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Thursday, 7 August 2014

चौराहे पर सीढ़ियां : Book Review

कभी कभी फ़ास्ट फ़ूड से मन भर जाता है, मुग़लई या या ऐसा ही कुछ "देसी" दाल बाटी सरीखा खाने का मन करता है फोर्थ गियर में गाडी दौड़ाते दौड़ाते लगता है कि ज़रा स्पीड कम कर ली जाए, सेकंड गियर में चलाया जाए। कूदते फांदते, भागते वक़्त के पैरों को ज़रा थाम लिया जाए, रोक लिया जाए. घडी की  सुइयों को ही धीमा कर दिया जाए. तसल्ली से बैठ कर एक कप गरम  चाय के साथ भुजिया खाते हुए सुस्ताया जाए.  कुछ ऐसे ही मिज़ाज़ की कहानियों का नाम है "चौराहे पर सीढ़ियां". किशोर चौधरी का लिखा एक बेहतरीन कहानी संग्रह जो हिंदी के बेस्ट सेलर में गिना जा रहा है. इस किताब को पढ़ते वक़्त ऐसा लगा जैसे वक़्त खुद कहानियाँ सुनने के लिए ठहर गया है या धीमे धीमे बीत रहा है.

इस संग्रह की  खासियत है इसका मिज़ाज़, इसकी भाषा, शिल्प और कहानी सुनाने का अंदाज़ ( जी हाँ लेखक आपको एक कहानी सुना रहा है, बैठिये उसके पास और सुनिये कि वो क्या कहता है).   आप कहेंगे कि मैं तो लेखक की  और उसकी किताब की  बड़ी तारीफें किये जा रही हूँ पर ऐसा नहीं है, मैं तो केवल भूमिका बाँधने की  कोशिश कर रही हूँ. दरअसल इस किताब को आप ऐसे ही भागते दौड़ते, बीच में से समय निकाल कर, यूँही महज़ समय काटने के लिए नहीं पढ़ सकेंगे। इन कहानियों के लिए आपको समय निकालना होगा, पढ़ने के साथ इन्हे समझना भी होगा कि ढेर सारी  उपमाओं, प्रतीकों और उदाहरणों के बीच कहानी कब किस मोड़ से गुज़र रही है.



संग्रह का नाम जिस कहानी के नाम पर रखा गया है "चौराहे पर सीढ़ियां", वो इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी है या नहीं ये निर्णय पाठक खुद करें। मुझे इसमें  जो दिखाई दिया वो है लेखक की अद्भुत कल्पनाशीलता और लोक जीवन में गहरे पैठी  हुई  मानसिकता को पहचानने की  नज़र. सीढ़ियां एक प्रतीक है, एक बहाना है जिनके ज़रिये कहानी कही जा रही है और आप पूरी तरह आज़ाद हैं इन सीढ़ियों को "घर की बेटी", "बुजुर्ग"  "रिश्ते नाते सम्बन्धो"  या और किसी भी मूर्त अमूर्त चीज़ से जोड़ने के लिए, बस इतना याद रखिये कि सीढ़ियां घर का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा  हैं जो अब घर की चौखट लांघ कर चौराहे पर खड़ी  है और चौराहे पर आने के बाद किसी भी घटना, पात्र और प्रतीक का कैनवास बहुत बड़ा हो जाता है. खुद चौराहा भी इसमें एक पात्र है. जब पहली बार मैंने कहानी पढ़ी तो मुझे लगा कि सीढ़ियों का अर्थ बेटियों से या लड़कियों से है, दूसरी बार लगा नहीं शायद  घर के बड़ों से है और तीसरी बार लगा कि कुछ और है.  अर्थ यही कि आपकी कल्पना के लिए यहाँ बहुत से हिंट और क्लू हैं.  

इस संग्रह की दूसरी कहानियों में  "परमिंदर के इंतज़ार में ठहरा हुआ समय", "खुशबू बारिश की नहीं मिटटी की  है",  "बताशे का सूखा हुआ पानी",  "एक फासले के दरम्यान खिले हुए चमेली के फूल",  और "लोहे के घोड़े" मुझे ज्यादा याद आ रही हैं.  "परमिंदर" की कहानी में हास्य और व्यंग्य दोनों को  धीर गम्भीर भाषा के ज़रिये पेश किया गया है जो इस स्कूल लव स्टोरी को और भी रोचक बना देता है.  चमेली के फूल, लोहे के घोड़े और चाँद का सूखा बताशा, इन कहानियों  में इनके पात्रों के आपसी सम्बन्ध, जीवन के उतार चढ़ाव और अनुभव ही एक पूरी  कहानी बुनते जा रहे हैं. और तब पाठक सोचता है कि ये तो रोज़मर्रा की  ज़िन्दगी का हाल है, क्या  इसे भी कहानी के रूप में लिखा जा सकता है ?  जवाब लेखक ने हाँ में दिया है.

 इन कहानियों  में राजस्थान  दिखाई देता है, छोटे शहर, कसबे, गाँव की कहानियाँ और वहीँ के पात्र भी. यहाँ आपको गाड़िया लोहार, रेगिस्तान के किसी दूर दराज गाँव का स्कूल मास्टर, भोपे, लोक भाषा के शब्दों की सहज उपस्थिति, लोक कथाओं और आस्थाओं का सन्दर्भ,  हेरिटेज होटल की पृष्ठभूमि और  जेठ की चिलचिलाती धूप  का पसरा हुआ आँचल और मेह के इंतज़ार में बाट  जोहते  हुए दिन मिलेंगे। पर फिर भी हम इन कहानियों को किसी एक खांचे जैसे केवल ग्रामीण परिवेश की कहानियां या स्त्री केंद्रित विषय तक सीमित नहीं कर सकते। यहाँ होस्टल में अकेलेपन से जूझने वाली अंजलि भी है वहीँ  सुगणी भी है जिसकी  दुनिया थार के एक कोने में अपने पति गोमिन्दा के आस पास  सिमटी हुई है. फिर यहाँ "गीली चौक" की सीलन का सबब ढूंढते और "रात की अँधेरी बाँहों"  में दो टीनएजर्स की प्रेमकथा के सूत्र सुलझाने में लगे हुए सूत्रधार जैसे दो पुरुष पात्र भी हैं. एक तरफ सिमली का सशक्त पात्र है जो रेत  के सागर में अपने हिरण कुलांची  वाले  मन का ठिकाना तलाश रही है और मन है कि कहीं टिकता ही नहीं; वहीँ  एक सिंगल मदर  नैना है जिसे एक घर की तलाश है, सर पर एक छत और ज़िन्दगी के भरे पूरे होने का अहसास दे सके ऐसे कुछेक रिश्तों की तलाश है.  

ना तो कहानियों की विषयवस्तु असाधारण है और ना इनके पात्र, असाधारण अगर कुछ है इसमें तो कहानी सुनाने का तरीका, सूत्रधार की तरह जो आपको बताता चलता है कि कब क्या हो रहा है.  इन कहानियों में आपको बड़े दिलचस्प विवरण मिलेंगे, ऐसी तुलनाएं और उपमाएं पढ़ने को मिलेंगी जो शायद आपने पहले कभी नहीं सोचा होगा कि चीज़ों को इस नज़रिये से भी देखा जा सकता है.

यहाँ आपको समय का एक चेजारा मिलेगा जो हर रोज़ नया दिन उगाता है, जहां घर चुप्पियों के शोर से गूंजते हैं, जहां चौराहे का माथा खुजाने के लिए कनखजूरे सीढ़ियों के रास्ते आते हैं;  जहां कांसे के रंग वाली सांझ आती है और रात पखावज की तरह बजती है और उसके साथ संगत  के लिए ह्यूमन नोड्स वाली सारंगी भी है. एक निराश्रित बेवा के फटे ओढ़ने जैसी सड़कें है और  मगरमच्छ की तरह गुलाची खाने वाले रास्ते भी है. निश्चित रूप से एक संवेदनशील पाठक को बाँध लेने के लिए एक नए किस्म की लच्छेदार भाषा है ये.  


 अंग्रेजी में जिसे हम कहते हैं थॉट प्रोसेस, तो कहानियाँ पढ़ते वक़्त उस प्रक्रिया की गहराई, परिपक्वता और उसके विविध आयामों का एक खूबसूरत उदाहरण है ये किताब। किशोर चौधरी की इन कहानियों की एक खासियत ये है कि इनमे कोई एक फिक्स थीम नहीं है कि  "एक बार की बात है, ऐसा हुआ और फिर वैसे और फिर इस तरह किस्सा ख़त्म हुआ". देखा जाए तो ये कहानियाँ  किसी एक घटना या किसी ख्याल को केंद्र में रखकर  अपने पात्रों  के ज़रिये जीवन यात्रा को उकेरती, पात्रों के अंदर और बाहर की दुनिया का हाल चाल बताती  चलती  हैं, और अक्सर ऐसे ही कहीं एक मोड़ पर आकर रुक जाती हैं और तब लेखक याद दिलाता है कि कहानी ख़त्म हो गई;  अब यहाँ से आगे इसे  आपकी कल्पना ले जायेगी।


खैर, अब तारीफ़ बहुत हो गई, अब कुछ  तीखी बातें भी होनी चाहिए। इन कहानियों में  जो  अच्छा नहीं लगता वो है, इन सबका एक जैसा रंग रूप यानि लगभग सभी कहानियों में धीमा और उदास समय है जो मौसम के बदलते रंग  पर अक्सर भारी पड़  जाता है.  इस किताब को पढ़ते समय मुझे निर्मल वर्मा का एक  कहानी संग्रह  याद  आ गया (नाम भूल रही हूँ)  जिसमे बर्फ और  बारिश एक ऐसा मौसम है जो लगभग हर कहानी में था; कुछ वैसा ही धूल उड़ाते दिन और रात, इंसान के भीतर और बाहर की आग और गर्मियों की धूप  में तपे  हुए लम्बे दिन, इन कहानियों में बार बार दिखते  हैं.  ऐसा लगता है कि  कई जगह विवरण बहुत ज्यादा भारी और बोझिल हो गए हैं जिनसे कहानी का प्रवाह भी टूट ही जाता है, उस समय एक औसत पाठक ये सोचने पर मज़बूर हो सकता है कि वो कहानी पढ़ रहा है या कोई निबंध जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान या किसी और विज्ञानं से है.  कुछेक कहानियाँ ऐसी भी लगी जिनके लिए समझ पाना मुश्किल है कि, आखिर इन पात्रों और उनके इर्द गिर्द बुने संसार के ज़रिये लेखक क्या कहने की कोशिश कर रहा है. "एक अर्से से", "गीली चॉक " और  "सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी थी" को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है.  इसके अलावा संवादों की कमी होना ज़रा अखरता ही है,  क्योंकि कहानी के पात्र जितना ज्यादा आपस में  बात करेंगे, वो किस्सा कहानी उतना ही ज्यादा जीवंत होकर पाठक के सामने आएगा और पाठक खुद उसका हिस्सा बनता जाएगा।

पर जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि इस किताब को पढ़ने के लिए आपको समय निकालना होगा तभी आप इस धीमे लेकिन लयबद्ध शब्दों के प्रवाह के साथ कदमताल कर पाएंगे। इस बात को लेखक ने एक कहानी में कुछ इस तरह समझाया है कि,  "ज़िन्दगी जिसे कहते हैं वह कैसी यात्रा है?  कैसी तलाश है? जो माया की तरह आसपास  महसूस तो होती है मगर दिखाई नहीं पड़ती, सामने नहीं आती, खुलकर बयान नहीं होती।"  जैसा उन्होंने एक और  जगह भी  कहा है कि 

"ये एक आदमी के दिमाग में दर्ज हो रही घटनाओ का बेतरतीब ब्यौरा है."

इस रिव्यु को आनक पत्रिका के  तीसरे अंक  के  लिए लिखा गया था 

Image courtesy : Google 

Sunday, 1 June 2014

एक इंच मुस्कान : A review



एक इंच मुस्कान उपन्यास थोड़ा अनोखा सा है क्योंकि इसे दो लोगों ने मिल कर लिखा है; राजेंद्र यादव और  मन्नू भंडारी।  दो भिन्न व्यक्तित्व वाले लेखक, अलग अलग लेखन शैली लेकिन कहानी एक. इसमें कुल चौदह चैप्टर हैं, एक चैप्टर राजेंद्र यादव का तो दूसरा मन्नू भंडारी का. ज्ञानोदय  मैगज़ीन में धारावाहिक किश्तों के रूप में छपे इस  उपन्यास को एक प्रयोग के तौर पर भी देख सकते हैं कि  दो लेखक मिल कर एक कहानी पर काम करें और पाठक को  कहीं से ऐसा ना लगे कि  इसे दो अलग दृष्टिकोणों से लिखा गया है; पढ़ते वक़्त कहानी का सूत्र और संरचना कहीं टूटती बिखरती ना लगे. तो इस पैमाने पर ये उपन्यास बिलकुल खरा है इसमें दो राय नहीं है.

एक इंच मुस्कान कहानी है तीन लोगों की; "अमर" जो एक प्रतिष्ठित लेखक है, जिसकी एक अच्छी खासी फैन फॉलोइंग है और जिसके लिए लिखना ज़िन्दगी जीने का ही दूसरा नाम है, जिसका "धन न बैंकों में न मिलों  में, वह मेरे मस्तिष्क में है, मेरी कलम में है." 

एक रंजना है, जो अमर से प्यार करती है और अमर को भी उससे प्यार है. अमर के लिए घर, परिवार, शहर सब छोड़ आई, शादी की और सोचती है कि जो किया वो ठीक ही तो किया। पर कहीं उसे थोड़ी फ़िक्र भी है, " इन साहित्यकारों का कोई भरोसा नहीं। इन्हे एक पत्नी, एक प्रेयसी , एक प्रेरणा, न जाने कितनी कितनी लडकियां चाहिए।"

एक है अमला, किसी रईस खानदान की इकलौती बेटी है जिसे पति ने शादी के एक साल बाद  घर से निकाल दिया। ज़िन्दगी के इस बड़े झटके के बाद  भी उस मानिनी का "व्यक्तित्व  ऐसा है कि  आदमी एक बार देख ले तो ज़िन्दगी भर भूल नहीं सकता।"  जिसकी मुस्कान कुछ ऐसी सम्मोहिनी, मायावी  सी है कि जिसके जादू से कोई ज्यादा देर तक बच नहीं सकता।  एक बार तो पढ़ते समय, पाठक भी कल्पना करने को मजबूर हो जाता है कि  मन्नू भंडारी ने अमला के मुस्कुराने का जो ख़ास तरीका बताया है,  वो कैसा लगता होगा। 


अमला चाहती है कि  अमर लिखे और बहुत लिखे, "तुम्हारा लेखन साहित्य की एक उपलब्धि है".  अमला के साथ अमर की "मधुर मैत्री", लेखक और पाठक का रिश्ता रंजना की समझ से बाहर हो जाता है. "ये मित्र क्या होती है? या तो बहन होती है या भाभी।"   और लगभग पूरी कहानी अमर, रंजना, अमर के अंदर के लेखक और अमला के बीच की खींचातानी  और उतार चढ़ाव को बयान करती चलती है. 

अमर का चरित्र एक अजब उधेड़बुन  और असमंजस में फंसे रहने वाले व्यक्ति का है, सपनों और फिलॉसफी की दुनिया में रहने वाला इंसान। शायद इसके लिए उसे दोष भी नहीं दे सकते। एक तरफ उसे अपने अंदर के लेखक की चिंता है.…  "कलाकार तो धारा है, हर कहीं बहता है, जब तक गति है  तब तक कला है, फिर न गति रहेगी न कला, धारा तालाब हो जायेगी। रंजना और अमला ज़िन्दगी में बहुत आएँगी लेकिन न अमर  प्रतिभा आएगी ना प्रतिभा के स्फुरण के ये क्षण आएंगे।"  वहीँ दूसरी तरफ ऐसा जड़मूर्ख और स्वार्थी भी नहीं कि रंजना की तरफ से पूरी तरह मुंह फेर सके; अमला को लिखे पत्र में कहता है, "अपनी आत्मा और आत्मा के जो अंश है उन्हें धोखा देता रहूँ  और दोस्तों से लड़ता रहूँ?"  

पर फिर भी फैसला लेने और उस पर टिके  रहने   की क्षमता उसमे ज्यादा नहीं है. अमर की  इस मनस्थिति को उसका दोस्त टंडन सही पहचानता है और कहता है " कुछ  मिथ्या  धारणाएं हमें परम्परा से मिलती हैं  और हम उन्हें बिना जाँचे ज़िन्दगी भर पालते जाते हैं. एक मिथ ये है कि कलाकार को घर नहीं बसाना चाहिए, उसे दुखी और निर्धन ही होना चाहिए।"  अमर  रंजना से विवाह करना चाहता था लेकिन जब अमला ने साहित्य के प्रति फ़र्ज़ याद दिलाया तो फैसला बदल गया; "तुम्हारे जीवन की पूरक तुम्हारी कलाकृतियां ही होंगी, रंजना नहीं।"  

फैसला फिर बदला और रंजना से विवाह हुआ.  और ये विवाह ही दो ज़िन्दगियों, दो लोगों उनकी अलग ख्वाहिशों और लक्ष्यों  और दो  अलग अलग  विचारों की लड़ाई का मैदान बन गया. अमर भी अपने वर्तमान के बजाय दूर भविष्य की कल्पना कर रहा है, जब लोग सिर्फ उसकी कृतियों को जानेंगे और उसका व्यक्तिगत  या पारिवारिक जीवन कैसा था इसकी परवाह किसी को नहीं होगी। टॉलस्टॉय, चेखव, ग़ालिब  वगैरह उसे याद आते हैं। टंडन ने उसके लिए बिलकुल सही कहा कि,  "तेरे निर्णय तेरे अपने  नहीं है, वे निर्णय किसी देशी विदेशी लेखक  ने पहले से लेकर रखे हुए हैं और उन्हें अपनी ज़िन्दगी में लागू करके तू उन लोगों  की महानता  प्राप्त करने का संतोष पाता है. काश तू अपने निर्णय कामू या सार्त्र  की किताबों से न लेकर खुद ले सकता होता।"

अब यहां अमर और रंजना के संयुक्त जीवन के बारे में कुछ कहें या उसे समझें इसके पहले अमला को जानना बेहद ज़रूरी है; आखिर उपन्यास का टाइटल उसकी मुस्कुराहट के कारण ही रखा गया है. 

अमला अपने समय और परिस्थियों से आगे की औरत है जो खुल कर कहने साहस  रखती है कि, " जीवन का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी मेरे लिए सौभाग्य बन कर ही आया.  इन दस वर्षों में जो कुछ पाया, उसका लेखा  जोखा करती हूँ तो लगता है मैंने खोया कम पाया अधिक है."  शायद यही साहस उसका गर्व और अभिमान दोनों बन गया है. औरों से अलग, विशिष्ट होने की इच्छा, सारे बंधन तोड़ देने की महत्वाकांक्षा, मर्यादाओं को लांघ जाने का दुस्साहस।  "जल की एक उन्मुक्त धारा .... किसी एक की होकर नहीं रहना चाहती, रह भी नहीं सकती …  उसके लिए सब समान  हैं, वह सबके लिए  समान  हैं."  लेकिन इस महत्वाकांक्षा में बड़ी गहरी अभिलाषा भी छिपी है कि  सब उसका कहना मानें, उस पर मोहित हो, उसका जादू सब पर चले; अपनी बात को हर किसी से मनवा सके. पर खुद अमला पर किस का जादू नहीं चल सकेगा, वो किसी की  कोई बात नहीं मानेगी, किसी को अपने भीतर झाँकने या कुछ तलाशने की इज़ाज़त नहीं देगी। जिसका ये दृढ विश्वास है कि, " पति के अतिरिक्त भी संसार में बहुत कुछ ऐसा होता  है जो नारी जीवन को पूर्ण बना सकता है."   पर यही अमला कैलाश के साथ झगड़े, बरसों पुरानी मैत्री के टूटने और उसकी बेरुखी को सहन नहीं कर पाती। अपने ही मन की दबी हुई आवाज़ को अनसुना किये  इस बात से मन को तसल्ली देती है कि  अमर जैसा एक प्रसिद्ध लेखक उसके बीते जीवन की ट्रैजेडी और वर्तमान के इंद्रधनुषी रंगों पर एक उपन्यास लिखना चाहता है; कि  वो एक बड़े लेखक के सृजन की प्रेरणा है और  अमर को ये विश्वास है  कि  अमला के जीवन पर लिखी ये किताब  उसका मास्टरपीस होगी और उसे साहित्य के क्षेत्र में "अमर" बना देगी। अमला अपने मान और अहम को इस बात में ढूंढ रही है कि  अमर ने अपनी रचना उसके नाम पर समर्पित की है. पर क्या इतना ही  पर्याप्त है ?

रंजना एक साधारण सरल लड़की  है जिसके वही सीधे सादे सपने हैं कि पति हो, एक सुन्दर सजा संवरा  घर हो, शाम को पति पत्नी साथ घूमने जाएँ, ज्यादा से ज्यादा वक़्त साथ बिताएं, सिनेमा देखने जाएँ; अमला के शब्दों में "सुख की कितनी सरल परिभाषा है"।  लेकिन फिर भी कुछ असाधारण है रंजना में; उसके पास एक अच्छी नौकरी है, उसने घरवालों की मर्जी को दरकिनार कर अपनी पसंद से शादी की, वो भी ऐसे आदमी से जो फुल टाइम लेखक है, जिसके ना नौकरी का ठिकाना, ना रहने खाने का कोई ढंग. घर का बजट, सारे खर्चे रंजना की ज़िम्मेदारी हैं; पर फिर भी उसे शिकायत नहीं क्योंकि उसे अमर से प्यार है. (सुनने में अजीब है कि  आजकल के ज़माने में ये क्या आदर्शवादी किस्सा है पर इस कहानी का यही मुख्य बिंदु है) अमर अपनी इन कमज़ोरियों को अच्छे से जानता है और इसलिए रंजना का ये बिना टर्म्स एंड कंडीशंस वाला प्यार जिसमे वो खुद रंजना को कुछ दे  नहीं सकता, ना घर, न पैसा और ना वैसा समर्पित प्यार उसे परेशानी में ज्यादा डालता है और सुख की अनुभूति कम करवाता है । अमर की सुख की  परिभाषा भी रंजना  से अलग है, उसे एक बंधे बंधाये व्यवस्थित जीवन की आदत नहीं है, " सारे दिन को घडी के हिसाब से नहीं , भोजन नाश्ते के हिसाब से बाँट दिया गया है."  उसके लिए किसी  पुराने मित्र ( या मित्री)  से मिलना, पाठकों (जिसमे महिलाएं भी शामिल हैं) के प्रशंसा भरे पत्र, शाम होते ना होते  दोस्तों के साथ  निकल जाना; सुख के पैमाने हैं. 

और इसलिए अमला या शकुन या लेखन नहीं, सुख की यही अलग अलग परिभाषा;  अमर और रंजना के बीच दीवार की तरह खड़ी है और दोनों को दो अलग समान्तर रास्तों पर ले जाती है. इस बात को अमला का चरित्र  बड़े सुन्दर ढंग से परिभाषित करता है, "जो किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन का चरम सुख हो सकता है वही तुम्हे कष्ट दे रहा है… शायद अपने अपने व्यक्तित्व के एक सिरे पर  बहुत ही साधारण हैं, वही हवसें, वही इच्छाएं, वही कमज़ोरियाँ …" 


तो ये कहानी आखिर किस अंत पर पहुँचती है, शायद कहीं नहीं … अमर के अपने शब्दों में इस कथा का सार यही है कि  " यह उसके जीवन की विवशता है, ट्रेजेडी है कि  जो कुछ उसे प्राप्त है  नहीं पाती, अस्वीकार कर देती है और एक ऐसे अदेखे अनजाने सुख पीछे भागती है जो शायद उसे कभी प्राप्त नहीं होगा।"  ये कथन अमर और अमला दोनों की जीवन यात्रा पर सही बैठता है और  शायद यही वो सन्देश या जीवन  सत्य  है जो उपन्यास लिखने वालों ने इस सीधी  सरल कहानी  के ज़रिये  बताने की कोशिश की है.

P.S.  जिन लोगों ने मन्नू भंडारी की आत्मकथा पढ़ी है या जिनको मन्नू और राजेंद्र यादव के  वैवाहिक जीवन की जानकरी रही है वे लोग इस उपन्यास को उन दोनों की अपनी निजी ज़िन्दगी का लेख जोखा ही  मानेंगे; खुद मुझे भी यही लगा था लेकिन हमारे इस भ्रम  को मन्नू भंडारी ने दूर कर दिया है. उपन्यास के अंत में दोनों लेखकों  ने इस डेढ़ साल तक चले  "प्रयोग" पर  अपने विचार दो चैप्टर्स में  लिखे हैं जो इस किताब की  खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं और इसी में मन्नू भंडारी ने स्पष्ट कहा है कि  इस कहानी का उनके निजी  जीवन से कोई लेना देना नहीं। पर फिर भी मन मानता तो नहीं।  



Image Courtesy Google

  

Wednesday, 3 April 2013

"अफीम सागर " A Review

पिछले महीने एक उपन्यास पढ़ा "अफीम सागर " जिसके लेखक है अमिताव घोष .. अगर आप पहचान नहीं पा रहे तो इस उपन्यास का अंग्रेजी मूल संस्करण है " Sea of Poppies"  जी हाँ बुकर पुरस्कार के लिए 2008 में shortlist हुई  एक भारतीय किताब जो उन दिनों काफी चर्चित भी हुई  थी . किताब को पढने पर आप जान जाते हैं कि  चर्चा बेवजह नहीं थी।  अफीम समुद्र, घोष की आइबिस त्रयी यानी " Ibis Trilogy" की पहली कड़ी है और इस किताब को एक बार पढना शुरू करने पर इसे छोड़ना सच में मुश्किल है .. क्या कहा ? आइबिस क्या है .. आइबिस एक जहाज का नाम है .. कोई ऐसा वैसा जहाज नहीं .. अफीम का व्यापार करने वाला जहाज,  गुलामों को दक्षिण अमेरिका और यूरोप ले जाना वाला, उंनका व्यापार करने वाला जहाज। लेकिन गुलामों के व्यापार और दास प्रथा पर रोक लग जाने के बाद उस व्यापार को एक नया नाम मिला , एक नया जमा पहनाया गया ... गिरमिटिया का .. गिरमिटिया मजदूर जिनको दूर अफ्रीका, मारीशस और Caribbean द्वीपों में ले जाया जाता था .. पेट भर रोटी और वेतन का लालच देकर .. इनका नाम गिरमिटिया इसलिए पड़ा कि  उन मजदूरों के नाम कागज़ के "गिरमिट" ( agreement) पर लिख लिए जाते थे जिनसे आजीवन छुटकारा नहीं होता था.

इस किताब की पृष्ठभूमि है उन्नीसवीं शताब्दी का भारत (पूर्वी भारत), भारत में फैल चुका  ब्रिटिश साम्राज्य, अफीम का व्यापार और जिसे चीन में भी उतनी ही मजबूती से स्थापित करने के लिए  एक के बाद एक अफीम युद्ध लड़े  गए .. ये उपन्यास मुख्यत: प्रथम अफीम युद्ध से ठीक पहले की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को बयान करता है। इन युद्धों का उद्देश्य चीनी जनता  को "आज़ादी", "मुक्त व्यापार के लाभ" और एक "उन्नत और सभ्य  जीवन" से परिचित करवाना था जिससे वो अपने मंचू  वंश के तानाशाहों के कारण वंचित थे। और सिर्फ चीन ही नहीं, पूरी दुनिया में फैली ब्रिटिश कॉलोनियों में ब्रिटिश राज का औचित्य और ब्रिटिश व्यापारियों द्वारा किये जाने वाले इस गिरमिटिया (कुली) व्यापार का मूल आधार था "इंसान की आज़ादी",  खासकर चीन में जहां अभी  यूरोपीय देशों और उनके व्यापारियों पर बहुत सारे प्रतिबन्ध थे, वहाँ इन व्यापारिक मिशनों का एक  काम ये भी था, "असभ्य और बर्बर देशों में सभ्यता का प्रकाश" फैलाना। और इस तरह अफीम महज एक नकदी फसल ही नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के झंडे को एक से दुसरे महाद्वीप तक ले जाने का साधन भी बना।  इस उपन्यास के ज़रिये अमिताव घोष ने अफीम के त्रिकोणीय व्यापार जो भारत से लेकर लन्दन और चीन में कैंटन तक फैला था उसके हर पहलू को हमारे सामने रखा  है। 


अफीम का व्यापार ब्रिटिश राज के लिए कितना महत्वपूर्ण था इसका अंदाज़ा उपन्यास के कुछ अंशों  से लगाया जा सकता है:

"कुछ ही वर्षों में अफीम से  होने वाला मुनाफा अमेरिका की पूरी आमदनी के बराबर हो गया है .. और अगर दौलत का ये स्त्रोत ना होता तो इस गरीब देश में ब्रिटिश शासन संभव होता ?" 


कप्तान चिलिन्गवोर्थ के शब्दों में, " मुझे यकीन है कि  इस युद्ध से हम में से कुछ को बहुत फायदा होगा लेकिन मुझे नहीं लगता कि  मैं या बहुत से चीनी फायदा पाने वालों में से होंगे .... फर्क बस इतना है कि  जब हम लोगों की हत्या करते हैं तो हम खुद को ये नाटक करने के लिए मजबूर कर लेते हैं कि  हमने ये काम किसी महान उद्देश्य से किया है और यकीन कीजिये कि  भलाई के इस नाटक को इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा". 

अफीम का महत्त्व उसके औषधीय गुणों के कारण भी था खासकर जब अफीम बच्चों के ग्राइप वाटर से लेकर narcotic , मोर्फीन और औरतों के इस्तेमाल तक अपने पैर पसार चुकी थी। इसलिए ऐसी सोने के अंडे देने वाली मुर्गी जैसी चीज़ के  व्यापार के मार्ग में  बाधाएं कम से कम  आयें ये सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी था। इसी के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल जैसी उपजाऊ मैदानी इलाकों में सिर्फ अफीम की खेती पर जोर दिया गया, किसानो  को एडवांस देकर अनुबंध से बाँध दिया जाता कि  वे बगैर ज्यादा मुनाफे वाली लेकिन बहुत मेहनत  कराने वाली फसल यानी पोस्त  बोयें। उपन्यास हमें बताता है कि  समूचे पूर्वी भारत में अफीम का व्यापार पूरी तरह ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में था और ज़ाहिर है कि  ये उस वक़्त का सबसे  ज्यादा मुनाफा देने वाला व्यापार था जिसमे समाज का हर वो तबका जिसके पास निवेश करने के लिए थोडा भी पैसा था वो इसमें शामिल होना चाहता था। 
 उपन्यास के मुख्य किरदार हैं दीती, जैकरी रीड, बेंजामिन बर्नहैम, राजा नील रतन हालदार और एक फ्रेंच लड़की पौलेट। दीती  बिहार  के किसी दूर दराज के गाँव की निवासी है  जिसका पति गाजीपुर की सदर अफीम फैक्ट्री में नौकरी करता है और एक दिन अफीम का नशा ही उसका मृत्यु का कारण बना और उसके मरने के बाद की "बुरी परिस्थितियों" से बचने के लिए अपनी बेटी को अपने भाइयों के पास भेजकर दीती  खुद सती  होना चाहती है। लेकिन दीती  को बचा लेता है कलुआ, एक अछूत चमार जिसकी कभी दीती  ने मदद की थी और अब अपनी जाति  से बहिष्कृत  और अपने गाँव घर से भागे इन मुसाफिरों को किस्मत आइबिस पर ले आई है। और उनके अलावा भी कई लोग जिनकी गरीबी, भूख, बदकिस्मती या  थोड़े में कहें तो ग्रामीण भारत की नष्ट और बदहाल हो चुकी अर्थव्यवस्था की मजबूरी उनको काले पानी के पार मारीशस ले जानी वाली आइबिस पर ले आई है। 

दीती के शब्दों में "यही वो सितारा है जिसने हमें अपने घरों से उठाया और इस कश्ती पर  बिठाया। यही वो ग्रह  है जो हमारी  नियति पर राज करता है।" उपन्यास की भाषा में .. "ये वो नन्हा सा गोला  है जो प्रचुर भी है, सर्वभक्षक भी, दयावान भी और विनाशक भी, टिकाऊ भी और बदला लेने वाला भी। ये उसका शनि था।" 

एक किरदार है नील रतन हालदार, बंगाल की एक समृद्ध रियासत का राजा, तत्कालीन भारतीय समाज के  सबसे ऊपरी  और  सम्मानीय वर्ग का एक कुलीन सदस्य ...ऐसा व्यक्ति जो ह्न्दुस्तानी अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और भोजपुरी जैसी भाषाएँ आसानी से बोल सकता है और जिसकी अपनी रुचियाँ काफी परिष्कृत हैं ... एक उच्च वर्गीय ब्राह्मण जिसके परिवार ने पीढ़ियों से रसखाली  रियासत पर राज किया है। नील तत्कालीन भारत के शासक वर्ग के चरित्र को बहुत अच्छी  तरह पेश करता है .. ये वो वर्ग था जिसकी विलासिता, ऐशो आराम और शांत जीवन में अंग्रेज़ों  के आने और यहाँ का शासक बन जाने के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा सिवाय इसके कि  कल तक भारतीय व्यापारी इन हिन्दुस्तानी नवाबों के लगाए पैसों से व्यापार करते थे और अब अँगरेज़ ऐसा कर रहे थे. और निश्चित रूप से ये बड़े ज़मींदार अब अपनी विलासिता भरी जीवन शैली का खर्च उठा सकने और उसे बनाये रखने में भी  सक्षम नहीं रह गए थे लेकिन फिर भी उन्होंने इस से  कोई सबक नहीं सीखा ..नील के पिता के समय से समृद्ध हालदार परिवार ने बेंजामिन बर्नहैम के उभरते अफीम व्यापार (चीन के साथ ) में निवेश करना शुरू किया और बड़े पैमाने पर मुनाफे में हिस्सेदारी भी की लेकिन उनके खर्च उस आय से कहीं  ज्यादा थे जो अफीम से होती थी नतीजतन, रियासत को आर्थिक दिवालियेपन से बचाने के लिए नील ने बाज़ार से उधार लिया (निवेश के लिए)  और इसी  के सिलसिले में राजा नील रतन हालदार को जालसाजी के एक झूठे  मुकदमे में काले पानी की सज़ा दी गई (लेकिन जैसे कि  कहानी आगे बढती है और हमें पता चलता है कि  इस मुकदमे के पीछे  बर्नहैम ब्रदर्स एंड कंपनी  का उद्देश्य हाल्दारों की लम्बी चौड़ी ज़मीनें और समूची रियासत को अपने कब्ज़े में करना था)।  ...

 नील उस वर्ग में था जो मानता था कि  अंग्रेजी शिक्षा, दर्शन, ब्रिटिश तौर तरीके ( कांटे छुरी का इस्तेमाल) का ज्ञान और ऐसी ही दूसरी चीज़ें उन्हें इस देश के नए मालिकों के समान  बना देती हैं (अब ये और बात है कि  खान पान और रहन सहन में हालदार राजा पूरी सावधानी से प्रचलित छुआछूत के सभी मानदंड कठोरता से  मानते आये थे)   लेकिन जब उसके मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई तब उसकी ये मान्यताएं परिवर्तित होनी शुरू हुई ..ब्रिटिश न्याय प्रणाली जो बाहरी तौर पर समानता  और विधि के शासन के सिद्धांत पर आधारित थी उसमे भी कुछ वर्गभेद बन गए थे जिसके अनुसार खुद "अँगरेज़ और बर्नहैम जैसे लोग इस देश के नए ब्राहमण बन गए थे और जो बिना सजा के अपराध करने के लिए आज़ाद थे". 

नील का चरित्र मुझे पूरे उपन्यास में सबसे ज्यादा प्रभावी लगता है क्योंकि सबसे ज्यादा उतार चढ़ाव उसी के जीवन में आते दिखाए गए हैं ... एक कुलीन ब्राहमण राजा की  विलासी और आराम तलब ज़िन्दगी से उलट जेल के एक कैदी की ज़िन्दगी जहां उसे हर वो काम करना था जो शायद वो अपने बुरे से बरे सपने में या किसी बड़े से बड़े गुनाह की सजा के तौर पर भी नहीं सोच सकता था। जिसे जाति बहिष्कृत कर दिया गया और जेल में उसने खुद को शरीर और आत्मा दोनों से एक नए आदमी के रूप में ढलते देखा ..एक कैदी जिसकी नियति मार और गालियाँ सहना है. वो एक ऐसे इंसान के तौर पर सामने आता है जिसने मखमल की सेज जैसा जीवन भी जिया और बाद में नर्क की यात्रा भी की, लेकिन  इन सब के बावजूद उसके व्यक्तित्व में कहीं छोटापन नहीं आता। वो पहले से ज्यादा सशक्त और साहसी बन कर उभरता है. 

जैकरी रीड एक नीग्रो गुलाम  माँ और गोरे  अमेरिकन बागान  मालिक का बेटा  है, जो आइबिस पर एक  लकड़ी का काम करने वाले मिस्त्री के रूप  आया लेकिन  बहुत जल्दी ही हालात ऐसे बदले कि  वो जहाज का सेकंड मेट बन गया।  जैकरी "पक्का गोरा साहिब" नहीं है। उसकी खासियत ये है कि गोरे  लोगों के समाज का हिस्सा होने के बावजूद वो अपनी नीग्रो जड़ों से जुड़ा है और इसलिए उसे अपने अधीनस्थ लोगों से घुलने मिलने और उनका सुख दुःख बांटने में मुश्किल नहीं होती. लेकिन उसका परिचय सिर्फ इतना नहीं है .. उपन्यास के कुछ  और किरदारों की कहानी भी जैकरी से जुडी है और आइबिस तो खैर उसके जीवन में परिवर्तन लाने वाली सबसे बड़ी ताकत है ही।  

पौलेट लैम्बर्ट, एक फ्रेंच अनाथ लड़की जिसके पिता एक प्रसिद्द वनस्पति शास्त्री थे और जिनके गुज़र जाने के बाद अब वो  बर्नहैम परिवार के संरक्षण में रह रही है (जहां उसे उसकी नादानियों के कारण "पगली " नाम दिया गया).. पौलेट का चरित्र एक ऐसी गोरी मेमसाहब का है जो अपने आचार विचार, तौर तरीकों और परवरिश किसी भी दृष्टि से फिरंगी या यूरोपीयन नहीं है. वनस्पतियों, पौधों का ज्ञान और उनके प्रति लगाव उसे अपने  पिता से विरासत में मिला और किसी दिन एक बड़े से जहाज में नाविक की तरह दुनिया का  सफ़र करने की महत्वाकांक्षा उसे अपनी ग्रैंड aunt मैडम कोमरसन  से मिली। पौलेट एक स्वछन्द और  आज़ाद ख्याल लड़की है जिसे लगता है कि  उसका लड़की होना उसके किसी भी शौक या   बाधा नहीं होना चाहिए ( उसके शौक है,  गंगा किनारे के जंगलों में नई  नई  वनस्पति की खोज करना, नदी में तैरना या किसी जहाज के सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ना  और  वहाँ जोडू के साथ बैठकर सागर का नज़ारा देखना) जोडू उसकी भारतीय आया का बेटा  है, (इस आया ने उसके फ्रेंच नाम का भारतीयकरण कर के उसे "पुतली" नाम दिया),  जो पौलेट के लिए भाई जैसा है और इस अलग किस्म की परवरिश ने ही पौलेट का एक अलग व्यक्तित्व गढ़ दिया है. पौलेट के लिए बंगला बोलना और साड़ी  पहनना, मेमसाहिब की यूरोपियन फैशन वाली पोशाक पहनने से कहीं ज्यादा आसान है. 

जैकरी और पौलेट के बीच पनपने वाला प्यार दोनों की इस असाधारण पृष्ठभूमि का नतीजा था। 

जैकरी से जुड़ा  लेकिन अपनी अलग पहचान रखने वाला एक किरदार है बाबू नोब किसिन पांडर  का .. ये श्रीमान बर्नहैम कंपनी के गुमाश्ता है और मैकाले की थ्योरी ( भारतीय बाबू) से मेल खाते हैं। पर इनके जीवन का एक छिपा हुआ है पहलू हैं जो उनकी आध्यात्मिक गुरु माँ तारामोणी से और उनकी भविष्यवानियों से  जुड़ा है  और जिसकी वजह से बाबू नोब किसिन  ने जैकरी को भगवान् कृष्ण का अवतार मान लिया है और इसलिए उसके पीछे वे काले पानी के पार जाने के लिए वे भी आइबिस पर मौजूद हैं। 

अब अगर आप इस सारे विवरण को पढ़कर बोर हो गए हो और सोच रहे हो कि  ये उपन्यास तो आर्थिक  इतिहास की पाठ्य पुस्तक  को महज़ एक कहानी के तौर पर पेश कर रहा है तो रुकिए अभी  आप सेरंग अली और उसके लस्कर नाविकों से नहीं मिले हैं। अब पूछिए कि  ये कौन सी बला हैं .. लस्कर उन  नाविकों को कहा जाता था जो हिन्द महासागर के अलग अलग स्थानों ( चीनी, अफ्रीकी, मलय, तमिल, गोअन, अराकानी) से आते थे और समूहों में बंधे होते थे जिसका नेतृत्व कोई सेरंग करता था। इन की अपनी अलग खिचड़ी भाषा होती थी और इस खिचड़ी के कुछ उदाहरन ही काफी है ..  मेट को मालूम, डेक को तुतुक, स्टारबोर्ड को जमना और लार बोर्ड  को दावा कहा जाता था। सेरंग अली की भी  अपनी अलग खिचड़ी अंग्रेजी है जिसका अपना व्याकरण और वर्तनी है। ये भाषाएँ नीले समुद्रों पर ही बोली और समझी जाती थी और इसमें लगभग हर भाषा के शब्द शामिल रहते थे जो हिन्द महासागर के किसी भी तटवर्ती या पृष्ठ प्रदेश में बोली जाती हो. 

उपन्यास की एक बड़ी खासियत है कि  लेखक ने जहाज के अलग अलग हिस्सों का, उसके बनावट और उसके सञ्चालन और खुले समुद्र में जहाजी ज़िन्दगी का ऐसा सजीव विवरण दिया है कि  भले ही किसी ने अपनी ज़िन्दगी में कभी पानी के जहाज, नाव, कश्तियाँ वगेरह ना देखी  हो लेकिन इस उपन्यास को पढने के बाद उसका ज्ञान इन विषयों पर निश्चित रूप से बढ़ जाएगा। जैसे आपको पता चलेगा कि  पुलवार, पटेली, लॉन्ग बोट,  ब्रिगैनतीन, बजरा, डोंगी, समेत कई किस्म की नावें होती हैं। इसके अलावा अफीम की खेती, फैक्ट्री में उसकी छंटाई, खरीद से लेकर उसके प्रसंस्करण और अंतिम  उत्पाद तक की उसकी यात्रा का ऐसा दिलचस्प शब्द चित्र शायद ही कहीं और मिले ख़ास तौर पर जो कहानी के रूप में ढाला गया हो। 

दीती  का पूजाघर जो उसकी झोपडी से उठकर जहाज के एक कोने तक चला आया है .. जहां हर उस जीवित या मृत शख्स की तस्वीर बनाई जाती है जो उसकी ज़िन्दगी में बेहद महत्त्व रखते हैं और जिन्हें निरंतर याद किया जाना एक रिवाज है .. उसकी बेटी कबूतरी के अलावा उसके जहाज के साथियों जैसे पौलेट जैकरी, नील, बाबू नोब किसिन  इन सभी को  उसके पूजाघर में समयानुसार जगह मिलती गई (ऐसा फ्यूचर टेन्स में उपन्यास में बताया गया है .. ज़ाहिर है पूजाघर के बारे में ज्यादा डिटेल्स आप उपन्यास के दुसरे भाग में ही पढ़ पायेंगे). अब इसमें दिलचस्प ये है कि  इन सबका चित्र उनकी शारीरिक आकृति और विशेषताओं  के अनुरूप ही बनाया गया। जहाज पर सवार गिरमिटियों के सुख दुःख और उनका ये महसूस करना कि  जैसे जैसे वो समुद्र में आगे बढ़ते जा रहे हैं उतना ही वो अपनी जड़ों, अपने लोगों और अपनी धरती से कटते जा रहे हैं और अब "आइबिस" ही उनका पूर्वज है, जिसने उन्हें एक नया जन्म दिया है एक नई  दुनिया में लाकर, एक नई  ज़िन्दगी में प्रवेश दिलाकर। 

इस उपन्यास का कैनवास अफीम व्यापार और आइबिस के बहाने हमारे सामने  औपनिवेशिक शासकों की मानसिकता, ख़ास कर  "सफ़ेद जाति  का बोझ" के सिद्धांत, तत्कालीन समाज, अर्थव्यवस्था और इन सबके बीच आम भारतीय जनता की स्थिति जैसे मुद्दों पर फैला है। इसका उद्देश्य किसी की आलोचना करना नहीं बल्कि स्थितियां जैसी थीं उन्हें वैसा का वैसा  एक दिलचस्प कहानी के ज़रिये पाठकों तक पहुंचाना है।  


Monday, 15 August 2011

मालंच : A review

 जापान में एक कहावत है कि "बगीचे का काम कभी ख़त्म नहीं होता, जब हो जाता है तब इंसान मर जाता है".  पर उस वक़्त  क्या होता है जब इंसान भी जिंदा है और बगीचे का काम भी अधूरा पड़ा है. 

            मालंच बंगला भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है "फूलों का बगीचा". इस  शब्द  से  मैं  पूरी  तरह  अपरिचित  नहीं  हूँ, पहले पहल इसे  शिवानी गौरा  पन्त की किताब में पढ़ा था, शान्तिनिकेतन के एक प्रोफ़ेसर अनिल चंदा के घर का नाम भी मालंच था...मुझे ये शब्द तब से बहुत आकर्षित करता रहा है ..जब कि इसका अर्थ भी मालूम न था. 

मालंच, रवीन्द्रनाथ टैगोर की   एक लघु उपन्यासिका  है और मेरे विचार से इसे उपन्यास के बजाय एक लम्बी कहानी जैसी क़ि कुर्रतुल एन हैदर ने लिखीं है, उस श्रेणी में रखा जा सकता है. मालंच कहानी है नीरजा की और उसके बगीचे की, बगीचा कोई आम छोटा मोटा घर का फूल पत्ती या सब्जी उगाने का बगीचा नहीं असल में उसके पति का  बेहतरीन और अनेक देशी विदेशी  किस्म के फूलों और पौधों का कारोबार है. ये बगीचा उनकी ज़िन्दगी का अटूट हिस्सा है और नीरजा ने भी बगीचे के काम को इस तरह अपने अस्तित्व के साथ मिला लिया  कि दोनों में कोई फर्क नहीं रह गया. लेकिन बगीचा तो यहाँ महज एक प्रतीक है,  कहानी कहने का माध्यम है ..असल मुद्दा है, स्त्री की मानसिकता, उसकी मनः स्थिति, उसका अधिकार क्षेत्र और अधिकार जताने और उसे बनाये रखने की प्रबल इच्छा जिसको दिखाने में, बयान करने में रवीन्द्रनाथ ने (शिवानी के शब्दों में कहूँ तो..) कलम तोड़ कर रख दी  है. 


 जब स्त्री का ये  अधिकार  किसी भी कारण या अकारण या लगने भर के लिए ही लगे कि,  मेरा ये  सारा ऐश्वर्य छिन रहा है, कि एक दूसरी औरत फिर वो जो भी है, उस पर हक जमाने का प्रयास कर रही  है तो मन बुद्धि सब बस के बाहर हो जाते हैं तब सही गलत, उचित- अनुचित, भला- बुरा कुछ नहीं सूझता या दिखाई देता है   ...दिखता है तो  बस छिनता हुआ साम्राज्य.

यहाँ  एक स्त्री के मन, उसकी इच्छाओं, उसके सुख-दुःख के अहसासों और इन सबके ऊपर उसकी कमजोरियों का चित्रण करने में रवीन्द्रनाथ को कमाल की सफलता मिली  है . यहाँ प्रेमचंद की एक नायिका याद आती है, "बड़े घर की बहू आनंदी" ..मैंने ये उपन्यास  तो नहीं पढ़ा पर कहीं उसका एक सन्दर्भ पढ़ा था क़ि  आनंदी के पास अभिमान और मान करने योग्य एक ही चीज़ है और वो है उसका पति, घर-गृहस्थी . यही उसका संसार और जैसा किसी मैगजीन  की कहानी में पढ़ा था ..."मेरा घर मेरा साम्राज्य".


और यही बात नीरजा पर भी लागू हुई, एक औरत अपने जीते-जी, आँखों के सामने अपना संसार, जिसे  उसने अपनी आत्मा से सींचा, किसी और को नहीं दे सकती. भले ही वो खुद अब उसे संभाल ना पा रही हो( अपनी लम्बी बीमारी की वजह से अब नीरजा बगीचा तो दूर घर की देखभाल भी नहीं कर सकती). भले ही उसे पता हो कि किसी के ना संभालने पर घर का ये बगीचा नष्ट हो जाएगा, पर फिर भी अपने  अधिकार का मोह छोड़ना बेहद मुश्किल है. उस से भी ज्यादा मुश्किल है ये स्वीकार करना कि मेरे बाद, मेरे पीछे , मेरा नामो-निशान , मेरा कोई चिहन भी शेष ना रहेगा...कल तक जिस महल का वैभव मेरे कारण था , वही कल मुझे भूल कर किसी और के व्यक्तित्व से महकेगा और जब वो  गृह स्वामिनी, वो कल की ऐश्वर्य लक्ष्मी  बीमार और कमज़ोर हो जाए तब इंसान का मन नकारात्मक रूप से शक्तिशाली हो जाता है.  बगीचा, जिसका हर कोना, हर हिस्सा नीरजा और उसके पति के हाथ से बना है, अब नीरजा के आँखों के सामने है पर अपनी बीमारी के चलते अब वो वहाँ चल कर जा भी नहीं सकती, वहाँ काम करना या उसे संभालना तो दूर की बात.

सरला को नीरजा के बीमार होने के कारण बगीचे की  सार-संभाल के लिए बुलाया गया. उसे फूल पौधों और बगीचे के हर काम की जानकारी विरासत में अपने ताऊ जी से विरासत में मिली, जिन्होंने आदित्य को भी यही काम सिखाया और रोज़गार शुरू करने में सहायता भी दी. आदित्य का  कहना कि, "सरला  को मैंने आश्रय दिया है या उसके आसरे में रहकर मैं यहाँ तक पहुंचा हूँ?"  और सरला का ये उलाहना कि, "....नाप तौल में मेरी तरफ से कुछ कम नहीं हुआ..फिर अचानक मुझे धक्का क्यों दे दिया गया...?"  ये दो सन्दर्भ ही उन दोनों के प्रगाढ़ लेकिन सहज सम्बन्ध को ज़ाहिर कर देते हैं. पर नीरजा का दुःख कुछ और है. उसे ये सहन नहीं कि कोई दूसरी औरत उसके बगीचे में आये, वहाँ वैसे  ही काम करे जैसे वो अपने अच्छे  दिनों में किया करती थी, अपने  पति के साथ.  कोई तीसरा, जिसे बगीचे के बारे में उस से ज्यादा ज्ञान है..जो उसके और आदित्य के बनाए आर्किड घर तक में प्रवेश पा गया है..ये उसके अस्तित्व को, उसके अधिकार को सीधी  चुनौती है.  ये संकेत है कि अब जाने का, इस घर-गृहस्थी को पीछे छोड़ जाने का समय आ गया है..

और इसलिए कभी नीरजा, सरला को कहीं दूर भेजने की बात कहती है, कभी अपने देवर से उसके विवाह का प्रस्ताव तो कभी आदित्य के जीवन में उसके महत्त्व और उसके  स्थान को स्वीकार कर लेने का प्रयास करती ही रहती है पर पूरी तरह नहीं मान सकती..और इस अंतर्द्वंद के चलते एक ओर उसका स्वास्थ्य और अधिक बिगड़ता जाता है वहीँ उसका मन अपने ही घर में उपेक्षित हो जाने के भय से,   अपना अधिकार और  अपना पृथक  अस्तित्व बचाए-बनाए रखने के लिए नकारात्मक रूप से और अधिक  शक्तिशाली होता जाता है.

नीरजा ये भी समझती है कि ये बंधन ..ये मोह उसे  अपने ही संसार से दूर कर रहा है ..उसे अपनी कमजोरी, अपनी विवशता और इन सबके ऊपर अपने मन की दुष्टता का भी पूरा  अहसास हो  गया है ...लेकिन ये समझते  हुए भी कि सब कुछ, सारे अधिकार  दे डालने में ही मुक्ति है और उसके मन की   शान्ति भी. ..लेकिन  बार बार कोशिश कर के भी, अंत में  सब दे डालने की ख्वाहिश ..सब कुछ को समेट लेने और उसे कस कर मुट्ठी में जकड लेने में बदल जाती है .

और शायद यही वजह है क़ि  लोग अपने और अपने प्रियजनों के नाम से स्कूल, अस्पताल और इमारतें बनवाते हैं, कहीं पूरी कायनात तो कहीं पत्थर की एक पट्टी ही सही पर कहीं न कहीं नाम तो हो कि जाने के बाद याद रखा जाए. नीरजा भी यही चाहती है कि जैसे कैसे भी उसकी उपस्थिति को, उसकी इच्छाओं को, आदेशों को महत्व मिले, बगीचे को लेकर उसकी समझ और ज्ञान को सब लोग आज भी वैसे ही सराहें जैसे कि हमेशा वो सुनती आई है. पर अब ऐसा हो नहीं पा रहा है...

कैसी अजीब है ये ख्वाहिश, कितना तकलीफदेह है, किसी से कहना कि " मुझे, मेरे बाद भी उसी तरह याद रखना, मेरे अस्तित्व को वैसे ही महसूस करना जैसे कि  आज या कल तक करते थे...मुझे आज भी वैसे ही प्यार करो जैसे पहले करते थे..और बाद में करते रहना..तुम्हारे दिल में मेरी वही जगह रहे जो अब तक रही है..."  जैसे कि कहीं ये सुनिश्चित कर लेना चाहता  है मन, कि मेरे बाद भी "मैं" यहीं रहूँगा/रहूंगी.


नीरजा नहीं दे सकती , क्योंकि उसके अपने जीवन  का आधार, उसकी सार्थकता और उसके अभिमान  का आधार ये बगीचा ही है और बगीचा किसके लिए , उसके पति आदित्य के लिए. यानि बगीचा नहीं उसे आदित्य को ही दे देना होगा , जो असम्भव तो नहीं है पर निश्चित रूप से आसान  भी नहीं. अब यहाँ  मुझे याद आई मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" और विद्ध्यानिवास  मिश्र की "यशोधरा" ..जो सब कुछ, अपना सारा खज़ाना, ऐश्वर्य यहाँ तक कि अपना बेटा राहुल भी भिक्षु संघ के लिए दे देती है और फिर  भी बुद्ध से पूछती है क़ि "और कुछ...कोई और अभिलाषा शेष है तपस्वी..?"


पर वहाँ  लेने वाला सिद्धार्थ यानि संसार के तथागत और बुद्ध है..पर यहाँ लेने वाला एक बाहरी व्यक्ति है ....नीरजा के लिए तीसरा इंसान पर आदित्य के लिए उसके बचपन की और बगीचे की  साथी  "सरला"  जो खुद भी किसी तरह नीरजा की जगह लेना नहीं चाहती...लेकिन नीरजा उसके हस्तक्षेप को बगीचे में यानि अपने संसार में  सहन कर रही है  वही बहुत माना  जाना चाहिए.  पर सब दे डालने से भी  बड़ी समस्या है  ये बर्दाश्त  करना क़ि जिसके लिए ये सारा प्रपंच, सारा अधिकार और उसकी लड़ाई है, वही अब किसी कारण से छिटक कर दूर होने लगा है या साथ नहीं दे रहा तो प्रयास ये हो जाता है क़ि उस तीसरे के माध्यम से इस आधार को थाम के रखा जाये पर इसके लिए भी त्याग करना होगा  और नीरजा इस त्याग को अपने जेवर और दूसरे प्रतीकों के माध्यम से जताए रखना चाहती है ..."हाँ  मैं बेड़ियाँ डालना चाहती हूँ. ताकि जन्म- मरण में तुम्हारे पाँव निस्संदेह रूप  से  मेरे पास बंधे रहे."


नीरजा की तकलीफ और उसका द्वंद सरला भी समझ रही है  इसलिए खुद ही पूरे परिदृश्य से हट जाना चाहती है ..पर नीरजा ऐसा भी होने नहीं देगी क्योंकि वो सारे सूत्र अपने  हाथों में रखना चाह रही है.


कहने का अंत दुखांत है ..नीरजा मर गई..पर दे नहीं सकी और सरला कुछ ले भी नहीं सकी...

 अंततः रवीन्द्रनाथ टैगोर  की एक बेहतरीन रचना,  जिसका सार है क़ि,  प्रेम और स्नेह जब बंधन हो जाता है तब इन्सान की  आत्मा का ही सर्वनाश कर देता है ..और पता तक नहीं चलता...

 

Tuesday, 9 August 2011

चार अध्याय : A Review



  "चार अध्याय"  रवीन्द्रनाथ टैगोर का बहुत प्रसिद्द उपन्यास है , इसकी पृष्ठभूमि है ३० और ४० के दशक का बंगाल का क्रांतिकारी आतंकवाद,  उस आन्दोलन से जुड़े संगठनों के भीतरी हालात और ख़ास तौर पर  क्रांतिकारी आन्दोलन में  औरतों की भूमिका, जो ३० के दशक में इस आन्दोलन की  सब से बड़ी विशेषता थी और जो  इसके पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर खुल कर नहीं दिखी थी,  उस पर आधारित है.  कहानी कहने की  सुविधा के लिए उपन्यास   को चार अध्यायों में बांटा गया है.

पर इस उपन्यास को केवल क्रांतिकारिता तक सीमित करना इसके साथ अन्याय होगा; असल में "चार अध्याय" एक प्रेम कथा है "ऐला और अतीन" की, दो विपरीत धाराओं  की, दो लोग जो एक दुसरे से प्यार करते हैं  लेकिन प्रेम को एक सुखद अंत तक नहीं पहुंचा सकते क्योंकि वे बंधे हैं अपने आदर्शों और प्रतिज्ञाओं से.
. वैसे, इस उपन्यास और इसके विषय का  तथ्य आधारित विश्लेषण  तो कोई इतिहासकार ही कर  सकता है, मैंने  यहाँ केवल  एक विनम्र प्रयास किया है टैगोर के इस उपन्यास  पर अपने  विचार प्रकट करने का. 



प्रेम कथा के माध्यम से  "चार अध्याय"   क्रांतिकारी  आन्दोलन  के एक कम दिखने वाले और छिपे हुए पक्ष को सामने लाता है, वो चेहरा जो आमतौर पर देशप्रेम, बलिदान, शहादत  गौरव की भारी-भरकम शब्दावली के आगे दिखाई  नहीं दिया और उसकी भयंकरता का अहसास बहुत बाद में हुआ. अतीन  के शब्दों में जो ताकतवर के विरुद्ध लड़ाई में बिना उपाय के उस ताकतवर की  बराबरी में खड़ा होता है, इस से ही उसके सम्मान की रक्षा होती है. मैंने भी उसी सम्मानपूर्ण अधिकार  की  कल्पना की थी." 


टैगोर के विचार से हिंसा का प्रतिउत्तर उतनी ही व्यापक हिंसा और अन्याय से  देना  देश की  आत्मा और उसकी प्रवृति के विरुद्ध था और ना ही इससे मनुष्यता  के  धर्म का पालन होता था. इसके अलावा  ..औरतों का हिंसक या ध्वंसात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेना , टैगोर के  मुताबिक़ उनकी वात्सल्य और ममतामय प्रकृति के खिलाफ है.  

और इसीलिए उन्होंने ये दिखाया है कि जब हम कुदरत के बनाए नियमों  और अपनी स्वाभाविक प्रवृति -प्रकृति के विरुद्ध  जाकर काम करते हैं तो उसका परिणाम निराशा, पराजय और पछतावे के अलावा और कुछ नहीं रहता.


           ये उपन्यास बताता है कि किस तरह अनेक बार  दल के  मुखिया को  ही अपने दल के उन  सदस्यों  को किनारे कर देना पड़ता था, जो अब उनके किसी काम के नहीं रह गए या जो अपने हिस्से का काम कर चुके और अब उनसे छुटकारा पा लेने में कोई बुराई नहीं।  ऐसे भी लोग जो दल के  बारे में, उसके सदस्यों के बारे बहुत कुछ जान चुके हैं और यदि वे पुलिस के हत्थे चढ़े तो शायद सब कुछ बता दें  या उनकी व्यक्तिगत ज़िन्दगी उनके काम को प्रभावित कर रही हो; उन्हें रास्ते से हटा देना ही सही उपाय माना गया.. ये क्रांतिकारी आन्दोलन का ऐसा क्रूर चेहरा था जिसे फ़र्ज़ और  देश के नाम पर जायज़ माना गया. भले ही इसके लिए निर्दोष लोगों को वक़्त-बेवक्त मरना या मारना पड़ा या  कभी व्यक्तिगत रंजिशों के नाम पर या दल का तथाकथित शुद्धिकरण ...बहाना कुछ भी हो सकता था ...             

सबसे बड़ी समस्या ये थी कि किसी भी बड़ी-छोटी  आतंकवादी घटना में गिरफ्तारी होने के बाद जो जेल और यातनाओं का दौर शुरू होता था..उसकी असलियत वहाँ पहुँचने पर ही सामने आती  थी और उन नौजवानों के परिवार और लगभग हर वो इंसान जो कभी भी, किसी भी रूप में उन बेचारे "आतंकवादियों"  से  जुड़ा रहा, उसका भी शेष जीवन नरक ही होना निश्चित था. यही कारण  था कि बलिदान और व्यक्तिगत शौर्य का जो रास्ता दिखाया गया उसकी निरर्थकता वे लोग खुद भी समझने लगे थे. भगत सिंह ने भी बाद के दिनों में अपनी जेल डायरी में लिखा था कि "युवा हिंसक क्रांति का रास्ता छोडें और खुलकर आन्दोलन चलायें" . यदयपि तीस के दशक  में एक समय ऐसा आया था जब भगत सिंह और उनके साथियों कि लोकप्रियता अन्य राष्ट्रीय  नेताओं  के बराबर ही थी  पर फिर भी  हम देखते हैं कि ४० का दशक आते आते ज्यादातर क्रांतिकारी या तो समाजवादी बन गए  या कम्युनिस्ट.  उस समय के अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों ने भी यही माना बाद में  कि, व्यक्तिगत बलिदान की घटनाओं से कुछ वक़्त के लिए लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया जा सकता है , अपनी विचारधारा का प्रचार भी किया जा सकता है, लेकिन अंततः आज़ादी का रास्ता राजनीतिक आन्दोलन से ही गुज़रता है. 

ख़ास तौर से जब उपन्यास ये दिखाता  हैं कि किस  तरह आन्दोलन के लिए पैसा जुटाने के लिए कई बार क्रांतिकारियों को आम लोगों  को भी लूटना या मारना पड़ता था तब समझ आता है कि
क्यों क्रांतिकारी आतंकवाद को खुलकर आम जनता का समर्थन नहीं मिल पाया...लेकिन फिर हमारे  सामने सूर्य सेन और बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र  के दूसरे क्रांतिकारियों  के संघर्षों के भी उदाहरण हैं ही..इसलिए काफी दुविधा जैसी स्थिति दिखती है..पर ये तो सच ही है कि क्रांतिकारिता नौजवानों से आगे नहीं बढ़ी ... 
                      
फिलहाल लौटते हैं मूल विषय, यानी उपन्यास की कहानी की तरफ, अर्थात एला और अतीन की तरफ जो इस कहानी के मुख्य पात्र हैं, .दो असाधारण व्यक्तित्व  जो उतनी ही  असाधारण परिस्थितियों में फंसे हैं.  एक बात फिर से  यहाँ कहनी होगी कि "चार अध्याय" मूलतः एक प्रेम कथा है, और हमें इस कहानी को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना होगा..हालाँकि यहाँ प्रेम कथा आज़ादी के लिए तथाकथित  संघर्ष के साथ इस तरह घुलमिल गई है कि दोनों को अलग करना मुश्किल हो जाता है..जैसा कि रवीन्द्रनाथ ने अतीन से कहलवाया भी है कि  " देश  की साधना और  तुम्हारी साधना एक हो जाने के कारण ही देश इसमें दिखाई देता है"....क्रांतिकारिता अतीन का लक्ष्य नहीं था, उसकी अभिरुचि  भी नहीं है  लेकिन एक बार इसमें शामिल होने के बाद पीछे हटने का उपाय नही. 

अतीन का चरित्र जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वैसे वैसे मज़बूत होकर निखरता जाता हैअतीन  की  रूचि है कविता, साहित्य लेकिन ऐला के आकर्षण में बंधकर  और ये
समझकर कि उसे प्राप्त करने और उसके पास आने  का और कोई उपाय नहीं सिवाय
इसके कि वो भी इस दल में शामिल हो. इसलिए अतीन  कहता है कि  " किसी ज़माने
में वीरता  के ज़ोर से योगयता दिखाकर नारी को प्राप्त करना पड़ता था।  आज
उसी प्रकार प्राण देने का अवसर मिला है मुझे।"

अब आते हैं एला पर, उसका चरित्र बहुत  से उतार  चढ़ाव से गुजरता है ...कहानी की शुरुआत में उसका चरित्र एक अदभुत ऊंचाई और शक्ति के साथ पाठकों के सामने आता है और बस बाँध लेता है अपने आकर्षण मे.  इंद्रनाथ  उसकी क्षमताओं को समझ कर उसे अपने साथ शामिल कर लेते हैं. यदयपि बह सीधे तौर पर किसी हिंसक गतिविधि से नहीं जुडी, उसका काम प्रतिभावान  लोगों को दल से जोड़ना है. इंद्रनाथ के विचार में  एला से बेहतर और ज्यादा भरोसेमंद (उसकी विशेष पारिवारिक परिस्थितियों और खुद उसके विद्रोही व्यक्तित्व के कारण जो परम्परागत आचार विचार, रूढ़ियों को नहीं मानता, जो अपने जीवन कि दिशा स्वयं निर्धारित करना चाहती है) और कोई हो नहीं सकता...जो भी है ..एला हालाँकि खुद को इतने ऊँचे आसन पर देखना नहीं चाहती ..पर साधारण जीवन , एक साधारण मनुष्य की तरह बिताना भी उसके वश में नहीं ..और कुछ देश प्रेम और बलिदान के गौरव के कारण इस दिशा में खिंची आई है. लेकिन जैसे जैसे क्रान्ति और बलिदान की वास्तविकता सामने आ रही है , वो इंद्रनाथ की आलोचना से भी नहीं झिझकती. वह कहती है, "जितने ही दिन बीतते जाते हैं, हमारा उद्देश्य उद्देश्य ना रहकर नशा होता जा रहा है."

इंद्रनाथ देश के एक बड़े क्रांतिकारी दल के प्रमुख सूत्रधार और कर्ता  धर्ता सब कुछ हैं. विज्ञान में  उच्च शिक्षित और असाधारण रूप से प्रतिभाशाली प्रोफेसर  किन्तु तत्कालीन व्यवस्था के हाथों अपमानित व्यक्ति। उनको देखकर कुछ हद तक चाणक्य और उसकी प्रतिज्ञा याद आती  है. वे अच्छी तरह से समझते हैं कि शक्तिशाली ब्रिटिश राज के विरुद्ध लड़ाई जीतना आसान नहीं ये बात उनका सहायक कन्हाई गुप्त स्पष्ट कहता भी है। … "तुम जिस व्यवसाय में लगे हो वह आज या कल दिवालिया होकर तो रहेगा ही."  इस सत्य को जानते हुए भी इन्द्रनाथ कहते हैं कि " यहाँ हार भी बड़ी है और जीत भी बड़ी है."   अपना अलग रास्ता बनाने के लिए और अपनी शक्ति दिखाने   के लिए वे लोग इस रास्ते पर बढ़ते जा रहे हैं. शायद इसलिए  कन्हाई  इंद्रनाथ से कहता है . ."..अंत में खतौनी के खाते में आग लगाकर हम लोगों से मज़ाक  ना करना भाईसाहब..उसके हरेक सिक्के में  हमारी छाती का खून है "..



दल के इस भीतर इस विरोधाभास और आत्मनाशी  निरर्थकता को अतीन   समय रहते ऐला से पहले ही समझ और जान लेता है लेकिन जैसा कि  टैगोर ने उसके लिए लिखा है कि "कर्म से जिस शासन को स्वीकार कर लिया  है उसका अनादर करने को वह स्वाभिमान के ही विरुद्ध समझता है."   ..अतीन का चरित्र जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वैसे वैसे मज़बूत होकर निखरता जाता है,  उसी के ज़रिये क्रांतिकारी आन्दोलन के इस छिपे चेहरे को टैगोर  सामने लाते हैं.   



रवींद्रनाथ ने इस कहानी को बेहद खूबसूरती से बुना है, ये उपन्यास उनकी अनोखी लेखन शैली और  मौलिक उपमाओं के कारण बहुत रोचक है.  इस उपन्यास को पढ़ते समय युद्ध की  पृष्ठभूमि पर बनी  फिल्में याद आती है, क्योंकि यह भी एक प्रकार का युद्ध ही है; देश में चल रहा स्व्तंत्रता का युद्ध, ऐला के मन के भीतर चलता हुआ युद्ध।   यह प्रेम की पुकार है जो ऐला को हज़ार खतरों के होते हुए भी अतिन्द्र के छुपने के  स्थान पर पहुंचा देती है. साथ ही जब वो देखती है कि अतीन का दल में आना और उसका ये सब अकथनीय तकलीफें झेलना किसी महान उद्द्देश्य का हिस्सा नहीं, साथ ही उसकी स्वयं की प्रकृति के भी खिलाफ है तब उसके सारे प्रण, प्रतिज्ञाएं, नियम टूटने या छूटने  पर आ जाते हैं ..पर अब  पीछे जाने या कहीं आगे बढ़ने का कोई रास्ता शेष नहीं. 

एक स्थिति  ये भी है कि आँखें  बंद किये जिस रास्ते पर चलने का उपदेश इंद्रनाथ दे रहे हैं और एला उसमे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित  कर रही है उसकी वास्तविकता  जब अतीन के ज़रिये जैसे जैसे सामने आती जाती है, वैसे वैसे एला का प्रण भी कमज़ोर होता गया लेकिन उतने समय में अतीन आगे निकलता गया. एला में आगे जाकर जो कमजोरी या बिखराव दिखता है उसका कारण या जवाब बहुत सरल है, कि जब मस्तिष्क पर प्रेम की आज्ञा शासन करती है तब और कोई नियम कायदा या क़ानून महत्त्व नहीं रखता 
       
  कहानी का अंत दुखांत है ..जब एला को अतीन खुद मार देता है  क्योंकि अब उसकी उपयोगिता दल के लिए समाप्त हो गई है और वो किसी समझौते के लिए भी तैयार नहीं है ऐसे में  यही  एक सम्मानजनक उपाय बचा है और  अतीन के लिए तो पहले से ही दल और उसके कुछ सदस्यों ने trap तैयार कर ही रखा है.

 हर आन्दोलन के दो पक्ष होते हैं, उजला और स्याह ..एक वो जो लोगों की श्रद्धा और सम्मान हासिल करता है दूसरा अँधेरे, नफरत और उपेक्षा के ही काबिल होता है ...कोई भी राजनीतिक या ऐसा कोई आन्दोलन चाहे वो दुनिया के किसी भी हिस्से में हुआ हो, इस नियम का अपवाद नहीं है ...यहाँ  मुझे दो और किताबें याद आ रही है. एक तो कुर्रतुल एन हैदर का "आखिरी शब् के हमसफ़र"  और दूसरा लेखक का नाम अब याद नहीं पर  उपन्यास का शीर्षक था "अनित्य " ..ये दोनों ही उपन्यास क्रन्तिकारी आन्दोलन, गांधीवादी राजनीति और कम्युनिस्ट आन्दोलन के अंदरूनी हालात, उनकी कमजोरियों और आज़ादी के बाद उनके वो बड़े बड़े नाम जो कभी सिद्धांत और विचारधारा का पर्याय थे उनकी असलियत को बड़ी खूबसूरती से सामने लाते हैं..


    जैसा कल्पना दत्ता ने कहा था .. "हमारा बलिदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा और  इसी में हमारी मृत्यु की सार्थकता है"....शायद इसी पक्ष को टैगोर अनदेखा कर गए..फिर भी मेरे विचार से एक बेहतरीन और  अदभुत प्रेम कथानक पर आधारित उपन्यास जिसे खुले दिमाग से पढ़ा जाना चाहिए.