Sunday, 1 July 2012

आदत पड़ जाती है, हम कभी भी आदत डालते नहीं पर फिर भी हमको बिना बताये, बिना इसका अहसास दिलाये ही अक्सर अलग अलग तरह की आदत पड़ जाती हैं, जिनको बाद में सुधारने, बदलने और छोड़ देने के लिए हम तरह तरह की कसरतें करते हैं. आदत कुछ भी, कैसी भी, कभी भीं.... हो सकती है. इस पर हमारा बस नहीं है. आदत चीज़ों की, आदत कुछ लोगों की, आदत कुछ रिश्तों की, आदत एक ख़ास तरह के व्यवहार की..अपने साथ, दूसरों के साथ, आदत अपेक्षाओं की और उनके हमेशा पूरे होते रहने की, आदत एक comfort zone की...

 आदत हो जाती है उपेक्षा और कठोरता की, आदत बाहरी दिखावे  और अंदरूनी छलावे  की..आदत पड़ जाती है  एक ढर्रे की.. 

एक आदत की आदत, आदतों की आदत...और भी राम जाने कौन कौन सी आदतें.. इन आदतों की गिनती करना बहुत मुश्किल है.. इनका कोई अंत नहीं.. इनके बिना हमारा काम नहीं चलता, हम चलाना भी नहीं चाहते.. हम चाहे जब तक इनको ऐसे ही चलाये रख सकते हैं..ना हम बदलेंगे ना हमारी आदतें ....फिर अक्सर ऐसा होता है कि आस पास के लोग हमसे किसी एक या बहुत सी आदतों को बदलने, सुधारने या छोड़ने के लिए कहते हैं..पर कोशिश करके भी आदत छूटती नहीं..

पर जब कभी कोई आदत छूट जाए, उसका नशा टूट जाए, उसकी लय ताल बिगड़ जाए,  उसके बिना काम चल जाए...एक दिन , कई दिन, काम चलने लगे लगातार... दिल उस से भर जाए, मन उस से उचाट हो जाए..  तो फिर उस आदत का कोई पता ठिकाना हमारी ज़िन्दगी में या  उसके आस पास बाकी नहीं रहता..उसका कोई नाम, निशान, पहचान,  कुछ नहीं बचता.. और फिर याद भी नहीं आता कि ऐसी भी कभी कोई आदत थी कि जिसके बिना काम नहीं चलता था... ऐसा भी कभी कुछ था कि जिसके बिना दिन नहीं गुज़रता था और शाम नहीं होती थी और चैन नहीं पड़ता था... कभी कभी आदत हमसे बेज़ार और हम आदत से परेशान हो जाते हैं ... 

पर कभी कभी कुछ आदतें वापिस लौट  कर आ जाती है जैसे कोई बेरंग लिफाफा या चिट्ठी जिस पर कोई पता नहीं लिखा या टिकट नहीं लगा हुआ इसलिए जहाँ से भेजी गई वहीँ वापिस आ गई यानि एक तरह का खोटा सिक्का जो अपने घर, अपने मालिक के पास  वापिस आ जाता है... ये सोच कर कि शायद फिर से रहने को जगह और चलते जाने के लिए कोई बहाना, कोई वजह फिर से मिल जाए.. और फिर से एक बार उन आदतों की, उन "दिनों" की फिर से शुरुआत हो जाए ..

"कुछ गुज़रा वक़्त, कुछ उसकी याद, कुछ उसके फीके पड़ते निशान, कुछ उसकी खींची हुई लकीरें जो अभी फीकी नहीं पड़ी हैं, कुछ उनसे जुड़ा, कुछ अलग होता हुआ सा,  कुछ पीछे छूटता हुआ सा,  उसे  फिर से पा लेने की ख्वाहिश, कुछ उसे रोक लेने की कोशिश, कुछ उसे फिर से महसूस करने की ख्वाहिश...कुछ है, कहीं है, जाने कहाँ खोया, कब खोया, कैसे खोया ..पर फिर से उसे ढूंढ लाने और बाँध कर रख लेने की ख्वाहिशें...  "

        

This Journey.. That Destination..


Be Vasco Be Columbus..

Solo goes the Marco Polo..

From Arctic to Antarctic…

Colorado to Volga..

Nile to Ganges..

Among Millions…Since the Ages… Alone Shines the “North Star”..

Discover The Destiny…. That Lies Beyond the Lofty Mountains and Sleeping Upon the Bed of Dark Woods…

Destiny… Playing with Roaring Stormy Waves, Calling Our Name to Touch the Untouchable, to Explore the Unknown, to See the Unseen…  

Discover The Path..  that will  lead us Towards the Bright Mornings and to those Calm Nights for which we are dreaming so far..


This Day.. That Morning, when the Sun will Shine on Our Sky and That Dusk when the Moon will Sprinkle Bright Rays on Our Earth..


This day.. This Time… The Momentum , The  Direction that will take us to Our Destination.. that is waiting to be Unveiled ..Since Ages..  

Saturday, 21 April 2012

आयशा --भाग 2

 .....और उनके बाद आयशा की सास यानि तरुण की माँ भी कुछ दिन रहकर लौट गई..अब मेघना उनको पहचानती तो नहीं और ना ही किसी किस्म की भावनाएं या संवेदनाएं उसके अन्दर जाग पाती हैं पर फिर भी जब तक वो रहीं तब तक कुछ हद तक  मेघना को तसल्ली रही कि वो घर में ..एक अनजाने घर में अकेली नहीं है ....अब उनके जाने के बाद, घर है, मेघना है, तरुण है, एक कोई नौकरानी भी है जिसका नाम राधा है और हैं घर की दीवारें, छत और पता नहीं कौन कौन सी चीज़ें, सामान जिनके बारे में कभी तरुण तो कभी कोई और उसे कुछ बताते या याद दिलाने की कोशिश करते ही रहते हैं..पर कुछ याद आये  जब ना... मेघना इन चीज़ों और तस्वीरों को देखती रहती है, किसी आयशा का चेहरा है उन सब में, किसी आशु की छाप है घर के सामान  पर..अब इसमें मेघा कहाँ है, उसका कहीं कोई निशाँ भी नहीं दिखता,  ऐसा क्यों? ..और अब तो उसकी स्मरण शक्ति थोड़ी सी कमज़ोर भी  हो गई है, कोई भी बात दो बार बताओ तब कहीं  याद रह पाती है..पर doctors  का कहना है कि ये तो धीरे धीरे  ठीक हो ही जाएगा..

सबके जाने के बाद मेघना ने अपने लिए अलग बेडरूम माँगा...तरुण ने अपना बेड लिविंग रूम में लगा  लिया..(और रास्ता भी क्या है)  शायद यही सोचा होगा उसने..  
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तरुण के कुछ करीबी दोस्त, खुद  मेघना के दोस्त  और कुछ रिश्तेदार जो इसी शहर में हैं,  मेघना को मिलने आते रहते हैं.. मेघना इनमे से ज्यादातर को अस्पताल में ही मिल चुकी है इसलिए ये चेहरे उसके लिए अनजाने तो  नहीं..पर इसके आगे और कुछ भी उसे याद नहीं है.  कुछ बेहद सामान्य सी बातचीत होती है जिनसे वो बहुत जल्दी उकता जाती है ..ज्यादातर वक़्त वो चुप रहती है और सबको यूँही देखती रहती है..उस वक़्त मेघना को लगता है कि जैसे वो किसी जू में रखा हुआ खूबसूरत जानवर या पक्षी है जिसे देखने  के लिए लोग आ रहे हैं..एक दो बार उसने तरुण को ये बताया भी लेकिन अब आप किसी को बीमार का  हाल चाल पूछने  आने से तो मना नहीं कर सकते ना . ...मेघना ये सोच के मन को तसल्ली देती कि कुछ दिन और..बस  कुछ दिन और ...अब इन कुछ दिनों के बाद क्या होगा या कैसा परिवर्तन आ जाएगा इसके बारे में तो उसे खुद भी नहीं पता.
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"ये  सब क्या है..?"
"ये कैंडल मोल्ड्स और chocolate  मोल्ड्स हैं ना...तुमने कैंडल और chocolate मेकिंग सीखा था."
"कब..क्यों?"
"अब तुम्हारी पसंद थी..और फिर तुम तो आर्डर पर customized  कैंडल्स और chocolates भी बनाती हो.."
मेघा को समझ तो कुछ ना आया..बस सिर  हिला दिया...जो अगर कभी ऐसा कुछ  सीखा भी था तो वो भी अब याद नहीं है.

२-४ दिन और रातें  जैसे तैसे बीते...एक रात तरुण की नींद खुली..कुछ आवाज़ आ रही है..बत्तियां जल रही हैं.."आशु......."
आशु कमरे में नहीं है..वो हॉल में सोफे पर सिमट कर बैठी  है ..कुछ बोल रही है या बुदबुदा रही है ..
"आशु..क्या हुआ..?"
" कुछ नहीं, नींद नहीं आ रही थी, इसलिए.." उसकी नज़रें फर्श को देख रही थीं.. और उसे हिचकियाँ  भी  आ रही थी ... इन हिचकियों को  तरुण खूब अच्छे से  समझता  है कि कोई  चिंता, परेशानी  या बोझ सा है  मेघना के मन में जो वो कह कर बता नहीं रही.
" क्यों, क्या हुआ...मुझे उठा दिया होता..."  कोई जवाब नहीं..
"तुम ठीक हो..कोई और परेशानी तो नहीं..आशु?"  तरुण की आवाज़ में स्नेह है...उसने शायद मेघना का हाथ थामना चाहा ..पर मेघना थोडा और सिमट गई.  कुछ देर तक शांति रही..
"सोने की कोशिश करो, नींद आ जायेगी..क्या मैं आकर सॉऊ तुम्हारे कमरे में ?"
मेघना ने पलट के सवाल किया, "तुम कहाँ सोते हो?"
"वहाँ.." तरुण ने इशारे से बताया.
"मैं भी वहीँ सो जाऊं..?"
"ठीक है."
"स्वीट निन्नी, आशु".
"क्या..??? क्या कहा",  मेघना ने अपने लिए बिछे बिस्तर पर सोते हुए  पूछा.
"स्वीट निन्नी, अच्छी नींद आ जायेगी." तरुण ने मुस्कुराते हुए कहा.
मेघना को कितना अच्छा लगा ये तो वो ही जाने पर नींद ज़रूर आ गई.  तरुण  जागता रहा, देखता रहा, मद्धिम  रोशनी में उस सोते हुए चेहरे को जो कहने को तो अभी उसकी बीवी आयशा  है  पर "आशु" कहाँ है इस चेहरे में,  ये ढूँढने  में ही सारी  रात गुज़र गई.

"पानी पानी रे  खारे  पानी रे, नैनों में भर जा ....नींदें खाली कर जा.. 
पानी पानी,  इन पहाड़ों की ढलानों से गुज़र जाना ....."  ये मेघना के गाने की आवाज़ है. जो कुछ याद रहा गया है उसमे मेघा की पसंद के  गानों की भी बड़ी संख्या है.  शाम को वो रोज़ छत पर गमलों के पास आकर बैठ जाती है... किसी चीज़ में उसका मन नहीं लगता, ना इस घर में  ना इस से जुड़े किसी मुद्दे में... तरुण समझता है पर क्या करे, ये नहीं  जान पाता ....   एक दो बार कहा भी कि फिर से अपना काम शुरू करो, उसमे मन लगेगा तो शायद ज़िन्दगी थोडा जल्दी नॉर्मल ट्रैक पर आ जायेगी, पर...

आज तरुण घर पर है...उसे पता है कि ये गाना ही क्या ऐसे कितने ही गीत आशु को इस तरह याद हैं जैसे कि कोई सामने रखे कागज़ पर लिखा पढ़ रहा हो.. पर फिर वो ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत और प्यारा गीत क्यों भूल गई है, याद क्यों नहीं करती.
"आशु,..कुछ याद आता है तुम्हें.."
"नहीं..." उसने ऐसे सर झुका लिया जैसे ये कोई बड़ी गलती है और इसके लिए उसे बेहद पछतावा है. फिर पूछ बैठी..
"तुम..तुम्हे..तुमको ये सब.. गुस्सा नहीं आता क्या तुम्हे.? ये कैसी ज़िन्दगी है हमारी.. मैं और तुम.. ये घर, ये रिश्ते..पर कुछ नहीं  जानती मैं इनके बारे में...मुझे कुछ याद नहीं तुम्हारे बारे में ...और शायद कभी कुछ याद आएगा भी नहीं..."

"हाँ हो सकता है कि तुम्हे कभी कुछ भी याद ना आये..हो सकता है कि तुम्हे मेरे बारे में, इस घर के बारे में कभी कोई चीज़  याद ना आ  पाए...पर ये भी तो हो सकता है ना कि तुम्हे सब याद आ जाए..हम इस तरह उम्मीद तो नहीं छोड़ सकते ना.."
मेघना बोली कुछ नहीं पर चेहरा और झुकी हुई पलकें बहुत कुछ कह गईं.

"पता है तुम में कोई बदलाव नहीं है.. तुम वैसी ही हो..वैसी ही जिद्दी कि अगर कोई चीज़ समझ ना आये या पसंद  ना आये तो तुम उसे क़ुबूल करने से साफ़ मना कर देती थी...फिर कोई लाख समझाए..अगर तुम्हारी समझ में नहीं आये तो सब बेकार..दुनिया सारी की पसंद एक तरफ और तुम्हारी टेढ़ी नाक एक तरफ.." तरुण ने मेघना का मन बहलाने के लिए बात बदली...पर लगा नहीं कि उसका कुछ असर हुआ है. .आखिर वो उसके पास बैठ गया..
"आशु....तुम्हे अब शायद याद ना हो...पर एक दिन तुमने मुझसे कहा था कि जब कभी तुम मुझसे नाराज़ हो जाओ तो मुझे तुम्हे मनाना ही होगा...पर मुझे कभी तुमसे नाराज़ होने का हक नहीं..ये हक सिर्फ तुम्हारा है...और मैंने यही मान लिया है कि तुम मुझसे  बहुत नाराज़ हो किसी बात पर और मुझे तुम्हे मनाना होगा.."

मेघना तरुण को थोड़ी देर देखती रही..एकटक, कुछ कहने की भी कोशिश की शायद, पर कह नहीं पाई..बस देखती रही..उसकी आँखों  का पानी अब भी उसके चेहरे पर अपने निशान बनाता बह रहा था..

"और तुम्हारे शब्दों में कहूँ ना तो It's your Absolute Right, Fundamental Right, Civil Right...." तरुण  ने  हंसने की कोशिश की इस उम्मीद में कि शायद मेघना भी हंस दे..हंसी तो ना आई पर हाँ एक मुस्कराहट ज़रूर उस चेहरे पर आ गई, ऐसे जैसे, तेज़ धूप में अचानक बारिश होने लगे, ऐसे जैसे बादलों से घिरे आसमान में कहीं बिजली चमक जाए... मुस्कराहट उस चेहरे पर जिसकी पहचान वक़्त के ऐसे जंगल में  कहीं खो गई है, जहाँ से एक नहीं कई रास्ते निकलते हैं...और हर रास्ते पर उसी चेहरे का एक अलग ही अक्स है..

अब इतने दिन बीत गए हैं कि शरीर से तो मेघना बिलकुल ठीक हो ही गई है..पर मन अभी भी कहीं गुज़रे वक़्त में ठहर गया है..वहाँ से निकल नहीं पा रहा और निकलना भी नहीं चाह रहा. घर में खाली बैठे बैठे मेघना के पास वक़्त बहुत है, सोचने के लिए, घर को देखने और घर के  सामान   से जान पहचान करने के लिए. बहुत सारी बातें सोचती रहती है मेघा...जो आज है, जो कल था, जो आने वाले समय में हो  सकता  है या नहीं भी हो सकता है.. तरुण के बारे में भी सोचती रहती है..और अब इतना तो मान ही चुकी है कि अब वो सिर्फ मेघना नहीं आयशा भी है...और तरुण अब सिर्फ नाम नहीं है,  एक रिश्ता भी है ..याद भले ही ना हो, पहचानती भी ना हो पर इतना ज़रूर समझती है कि इस तरह ख्याल रखने वाला, देखभाल करने वाला साथी कोई अनजान या नामालूम सा शख्स नहीं है. अब वो जो भी है,  वर्तमान में  उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा है और भविष्य में भी रहेगा...शायद ... विश्वास जैसा कहीं कुछ होता हो तो फिलहाल तो मेघना या आयशा जो भी कह लें ..तरुण का और उसकी हर बात का विश्वास कर पाती हो या नहीं पर रोज़  उसके घर लौट आने का इंतज़ार ज़रूर करती है..उसके साथ बैठ कर बातें करने और उसकी बातें सुनने में निश्चित रूप से उसकी दिलचस्पी है..

"show me the way take me to love......."  ये गाना चल रहा था किसी म्यूजिक चैनल पर, जब आयशा कमरे में आई...अब तक गाने का अंतरा शुरू हो गया था..पर तभी लाइट चली गई...पर तभी तरुण ने सुना..
"A wish a dream, magic go it does seem, has time stood still just for me... just for me... यहाँ आकर  आयशा का गाना रुक गया.. "आगे याद नहीं आ रहा."

"It's saying that we're meant to be together forever one another's destinies" 
तरुण ने आगे की पंक्ति पूरी की..
जैसे अचानक से ही आयशा को बहुत पहले किसी की कही  हुई बात याद आ गई, "इस दुनिया में विश्वास जैसा कहीं कुछ नहीं होता..हमें सिर्फ ये तय करना होता है कि कोई इंसान हमारे लिए ठीक है या नहीं, क्या हम उसे पसंद करते हैं , हमें बस एक चुनाव करना होता है..और चुन लेने के बाद हमारे दिल को तसल्ली होनी चाहिए कि हमने सही इंसान को चुना है..इसी तसल्ली की परख में ही सारे सच झूठ, विश्वास-अविश्वास, फरेब और सरलता के राज छुपे हैं.  वो बस तरुण को थोड़ी देर तक यूँही टकटकी बांधे देखती रही..
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं...बस यूँही.." एक बार फिर  से उसे हिचकियाँ होने लगीं..
"आशु...." पर आयशा रुकी नहीं..सीधे अपने रूफटॉप गार्डेन को देखने चली गई..

"हमारे यहाँ हरसिंगार और डेहलिया के फूल क्यों नहीं हैं...मुझे वो बहुत पसंद हैं.."
"दोनों थे..पर इतने दिन से किसी ने देखभाल की नहीं..इसलिए ज्यादातर फूलों के  पौधे मुरझा गए तो मैंने माली से कहकर उन गमलों को हटवा दिया. अब सिर्फ palms  और दूसरे पौधे  ही हैं. "
 "तो माली को बुलाओ, मुझे नए पौधे लगाने हैं..ख़ास तौर पर फूलों के."

अगले दिन माली आया, आयशा उसे बहुत सारी चीज़ें समझाती रही, बताती रही, खुद भी पता नहीं  किन किन कामों में उलझी रही..ऐसा लगता था कि  एक ही दिन में बगीचे का नक्शा ही बदल देगी..आज तरुण को एक लम्बे वक़्त के बाद मेघना में आशु दिख रही है..सिर्फ नाम की आशु नहीं , वही आशु जिसने कभी खुद इस घर का interior  डिजाईन किया था.

अब सांझ हो गई है..आयशा थक गई है, पर चेहरे पर संतुष्टि है..उसकी पसंद के पौधे लग गए हैं और अब तो बालकनी में भी एक छोटा गार्डेन space  बना दिया गया है. तरुण वहीँ गमलों के पास खड़ा है... आयशा  भी पास आकर खड़ी हो गई. तरुण ने उसका हाथ थाम लिया और अब  आयशा का सिर उसके कंधे पर था...विचारों और भावनाओं का तूफ़ान अभी भी थमा नहीं है मेघना के अन्दर पर अब उस तूफ़ान में भी उसे  जीवन का संगीत, लय, संतुलन और एक समतल किनारा दिखाई दे रहा है...और अब उसे मेघना और आयशा के बीच के उलझे धागे अब  सुलझते दिखाई दे रहे हैं..



Part -- 1























Tuesday, 3 April 2012

ये बाज़ार है

हम सब फूलों से  प्यार करते हैं. हम सबको फूल  ही चाहिए.

हम सब फूलों के मखमली कालीन पर चलना चाहते हैं. 

हम सब फूलों के नाज़ुक बिछौनों पर सोना चाहते हैं. 

हम सब  फूलों से बनी  नर्म और महकती हुई गर्म रजाइयां ओढ़ कर सुख के सपने देखना चाहते हैं.

हम सब  फूलों की तस्वीरों से ज़िन्दगी की दीवारों को सजाना चाहते हैं. 

हम सब फूलों के गहनों से अपनी अलमारियों और दिलों की तिजोरियां भरकर उन पर ताले लगा देना चाहते हैं. 

हम सब को फूलों की ख्वाहिश है..

कितना कुछ चाहिए हमें, कितना ज्यादा, अपने हक से ज्यादा..अपने हिस्से से भी ज्यादा  हमें ज़िन्दगी से चाहिए.

पर मिलता नहीं, दिया नहीं जाता. 

जितना हिस्सा है उस से भी थोडा  कम  मिलता है. 

जीवन का तराजू बनिए की तरह हम को तौलकर देखता है, फिर बाज़ार में हमारी कीमत का अंदाज़ा लगाता है. 

फिर उतना ही देता है जितने के हम काबिल है या जितना हम संभाल सकते हैं और जितनी हमारी बाज़ार के मुताबिक़ हैसियत भी है. 

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हम सब को फूल चाहिए पर असल में हम सब हैं पत्थरों के व्यापारी. 

हम फूलों का सौदा पत्थरों के बदले करना चाहते हैं.

हमें नज़र ही नहीं आता कि कब इस अदला बदली में  इन पत्थरों के नीचे फूल कुचल गए और मर गए.

हम पत्थरों के सिक्कों से फूलों की खुशबू खरीदने चले हैं. क्योंकि और कुछ देने को हमारे पास है नहीं और खरा मुनाफे का  सौदा किये बिना हम रह नहीं सकते.

हमें फूल चाहिए जिनसे हम अपने पत्थरों को ढक सकें, जिनसे हम अपने खुरदुरेपन को छुपा सकें.

हमने फूल खरीदे हैं, हम उनके मालिक हैं, हमने कीमत अदा की है और इसलिए बनिया भी हम, तराजू भी हमारा और इसकी परख भी हम ही तय करेंगे.



 

Thursday, 8 March 2012

मुझे भूख लगी है ....

भूख सबको लगती है, इंसान हो या जानवर, कोई इस प्राकृतिक आवशयकता से परे नहीं है  ..ऐसा इस नश्वर संसार में कोई  नहीं हो सकता जो कहे कि मुझे भूख नहीं लगती...और फिर हमारे देश में तो पितरों को भी साल में एक भोजन करवाया जाता है (हाँ उनके नाम पर पंडित और ब्राह्मण खाना खाते हैं..)और भी बहुत से मान्यताएं, विश्वास भोजन को लेकर हमारे हिन्दुस्तान में मिल जायेंगे, कहने का अर्थ सिर्फ यही है कि बगैर खाए हम रह नहीं सकते, ना जीते जी न मरने के बाद ..पर ये सब तो हमारा विषय नहीं है..

दरअसल भूख के बारे में लिखने का ख़याल आया क्योंकि ....अब..क्या कहें ...चलिए रहने दीजिये..आप लोग खुद ही समझदार हैं..

भूख की philosophy , सिद्धांत, nature  या और जो भी कुछ नाम रख लें ...वो बहुत सीधी और  सरल है ...अक्सर जब बहुत ज्यादा भूख लगी होती है तब उस समय खाने के लिए कुछ ऐसी चीज़ नहीं होती जो पसंद आये या जो मन भर के खाने की इच्छा हो ( मन अगर भर जाए तो पेट तो उसके बहुत पहले ही भर जाता है ..) 

पर अगर किसी कारण से मूड बिगड़ा हो, दिमाग का temperature  १०० डिग्री के आस पास हो या आ जाने की संभावना बन गई हो..तो ऐसे में भूख भी उतनी ही ज्यादा  और जोर से लगती है (यहाँ क्रिया की प्रतिक्रया का सिद्धांत तुरंत अपना असर दिखाता है, ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है)  पर अब इसमें मुसीबत ये हो जाती है कि गुस्से के कारण खाने का मूड नहीं होगा. जैसे ना खाने से समस्या सुलझ जायेगी या दुनिया में कोई बड़ा भारी परिवर्तन आ जाएगा. ऐसा कहीं कुछ होता नहीं, उल्टा गुस्सा और भूख दोनों मिलकर सिरदर्द, थकान और पता नहीं कौन कौन सी मुसीबतों की  जड़, फूल-पत्ती, डाली, टहनी सब एकसाथ  बन जाते हैं.

भूख हमें लगी है, पर खाना हम नहीं खायेंगे, लोग पूछते पूछते थक जायेंगे पर हम नहीं खायेंगे...क्योंकि एक तरफ अपनी जिद भी है..उसको भी बनाए रखना है और दूसरी तरफ मन में अच्छा भी लग रहा होता है कि चलो हमें खाने की और अपना ये दुर्वासा  रुपी क्रोध का अवतार त्याग देने की मनुहार की जा रही है (मतलब हम महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं )  ..पर अब इस झमेले में  फिर ये भी  होता है कि आखिर बेचारी भूख खुद भी थक जाती है और २-४ घंटे के लिए या ऐसे कुछ समय के लिए भूख महसूस होना बंद हो जाता है. इसके पीछे का विज्ञान या कारण तो मुझे नहीं पता पर मेरे ख्याल से इसकी वजह मानसिक उदासीनता है. अगर जिद पकड़ ही ली है कि नहीं खाना.. या किसी और  वजह से खाने का मन नहीं है  तो फिर ये एक तरह का adjustment  ही है कि कितनी देर तक भूख बर्दाश्त करने की  क्षमता है.  ये हमारी सहनशक्ति की भी परीक्षा है...कि भूखे रहकर भी दिमाग को कितना शांत रखा जा सकता, अच्छी नींद ली जा सकती, सपने देखे  जा सकते हैं..और कब तक अपनी आवाज़ को शांत और स्थिर रखा जा सकता है..

भूखा रहना आसान  काम नहीं है, भूख न लगे ये भी हो नहीं सकता.. थोड़ी देर के लिए भूख का अहसास गायब हो सकता है पर फिर जल्दी ही और ज्यादा तीव्रता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगता है... पर फिर देखने की  बात सिर्फ इतनी ही है कि कितनी देर और कब तक बिना खाए काम चल सकता है या चलाया जा सकता...ये शरीर और मन दोनों की मिलीजुली परीक्षा है और अक्सर शरीर से पहले मन थकने लगता है...भूखे पेट होने  से ज्यादा ...भूख लग रही और "इतनी या उतनी देर" से कुछ खाया नहीं है..ये फिकर ज्यादा असरदार होती है.. और ऐसे में अगर किसी ने आपको खाना खाने के लिए जैसे तैसे मना लिया (रोना धोना वगैरह)  तो दिल को बड़ी तसल्ली हो जाती है..कि ( चलो आखिर इतनी देर बाद कुछ तो खा लिया). ...और आपकी प्रतिज्ञा  भी रह  गई कि  "मुझे नहीं खाना." 

पर अब एक अंतिम बात और कहना चाहूंगी कि भूख और भूखे पेट के बारें में इतना सब वाणी विलास भरे पेट ही हो सकता है...खाली पेट रह कर भूख पर कुछ लिखा गया तो रांगेय राघव के शब्दों में.." जब नफरत से प्रेम करने वाली आँखों का पानी घास पर गिरता है तो घास झुलस जाती है, जब दर्द देख कर गिरता है तो बन्दूक की गोली बनकर और जब इंसान को भूखा देखता है तो वह गुलामी का दस्तावेज बन जाता है."

भूख से हम लड़ नहीं सकते..हारना ही नियति है..पर कुछ देर के मन-बहलाव के लिए अपनी बात मनवा लेने के लिए, अपने होने का अहसास दिलाने के लिए, अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए, अपना गुस्सा दिखाने के लिए..भूख एक बहुत सशक्त हथियार है..


When There Would Be Nobody

आखिर में कोई भी मेरे साथ नहीं गायेगा....सिर्फ ये खामोशी मेरे साथ गाएगी...

आखिर में कोई भी बात नहीं करेगा...सिर्फ एक आईना मेरे सामने होगा ....

आखिर में कोई भी मेरे साथ नहीं सोयेगा...सिर्फ अकेलापन मेरे साथ सोयेगा...


---Unknown Author

जो कहीं नहीं है ..

वो जो तेरे साथ गुज़रा, वो वक़्त, वो लम्हा अब भी मेरी साँसों में जिंदा है...अब उसकी ही  खुमारी में आने वाला वक़्त भी गुज़र ही जाएगा.. वो जो गुज़र गया, वो बेशकीमती था पर उसे संभाल के  कहीं रख सकें ऐसा कोई कोना नहीं मिला..

कुछ गुज़रा वक़्त, कुछ उसकी याद, कुछ उसके फीके पड़ते निशान, कुछ उसकी खींची हुई लकीरें जो अभी फीकी नहीं पड़ी हैं, कुछ उनसे जुड़ा, कुछ अलग होता हुआ सा,  कुछ पीछे छूटता हुआ सा,  कुछ  उसे  फिर से पा लेने की ख्वाहिश, कुछ उसे फिर से लौटा लाने की चाह,   कुछ उसे रोक लेने की कोशिश,  कुछ उसे एक बार  फिर से महसूस करने की ख्वाहिश...कुछ है, कहीं है, जाने कहाँ खोया, कब खोया, कैसे खोया ..पर फिर से उसे ढूंढ लाने और बाँध कर रख लेने की ख्वाहिशें... 



"तेरे इश्क का एक कतरा इसमें मिल गया था, इसलिए मैंने ज़िन्दगी की सारी कडवाहट पी ली थी"
आखिरी पंक्ति "अमृता प्रीतम की है.