, "जो किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन का चरम सुख हो सकता है वही तुम्हे कष्ट दे रहा है… शायद अपने अपने व्यक्तित्व के एक सिरे पर  बहुत ही साधारण हैं, वही हवसें, वही इच्छाएं, वही कमज़ोरियाँ …" 


तो ये कहानी आखिर किस अंत पर पहुँचती है, शायद कहीं नहीं … अमर के अपने शब्दों में इस कथा का सार यही है कि  " यह उसके जीवन की विवशता है, ट्रेजेडी है कि  जो कुछ उसे प्राप्त है  नहीं पाती, अस्वीकार कर देती है और एक ऐसे अदेखे अनजाने सुख पीछे भागती है जो शायद उसे कभी प्राप्त नहीं होगा।"  ये कथन अमर और अमला दोनों की जीवन यात्रा पर सही बैठता है और  शायद यही वो सन्देश या जीवन  सत्य  है जो उपन्यास लिखने वालों ने इस सीधी  सरल कहानी  के ज़रिये  बताने की कोशिश की है.

P.S.  जिन लोगों ने मन्नू भंडारी की आत्मकथा पढ़ी है या जिनको मन्नू और राजेंद्र यादव के  वैवाहिक जीवन की जानकरी रही है वे लोग इस उपन्यास को उन दोनों की अपनी निजी ज़िन्दगी का लेख जोखा ही  मानेंगे; खुद मुझे भी यही लगा था लेकिन हमारे इस भ्रम  को मन्नू भंडारी ने दूर कर दिया है. उपन्यास के अंत में दोनों लेखकों  ने इस डेढ़ साल तक चले  "प्रयोग" पर  अपने विचार दो चैप्टर्स में  लिखे हैं जो इस किताब की  खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं और इसी में मन्नू भंडारी ने स्पष्ट कहा है कि  इस कहानी का उनके निजी  जीवन से कोई लेना देना नहीं। पर फिर भी मन मानता तो नहीं।  



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Wednesday, 25 December 2013

Free fall

Sitting Near by the Shore

You are Looking Straight into My face, Your Piercing Eyes..    

And I am Looking into the Mirror, Looking at My own Reflection 

Do I recognize Myself ???  For I don't Know .. 

You ask Me, What Happened to You ?

What's Wrong With You, Where are you ?? 

I said, I want to Go Beyond the Barriers 

I want to Sink Myself into the Deep Waters


मैं अपने आप में ही उलझी हूँ  मैं तुमसे क्या कहूं, मुझे खो जाने दो हवा में.

इन उलझे हुए ज़िन्दगी के बेसुरे तारों को ज़रा सुलझा लेने दो, इसकी लय ताल को वापिस लौटा लाने के लिए मुझे जाने दो.



I Don't Know How Am I Expressing Myself,  am I sounding Pleasant, Rude, Angry ... 

Please Don't Accuse me, Don't Blame me, Don't Expect Anything; for I have Lost my Senses as You Think 

I am Not That One Whom You Ever Knew, I am a Shadow of that Name and that Face 

मैं अपने आपे में ही नहीं हूँ

मैं रास्ते भूल रही हूँ

मुझे रास्ता तलाशने दो 

मुझसे सवाल ना करो, मुझे डर  लगता है उनसे  

वे मेरे चारों ओर  घेरा बना कर मुझे बाँध लेते हैं 

मुझे मत बांधो 

Let me Disperse Myself into the Air and in the Water and in the Sand ..

Tuesday, 20 August 2013

राधा बाई की लव स्टोरी --- पार्ट २

राधा की कोर्ट मैरिज में अभी कुछ वक़्त था .. लेकिन तब तक प्लानिंग भी तो करनी थी ना .. आखिर शादी होने वाली है। लेकिन तभी राधा ने फिर से ४ दिन की छुट्टी ली। पांचवे दिन देवी जी प्रकट हुई, आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई।

"अब क्या हुआ ?" 

" घर में बहुत झगडा हुआ था ?"  राधा जी उदास हैं।

और फिर जो किस्सा सुनाया गया वो इस तरह कि घर में इसी मुद्दे को लेकर हंगामा मचा  है, झगडा हो रहा है राधा और उसकी माँ के बीच और इसलिए राधा जी ने एलान किया है कि  वो खाना नहीं खायेंगी तब तक नहीं जब तक माँ,  हाँ  नहीं  कह देती और पिछले चार दिन से  सचमुच कुछ नहीं खाया ।

"क्या .. तू पागल हो गई है .." माताजी फिक्रमंद हैं।

"मैंने तो मन्नत मांग ली है, गाँठ बाँध ली है चुन्नी में ..तभी खाना खाऊँगी जब घरवाले मान जायेंगे।"

" खाना नहीं खाएगी तो क्या भूखी मरेगी?" 

"मैंने तो देखो मेहंदी में भी उसका नाम लिखवा  लिया है"   राधा देवी ने अपनी बायें  हाथ की हथेली आगे की … वहाँ लक्ष्मण नाम शोभायमान था. 

"अब अगर बच गई तो "उसकी" वर्ना भगवान् की, " राधा जी ने गहरी सांस ली.  

अब यकीन हो गया कि  कुछ  धमाकेदार होने वाला है.  और उसके लिए ज्यादा इंतज़ार भी नहीं करना पड़ा.  दो  दिन बाद  एक  नई  खबर आई ...

" माँ   मान गई है, कहती है कि लड़के वाले घर आये हमसे रिश्ते की बात  करने। अब परसों आयेंगे उसके घर से "सब लोग".  

"ये कैसे हो गया ??" 

" भगवान् ने सदबुद्धि  दी मेरी माँ  को, मेरी मन्नत पूरी हो गई, आज जाउंगी मंदिर प्रसाद चढाने।"


 उसके बाद शुरू हुआ सलाहों का दौर …. "अच्छी मिठाई और नमकीन मंगवा के रखना,  मेन  रोड वाली श्यामा स्वीट्स से लेना और उसी से गुड डे बिस्किट के पैकेट भी. और सुन तू अच्छी  सी ड्रेस पहनना। . है तेरे पास कोई ढंग की बढ़िया ड्रेस ??"   इस आखिरी सवाल ने मुझे चिंतित कर दिया, कहीं मेरी ही किसी ड्रेस का नंबर ना लग जाए ….  शुक्र था कि  राधा का जवाब हाँ में था.

"उसने मुझे कहा है कि   कोर्ट मैरिज करेंगे तो वो मुझे गोल बाज़ार ले जाएगा और वहाँ से नई  ड्रेस, पायल और मेकअप  का सामान खरीद कर देगा।" 

"वो सब जब होगा तब होगा , फिलहाल तो तू अच्छी ड्रेस पहन के ढंग से तैयार होना।" माताजी ने झिडकी और सीख दोनों एकसाथ  दी. 

फिर दो दिन इसी मुद्दे पर लम्बी और गंभीर किस्म  की वार्ताएं  हमारी डाइनिंग टेबल पर चलती रही. और फिर वो दिन भी आ गया, उस दिन राधा बाई ने छुट्टी ली ना सिर्फ उस दिन बल्कि उसके बाद तीन  दिन और भी. ज़ाहिर अब मेरे साथ माताजी का पारा  उसकी लगातार छुट्टियों की वजह से चढ़ने भी लगा और साथ ही चिंता भी बढ़ने लगी कि  आखिर हुआ क्या। … 

तो आखिर पर्दा उठा,  राधा देवी आई, बैठी और बिना पूछे ही उन्होंने सारा किस्सा शुरू से आखिर तक कह सुनाया। आप भी सुनिये लेकिन संक्षेप में।  

"उस दिन " राधा की होने वाली ससुराल का पूरा कुनबा आया, सास, ससुर,  उनके दोनों सुपुत्र, तीन सुपुत्रियाँ अपने पति-बच्चों समेत. वे लोग आये, लेकिन राधा की माँ ने उनमे से किसी से भी बात नहीं की, पानी तक नहीं पूछा, वे लोग काफी देर रुके, लेकिन ना माँ ने और ना राधा के पिता ने उनसे एक बार भी बात की. राधा ने ही उन्हें खिलाया पिलाया (बड़ी मिन्नतें मनुहार करके ). जाते जाते परिवार के मर्दों ने यही कहा कि उन्हें क्या अपमानित करने के लिए बुलाया गया ? औरतों का रुख फिर भी थोडा सहानुभूति का था. यहाँ तक आते आते राधा का रोना शुरू हो गया, उसने किस्मत को कोसा, अपने नसीब को, अपनी माँ को भी. हमारी माताजी ने उसे तसल्ली दी, चाय पिलाई, बिस्कुट खिलाये, राधा जी का चित्त स्वस्थ हुआ और चुन्नी में एक गाँठ और बाँध के वो फिर से अपने काम में लगी.

लेकिन अब मामला गंभीर हो चला था. राधा की शादी तो दूर उसकी  लव स्टोरी ही खटाई में पड़ती दिख रही थी. और फिर करीब दस दिन और बीत गए,इस  बीच लक्षमण दास का कोई  फोन नहीं  आया और जब राधा ने फोन किये तो उसने ज्यादा बात ही नहीं की. राधा परेशान थी, क्योंकि लक्ष्मण अब या तो फोन उठा नहीं रहा या फिर बाद में बात करने का कह कर काट देता है..

"उसका भाई कहता है कि  ऐसी लड़की को घर में ब्याह के नहीं लाना जिसकी माँ ने हमारी इतनी बेईज्ज़ती की."  राधा उवाच।

" फिर अब लक्ष्मण क्या कहता है?" माताजी उवाच. 

"वो कुछ नहीं कह रहा, लेकिन मैंने उसे समझाया है कि शादी तो  मुझे करनी है, मैं तो तैयार हूँ ना, माँ ना माने  तो ना माने"  राधा का सोत्साह जवाब.  

"तेरी माँ क्या कहती है ?" माताजी गंभीर हो चली हैं.

"माँ तो कहती है कि  अगर मैंने उस से शादी की तो मुझसे सारे रिश्ते तोड़ लेगी और मुझे कभी घर नहीं आने देगी, मेरी बहन शोभा भी यही कहती है."  राधा की आवाज़ भी अब उदास हो गई. 

"फिर तो सोच समझ के ही कदम उठाना, अगर लक्षमण भी अपनी बात से फिर गया तो तू कहाँ जायेगी।" 

"नहीं, मुझे विश्वास है, "उसने मुझे कहा है, वादा किया है, अमावस को छुट्टी होती है, उस दिन हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे, उसने वकील से बात कर ली है … गोल बाज़ार जाकर  … " राधा फिर से सुख सपनों में खो गई.

दिन पर दिन बीते, अमावस भी आई और निकल गई पर  उस दिन राधा देर से आई  और कई दिन बाद हमने राधा को बहुत खुश देखा …मोबाइल में रेडियो फुल वॉल्यूम चल रहा था. कारण पूछने की नौबत नहीं आई, राधा धम्म से कुर्सी खींच कर बैठ गई और बोली...  " आज तो हम पिक्चर  जाने वाले थे. उसने फोन किया था दो दिन पहले कि  … वो फिल्म आई है ना आशिकी २  … वो दिखाने ले जाएगा, लेकिन आज उसके पिता जी की तबियत अचानक बिगड़ गई तो उनको लेके अस्पताल गया है, मुझे रास्ते में मिला था तब बताया।  राम करे जल्दी ठीक हो मेरे ससुर जी." 

माताजी और मैं मुंह और कान दोनों खोल कर ये सब सुन रहे थे और सोच रहे थे कि  कहानी में ये नया ट्विस्ट कैसे आ गया.  

  
 To Be Continued ...

Photo Courtesy :-- Google 


Final Part of the Story can be read Here