Tuesday, 12 March 2013

एक कहानी ये भी

ये एक आम कहानी है .. बेहद औसत दर्जे की .. जिसमे कुछ भी बहुत नया, अलग सा या दिलचस्प जैसा कुछ नहीं .. लेकिन फिर भी मैंने इसे लिखने का विचार  किया क्योंकि ये कहानी महज़  "एक रोज़मर्रा की बात" नहीं है ये किसी की ज़िन्दगी में सचमुच हो रहा है, कोई है हमारी इस दुनिया में, हमारी आस पास की दुनिया में  जो हर रोज़ अलग अलग नामों और चेहरों वाली पहचान लिए लगभग ऐसी ही, मिलती जुलती परिस्थितियों से गुज़र रहा है, झेल रहा है, चुपचाप क्योंकि शिकायत करके वो हार गया है और अब उसने हालात से समझौता कर लिया है .. "अब और चारा भी क्या है". 


तो ये कहानी कुछ इस तरह है ....



" वो ऊपर वाला जडाऊ सेट दिखाना तो .. हाँ वही।"  

"देखो, कैसा लग रहा है ..?" 

"बहुत खूबसूरत है .. तुम पर खिल रहा है ..   ओ के,  इसे ही पैक कर दीजिये।" 

"अरे रुको ज़रा .. वो वाला दिखाना तो "

"हाँ अब कहो .. इन दोनों में से कौनसा ज्यादा अच्छा है .."

"दोनों ही बढ़िया है ,, ऐसा करते हैं कि  दोनॊ ले लेते हैं। दोनों को पैक करिए और बिल बनवा दीजिये।"

" जी .." 

अब नाम किसी का ना पूछिए .. नाम तो कुछ भी हो सकता है .. नीता, अनीता सुनीता, निशा, मीना, आशा, लता, कांता या ...शोभा ..हाँ शोभा,  इस शानदार    ज्वेलरी शोरूम में एक सेल्स गर्ल है। और आज सैलरी मिलने का दिन है, इसलिए आज उसका मूड बहुत अच्छा है, आज उसे कोई चीज़ बुरी नहीं लग रही।  वो बस एक शौपिंग लिस्ट बनाती  जा रही है मन में .. गुडिया के लिए नया  फ्राक और नए जूते ..उसके स्कूल प्रोजेक्ट का सामान .. नए बैग का भी कह रही थी .. वो  भाभी की बेटी का पुराना बैग चला रही है जो अब फट गया है। 

और भी ज़रूरत की कुछ चीज़ों को लिस्ट में जोड़ा जा रहा है।  

आखिर शाम को सबको सैलरी चेक मिल गए। घर वापसी के समय शोभा मंदिर भी गई .. वैसे तो रोज़ सुबह  की आरती  में पहुंचना उसका नियम है पर आज का दिन ख़ास है ना इसलिए गई । 

 अगले दिन शोभा ने आधे दिन की छुट्टी ली और गुडिया को लेकर बाज़ार में घूमती फिरी  ... ये भी लेना है वो भी लेना है  और हाँ महीने का राशन भी .. रात को खाने के लिए माँ ने बुलाया है, वापसी में कोई ना कोई घर छोड़ जाएगा। 

गुडिया ने अपना नया फ्राक पहन लिया था .. सबको बताती फिर  रही थी कि  इसे आज ही लिया है ... 

"शोभा,  बबली भी अब दस ग्यारह  साल की हो  गई है ना .."

"हाँ माँ, अगले  हफ्ते ही उसका जन्मदिन भी है .."

"माँ बबली को फोन करो ना " .. ये गुडिया है जो अपनी छोटी बहन का नाम सुनकर मचल गई है .

शोभा ने जवाब दिया नहीं .. चुपचाप मुंह फेर लिया और चुन्नी के छोर से आँखें पोंछने लगी। 
खाने के बाद शोभा का भाई उसे और गुडिया को उनके घर छोड़ आया ..

हफ्ते भर बाद ...

" सुनिए ज़रा एक बार बबली को फोन दीजिये .. मुझे एक बार उसकी आवाज़ सुननी  है .." कहते कहते शोभा रोने लगी है पर लगता नहीं कि  फोन के दूसरी तरफ जो लोग हैं उनको कोई फर्क पडा .. फोन कट गया .. और उसके साथ ही एक आवाज़ और सुनाई दी ..

"फोन क्यों रखा .. मुझे भी बात करनी थी मम्मी से .. मुझे अभी बात करनी है .. मम्मी को बुलाओ।"  कहते कहते बबली ने भी रोना और हाथ पटकना शुरू कर दिया .. पर इसकी प्रतिक्रिया काफी सख्त हुई, उसे ज़बरदस्ती कमरे में ले जाकर बिठा दिया गया .. जोर से डांट  भी पड़ी और शायद थप्पड़ भी पड़ा हो .. मगर देखा किसी ने नहीं।  

वैसे देखा तो बहुत कुछ नहीं .. लोगों ने, दुनिया जहान  ने और बहुतों ने तो सिर्फ सुना भर है। 

महीने भर बाद ...

दूकान पर आज एक के बाद एक ग्राहक आ रहे हैं  और शोभा वाले काउंटर पर कुछ ज्यादा ही रश  है .. नवरात्र हैं ना इसलिए .. शोभा को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं .. पर इस व्यस्तता में भी उसकी नज़र एक लड़की पर बार बार टिक रही है .. जिसने शोभा के काउंटर से एक टॉप्स का जोड़ा पसंद किया और अब कंगन देख रही है .. उसे देख कर ही पता लग रहा है कि  शादी हुए अभी ज्यादा वक़्त नहीं हुआ .. 
आखिर उसने कंगन का एक जोड़ा भी लिया और अब  अपने पति के साथ  वो दूकान से बाहर जा  रही है .. पता नहीं  क्यों शोभा उसे देखे जा रही है .. ऐसे तो कितने ही ग्राहक हर दुसरे दिन आते हैं और गहने खरीदते हैं। 

रात को खाना खाकर, घर के काम निपटा, गुडिया का होम वर्क भी पूरा कराया  और अब सोने की कोशिश कर रही है शोभा .. गुडिया सो गई है और उसके चेहरे में शोभा को गुज़रा समय और आज .. और आने वाला समय सब एक साथ दिख रहे हैं। 

इस बड़े से शहर के एक अच्छे  भले  व्यवसायी परिवार की बेटी, पांच भाई बहनों में सबसे छोटी .. ब्याह कर के गई जहां वो भी वैसा ही धन धान्य से भरा पूरा, बड़े से बंगले में रहने वाला परिवार था .. जिसकी इकलौती बहू बनी शोभा..घर में उसे मिलकर कुल चार प्राणी .. सास ससुर, पति और शोभा .. शादी के दो साल बाद एक एक कर गुडिया और बबली पैदा हुई। सब कुछ था उस घर में पर शोभा के लिए कुछ नहीं था ... बिलकुल वही घिसा पिटा किस्सा  कहानी जो पुरानी फिल्मों में दिखाते हैं ...  पर फिल्म की कहानी असल ज़िन्दगी में उतर आएगी ये किसने सोचा था। 

उस बड़े से बंगले की सार संभाल, घर के काम और बिस्तर पर पड़े बीमार ससुर की देखभाल .. बस "इतना ही काम"  शोभा के जिम्मे था।    

कुछ साल पहले ...

"एक काम वाली बाई रख लें .. मुझे थोड़ी मदद हो जायेगी .. सब अकेले नहीं संभलता" 
"ठीक है .. माँ से कह दूंगा कल कि  तुमसे घर का काम नहीं होता .. इसलिए बाई रख लो।"
"मैं ऐसा कहाँ कह रही हूँ .. सिर्फ इतना कहा कि  .." 
 " एक काम  करो .. तुम्हारे बाप  से कहो एक नौकर भेज दें यहाँ .. तुमसे तो अब चार लोगों की रोटी भी नहीं  बनती।" 

आगे कुछ कह सके इतनी हिम्मत शोभा में अब बची नहीं .. उसके थके टूटे शरीर में मार सहने की ताकत  नहीं और सास तक उसकी ये इच्छा पहुंची तो नतीजा  कैसा भी हो सकता था .. शायद पिछली बार से थोडा ज्यादा या थोडा कम।

पिछली बार  पता नहीं किस बात पर झगडा शुरू हुआ था जिसके लिए उसे पीटा  गया .. इतना कि  शरीर पर जगह जगह नीले निशान पड़  गए, आँख  सूज गई थी और उसका हाथ ज़ख़्मी हो गया था .. लेकिन इसके बाद भी सास को चैन नहीं आया और रात बारह बजे उसे घर से बाहर निकाल दिया और दोनों बच्चियों को कमरे  में बंद कर दिया था। रात भर गेट के पास सिकुड़ी सी बैठी शोभा रोती  रही , डरती और सहमती रही .. सुबह हुई .. तब सास ने उसे अन्दर बुलाया .. चाय बनाने के लिए। 

ऐसे ही एक दिन जब बहुत मार खाने के बाद शोभा ने  हार कर पिता को फोन किया जो उसे लिवा  ले गए, ये कह कर कि सास और पति अपना व्यवहार सुधारें वर्ना अब शोभा को वापिस नहीं भेजेंगे। 

बिस्तर पर लेटी  शोभा अब भी जाग रही है .. अब रोना भी नहीं आता ..बस सोचती है ...जब घर से रवाना हो रही थी .. तब सास ने बबली को नहीं आने दिया था .. और वो दिन है और आज का दिन उस घर से ना कोई लेने आया ना किसी ने चला कर उसका हाल चाल पूछा ..माता  पिता ने बड़ी कोशिशें की कि  कुछ समझौता सुलह हो सके .. शायद उसका पति ही मान जाए .. पर ..

कुछ महीने पहले ...

"मेरी ही किस्मत इतनी खराब लिखनी थी .. मैंने ही  क्या  गुनाह कर दिया था .. और मेरी दोनों बच्चियों ने .. उनका क्या भविष्य होगा ..भाई भाभी कब तक बिठा कर खिलाएंगे और कब तक बिठाएंगे .." शोभा का रोना ही बंद नहीं हो रहा था और  जमुना आंटी को समझ नहीं आ रहा कि  कैसे और कौनसे शब्दों का जाल शोभा को  समझा सकता है। 

फिर यहाँ नौकरी मिल गई शोभा को .. ज्वेलरी शो रूम पर  और  फिर उसने एक छोटा मकान किताये पर ले लिया .. मकान मालिक नीचे रहते हैं, भले लोग हैं .. शोभा और गुडिया का ध्यान रखते हैं और इसलिए अब सब लोग निश्चिन्त है कि  शोभा की ज़िन्दगी अब जैसे तैसे कट ही जायेगी।

" अरे शोभा  क्या बात है न बिंदी ना टीका ना सिन्दूर और ना कुछ और .. आज दिवाली है .. ऐसे भी कोई रहता है त्यौहार के दिन"
मंदिर में कोई पूछ रहा था शोभा को ..

"बिंदी सिन्दूर किस पति के लिए लगाऊं .. वो जिसने मेरी ही बच्ची  मुझसे छीन ली और ..." आगे बात उसने अधूरी छोड़ दी। 

आज का दिन ..

"गुडिया अगले साल कॉलेज जायेगी माँ .. इसके लिए अब कोई लड़का .."
"चिंता मत कर .. गुडिया की शादी तो तेरे भाई करवा ही देंगे .. बड़ी वाली ने मुझे कहा भी है कि  गुडिया के लिए एक हार सेट वो देगी .. बाकी दोनों और तेरी बहनें भी देंगी .. चिंता मत कर .. गुडिया को अच्छा दहेज़ देंगे और बबली को तो उसकी  दादी और पिता ही देख्नेगे .."  "बात होती है उस से .. बबली से ?" 

"हाँ, कभी कभी चोरी छुप के खुद  फोन कर लेती है मोबाइल तो अभी है नहीं उसके पास वर्ना मैं करती हूँ तो दादी की मर्ज़ी हो तो बात कराती है वर्ना नहीं .. और मैं तो अब माँ तुम जानती ही हो .. मैंने तो अब बबली से अपना मोह निकाल दिया है .. क्या करूँ तुम बताओ ..?" 



क्या करूँ .. तुम ही कुछ बताओ ... 

ये सवाल आज भी अनुत्तरित है।






  

Monday, 11 February 2013

उसकी खता


दृश्य --1

" अरे ये अनीता शादी क्यों नहीं कर लेती ? और कब तक बैठी रहेगी। तू इस से ज्यादा  बात न किया कर और ना इसके साथ रहा कर, क्या ज़रूरत है इसके साथ  इतना घुलने मिलने की ?" कहने वाले की आवाज़ में तुर्शी थी, व्यंग्य और कडवाहट एकसाथ थी, लेकिन सुनने वाली की समझ में ना आया कि आखिर गलत क्या किया .. इतनी अच्छी  तो है अनीता, सबसे प्यार से मिलती है, कितने तो दोस्त है इसके और सब कितना रेस्पेक्ट देते हैं .. अनजाने को भी दोस्त बना लेती है।   


दृश्य --2 

" लो भाई अब तो अपने सेक्शन के लगभग सभी कुंवारों  की या तो शादी हो गई या अब होने वाली है .. सपना का भी नंबर लग गया।"  कहने वाले ने गुलाब जामुन खाते हुए कहा। 

" हाँ अपने सेक्शन में तो अब कोई कैंडिडेट नहीं  है पर दफ्तर में और है .. " बात अधूरी छोड़ दी गई .. जान बूझकर .. आँखों से एक राज, एक संकेत झाँक रहा था .

"तेरा मतलब अनीता और रंजना ?"  एक मुस्कराहट आई चेहरे पर जैसे वो राज समझ आ गया।

" अब यार कुछ तो रौनक रहने दो दफ्तर में .. वैसे भी नौकरीपेशा लडकियां तो खुद ही शादी वगेरह के झंझट से बचती हैं  .. उनकी शादी तो .. " आगे का वाक्य एक बड़ी हंसी में डूब गया। एक उपेक्षा और व्यंग्य से भरी हंसी .. एक ऐसे मजाक के लिए जो  "अब ये हंसी मजाक  तो  चलता ही रहता है " की श्रेणी में आता है। 


दृश्य -- 3

" सर मैं इन दूर  दराज के इलाकों में अकेले नहीं जा सकती और ना ही गाँव में .. कम से कम बिना सिक्यूरिटी gaurd  और गाडी के तो नहीं जाउंगी।"

"अच्छा, ठीक है .. ले जाओ गाडी।"  जवाब सूखा और उपेक्षा से भरा था।  कहने वाले ने बोलते वक़्त अपना सिर  उठा के देखने की भी जहमत नहीं की। 

दृश्य --4 

" इन आजकल के नए भर्ती  हुए लोगों को बड़े नखरे हैं, खासतौर पर इस छोकरी के। कहती है  अकेले नहीं जायेगी .. gaurd  चाहिए, गाडी चाहिए .. अरे  ज्वाइन करने से पहले  नहीं पता था कि  कितनी भागदौड है यहाँ .. हर जगह जाने के लिए एक आदमी साथ चाहिए .. अपना आदमी क्यों नहीं कर लेती .. ये भी सरकार  देगी क्या .." एक पल के लिए सबने एक दुसरे को देखा फिर कहने वाले की हंसी में शामिल हो गए।

दृश्य -- 5 

"इतनी देर से  किस से बात कर रहा है? कौन है ..तेरी ऑनलाइन गर्ल फ्रेंड है क्या ?" पूछने वाले ने एक ख़ास नज़र से देखा।

" गर्ल फ्रेंड तो नहीं है पर बातें करने के लिए, टाइमपास के लिए क्या बुरी है, और इसके पास टाइम तो बहुत है।"

"कॉलेज में है या नौकरी करती है?" 

"अरे अच्छी  जॉब है इसकी .. कॉलेज वालेज़ नहीं .. मुझसे ही बड़ी है ये तो .. खुद ही कहती है।"

"तो .. scene  क्या  है"

"कुछ नहीं यार .. ऐसे ही "टाइमपास" के लिए। जवाब देने वाला और सुन ने वाला दोनों की हंसी कमरे में गूँज गई .. कंप्यूटर स्क्रीन के दूसरी तरफ चैट  विंडो में एक स्माइली आइकॉन उभरा ..   "you are so sweet" के जवाब में।


दृश्य --6 

रात हो गई, सोने का वक़्त भी हो गया। थक कर अनीता बिस्तर पर लेटी .. चादर मुंह तक खींच कर, एक हाथ अपनी आँखों पर रख कर, सांस कस  कर भींच ली। कल सुबह क्या क्या काम हैं .. सोचती रही। और फिर सोच की दिशा एक सुनिश्चित विषय  की ओर  मुड़  गई। बहुत सी सुनी --अनसुनी बातें और बहुत से ख्याल मन में आने जाने लगे .. फिर अपने आप से ही पूछ लिया .. "मेरी क्या गलती ?"  मैंने क्या कसूर किया है ?"

आँखों पर रखे हुए हाथ का कुछ हिस्सा  गीला हो गया लेकिन फिर कुछ देर बाद सूख गया .. अगली सुबह तक के लिए।


Tuesday, 22 January 2013

"When Love Speaks" : My entry for the Get Published contest"




  "When Love Speaks" : My entry for the Get Published contest"


Idea Description

Sometimes it takes a second or third or even many more sights to fall in love with each other. With Awani and Sushant this thing proved completely true; from casual friendship to close friends and when it turned into Love, they never knew.

A relationship that started from the beautiful city of Udaipur; reached to new heights in Hyderabad and then Delhi before it comes back to Udaipur.

Awani and Sushant were well-aware of the fact that parents will not give their consent for this relationship. Hence, they took decisions one after another, grabbed and left opportunities; to gain time as much as they can. In this process, they both had to change the directions of their lives and careers. Awani got a job in Hyderabad after her B.Tech and Sushant also managed to get admission in an MBA course in Hyderabad, purpose was to be with each other. However, it was just a beginning of a long struggle, a roller costar ride of events and a crazy romance that grew mature and strong with time. But one day the destiny turned its wheels to a different direction which they never anticipated.

Two people who think that “When Love Speaks” nothing else does matter.


What Makes It Real

This story is inspired by those friends of mine who had a long time relationships, a few of them succeeded in taking it to the final stage that is marriage, where as some others had to get separated due to various issues.



Extract

Sitting on a bench at Fateh Sagar Lake (Udaipur), Awani was looking at the reflection of gleaming lights in the water. She remembered that mesmerizing bike ride with Sushant at 4 am in the morning on the empty roads of Hyderabad, around the Hussain Sagar Lake. She wanted to listen to the silence of city and most of all she wished to view the sunrise at the lakeside.

Sushant was driving fast and she spread her arms as if she wanted to embrace the whole world.

“I want to hold the wheel of time right here. I want to stop this moment right here, forever...” she spoke while gazing at the lofty statue of Buddha in the middle of the lake.

Then hold it, but remember when the sun will rise, your moment will disappear,” Sushant laughed in a careless manner.

The same day when she reached at office, her boss called her to give her a news.

Awani’s somnolence got broken and she saw Sushant sitting beside her.

“Do you remember how much you loved to see the sunrise and sunsets at lakeside?”

“Yes, those were beautiful days”.

Awani’s thoughts again went few days back in time...

“Annu, if I would have been aware of all this  ... this Infosys job of yours, your civil service preparations... then I might have never allowed you to go to Hyderabad or anywhere else”, her Father said.




This is my entry for the HarperCollins–IndiBlogger Get Published contest, which is run with inputs from Yashodhara Lal andHarperCollins India.


Saturday, 29 December 2012

वो मर गई

वो मर गई .. पर हम औरतों को  बता गई कि  लड़की होना सचमुच  गुनाह है .

वो मर गई पर हमें सिखा  और समझा गई कि  बेटियाँ क्यों पैदा ना होने पाएं ..

वो मर गई पर हमें आईने में अपनी सूरत दिखा गई कि  हमारी आँखों का पानी मर गया है  .. हमारी आत्माएं मर गई है, सड़  चुकी हैं ..

वो मर गई, उसकी आत्मा को मुक्ति मिल गई .. पर हमसे सवाल करके गई कि  सड़कों पर चीखने और संसद में रोने के अलावा  हमने क्या किया है और क्या कर लेंगे ..?? 

वो मर गई क्योंकि बड़े बड़े दावे करने वाला हमारा मुल्क, अपनी बेटियों  को ओढने के लिए  इज्ज़त का कफ़न और दफ़न होने के लिए ज़मीन का टुकड़ा भी नहीं दे सकता है .. दे सकता है तो सिर्फ टुकडो टुकडो में मौत .. बेपनाह दर्द,  तकलीफ, अपमान और किसी वहशी  इंसान के ज़ुल्मों से तय हुई मौत ..

कोई जवाब दे मुझे कि  क्या यही नसीब लिखा कर लाइ हैं इस देश की बेटियाँ ????

वो मर गई .. क्योंकि इस देश का पौरुष और संवेदना मर गई है .. क्योंकि हम ना इंसान हैं ना जानवर ..हम तो सिर्फ बेजान पुतलों का देश है ..

क्योंकि यहाँ का निजाम बहरा और बेबस है .. क्योंकि हमारी व्यवस्था सड  गई है ..  क्योंकि ये ठन्डे सख्त पत्थरों का मुल्क है ..इसलिए यहाँ बेटियाँ हर दुसरे दिन अखबारों में मरी हुई नज़र आती है .. उन्हें मारा  जाता है या कभी जिंदा रखा जाता है कि  दुनिया देखे और सबक ले कि  लड़की के रूप में पैदा होने पर आपके साथ क्या कुछ हो सकता है .. 

वो मरी नहीं .. उसे मार दिया गया .. उससे जीने का हक़ छीना गया .. और भी ना जाने कितनों से छीना जा रहा है ..

हर रोज़ अखबारों में टीवी पर खबरें आती है और हर बार मेरा दिल दहल जाता है .. मेरी साँसे रुक जाती हैं ये सोच कर कि  मैं भी एक औरत हूँ और क्यों हूँ .. अगर हूँ भी तो इस धरती पर क्यों हूँ ??? कोई जवाब दे मुझे ........................

 हर रोज़ जब मैं घर से बाहर निकलती हूँ  तब हर अजनबी चेहरा मुझे डराता है .. 

मुझे डर  लगता है ये सोच कर कि  मैं एक ऐसे वक़्त और समाज में रहती हूँ  जहां जीती जागती  औरत के  शरीर और एक मुर्दे के शरीर में कोई फर्क नहीं किया जाता .. ज़ुल्म करने वालों की आत्मा नहीं कांपती .. उनको किसी औरत ने जन्म नहीं दिया है ..

क्या हम उस दिन जागेंगे जब बेटियाँ पैदा होना ही बंद हो जायेंगी ..


क़यामत जिस भी दिन होगी .. उस दिन खुदा  हमसे सवाल ज़रूर करेगा ,,पर क्या हम उस दिन जवाब दे पायेंगे ..????

वो मर गई और हर रोज़ एक बच्ची आपके और मेरे पड़ोस में मर रही है .. कोई उसे टुकडो टुकडो में मार रहा है .. पर हम अभी जिंदा है .. पर अभी ये साबित होना बाकी है कि  हम सचमुच जिंदा है ...  और ये कि  अन्दर का इंसान अभी जिंदा है  ... और ये भी कि  अभी भी दूसरों का दर्द देख कर हमारी आँखों से पानी बहता है ... 

कोई मुझे जवाब दे ??????


जो जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना चाहिए ...

Wednesday, 19 December 2012

मुझे डर लग रहा है


वो ICU  से बाहर निकल आई .. वहाँ का माहौल अच्छा नहीं लग रहा था .. मद्धिम रौशनी में सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। उसने देखा डॉक्टर्स और नर्स बिस्तर पर लेटे हुए  मरीज को पता नहीं क्या क्या ट्रीटमेंट  दे रहे थे। पर उस शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी .. लेकिन डॉक्टर्स पूरी मेहनत  कर रहे थे .. उसमे जान डालने की, उसे जिलाए रखने की और शायद उसे बोलने के काबिल बनाने की भी। पर उस से ये सब देखा नहीं गया .. एक  ज़ख़्मी और बीमार शरीर पर दवाइयां और जीवन रक्षक उपकरण अपना काम कर रहे थे।

वो बाहर आ गई .. ताज़ी हवा में सांस ली .. उसे महसूस हुआ कि  अब वो थकी हुई नहीं है और कल रात वाला दर्द और गले से लेकर सारे शरीर में फैलती कैक्टस जैसी तीखी बैचेनी और तकलीफ  भी नहीं है .. शायद ये अच्छी  नींद का असर है  .. उसने  सोचा .. फिर बरामदे में चली आई .. 

"माँ और पापा कहाँ है?"  

फिर नज़र पड़ी .. पापा एक बेंच पर बैठे थे .. एक सपाट भावशून्य चेहरा, जाने कहाँ देखती आँखें और उनसे रुक रुक कर बहते आंसू .. वो डर  गई .. 

"पापा .. पापा ... " उसने आवाज़ दी "माँ कहाँ है, दिख नहीं रही?"  कोई जवाब नहीं मिला .. उसे और डर  लगा,  उसने पापा का कन्धा हिलाया धीरे से पर कोई हरकत नहीं कोई जवाब नहीं .. अब उस से बर्दाश्त नहीं हो रहा .. इधर उधर देखने लगी, ढूँढने लगी .. माँ  कहाँ है .. पर किसी ने कुछ नहीं बताया जैसे किसी ने सुना ही नहीं .. बरामदे में अजीब पीली रौशनी है, सब कुछ धुंधला और उदासी में डूबा लग रहा है ... अब उस से खडा नहीं रहा गया .. बैठ गई पापा के पास उनका हाथ धीरे से पकड़ लिया .. 

फिर एक बार कहा " मुझे डर  लग रहा है .. मम्मी को बुला दो, कहीं नहीं दिख रही।"   

तभी भाई को आता देखा, वो सीधा ICU चला गया . उसे कुछ हिम्मत बंधी वो भी पीछे पीछे गई .. भाई डॉक्टर से बात कर रहा है .. रो रहा था ..

"क्या हुआ .. माँ कहाँ है , कुछ बोलता क्यों नहीं ...?" वो भाई  के सामने खड़ी  थी पर वो डॉक्टर्स की बात सुन रहा था।  

 उसने  देखा कि डॉक्टर अब सारे जीवन रक्षक उपकरण हटा रहे हैं ..नर्स सफ़ेद चादर से मरीज़ को  ठीक से ढक  रही है .. उसने पास जाकर देखने की सोची .. नर्स अब बस चेहरा भी ढकने वाली थी जब उसने देखा .. आँखें बंद जैसे कोई चैन से  सोया हो ..एक थका हुआ .. पीला कमज़ोर चेहरा। वो हट गई ..वापिस बाहर आ गई .. फिर से पापा के पास बैठने ही वाली थी कि  किसी ने उसका हाथ पकड़ा और ले जाने लगा .. कौन है, कहाँ ले जा रहा है .. उसने पूछना चाहा पर किसी ने जवाब नहीं दिया बस उसका हाथ पकडे ले जाता गया .. 


और उस पर फिर से गहरी  नींद और बेहोशी तारी होने लगी। कुछ याद नहीं रहा उसके बाद।     

आँख खुली ..चारों तरफ रौशनी है, सफ़ेद और पारदर्शी ...  बहुत सारे लोग हैं .. औरत, मर्द, बच्चे .. अलग अलग  उम्र और रंग रूप के ..सब खड़े हैं .. उसे साथ लाने वाला  अब पता नहीं कहाँ है।  पता नहीं क्या हो रहा है .. तभी उसने महसूस किया कि आस पास खड़े लोग उसे घूर रहे हैं ऐसे देख रहे हैं जैसे कुछ बहुत अजीब हो .. उसकी कुछ समझ में नहीं आया .. तभी नज़र पड़ी सामने लगे किसी आईने पर .. उसने देखा खुद को उस आईने में ...

एक कटा फटा शरीर .. क्षत विक्षत अंग .. जगह जगह लगी चोटें और घाव जिनसे बहता खून .. चेहरा बिगड़ गया था क्योंकि उस पर कई ज़ख्म थे। टांगों पर ऊपर से नीचे तक  जगह जगह कटने के निशान  थे कहीं कहीं तो मांस बाहर निकल आया था। बाकी शरीर की हालत भी कमोबेश ऐसी ही थी।  सर से पैर तक काली  स्याह रंगत थी उसके शरीर की .. और वो खून जो लगातार  ज़ख्मों से बह रहा था उसका कुछ गन्दा सा लाल और काला  रंग उसे और भी ज्यादा भयानक और बदसूरत बना रहा था।   

वो आगे कुछ देख ना सकी .. बीती रात याद आ गई और वो चीख कर धम्म से  नीचे बैठ गई ..बदहवास, बेबस और बेजान .. 

उसकी चीख सुन कर उस शांत माहौल में भी हलचल हुई  और फिर किसी ने ऊँची लेकिन बेहद सर्द और संजीदा  आवाज़ में कहा ..
"इसे ले जाओ और वहाँ बाकी सबके साथ रखो .. इसकी आत्मा पर लगे दागों और ज़ख्मों को मिटाने में बहुत वक़्त लगेगा .. इसके लिए एक नया साफ़ सुथरा और स्वच्छ शरीर मिलने में अभी वक़्त लगेगा।  .. अभी बहुत वक़्त लगेगा तब तक इसे यहीं रखो फिलहाल इस आत्मा के लिए कोई शरीर, कोई ठिकाना  मेरी बनाई धरती पर मयस्सर ना होगा। " 

उसने सुना, सर झुकाए वहीँ बैठी रही .. कोई आया और फिर से उसे कहीं  ले जाने लगा .. और वो चलती गई ..