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Monday, 24 February 2020

उस पार ---3

लड़की एक  बार फिर से उसी  झील के किनारे बैठी है।  पानी में पैर  डुबोने  और छप  छप करें , का ख्याल आया लेकिन गंदले और काई जमे किनारे ने उसे दूर से ही छिटका दिया। पानी अब बहुत दूर तक खिसक गया था , झील के किनारे वाला हिस्सा सूख गया लगता है।  अब इसे  झील तो नहीं तालाब जैसा कुछ मान लें ऐसा ख्याल आया उसके मन में। उसका मन जो अब समय की धुरी पर चारों दिशाओं और चौदह भुवन को देख आया है ; उस मन में अब कोई कविता या संगीत नहीं उपज रहा।  बस केवल कुछ परिचित कुछ जाना पहचाना  चिन्ह दिख जाए तो यहां आने का सुकून  पूरा हो जाए।

'खरगोश अभी तक नहीं दिखा' , एक सवाल आकर टंग  गया हवा में।

"ऐसे उजाड़, सूखे में कौनसा खरगोश रह सकता है ?"  चौदह भुवन में से किसी एक भुवन ने उत्तर दिया।  
उसने खुद को देखा या हाथ लगा कर खुद को महसूस किया।   रूखे  टूटे बाल जो कंधे से नीचे तिनकों की तरह झूल रहे थे। चेहरे पर जगह जगह सूखा खुरदुरापन  महसूस हुआ।  फिर हाथ भींच कर उसने आस पास नज़र घुमाई।  वो जादू, वो रहस्य से भरे नज़ारे जो उसने देखे थे  इस जगह पर; कुछ नहीं था।  सूखी कांटे वाली झाड़ियाँ थीं,  पेड़ कहीं इधर उधर अकेले खड़े जैसे सोचते हों कि आखिर कौन उन्हें यहां छोड़ गया  और लेने कब आएगा ? कोई फूल पत्ता , हरी टहनियां और झुकी हुई डालियाँ  .....  यह सब कविता अब  यहां क्यों नहीं दिखती ?  

"खरगोश नहीं हैं क्या ?" 
"नहीं हैं। " फिर से किसी भुवन या दिशा  ने जवाब दिया  स्पष्ट ही सुनाई दिया उसे. उसे जिसका नाम शायद ,,,,, 

किसी के चलने  और धीरे धीरे पैर  रखने की आहट  है , शायद खरगोश !!! उसने पीछे मुड़  कर देखा, वही लड़का  वहाँ खड़ा है,  जहां तब पहली बार उसे आता देखा था। एक पहचानी हुई सूरत देख कर इंसान खुश हो जाता है या दुखी होता है या अपने में ही सिमटने की कोशिश करने लगता है ?? यह प्रश्न जगा।  

"तुम, जून ; तुम यहां वापिस कब आईं ?"
"क्यों नहीं आ सकती क्या ?"
"ऐसा कब कहा ?"
"पर इतने दिन तुम कहाँ थीं ?"
"मैं, मैं ... वहाँ उस पार से आगे , वहाँ ,,,,,"
जवाब अधूरा ही रहा।  वो तीर तीक्ष्ण दृष्टि जिसने कभी आगे बढ़ते पैरों के आवेग को रोक दिया था , वो दृष्टि अब झुकी हुई थी। 
"तुम कहाँ थीं ?" 
"तुम, तुम इतने दिन क्या करते रहे ?" पलट कर सवाल आया।  तीक्षणता  आसानी से जाती नहीं; यही तो धागा है जोड़े रखने का।  इस प्रतिप्रश्न ने पुराने उल्लास को जगा दिया।  
"मैं बहुत बहुत से कामों में उलझा था।  मुझे बहुत कुछ करना था। जाना था और पहाड़ पार करने थे।" लड़के का मन जाग उठा , हर वो बात बताने को जिसका कोई श्रोता अभी तक नहीं मिला है।  
"अच्छा, मुझे भी बहुत कुछ करना था। मैंने नदियां और समंदर पार किये। ये पेड़ कहाँ गए और वो खरगोश और वो फूल, वो झील का पानी ??? वो डालियाँ जिन पर मैंने झूला लगाया था। " लड़की ने कहीं दूर पहाड़ पर नज़र टिकाते कहा।  
"बहुत दिन हुए बरसात नहीं हुई। और पेड़ हमने काट दिए। "  क्या बस इतना ही  कहना है इसे , क्या यह मुझसे नहीं पूछेगी कि मैं कहाँ गया था और मैंने क्या देखा ? क्या वो अभी भी उस फूल को जो  झील में से निकाला था उसे याद कर रही है; यह सब ख्याल लड़के के मन में तैरने लगे.  
"क्यों !!!!" एक संवेग जगा लड़की के अंदर।  
"पहाड़ पर लकड़ी चाहिए  आग जलाने के लिए। " बेहद सपाट जवाब दिया उस लड़के ने। 
"आग तो हर जगह जल रही है।"
"तुमने फिर से उलझी हुई बातें करनी शुरू कर दी।  "
  " तुम यहां दुबारा कभी नहीं आये थे ?" 
"आता था, कभी कभी लकड़ियां काटने।   

लड़की ने उसकी तरफ अजब निगाह से देखा ; और आज पहली बार लड़के ने उसकी आँखों में देखने की कोशिश की. वहाँ अनसुने सवाल थे , आँखों के परदे के पीछे छिपे जवाब थे ; ना सुनी गई ख्वाहिशे और इच्छाएं थीं ; कामनाएं और  लालसाएं  जहां सो रही थीं गहरी नींद में।  इतना कुछ था वहाँ पर पहले कभी देखा नहीं।  अचानक लड़के को कुछ महसूस हुआ, उसे समझ आया कि अब कोई उलझन या दुविधा नहीं है ; यह उलझनें जिस अलबेले समय की थीं वो समय कब का बीत गया।  उसने ये भी जाना  कि अब वो लड़की महज वो अल्हड फूलों की बेल नहीं है जिसने उसने उस दिन देखा था , जिसके साथ झील के किनारे बैठ कर फूलों का संसार देखा था।  अब वो एक अलग दुनिया  लेकर आई है जिसमे उस लड़की के चेहरे के पीछे से एक औरत झाँक रही है।  लेकिन फिर ये और जाना कि अब  वो खुद भी बदल गया है,;  आश्चर्य और आवेगों का उसका वक़्त  भी गुजर गया है , अब उसमे बर्दाश्त और समझ आ गई है। अचानक उसने खुद से कहा ; 'अब तुम मुझे बहला नहीं सकोगी , अब मैं नाम चेहरे और रूप की दुनिया देख चुका। ' 
जो पता नहीं कहाँ से और कहाँ आगे जायेंगे 
एक सम्पूर्ण संसार बस गया उस एक निमिष में उन दोनों  के बीच।  समय का पहिया एक क्षणांश के लिए शायद थमा , कुछ देखा और फिर चल पड़ा , अनवरत अनंत की तरफ।  उस चलने को लड़की ने जान लिया।  

"अब मैं जाऊं ?"
"नहीं रुको,. " यह आदेश का स्वर था  जो पहली बार इस कायनात ने सुना  था।  एक मजबूत हड्डियों वाला हाथ आगे बढ़ा और उसने उस दुसरे उतने ही मजबूत लेकिन कोमल नसों वाले हाथ को थामा। 
लेकिन वो रुकी नहीं, रोक सकने  जितनी ताकत अभी उस हाथ में नहीं आई थी। लड़की को पता था कि इस मजबूत हाथ की ताकत  कितनी दूर कितने पास तक जा सकती है, इसलिए निश्चिन्त होकर  चलती गई एक नामालूम दिशा में।  एक पेड़ था उस चलने की दिशा में; कुछ पत्ते, टहनियों और सूखी डालियों को समेटे हुए।  वो बैठ गई वहाँ एक पत्थर पर; उस पेड़ के आस पास अब सिर्फ पत्थर थे जिनको शायद बैठने की गरज से ही वहाँ होना था।  एक फ्रेम था , जिसमे पत्थर हैं, पेड़ की सूखी झुर्रियों वाली डालियाँ हैं और पेड़ के नीचे  बैठे ये  मुसाफिर ; जो कहीं दूर रास्ते से आये हैं और अब किसी दूर देस को जायेंगे। यह सब समय का  एक फ्रेम था,  जिसमे ये सारे तय किरदार थे अपनी अपनी लाइन्स भूले हुए।

लड़की अभी भी सोच रही है कि यहां  क्यों  आ बैठी हूँ ? चली ही जाऊं ! और ये लड़का अब इतना अजनबी क्यों लग रहा है,  इसे अब चले ही  जाना चाहिए ; शायद इसके जाने के बाद मैं फिर से वो ढूंढ  सकूँ जिसके लिए यहां आई हूँ ? पर क्या ढूंढने आई हूँ ?  
'वो हंसी , वो फूलों की महक और सिंगार ; झील के पानी का जादू और उस पानी का ठंडा नशा जो चमड़ी को भेदता अंदर हड्डियों तक को भिगो देता है। ' फिर से कोई दिशा उसके पास आकर बुदबुदाई।  

"यहां, वो झुरमुट होते थे न, जिनमे खरगोश रहते थे।" 
" पता नहीं, मैंने तो  पहले भी कभी देखे नहीं थे। " लड़का अब थकने और ऊबने लगा था. क्यों बैठा है यहां ? ये कौन है जिसके लिए एक बार फिर  छलावे के फर्श पर चल रहा हूँ मैं ?

"वहाँ पहाड़ के पार एक झील है, वहाँ सुना है खरगोश भी हैं और वो सब फूल वगैरह भी. तुम वहाँ चली जाओ।"
पर लड़की  ने शायद सुना नहीं, वो कुछ बोल रही थी, " वो जादू, वो रंगीन नज़ारा ; वही सब देखने तो आई थी। नदी के इस पार ये था और उस पार मैं थी। तुमने पहाड़ के पार क्या देखा ? बताओ ?"  

और एक थकी निराश  जिज्ञासा ने  सिलसिला जगा दिया  किस्से और कहानी का। वक़्त का पैमाना रेत  गिराता  रहा,  कब फिर से हाथ  की अंगुलियां कंकड़ों से उलझती खुद में उलझीं ये सिर्फ वक़्त के कतरे ने देखा।  और शायद झील के किनारों ने भी देखा।  उन पथरीले किनारों ने फिर से पानी को आवाज़ दी। और देखते देखते एक रहस्य उस झील के भीतर से निकल  किनारों तक पहुँचने लगा।  लड़की के नज़र बेसाख्ता ही उस तरफ उठी और उसने पुकारा,

"अरे ये क्या है !!! देखो, क्या पानी बरसा है ? झील तो पानी से भरी दिख रही है !!!" लड़की के शरीर में जितना उत्साह और उल्लास का खून था वो सब इस वक़्त उसकी साँसों में भरा भाग रहा था।  

"कहाँ से आया पानी ?? तुम  फिर  से .."  लड़का अब की बार झुंझला गया।  मगर लड़की तो बगैर उसके जवाब  सुने दौड़ रही थी झील की तरफ, उसके ठन्डे पानी की छुअन की तरफ। 

"ये इतना पानी कहाँ से आया।  ये तो कब से सूखा ही पड़ा था ?"  संशय था, संदेह था और हैरानी की हद से भी ऊपर जाते सवाल थे लड़के के मन में।  उसके समझ में नहीं आता था कि  आखिर ये क्या गोरख धंधा है।  

"तुम कोई जादू मंत्र जानती हो क्या ? पिछली बार खरगोश थे , इस बार झील का पानी।  कौन हो, कहाँ से आई हो ?" 

"मैं, मैं तो उस पार ,,,,,,,,,,,,,," छप छप करते पैर थम गए। खिलखिलाहट लौट आई।  उपेक्षा लौट आई, बेपरवाही ने अपना चोला ओढ़ लिया। झील में  खूबसूरत फूल खिल रहे थे। 

"तुम, तुम जवाब दो ?" लड़के ने इस बार उस का हाथ ज़ोर से खींचा।  और उस सूखे उजाड़ बियाबान में पेड़ों पर डालियाँ फल रही थीं ,  लड़के के पैरों के नीचे नरम घास थी।  फूलों की बेलें महक रही थीं। 
लड़की ने मुस्कुरा कर ये सब देखा फिर मुड़ कर  लड़के की तरफ देखा।  जैसे पूछती हो,  तुम्हें रहस्य और जादू के संसार से इतनी हैरत क्यों है ??  इतने सवाल ही क्यों हैं, बस मान क्यों नहीं लेते कि  बस, ये है और यहां है।  

"मैं तुम्हारे लिए , उस दूर पहाड़ से बहती नदी के साथ आई  हूँ। चलो तुम्हें अब खरगोश दिखाऊं। " 

लड़के के माथे पर पानी की बूँदें थीं, उसकी सांस में तेजी और दिल में हज़ार बातें थी। मगर वहाँ  किसे परवाह थी;  उसका हाथ एक नर्म  हथेली ने थाम रखा था जिसमे गर्माहट थी एक पुराने परिचय की।  और वो दोनों चल रहे थे, उस  अनजानी  दिशा  और उस अनदेखे भुवन की तरफ।   

किसी ने पुकारा, आवाज़ दी।  लड़के के पैर  थमे , यह एक पहचानी आवाज़ का संकेत था।  कोई बुला रहा है उसे।  उसने लड़की की तरफ देखा और उसकी हथेली को कस के थामा  पर इतने में फूलों की वो बेल उसके ठन्डे हाथों से फिसलने  लगी।

"कहाँ जा रही हो ? रुको !!! "  

"वीरेन , क्या आज  भी  हम घूमने नहीं जाएंगे ? चलो ना, देखो हलकी हलकी बारिश हो रही है। "  और  वीरेन को किसी ने जगाया है।  

"तुम कब सोये ? उठो " 


Thursday, 29 December 2011

उस पार --1

वो झील के किनारे बैठी थी. उसके पैर एडियों  तक पानी में डूबे हुए  थे और  उसके लम्बे रेशमी  बाल  उसकी पीठ पर बिखरे थे और ज़मीन को छू रहे थे. उसने एक लम्बा सा  फ्रौक पहन रखा था जिस पर नीले, सफ़ेद और पीले रंग ऐसे लग रहे थे जैसे किसी चित्रकार ने यूँ ही ब्रश चलाया हो.. उसके चेहरे पर एक  मुस्कराहट थी और वो अपने ही जाने कौनसे  ख्यालों में खोई हुई थी.  उसकी आँखें अपने आस पास के वातावरण की हर चीज़ को एक आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी के साथ देख रही थी, जैसे उस खूबसूरत, शांत और अनछुए कुदरत के नजारों को अपनी आँखों में क़ैद करती जा रही हो...उस वक़्त उसे सिवाय उन नजारों के और किसी चीज़ का शायद ही कुछ ध्यान रहा होगा..अचानक उसे अपने हथेली के पास  कुछ गुदगुदी सी महसूस हुई, उसने देखा एक मखमल सा सफ़ेद खरगोश उसके हाथ के पास अपनी छोटी सी नाक से ज़मीन रगड़ रहा था..उसे हंसी आई, जैसे कोई छोटा बच्चा हंसा हो ...

उसने एकदम से बढ़कर खरगोश को पकड़ने की कोशिश की..पर ये क्या, वो तो एक ही क्षण में  जाने कितनी दूर तक दौड़ गया..वो भी उसके पीछे भागी ..और फिर एक झाडी से दूसरी झाडी के पीछे, एक पेड़ से दूसरे पेड़ की तरफ, एक कोने से दूसरे तक..वो खरगोश के पीछे दौड़ती रही कि शायद पकड़ में आ जाए..उसकी साँसे तेज़ हो रही थीं पर उसकी हंसी पूरे माहौल में गूँज रही थी ..अचानक उसने कुछ महसूस  किया, वो रुक गई, पीछे मुड़ी, उस दिशा में देखने के लिए, जिसने अचानक उसके खेल में विघ्न डाल दिया था.. 

वहाँ एक लड़का खड़ा था, उसे अजीब सी निगाहों से देखता हुआ, जैसे किसी अनिश्चय में डूबा हुआ...उसने भी लड़के को देखा..सर से पैर तक ..उसकी निगाहों में एक कठोरता थी ..एक उपेक्षा, लापरवाही और थोडा सा गुस्सा भी ..जाने कितने सवाल थे उन आँखों में..शायद पूछना चाह रही थीं, " कौन हो तुम और किसकी इज़ाज़त से यहाँ तक चले आये हो?" पर फिर वो बिना कुछ कहे चुपचाप मुड गई , जिस तरफ से आई थी , उसी तरफ वापिस चली गई.. लड़का अभी भी उसे घूर  रहा था और फिर  कुछ सोच कर वो उसके पीछे चलने लगा..

"कौन हो तुम?" उस लड़के ने पूछा.

लड़की ने एक बार फिर  उसकी तरफ तीखी नज़रों से देखा जैसे कह रही हो, " तुम कौन होते हो पूछने वाले या क्यों पूछ रहे हो?" 
एक बार फिर से उसकी आँखें उस खरगोश को तलाशने लगीं जो अब पता नहीं कहाँ खो गया था और  कहीं भी  नहीं दिख रहा था..वो चुपचाप फिर से झील की  तरफ चली गई और वहीँ उसी जगह जाकर बैठ गई. उसका प्रतिबिम्ब पानी में झिलमिला रहा था और वो उसे देखे जा रही थी या शायद उसमे कुछ तलाश रही थी ..कहा नहीं जा सकता. 

लड़का भी अब तक उसके पास पहुँच चुका था. उसने पानी में  लड़की के प्रतिबिम्ब को देखते हुए  धीरे से पूछा, "क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ?"  वो इतना नज़दीक खडा था कि अब उसका प्रतिबिम्ब भी पानी में  दिखाई देने लगा था, बिल्कुल लड़की के प्रतिबिम्ब के पास..उन दोनों की परछाइयां  झील की शांत और पारदर्शी  सतह  पर  एक-दूसरे में घुल मिलकर एक अलग ही तस्वीर बना रही थीं. 

"कौन हो तुम?"  सवाल दोहराया गया लेकिन लड़की ने एक बार फिर  इसे उपेक्षित कर दिया और पलट कर प्रति प्रश्न किया..

"तुम कहाँ से  आये हो?"
वो मुस्कुराया, " उस पार से.."

" उस पार..!! कहाँ  से.." निश्चित रूप से इस जवाब ने लड़की की जिज्ञासा बढ़ा दी.
"पहाड़ के उस पार से.." उसने थोड़ी दूर एक पहाड़ की तरफ अपनी ऊँगली से इशारा करके बताया. वो अब तक उसकी इस  दिलचस्पी को  समझ गया था. लड़की ने उस दिशा में देखा और दूसरा  सवाल किया, " क्या तुम यहाँ अक्सर आते हो?" 

"नहीं ज्यादा नहीं, सिर्फ कभी कभार, लेकिन कभी किसी को यहाँ नहीं देखा इसलिए तुमको देख कर कुछ हैरानी सी हुई."

"वैसे तुम कहाँ से आई हो?" अब पूछने की बारी लड़के की थी.

"उस पार से". 
वही जवाब उसे भी मिला और फिर उसने भी वही सवाल लड़की की तरफ दोहराया...

"नदी के उस पार से,"  अबकी बार लड़की ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
"लेकिन मैंने तो यहाँ कभी कोई  नदी नहीं देखी."

"क्योंकि तुमने कभी देखने की कोशिश नहीं की". 
"अच्छा.." अब हंसने की बारी लड़के की थी.

थोड़ी देर बाद लड़की के पैर पानी में छप छप कर रहे थे..

"तुम्हारा नाम क्या है?" लड़के ने पूछा.

"क्या उस से कुछ फर्क पड़ता है?" वो एक बार फिर हंसी.  फिर उसने  पूछा,  "अच्छा, पहाड़ के उस पार कैसी  दुनिया है?  मैं कभी वहाँ नहीं गई."

लड़के ने धीरे धीरे बताना शुरू किया, और इस तरह उन दोनों के बीच बातों का सिलसिला चल निकला...और यूँ ही चलता चला गया जाने कब तक, वहीँ झील के किनारे बैठे .. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि दोनों अजनबी हैं और अभी कुछ देर पहले ही मिले हैं...ऐसा लग रहा था जैसे दो पुराने दोस्त एक लम्बे अंतराल के बाद मिल रहे हों ..  समय के कांटे भी  जैसे कहीं रुक गए, सुस्ताने लगे,  उनकी बातें सुनने लगे...अचानक लड़की बातें करते करते रुक गई जैसे किसी चीज़ ने बेसाख्ता उसका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया हो..उसने लड़के की तरफ कुछ झिझकते हुए देखा..उसने समझा, और पूछा, "क्या हुआ?"

"मुझे वो फूल चाहिए." लड़की ने उंगली से इशारा करके बताया...वहाँ झील में फूल था..पूरा खिला हुआ, थोडा गुलाबी,  थोडा किनारों पर सफ़ेद और थोडा सा कुछ और हरे भूरे रंगों का मिश्रण.. फूल झील के किनारे से थोडा दूर था, वहाँ तक पहुंचना  ज़रा मुश्किल सा था..

"वो तो काफी दूर है, और कुछ है भी नहीं कि वहाँ तक जाया जा सके.."  लड़के ने थोडा परेशान होते हुए समझाना चाहा.. पर लड़की इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई. लेकिन उसने आगे कुछ  न कहा न पूछा पर उसका चेहरा कुछ नहीं, बहुत कुछ कहता हुआ सा लग रहा था..लड़के ने देखा , कुछ समझा  और कुछ महसूस किया..फिर कहा..

"तुम वो फूल क्यों नहीं ले लेतीं..वो भी तो बहुत सुन्दर हैं...हैं ना?"  उसने कुछ झाड़ियों की तरफ इशारा करते हुए कहा..और लगा जैसे कि लड़की को ये  सुझाव पसंद आ गया और वो तुरंत ही उन झाड़ियों की तरफ तेज़ कदमों से चली गई.. फिर जैसे उसे कोई नया ही खेल मिल गया ..उसने कुछ फूल डंठल समेत तोड़ लिए और कुछ को उनके डंठल और नरम छोटी पत्तियों समेत ....कुछ फूलों को उसने अपनी कलाई पर कंगन की तरह लपेट लिया, कुछ फूलों को कानों के बुन्दों की तरह सजा लिया और कुछ का एक हार बना कर गले में पहन लिया.. और अपने माथे पर फूलों का छोटा ताज भी सजा लिया..उसकी हंसी, खिलखिलाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी, एक पेड़ से दूसरे की तरफ जाती हुई, पेड़ों से लटकती  फूलों की लताओं से लिपटती हुई, उनमे खुद को उलझाती हुई..बस यहाँ से वहाँ..

वो उसे देख रहा था... आश्चर्यचकित और चमत्कृत सा, ..ये उसकी आँखों के सामने क्या है...ये कोई  लड़की है या फूलों की एक  बेल जो उस लड़की की तरह दिख रही है.. दोनों में अंतर करना मुश्किल लग रहा था..थोड़ी देर में लड़की का ध्यान उस पर गया, उसकी निगाहों पर गया...और उसने भी अपनी आँखें लड़के के चेहरे पर टिका दीं.. उसकी तेज़ नज़रें लड़के की आँखों के परदे को भेदते हुए उसके दिल और आत्मा तक पहुँच रही थीं..जैसे सब कुछ जाने ले रही हो, सब देख रही हों.. लड़के ने अपनी आँखें  झुका ली और बड़ी मुश्किल से बोला..

"तुम.. तुम बहुत..बहुत.."

"सुन्दर लग रही हूँ.." उसने वाक्य पूरा किया और फिर से एक खिलखिलाहट हवा में बिखर गई..

"हाँ बहुत सुन्दर.."

वो मुस्कुराई..और फिर अगले कुछ लम्हों तक खामोशी ही उन दोनों के बीच बातें करती रही..कुछ कहती रही और सुनती रही..ऐसा लगा जैसे सारा जहान..ये सारी कायनात, वक़्त के उस एक लम्हे पर आकर थम  गई हो..कुदरत की बनाई हर चीज़, हर रचना जैसे उस खामोशी से  सम्मोहित हो कर वहीँ रुक कर उन दोनों को देख रही थी..खामोशी के उस जादू में सिर्फ साँसों की आवाज़ ही हवाओं में प्रतिध्वनित हो रही थी..

अचानक एक तेज़ आवाज़ ने उस प्रवाह को तोड़ दिया..लड़का तुरंत मुड़ा और उस दिशा में देखने लगा जहाँ  से आवाज़ आई थी.. "मुझे बुला रहे हैं, मुझे जाना होगा.." उसने धीमी आवाज़ में कहा..लड़की चुप रही, बगैर एक भी शब्द बोले..

"मुझे जाना है.."

वो वैसी ही खामोश रही, उसकी आँखें अब किसी शून्य में खो गईं सी लगती थीं...

वो कुछ देर, कुछ क्षण वहाँ खड़ा रहा, इतनी देर में वो तेज़ आवाज़ फिर से गूंजी..लड़का अब उस आवाज़ की दिशा में दौड़ चला..लेकिन फिर जैसे कुछ याद आया और फिर एक पल के लिए रुका और चिल्लाया.. 

"तुमने मुझे अभी तक अपना नाम नहीं बताया..?"

"जून ..मेरा नाम जून है.."

"जून.. अजीब नाम है.." लड़के ने अपने आप से कहा और फिर चला गया. लड़की अब उस दिशा में देखने लगी जहाँ वो भागता हुआ  गया और फिर कहीं खो गया. अगले कुछ क्षणों तक वो वहीँ खड़ी रही, निरुद्देश्य सी और फिर धीरे धीरे पेड़ों की तरफ वापिस चली गई. वो सोच रही थी.. समझ नहीं पा रही थी.. 
"क्या मैं दुखी हूँ..क्या कुछ कमी सी है, क्या मुझे उसकी कमी महसूस हो रही है..क्या मैं..???















Saturday, 15 October 2011

कभी कभी खामोशी भी बोलती है



खामोशियों के बंद दरवाजे जिस आँगन में खुलते हैं वहाँ समय और गति के सारे समीकरण अपना अर्थ खो बैठे हैं ..यहाँ एक ऐसा ब्लैक होल है जहां आकाश और धरती के बीच का अंतर, दूरी सब मिट गए हैं..यहाँ क्षितिज की रेखाएं दिखाई नहीं देती,  उनके होने का कोई भ्रम भी नहीं होता  ..यहाँ कोई आकार, कोई साइज़ या रंग-रूप भी नहीं दिखता, यहाँ ना कोई काला रंग है और ना कोई gray shade  ...


खामोशी का भी अपना एक  संसार होता है..एक समंदर की तरह है खामोशी ..आवाजों का, प्रतिक्रियाओं का, ख्यालों  का, नींदों का,  खुली आँखों का भी ... एक गहरा समंदर, जिसकी पहरेदारी करते हैं ये दरवाजे जो दिखते भी नहीं पर फिर भी जैसे  किसी सख्त चट्टान की तरह खड़े हैं ..रास्ता रोके हर बाहरी चीज़ का ..खामोशी के ये दरवाजे दिखते भले ही ना हो पर उनकी मौजूदगी बड़ी तीखी -चुभती हुई सी होती है ..जैसे किसी कैक्टस  के कांटे या टूटे कांच की किरचें तकलीफ देती हैं  कुछ वैसे ही..

लोगों को ख़ामोशी में भी संगीत सुनाई  देता है, लय ताल और शब्द का नाद ..और ऐसा होता भी है. खामोशी की अपनी भाषा, अपने संकेत और उनको प्रेषित करने के अपने माध्यम भी होते हैं.  उसकी बेआवाज़ लय ताल में ज़िन्दगी के सुर मिलते हुए और उस चुप्पी को तोड़ते हुए से लगते हैं...कह लो कि इस चुप को ज़िन्दगी के शोर में खो जाने दो, इस तरह कि उसके होने का पता भी ना पड़े...पर क्या सचमुच ऐसा हो पाता है , होता है  या होने का अहसास भी होता है. ???


कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है ..लेकिन छुप के इस दिल में तन्हाई पलती है..." फिल्म का गाना है पर इस situation के लिए एकदम मौजूं है. दुनिया के रंग में खुद को रंगते, उसके साथ गाते-गुनगुनाते, हँसते रोते, कहते -सुनते , उसके साथ कदम-ताल करते हुए भी ऐसा लगता है कि जैसे दोनों हाथ और दिल-दिमाग के कुछ कोने खाली हैं. 

इन दरवाजों के पीछे किसी के सांस लेने की आवाज़ सुनाई देती है...किसी के चलने की, कुछ स्पंदन ..जिनसे पता चलता है कि खामोशी के इस दरवाज़े के पार अभी भी कुछ जीवन शेष है ...लेकिन ये आवाज़ बहुत धीमी है ..इसके होने का अहसास भी मुश्किल से ही होता है ...ज्यादातर तो होता ही नहीं...ऐसे में किसी को इन दरवाजों के होने या ना होने के बारे में पता भी नहीं.. और कब उसके दरवाजे, बाहर की  आवाजों के लिए  बंद हो जाते हैं, पता भी नहीं चलता.  तब ना दिखने वाला एक लौह-आवरण बन जाता है,  जो दरवाजों  के चारों ओर की परिधि बन जाता है. तब परिधि के बाहर का शोर, उसकी सुर ताल, संगीत कुछ भी अन्दर नहीं पहुंचता. पहुँच भी जाए तो जैसे ठहरे पानी  में किसी ने एक मामूली कंकड़ उठा के फेंक दिया और कुछ देर के लिए उस पानी में लहरें बन जाएँ...बस कुछ कुछ वैसा ही  और उतना ही असर बना पाता  है.


इन दरवाजों की चाबी कहीं खो गई है या ये इनके ताले बिना चाबियों के ही बनाए गए, ये कह पाना अब मुश्किल है  ...बहुत से लोग आये अपनी - अपनी चाबियाँ लेकर..अलग अलग किस्म की रंग-बिरंगी और सुन्दर चाबिया लेकर..लेकिन दरवाजों ने खुलने से मना कर दिया ..तालों ने उन चाबियों को स्वीकार नहीं किया..शायद उन्हें किसी ख़ास customized, tailor-made, specific चाबी का इंतज़ार है ..खामोशी के ये बंद दरवाज़े खुलने में अभी और वक़्त लगेगा क्योंकि शायद  इसकी चाबियाँ अभी बनी ही नहीं है..या शायद ये कभी भी ना खुलें ..क्योंकि ऐसा कोई खजाना इनके पीछे नहीं छिपा कि जिसके लिए कोई कोलंबस दुनिया छानने के लिए निकल पड़े (या शायद ये एक गलत तुलना है..मेरे ख्याल से मैं यहाँ confuse  हूँ ...)


फिर एक और ख्याल भी आता है कि  जब ये दरवाजे खुलेंगे तो जो हरहराता समंदर अभी तक दरवाजे के पीछे रुका हुआ है वो पूरी  ताकत के साथ बह निकलेगा  और उसके साथ कौन और क्या बह जाएगा ये तो अभी सिर्फ सोचने और कल्पना करने की ही बात है..दरवाजे खुलते नहीं इसलिए कि  कोई इनको खोलना  नहीं चाहता.  दरवाजे खुलते नहीं क्योंकि कोई बहुत कोशिश कर रहा है...दरवाजे के key  combination  को सुलझाने की मगर वो के,  वो जवाब कहीं मिल नहीं रहा.  दरवाजे बंद हैं ..क्योंकि उसके पीछे जो धीमा सा स्पन्दन है , वो खुद ही उस खामोशी से डरा हुआ है ..उसकी नज़र का क्षितिज किसी अनजाने कोने-किनारों से शुरू होकर कहीं बीच में ही खो जाता है  जैसे धुंए की लकीर खो जाती है हवा में....


इन दरवाजों को खुलना चाहिए, इन्हें बंद क्यों छोड़ दिया गया ..इस बात पर किसी ने गौर क्यों नहीं किया ? क्या अब ये बंद ही रहेंगे ? सुनते हैं कि दुनिया में हर ताले की एक चाबी ज़रूर होती है,  हर दरवाजे पर बाहर से एक बार ही सही किस्मत भी खुद आकार दस्तक ज़रूर देती है  तो ये दरवाजे भी तो इन नियमों के अपवाद नहीं होंगे???

इतना रहस्य क्यों है  इन दरवाजों के चारों ओर..जैसे किसी कोहरे में लिपटे...सफ़ेद रुई के फाहे जैसी धुंध..लगता है   कि  इस धुंध के पार,  इन दरवाजों के पार,  एक इन्द्रधनुष सी रंगीन, बादलों से भी हलकी, रजनीगन्धा की खुशबू से भी ज्यादा मदहोश कर दे जैसी एक दुनिया है...क्या सचमुच है..????
खामोशी के इन दरवाजों को खोलने के लिए किसी जादू या चमत्कार की ज़रुरत तो नहीं है. पर जो एक सीधी-सरल  चाबी चाहिए,  वो चाबी वक़्त ने बड़ी सावधानी से और समझदार से कहीं ऐसी जगह रख  दी है,  कि वहाँ पहुंचना  एवरेस्ट फतह करने के बराबर लग रहा है. जाने क्यों ये लगता है कि चाबी तो खुद ही सात तालों में बंद है फिर कैसे खुले ये दरवाजे..


सात तालों और सात दरवाजों ..सात घूँघट में छिपी हुई चाबी...

पर जो चाबी अगर मिल भी गई तो कौन  जाने कि वही असली चाबी है या असल की  एक  खूबसूरत, चालाक नक़ल भर नहीं है..इस मिलावट की  दुनिया में असल-नक़ल की परख कर सकें जैसी निगाहें अब रही नहीं..और दस्तक देने वाला कौन है , कौन नहीं, ये जान पाने की बुद्धि भी नहीं.