भारतीय सड़कें कितना बड़ा दिल रखती हैं। कभी लगता है कि सड़कें हैं या कोई इमामबाड़ा .... फल सब्ज़ी के ठेले, चाट वाले, घास बेचने वाले, फ़ास्ट फ़ूड वाले और भी पता नहीं, क्या क्या बेचने वाले के ठेले या स्ट्रीट काउंटर सड़क किनारे जगह बनाये एक परफेक्ट फ्रेम की तरह सुशोभित होते हैं। अभी तो हमने सड़क किनारे या फुटपाथ पर या चौड़े डिवाइडर पर रहने, बसने या सोने वाले भिखारियों का तो अभी तक कुछ नक्शा ही नहीं निकाला !!! और इस सबके साथ, भारतीय सड़कों की स्थाई विशेषता जो अब कह लीजिये कि इन सड़कों की शोभा को बढ़ाते हैं या बिगाड़ते हैं, वो हैं खड्डे, टूटी फूटी सड़क के पत्त्थर, मिटटी और कीचड के टापू। सडकों पर जो स्थाई रूप से गाय, कुत्ते समेत कई तरह के पशु प्राणी निवास करते हैं, उनकी संख्या का तो कोई हिसाब ही नहीं। कितना संसार बसा हुआ है इन सड़कों पर। इतने पर भी अपनी शाही सड़कों पर हिंदुस्तान मजे से, पूरी रफ़्तार से दौड़ रहा है। बिना रुके, बिना ट्रैफिक सिग्नल की परवाह किये , बगैर ब्रेक लगाए; बस दौड़ रहा है। "हर लिमिट की हाइट पर चढ़ के डांस बसंती " ( एक फिल्म का लिरिक्स)
Saturday, 19 February 2022
अमेज़न के जंगल और शहर की सड़क
Tuesday, 15 February 2022
भद्र लोक वाली महिला
"An Exotic Woman, A Delusional Woman, asking for Attention." This is how I would like to start my Blabber.
Friday, 29 January 2021
और हम बाकी लोगों का क्या ??
कहानियां किसके बारे में कही जाती हैं ? कहानियों से क्या आशा की जाती है कि उन्हें हमेश हैप्पी एंडिंग या कोई स्टीरियो टाइप एंडिंग होनी चाहिए ? अनगिनत फिल्में और उपन्यास जो अब तक रचे जा चुके, उनमे हर उस संभावना पर एक विस्तृत कथा है जिसके होने की कहीं एक ज़रा सी भी संभाव्यता है। इस दार्शनिकता से परे क्या कभी कोई कहानी ऐसी भी हो सकती है जिसम कोई एंडिंग नहीं है जिसमे दो तयशुदा किरदार नहीं है ? जिसमे लवस्टोरी नहीं है !! जिसमे हेट स्टोरी भी नहीं है !! जिसमे कोई प्रवचन या आदर्श या बहादुरी की गाथाएं भी नहीं है !!! क्या ऐसी भी कहानी हो सकती है ? ऐसे लोगों की कहानी जो कहानी का किरदार होने लायक माने नहीं गए ?? क्या किसी एक इंसान की भी कोई कहानी हो सकती है ?
Tuesday, 24 November 2020
लहसुन के बीच काजू
लहसुन के ढेर के बीच मैं एक काजू हूँ। दिखता भी हूँ मगर पहचान में नहीं आता। जानता हूँ कि लहसुन गुणों की खान है, आम आदमी का खास सहारा है। दवा है, स्वाद है , नुस्खा है, रौनक है सब है। लेकिन मैं भी अपनी मर्ज़ी से काजू नहीं बना। मुझे आलू गाजर मूली कांटा झाडी घास कुछ भी बनाया जा सकता था लेकिन कुदरत ने मुझे काजू ही बनाया। यूँ मैं भी मीठे स्वाद की शान हूँ, मिठाई की रौनक और कीमत हूँ। मेरा अपना जलवा है लेकिन मैं सिर्फ उन्हीं का साथी हूँ जो मेरी कीमत चुका सकें। वैसे काजू बन पाना भी आसान नहीं था। मेरे साथ के कितने बीज सड़ गए, फूल को पक्षी खा गए या फल निकला तो उसमे कीड़े लगे, कभी हवा उड़ा ले गई कभी और कुछ। इन सब में, मैं और मेरे कुछ खुश किस्मत साथी पूरा फल बने और समय आने पर खेत से मंडी तक का सफर तय कर यहां पहुंचे। बस यहां आकर किस्मत पलट गई, बनिए की दुकान के बजाय मैं इधर लहसुन प्याज के ढेर पर गिर गया। और बस क्षण भर में मेरी जाति बदल गई , अब मैं लहसुन हूँ। लेकिन जब मुझे देख कर पहचाना जायेगा तब शायद खुश होकर खरीदार मुझे ये सोच कर खायेगा कि लहसुन के भाव काजू मिल गया। मुझे सब्ज़ी में नहीं डाला जायेगा, बस यूँही खा लिया जायेगा स्वाद बदलने की खातिर। इसलिए मैंने कहा ना कि काजू बनना मेरे हाथ में नहीं था। फिर भी अभी के लिए लहसुन के ढेर के बीच मैं एक काजू यहां पड़ा हूँ। यह सब लहसुन मुझे देखते हैं और बार बार इधर उधर ठेल देते हैं। इनके लिए मैं घुसपैठिया, अतिक्रमणकारी और बाहरी। और मेरे लिए ये अजनबी, विजातीय और अमित्र।
Wednesday, 1 April 2020
मूर्ख होने का विज्ञान
Tuesday, 28 August 2018
एक थीसिस चाँद पर
Monday, 11 June 2018
आदमी और कहानी
Sunday, 29 November 2015
ज़िन्दगी का खटराग --- 2
घड़ी की टिक टिक दिन और रात के प्रहर बीतने की सूचना देती है लेकिन इस मौसम के बीतने के कोई आसार नहीं दिखते। ये एक लम्बी गर्मियों की तरह है जिसमे दिन कभी नहीं ढलता, दोपहर सुबह से शुरू होकर अँधेरा घिरने के बाद भी कुछ देर तक बनी रहती है और घड़ी लम्बे पॉज लेकर चलती है. और इस गर्म मौसम के पार कोई और मौसम है भी या नहीं इसकी भी कोई खबर नहीं। अक्सर इस थमे हुए दिनों वाले मौसम के लिए उस शख्स को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिसकी ज़िन्दगी में ये उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के छह छह महीनो वाला मौसम आकर रुक गया है. पर अक्सर खुद उस शख्स को भी नहीं होती कि आखिर इतनी तेज़ गति से भागने के बावजूद समय रुका क्यों है ? अनंत तक फैले हुए ये दिन किसी झिलमिलाती खुशनुमा साँझ तक क्यों नहीं पहुँचते ? यहां रात को नींद में सपने क्यों नहीं आते ? यहां शाम कब आती है और कितने बजे आती है और कब ख़त्म हो जाती है, इसके बारे में घड़ी देख कर क्यों नहीं पता चलता ?
कलैंडर में तारीखें बदलती हैं लेकिन मौसम नहीं बदलता। दिन बीत जाता है लेकिन वक़्त थमा हुआ ही लगता है. उत्तरी रौशनियों के साये और महासागर के गहरे रंग कभी एक नया मौसम बना सकेंगे ? समय का एक नया आयाम ? दिन और रात का कोई नया हिसाब जो चौबीस घंटो और सात, तीस, बावन, बारह और 365 की गिनती से अलग और घड़ी की पाबंदी से दूर हो ?
Monday, 8 September 2014
मेरी पसंद की कुछ किताबें : एक अधूरी सूची
तो इस बार का indispire टॉपिक है, आपकी पसंद की टॉप टेन किताबें बताइये। अब पढ़ा तो बहुत है, स्कूल कॉलेज और फिर नौकरी करते हुए पब्लिक लाइब्रेरी तक … जो हाथ लगा वो सब पढ़ डाला। पर ऐसा टॉप टेन जैसा कभी कुछ सोचा नहीं। तो चलिए आज सोचते हैं, मेरी पसंद की टॉप टेन किताबें।
Submit a list of your 10 favourite books with reasons as to why they made it to your list. Let us try to complete a circle and compile a list of books we are yet to pick.#loveofreading
Friday, 29 August 2014
समय के संसार में
Tuesday, 1 July 2014
कार का कनेक्शन
Saturday, 7 June 2014
एक ब्लॉगर की गुस्से भरी कथा
कुछ समय पहले भी इसी मुद्दे पर एक Essay लिखा था





















