Thursday, 15 August 2013

चलो कही चलते हैं

ज़िन्दगी तू  मुझसे खफा और मैं तुझसे 

ज़िन्दगी तू मुझसे परेशान और मैं तुझसे 

ज़िन्दगी तुझे मैं नापसंद और मुझे तू पसंद नहीं 

ज़िन्दगी तू मेरी आकांक्षाओं, महत्वकांक्षाओ और सपनों से परेशान  और मैं तेरी लगाईं हुई बंदिशों से 

ज़िन्दगी मैं तुझसे थक गई हूँ और तू तो  जाने कब से मुझसे थक कर अपना हाथ छुड़ा चुकी है.

ज़िन्दगी  तू मेरी नित नई  इच्छाओं के कभी ना खुटने वाले खजाने से झुंझलाई हुई है और मैं तेरे मन के रीते हुए घड़े को देखकर रोये जाती हूँ.
ज़िन्दगी ना तूने मुझसे कुछ पाया और  ना मुझे कुछ दिया 

ज़िन्दगी  ना  जाने कैसे हर रोज़ हम एक दूसरे  का  साथ हँसते हँसते  निभाये जा रहे हैं 

ज़िन्दगी हर रोज़ तू उसी पुराने रास्ते पर मुझे उठाये ले चलती है और हर सुबह मैं एक नए रास्ते की तलाश में अलग अलग दिशाओं में भागती  जाती हूँ  … लौट आने के लिए उसी पुराने रास्ते पर.

ज़िन्दगी तू मुझसे खफा और मैं तुझसे  फिर भी हम चले जा रहे हैं एक साथ, एक ही रास्ते पर अलग अलग मंजिलों की तरफ  ….  जानते  हुए कि रास्ते का अंत नहीं और मंजिल का कोई नाम कोई ठिकाना नहीं फिर भी हम चले जाते हैं।


Friday, 19 July 2013

उस पार --- भाग 2

  हालांकि ये   स्थिति भी ज्यादा देर  तक  नहीं  ठहर सकी .. उसने  खुद को एकबारगी फिर से फूलों की टहनियों और उस खरगोश की तलाश में व्यस्त कर लिया। पर जाने क्यों वो उत्साह अब मंद पड़  गया था।  और तभी उसकी आँखें जा टिकीं उस "फूल" पर .. वही जो झील में था .. अब भी वहीँ था .. उसे वो फूल चाहिए था ..बस चाहिए था .. लेकिन कैसे मिले .. दूर था .. "उह्ह किसे परवाह है .. मुझे चाहिए बस " .. उसने सोचा। 

उसने यहाँ वहाँ देखना और  तलाशना शुरू किया शायद कुछ   मिल जाए .. थोड़ी देर बाद उसे किसी पेड़ की एक टूटी  हुई लेकिन कुछ लम्बी टहनी या डाल  जैसा मिल गया .. "शायद ये  काम  कर जाए". 

उस टहनी को थामे वो पानी में उतरी .. पानी ठंडा था, इसके अलावा झील की तली काफी चिकनी और फिसलन भरी भी  थी .. इसलिए वो धीरे धीरे सावधानी से कदम बढ़ा रही थी .. और अब काफी हद तक पानी के भीतर थी। वो सब फूलों के गहने, जो उसने पहन रखे थे, अब धीरे धीरे ढीले होकर खुलने लगे थे और पानी की सतह पे बिखरने लगे थे  सिर्फ वो फूलों का ताज उसके सर पर  अभी  तक खिला  हुआ था लेकिन उसने खुद ही उसे हटा  दिया। अचानक से उसे  कुछ महसूस हुआ ... ठंडा पानी .. जिसकी  छुअन बेहद रहस्यमय थी ..एक मदहोश कर देने वाला नशा उस पर छा  रहा था .. उसने खुद को खो जाने दिया .. उस जादुई लम्हे और उस अलौकिक अनुभव में .. गहरे तक डूब जाने दिया खुद को  ..पानी जैसे उसके शरीर की बाहरी परत को भेदता हुआ अन्दर तक समा रहा था .. उसकी आत्मा को भिगो रहा था ..कुछ वक़्त  तक  वो ऐसे ही रही .. पानी में ..  उस वजह को भी भूल गई जो (फूल) उसे यहाँ पानी के भीतर लेकर आया था .

कुछ देर बाद अचानक जैसे वो नींद से जागी .. एक ख्याल उसके दिमाग में आया और उसे थोडा डर  लगा .. वो उस जादुई दुनिया से बाहर निकल आई .. उसने अपने होश संभाले और एक बार फिर  से उस फूल की तरफ देखा .. धीरे से .. ध्यान से उसने अपने हाथ में थामी हुई टहनी को आगे बढाया और उस फूल को उसके डंठल के साथ खींचा .. दो चार कोशिशों  के बाद उसने फूल को अपनी तरफ खींच लिया और डंठल समेत तोड़ भी लिया और फिर वो झील से बाहर निकल आई।


वो फूल, दुसरे आम फूलों से कुछ ज्यादा ही बड़ा था .. उसकी खुशबू , लड़की के मन मस्तिष्क पर छाने लगी थी या शायद अब भी वो उस रहस्य के आवरण में खोई हुई थी,  उसे महसूस  कर रही थी । उसने  अपने बालों का एक ढीला सा जूडा सा बनाया और वो फूल उसमे लगा दिया ..और फिर दुबारा झील की तरफ गई .. झील के आईने में खुद को देखा .. फूल उसके बालों में बेहद खूबसूरत लग रहा था या  ये महज़ उसकी कल्पना थी जो उस फूल को  और उसे भी  खूबसूरत बना रही थी ? उसे मालूम नहीं था   

और तभी एक बार फिर से उसने वो खरगोश देखा .. पेड़ के पास जाने क्या कर रहा था .. दोनॊ को एक एक दूसरे की उपस्थिति का पूरा अहसास था और दोनों एक दूसरे से कभी नज़रें मिलाते तो कभी नज़रें चुराते .. लड़की मुस्कुरा रही थी और खरगोश  अपनी चमकीली आँखें झपका रहा था। कुछ देर  बाद  खरगोश  पेड़ों के एक झुरमुट की और भाग चला .. जिज्ञासा,  लड़की को खरगोश के पीछे ले गई .. उस झुरमुट के अन्दर .. 

और क्या था वहाँ  .. वहाँ तीन चार खरगोश और भी थे।  उसने अपने चारों और देखा और उसका चेहरा चमक उठा बच्चों जैसी ख़ुशी और उत्साह से .. एक बार फिर से उसके मन  मस्तिष्क और उसकी आत्मा  झूम उठी उस नज़ारे को देखकर, भूल गई कि थोड़ी देर पहले क्या था, क्या नहीं था ..  और फिर अगले कुछ ही क्षणों में लड़की ने उन नर्म नाजुक छोटे दोस्तों के साथ खेलना शुरू कर दिया या उन्होंने उसका हाथ थाम लिया,  कह पाना मुश्किल है .. लेकिन इतना ज़रूर था कि  एक दुसरे का साथ उन्हें बहुत पसंद आ रहा था और वो उसका पूरा मज़ा ले रहे थे। कुछ घंटे और बीत गए .. वो भूल गई, समय को, समय के बंधनों को और शेष जगत को .. यहाँ तक कि  उसे नींद आ गई .. नींद में उसे ख्वाब आ रहे थे .. ख्वाब "उस पार" के, ख्वाब परछाइयों के, प्रतिबिम्बों के और हाँ खरगोशों के भी। 

अचानक एक तेज़ आवाज़ ने उस जगह की खामोशी को तोडा .. कोई पुकार रहा है .. वो जाग गई ..  

"ये किस  किस्म का शोर है?" वो बुदबुदाई और झील की तरफ  लौटी। 

वो लड़का, वोही .. यहाँ वहाँ घूम रहा था .. सब तरफ उसका नाम पुकारता ढूंढ रहा था .. 

"जून .. जून .. कहाँ हो तुम ?" 

वो उसे वापिस आया  देख कर हैरान थी .. कुछ देर यूँही खामोश खड़ी  रही और उसकी हरकतों को देखती रही। 

आखिर लड़के की नज़र उस पर पड़ी .. " तो तुम यहाँ हो " .. लड़का उसे देख कर खुश था ... हालाँकि वो हांफ रहा था लेकिन एक बड़ी सी मुस्कान उसके चेहरे पर बिखर गई। लड़की ने इसे देखा, समझा और  उसकी तरफ बढ़ आई .. वो अब भी उसे आश्चर्य से देख रही थी। 

"कुछ बोलो ना .. मैंने तो सोचा था कि  तुम अब तक जा चुकी होंगी लेकिन देखता हूँ कि  तुम अब भी .."

"हाँ मैं यहीं थी .." लड़की ने धीरे से जवाब दिया। लड़के ने उस अनकही ख़ुशी को और उस छुपाये गए उत्साह  को देख लिया था ..जान लिया था, समझ लिया था जो उसके शब्दों के पीछे से झाँक रहा था। 

"तो तुम वापिस कैसे आ गए .. मैंने सोचा था कि  तुम चले गए हो, तुम्हारे लोग तुम्हे बुला रहे थे ना .."


"हाँ, कुछ काम था, पर मैंने कर लिया और वापिस आ गया .. ये देखने कि  क्या तुम अब भी यहीं हो या .."  अब उसकी साँसे सामान्य होने लगी थी। 

वो उसके शब्दों को गौर से सुन रही थी ..

"तो क्या कर रही थी तुम इतनी देर  तक ..और डर  नहीं लगा तुम्हे". 

"डर  किस बात का ?" 

"ये जगह, बिलकुल अकेले .."  लड़के ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया और अचानक जोर से चिल्ला कर पूछा ... "वो सारे फूल कहाँ गए?" 

पहले तो वो हंसी,  फिर थोडा रुक कर उसने कहा .. " चले गए, खो गए". 

"खो गए?? कहाँ?"  वो कुछ समझ नहीं पाया .. हज़ारों ख्याल उसके मन को झिंझोड़ने लगे। 

लेकिन लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी, उसकी आँखें एक रहस्यपूर्ण  तरीके से चमक  रही थी, कुछ देर तक खामोश रही वो जैसे कोई बड़ा राज़ छुपा रही हो, फिर एक बार  खिलखिलाई और उसने वही जवाब दोहरा दिया .. " खो गये." 

लड़का अब् भी  उलझन में था .. कुछ पूछना चाहता था लेकिन जानता नहीं  था कि  कैसे पूछे ..

"क्या तुमने इसे नहीं देखा ?" लड़की ने अपने बालों में लगे फूल की तरफ इशारा किया .. उसका चेहरा अब एक विजेता के जैसी ख़ुशी से दमक रहा था।  एक पल को लड़का कुछ समझ नहीं पाया लेकिन फिर अगले ही क्षण उसने झील की तरफ देखा (झील ज्यादा दूर नहीं थी ) और फिर उस फूल की तरफ .. .

"तुमने ये कैसे किया .."? लड़के की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गई। 

वो मुस्कुराई .. "बस कर लिया ... मैं पानी में गई, और फूल को एक  टूटी टहनी की मदद से तोड़ लिया।"  वो  ऐसे  बता रही थी  जैसे कोई छोटा बच्चा स्कूल में  होमवर्क के लिए मिली तारीफ़ के बारे में बता रहा  हो।     

  "तुम पागल हो हो ..?? पानी में गई !!!!!!!!!!!!"

"हाँ .." उसने लापरवाही से जवाब दिया।

"तुम पागल हो, बिलकुल पागल. ये  खतरनाक हो सकता था .. तुम जानती नहीं क्या ?"

" ऐसा कुछ भी नहीं था,  ना तो ये कोई बड़ा खतरनाक  काम था और ना ही इसमें कोई परेशानी लगी।" 

लड़की की आवाज़ में एक लापरवाही और उपेक्षा सी थी उसके सवालों के लिये. और शायद इसलिए, लड़के ने कहे गए शब्दों से कहीं  ज्यादा सुना और जितना उसके कहने का अर्थ था उस से कहीं  ज्यादा समझा भी. और अब लड़के का उत्साह और ख़ुशी जो उस से  मिलने पर  था, अब फीका पड़ने लगा. 

लेकन इस सबसे बेखबर वो अब फिर से पेड़ों के झुरमुट की ओर  जा रही थी।     

"अब तुम कहाँ जा रही हो?" वो अब भी उलझन से घिरा था। 


"मैं ... मैं वो ..मैं तुम्हे कुछ दिखाना चाहती हूँ ..चलो .. चलो ना ".

लड़के ने हालाँकि आगे कुछ नहीं पूछा और वो उसके पीछे चलता गया लेकिन अब दिल में एक भारीपन था. और अब वो दोनों झुरमुट के पास थे. लगा जैसे लड़की थोड़ी निराश सी हुई हो, खरगोश और उनका कोई नामोनिशान आस पास नहीं था। 

"वो खरगोश कहाँ गए?" 

"कौनसे खरगोश?"

"यहीं तो थे, उन्ही के साथ तो मैं पूरा वक़्त खेल रही थी जब तुम यहाँ नहीं थे".  

अब लड़का थोडा और हैरान परेशान हो गया .. "मैंने तो यहाँ कभी कोई खरगोश नहीं देखे." 

'पर वो यहीं थे ..अच्छा  चलो रहने दो .. ज़रा इसे देखो  तो .." 

लड़की अब एक बड़े से  बरगद के पेड़ की तरफ गई और पेड़ से लटकती उसकी लम्बी जड़ों के एक जोड़े को थाम लिया, जो बिलकुल एक कुदरत के बनाये झूले जैसा लग रहा था। वो उस पर बैठ गई और धीरे धीरे झूलने लगी .. झूला गति पकड़ने लगा .. ऊपर उठता हुआ और फिर नीचे आता हुआ ..

"अरे, ध्यान से, कहीं गिर ना जाओ". लड़का परेशान था।

लड़की हंसी .. और उस लम्हे में लगा जैसे कोई झरना बह निकला  हो ... ऊँचे पहाड़ों से गिरता हुआ .. आश्चर्य के साथ लड़का उसे फिर से देख रहा था .. " तुम पागल हो .."


झूले की गति अब काफी बढ़ गई थी पर जैसे इतना काफी नहीं था .. लड़की ने अब उन टहनियों के झूले को गोल घेरे में घुमा के झूलना शुरू किया  और लड़का अब पूरी तरह अचंभित था .. उस लड़की की हंसी और उमंगें जैसे हवा में चुम्बकीय तरंगें पैदा कर रही थी और हर उस चीज़ को अपने में समाती जा रही थी जो वक़्त के उस लम्हे में, धरती के उस टुकड़े पर मौजूद था। लेकिन लगता नहीं था कि  लड़की को इस सबका भान था, वो तो सिर्फ झूलने का आनद ले रही थी। लड़के ने महसूस किया वो अपनी आँखें नहीं हटा पा रहा उस से .. उस लड़की से .. या शायद वो हटाना ही नहीं चाहता .. जो भी था .. लड़की ने इस बात को समझ लिया। 

लड़की ने उसकी आँखों को देखा .. उनमे लालसाएं थीं, आकांक्षाएं थीं, महत्वाकांक्षाएं थी, अपेक्षाएं थीं और … और बहुत कुछ  था … और उसकी आँखों में लड़के ने एक  सपना देखा जो झिलमिलाते हुए पर्दों के पीछे छिपा था . वो आगे बढा … 

"तुमने अभी तक मेरा  नाम नहीं पूछा". 

"मैं जानती हूँ तुम्हारा नाम ।" एक और बेपरवाह जवाब. 

" तुम जानती हो !!!!!!!!!!!!,  लेकिन  मैंने तो  तुम्हे नहीं बताया, फिर कैसे । कैसे तुम जानती हो ?"  लड़का अब उसके ठीक  सामने आकर खड़ा हो गया. 
  
"क्या …"  एक क्षण के लिए उसकी हंसी रुक गई और वो निरुत्तर हो गई. 

लड़के ने अपना सवाल दोहराया … लड़की की मुस्कान फिर से लौट आई. दूर अज्ञात क्षितिज को देखते हुए उसने कहा …

" तुम्हारा नाम छलावा  है … तुम्हारा नाम है सतरंगी आभास, भ्रम, तृष्णा … "

लड़के ने झूले को कस कर पकड़ लिया और उसकी तरफ देखने लगा  लेकिन लड़की ने  कोमलता से उसका हाथ हटाया और रुक चुके झूले से उठ खड़ी हुई. 

लड़का खामोश था लेकिन शायद कुछ  कहना चाहता था. 

लड़की ने सुन लिया … वो मुड़ी … लेकिन ये क्या … 

हर चीज़ … उसके चारों ओर, वो लड़का … सब कुछ एक भंवर में समाता और गायब होता जा रहा था.  वो डर कर चीखी … उसने अपना हाथ आगे बढाया शायद कुछ थामने के लिए या पकड़ने के लिए … लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. 


"रुकॊऒऒओ … " उसकी साँसे तेज़ तेज़ चल रही थी पसीने से नहा  गई थी वो. 

" बिटिया, सोना … क्या हुआ  … कुछ नहीं बस एक बुरा सपना ही था, शांत हो जा".  ये उसके माता पिता थे.   

और तभी उसके सेलफोन की रिंग टोन बज उठी … "छोटी सी कहानी से बारिशों के पानी से सारी वादी भर गई … " 






Thursday, 4 July 2013

Before I Die

Before I Die, Let Me Sing One Last Time

Before I Die, Let Me Dance One Last Time 

Before I die, Let Me Laugh Freely One Last Time

Before I Die, Let Me Smile One Last Time

Before I Die, Let Me Explore Those Lofty Heights One First and Last Time

Before I Die, Let Me Touch That Blue Sky One First and Last Time

Before I Die, Let Me Spread My Wings and Fly To The Unknown Horizons One Last Time 

Before I Die, Let Me Sleep On Clouds One First and Last Time

Before I Die, Let Me Awake With A Golden Morning One First and Last Time

Before I Die, Let Me Feel that Beautiful Night Which Would Not Bring Sorrows One First And Last Time

Before I Die, Let Me Fall in Love One First and  Last Time

Before I Die, Let Me Feel the Rain Drops on My Cheeks One Last Time

Before I Die, Let Me Lost in Your Arms One First and Last Time So That I Could Never Return Back

Before I Die, Let me Kiss You One First and Last Time So That I Can Sleep Peacefully 

before I Die, Let Me ... Let Me Live One First and Last Time With My Volition and Will

Tuesday, 25 June 2013

राधा बाई की लव स्टोरी -- भाग 1

"नालायक आज भी नहीं आएगी". 

"क्यों ?? अब आज कहाँ मर गई ? इस हफ्ते ये तीसरी बार हो गया।"

" कहीं नहीं मर रही, वो जो गाँव के रिश्तेदारों का कुनबा आया है दस - ग्यारह लोगों का, उनको  बाज़ार घुमाने, खरीद दारी  कराने और पता नहीं  कौन कौन से मंदिरों के दर्शन करवाने ले जायेगी।" 

"अब निकाल दो इस निकम्मी, नालायक को .. हद ही हो गई है अब .. कभी खुद कहीं मेले ठेले में डोलने जा रही है .. कभी गाँव में शादी है, कभी बीमार पड़ी है (वैसे है तो पैदायशी बीमार ) और कभी गाँव से रिश्तेदार आकर इसी के घर में डेरा डाले बैठे हैं और ये इनकी पलटन को खिला  रही है (वो भी उधार लेकर )".

इस रामकथा के बाद मैंने झाड़ू उठाया और लग गई सफाई में .. ज़ाहिर है अन्दर से पचास गालियाँ देते हुए .."काम वाली बाई" को  जिसका नाम है "राधा" .

हमारी राधा को हम "राधा-बाई" नहीं कहते सिर्फ राधा कहते हैं ...ये बाई शब्द सीरियल और फिल्मों में ही ठीक लगता है।  और हमारी राधा मैडम को आप ऐसा वैसा मत समझिये .. उनको हर चीज़ का शौक है .. घूमने का,  नई  ड्रेसे पहनने का, मोबाइल का, टीवी सीरियल देखने का और अगले दिन एपिसोड की कहानी के बारे में बातें करने का ... (मोबाइल का शौक ऊँचे दर्जे का है, उस में रेडियो चलता रहता है और राधा काम करती रहती है, गलती  से भी  अगर उसके मोबाइल को किसी ने हाथ लगाया या उसमे कुछ ताक झांकी की तो  राधा को  अच्छा नहीं लगेगा .. बताये देते  हैं आपको .... और रेडियो को बंद करने के बारे में तो बात करना  ही बेकार है क्योंकि संगीत की सुमधुर लहरी के बिना राधा का मन नहीं लगता काम में ... और अभी कोई दो चार महीने हुए है कि  राधा ने नया मोबाइल खरीदा है जिसमे कैमरा भी है !!!! )

और  हाँ,  घूमने का उनका शौक कोई मामूली नहीं है इसमें मेले, शादी-ब्याह, कोई  सा भी त्यौहार और रिश्तेदारों के घर जाना सब कुछ शामिल है ..बस मौका मिलना चाहिए डोलने का और भटकने का ..

    तो बस उन्ही सब झमेलों के चलते राधा देवी छुट्टियां लेती ही रहती हैं और अक्सर इसकी पूर्व सूचना देना बिलकुल गैरज़रूरी मानती हैं या कभी कभार सूचना आ भी जाए तोह वो देर से ही पहुँचती है (जी नहीं डाक विभाग को या टेलिफोन के घटिया नेटवर्क को ना कोसिये ये तो उनके छोटे भाईसाहब हैं जो मर्ज़ी हुई तो आ जाते हैं बताने वर्ना जय राम जी की ) 

तो बस ऐसा ही एक दिन था जब सन्डे था और मेरे एग्जाम सर पर थे और मम्मी की तबिअत भी कुछ ठीक नहीं थी और हमारी राधा बाई के आने के आसार दिख नहीं  रहे थे और  इसलिए मैंने हाय तौबा मचाते हुए सफाई करना शुरू किया .. पूरे घर का झाडू लगा चुकने के बाद मैंने अभी सांस भी नहीं ली थी कि  राधा देवी दरवाजे पर प्रकट हुई .. गुस्सा तो पहले ही दिमाग पर सवार था इसलिए मैंने वहीँ दरवाजे पर ही राधा को कुछ मधुर वचन सुनाये लेकिन फिर मम्मी बीच में आ गई तो मुझे अपना रेडियो बंद करना पड़ा।  

मैं वापिस पढने बैठ गई और थोड़ी देर बाद कुछ आधी अधूरी बातें सुनाई दी, राधा कुछ बता रही थी और मम्मी खुश हो रही थी। खैर,  उसके जाने के बाद  दोपहर का खाना निपटा कर, कूलर चला कर जब मैं शुतुरमुर्ग की तरह  किताबों में अपना सिर घुसा के पढ़ रही थी तब मम्मी ने कहना शुरू किया ...

" अब राधा शायद काम छोड़ देगी". 

"क्यों अब क्या हुआ इस नालायक को".

"अरे, अब उसकी शादी होने वाली है, और उसका होने वाला पति नहीं चाहता कि  राधा अब  बाई का काम करे।"  मम्मी ने एक झटके में कह दिया और मेरा शुतुरमुर्ग वाला सिर  बाहर निकल आया। 

"क्याआआआ ... शादीईईईईईई ... किस से करेगी ??????"  

अब यहाँ थोडा विवरण और देना पड़ेगा कि  मैं इतनी हैरान क्यों हो रही हूँ .. किस्सा--मामला ये है कि  राधा कि  उम्र तो ज्यादा नहीं है  लेकिन गाँव के रिवाज के मुताबिक़ बचपन में ब्याह हो गया फिर वही घिसा पिटा  किस्सा, मारपीट वगेरह और फिर राधा अपने साल दो साल के लड़के को लिए वापिस माँ के पास आ गई।  तो हैरानी ये है कि  ऐसा कौन मिल गया जो राधा को उसके बेटे  समेत ले जाने को तैयार है ???


तो अब किस्सा कुछ यूँ है कि  राधा की मौसी को राधा की बड़ी फिकर थी इसलिए उन्होंने ढूंढ निकाला एक दूज वर राधा के लिए (वैसे राधा भी तो  दूसरी  बार ब्याह करेगी ना ) तो  "लड़का"   राधा को मिलने  उसके घर आया  मौसी के लड़के  के साथ .. और राधा को  बाहर चलने के लिए पूछा,  जहां बैठ के दो घडी बतियाया जा सके. ( घर में तो बैठने की जगह ही नहीं है ना .. वैसे ये और बता दूँ कि  उस वक़्त राधा की माँ और छोटी बहन भी घर पे नहीं थे .. लेकिन श्ह्ह्ह )

तो फिर राधा उस लड़के की बाइक  पे बैठ कर गई नेहरु गार्डन, जहां उन्होंने खाई आइसक्रीम और पिया जूस और घर छोड़ने से पहले लड़के ने राधा को दिलाई एक बड़ी सी डेरी मिल्क। और हाँ अपना नंबर देना नहीं भूला लेकिन ये तो बुरा हो उस बुरे वक़्त का जिसमे राधा के फोन में  सिम ही नहीं थी, इसलिए फोनियाना संभव नहीं था .. खैर .. 

और बस तभी से राधा को प्यार हो गया  "इश्क वाला लव .."

 "लड़का मेरी ही उम्र का है .. बीवी उसकी भाग गई शादी के कुछ महीने के बाद (थोड़े दुःख क साथ कहते हुए ) और मेरे छोटू को भी साथ रखने को तैयार है और कहता है कि  काम छोड़ दो , अब कोई ज़रूरत नहीं (बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए, शरमाते हुए ) "  राधा देवी मेरी माता जी को बता रही थी।

"लड़के का कुछ नाम भी है कि  नहीं?" बाउंसर जैसा, बेसुरी आवाज़ में मेरा सवाल।

"लक्ष्मण दास" .. कहते कहते राधा की बत्तीसी खिल गई और अपने ख़ास अंदाज़ में हंसी।

"करता क्या है?" 

"लकड़ी का काम है .. खुद का .. मजदूर नहीं  है, नौ  हज़ार महीना कमाता है, घर में माँ बाप के अलावा एक छोटा भाई है वो भी काम करता है।" 

  यानी लव स्टोरी फुल स्विंग पर थी। 

राधा को बाइक  पर घूमने, आइसक्रीम  खाने और गार्डन में घूमने के सपने आ रहे होंगे।  अब घूमने के लिए बस के धक्के या ऑटो का किराया खर्च नहीं करना पड़ेगा। 

लेकिन अब यहाँ भी एक पेंच था .. हर लव स्टोरी में होता है इसमें कैसे नहीं होगा। तो पेंच ये है कि  राधा की माँ को लक्ष्मण पसंद नहीं आया,  उसको तो ये रिश्ता, घर  और यूँ  कहें कि पूरा मामला ही पसंद नहीं आया। अब क्यों, किसलिए, जैसे सवालों के पीछे एक दुःख भरी कथा और है।

राधा के अलावा उसके घर में उसके दो भाई और एक बहन है और माता  पिता है  और ये सब लोग कुछ ना काम करते ही हैं, राधा उसकी  बहन शोभा  और उसकी माँ तीनों अलग अलग  घरों में  काम करती है और हर महीने मिलकर  तीन चार हज़ार  तो कमा ही लेती है. लेकिन फिर भी घर का खर्च, बेटे की पढाई  और भी कई खर्चे आम तौर  पर राधा के ही हिस्से आते हैं। शोभा अपनी कमाई या तो बचा के रखते है या फिर अपने ऊपर ही खर्च करती है। घर के सारे काम, अक्सर आने वाले और लम्बे वक़्त तक ठहरने वाले गाँव के मेहमानों की आवभगत और महीने का राशन लाना जैसे सभी काम राधा की ज़िम्मेदारी है। शोभा और  उसकी माँ  का इन सब से कोई लेना देना नहीं .. सुनने में काफी अजीब और फ़िल्मी  लग सकता है लेकिन  है सच .. राधा घरों में काम करती है और अपने घर का भी हर छोटा बड़ा काम करती है। उसकी माँ जो साल के छह महीने घर से बाहर ही रहती है (कभी रिश्तेदारों से मिलने , कभी खेत बुआई के वक़्त मजदूरी करने जैसे कामों के कारण) तब घर की पूरी ज़िम्मेदारी अकेली राधा की होती है. 

ऐसे में अगर राधा शादी करके चली गई तो ज़ाहिर है कि ना सिर्फ  घर का एक  कमाऊ सदस्य चला जाएगा पर फिर घर कौन संभालेगा ..????? और  इसलिए राधा की माँ ने साफ़ शब्दों से कह दिया ... "नहीं, नहीं, नाहीं .. बिक्लुल नाहीं". 

इस "नाहीं" ने बेचारी राधा के नन्हे दिल को तकलीफ दी , रिश्ता लाने वाली मौसी और राधा के पिता ने भी माँ को समझाया पर कोई फायदा नहीं हुआ. 

"मैंने पहले ही तुझे कहा था कि  तेरी माँ तो किसी हालत में राज़ी नहीं होगी". ये हमारी माताजी हैं जो परेशान हैं ( नहीं, नहीं आप समझे नहीं, परेशानी की वजह  ये है कि  अब राधा काम छोड़ देगी तो नई  बाई   इतनी जल्दी कहाँ से मिलेगी) 

" पर मैंने भी कह दिया है कि  शादी करुँगी तो सिर्फ उसी से वर्ना करुँगी ही नहीं". 

"पर तेरी माँ .." 

"माँ तो ऐसे रिश्ते ला रही थी कि  बस .. मैं ना करूँ उनसे ब्याह और फिर शोभा भी तो रोज़ झगडती है मुझसे, कहती है कि  शादी करले और अलग घर लेके रह." 

"लेकिन ..??" 

" उसकी माँ ने भी मुझसे कहा है कि  घरवाले ना माने तो भी कोई बात नहीं, तू तो बस अपनी दो ड्रेस लेकर आ जा।  मैं कोर्ट मैरिज कर लूंगी।"

" क्याआआआ ..क्या करेगीईइ।" फिर से बाउंसर।

"उसने कहा है हम कोर्ट मैरिज  कर सकते हैं, फिर  कोई कुछ नहीं बोलेगा, कोर्ट का आर्डर होगा तो सबको मानना पड़ेगा।"  

मुझे उसके ज्ञान कोष पर और उसकी हिम्मत दोनों पर हैरानी और थोड़ी जलन भी हो रही थी। 

"तू कोर्ट मैरिज करेगी .." माताजी चकित और मुदित थी। 



        

  
     

Saturday, 22 June 2013

बर्फ

अपने 15वीं  मंजिल के फ्लैट की खिड़की से बाहर सड़क और उस से लगी हुई इमारतों का नज़ारा देखते हुए उसका मन और मस्तिष्क जाने कहाँ उड़ता फिर रहा था .. कौन पहाड़ों, नदियों और सागरों के पार भागता फिर रहा था इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।

 पिछले तीन दिन से लगातार बर्फ पड़  रही थी, टोरंटो का मौसम बेहद ठंडा हो गया था .. वो अंग्रेजी में कहते हैं ना स्पाइन चिल्लिंग कोल्ड .. वैसा ही। चारों तरफ जहां तक नज़र जाती थी, "सब कुछ" बर्फ से ढका  था, बिल्डिंग्स, सडकें यहाँ तक कि सड़क किनारे के पेड़ और झाड़ियाँ भी। सारी  दुनिया   सफ़ेद रंग में रंग गई थी .. ऋचा को लगा जैसे एक सफ़ेद चादर, बर्फ की सफ़ेद चादर उसे भी ढके हुए हैं .. अन्दर से  लेकर बाहर तक , सर से पैर तक बर्फ की ठंडी चादर उसे समेटे हैं।  अभी और कुछ आगे सोचती या मन किसी और सागर या पहाड़ के किनारे को पार करता इसके पहले एक आवाज़ ने उसका ध्यान तोडा।

"ऋचा .. कहाँ हो ". मानिक घर आ चुका  हैं। ऋचा ने उसे  किचन की तरफ जाते देखा .. कुछ समझ ना आया .. कुछ खाना या पीना है तो मुझसे ही कह देता।  
लेकिन मानिक शायद कुछ और ही सोच रहा होगा क्योंकि अब तक कॉफ़ी मेकर मानिक के लिए कॉफ़ी  बना चुका  था। मानिक ने ड्रिंकिंग चॉकलेट का कैन खोल एक बड़ा स्पून अपनी कॉफ़ी में मिलाया ... ऋचा ध्यान से देख रही थी .. आजतक कभी उसने नोटिस नहीं किया था कि  मानिक को कैसी कॉफ़ी पसंद है ..

"तुमको चोको कॉफ़ी पसंद है?"

अब था तो ये एक सवाल लेकिन ऋचा ने इसे सवाल की तरह नहीं कहा। मानिक ने इस अंतर को पकड़ लिया था  इसलिए उसने    एक लापरवाह नज़र ऋचा पर डालते हुए जवाब दिया ..

"हाँ, जब थक जाता हूँ तब हॉट चोको कॉफ़ी बॉडी और ब्रेन दोनों को रिलैक्स कर देती है" और उस वक़्त बात वहीँ पर आकर रुक गई आगे बढाने का कोई सूत्र नहीं था,  होता तो भी व्यर्थ का औपचारिक वार्तालाप कब तक खींचा जा सकता है। 

दो साल हो गए हैं यहाँ आये और सेटल हुए .. ऋचा एक फर्म में लीगल असिस्टेंट बन गई और मानिक तो खैर पहले ही एक लीडिंग फाइनेंसियल और बैंकिंग फर्म का सीनियर फाइनेंसियल एनालिस्ट है और इस खूबसूरत अपार्टमेंट को, जिसमे ये दोनों रहते हैं इसे मेन्टेन रखने में मानिक की सैलरी का ही बड़ा योगदान है। 

"मैं ज़रा बाहर घूम कर आती हूँ" .. मानिक ने दरवाजे पर खड़ी  ऋचा को देखा और फिर उसे जाते हुए, घर से बाहर निकलते हुए और दरवाजा बंद करते हुए सुना। 

ऋचा के पैर  निरूद्देश्य रास्ता बना रहे थे और आँखें बर्फ की चादर  के आगे कुछ देखने की कोशिश कर रही थी .. कि  एक आवाज़ सुनाई दी .. " कौसानी  कितना खूबसूरत है ना, लगता है कि  हिमालय के शिखरों की शाश्वत  बर्फ यहाँ ज़मीन पर ही उतर आई है". 

ऋचा चौंक गई, ये आवाज़ यहाँ कैसे ??? फिर से सुनाई दिया .. "कौसानी !!!!"  पैर रुक गए, शून्य को निहारती आँखें .. वो चर्च की तरफ मुड गई।  

थोड़ी देर बाद चर्च में बेंच पर बैठी ऋचा दीवारों और छत की चित्रकारी को देखने लगी है, उनके रंग ... "शान्तिनिकेतन की होली याद है तुम्हे?"  फिर से कोई   बोला और ऋचा को सुनाई देने लगा .. " रांगा  नेशा  मेघे मेशा प्रभात आकाशे ... नवीन पाताय  लागे रांगा हिल्लोल .. खोल द्वार खोल" 

इन्ही आवाज़ों  के बीच कुछ और परिचित आवाजें उभरने लगी ... " तुझसे छह साल बड़ा है, शक्ल सूरत तो खैर अब क्या कहें तू खुद भी तो एक बार मिल ही चुकी है .. हाँ well settled तो है  .. पर फिर  एक बार सोच ले .. कहीं बाद में कोई पछतावा ना हो .. उस परदेस में कोई नहीं होगा तेरी बात सुनने वाला .."  ऋचा ने  आवाजों को परे धकेल कर  क्रॉस पर टंगे ईसा पर अपनी नज़रें केन्द्रित करने की कोशिश की 

पर फिर वहाँ नहीं बैठा गया ऋचा से .. लौट आई .. घर .. 

"आज खाना क्या बनाऊं ?" 

"पिज़्ज़ा आर्डर कर दो ". 

खिड़की के बाहर बर्फ की सफेदी अब धूसर मटमैली और स्याह चादर ओढ़े सो गई है लेकिन टोरंटो अभी भी जाग रहा है .. घरों से झांकती रोशनियाँ, सड़कों पर जवान होती "नाईट लाइफ"  और  आवाजें ... हर तरफ से, हर तरह की ..



ऋचा ने अगले दिन के किसी केस की हियरिंग के लिए  क़ानून  के जंगल को खंगालना शुरू  कर दिया है .. पर अब कौसानी की आवाजें , विश्वभारती के रंग और  बहुत सी आवाजें उसके दिमाग में घूमने और शोर मचाने लगे हैं। लिविंग रूम में आई और सब कुछ को देखने लगी  और फिर  अगले कुछ सेकण्ड्स के बाद वो मानिक के कमरे में हैं .. मानिक भी अब स्टॉक मार्किट के आंकड़ों और अर्थव्यवस्था की उठापटक के बीच मुनाफे के रास्ते खोज रहा है. 

"कुछ काम है ?" 

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"कुछ चाहिए .. क्रेडिट कार्ड प्रॉब्लम ?" 

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"क्या फर्क है मुझमें और घर के बाकी सामान में और क्या फर्क है तुम में और घर की दीवारों और  छत में  ?" 

"कुछ भी नहीं .. इन सब को और तुम्हे भी ... मैंने  पैसों से ही खरीदा है लेकिन तुम्हे ना इस घर के लिए कोई EMI देनी पड़ती है और ना ..  ."  लेकिन कहते कहते मानिक समझ ही गया कि  जितना  सवाल बेतुका था उतना ही या उस से भी  ज्यादा बेहूदा उसका जवाब था क्योंकि सवाल करने वाली अब  कमरे से बाहर जा चुकी थी। 

टोरंटो जाग रहा था और बर्फ  गहरी नींद सो रही थी, 

"सब कुछ" घर के अन्दर और खिड़की से बाहर अपनी जगह पर था .. कुछ नहीं बदला था  लेकिन ऋचा के अन्दर कौसानी, विश्वभारती और   छूट गए समय के रंग और आवाजें सब मिलकर एक ऐसा  साइक्लोन पैदा कर रहे थे जो "सबकुछ " को तोड़ फोड़ रहा था। और अब  मानिक  भी उस सबकुछ के बीच आकर खड़ा हो गया .. 

"जाओ, जाकर सो जाओ।" 

" मुझे अब नींद नहीं आती ..." 


पर ये जवाब सुनने के लिए मानिक रुका नहीं था .. कमरे में लौट गया ..


बर्फ अब पिघलने लगी है .. बहने लगी है, रंग भी मिटने लगे हैं .. मानिक उलटे पैरों वापिस आया .. ऋचा अब भी साइक्लोन  के बीच खड़ी है ... नींद को तलाश रही है। 

" क्या तुम्हे मेरी ज़रूरत महसूस नहीं होती ?" 

" ज़रूरत ...!!!!!!" आँखें गुस्से और हैरानी  से फ़ैल गई मानिक की।

"क्या तुम मुझसे प्यार करती हो ... बोलो ..मेरी तरफ देखो और बताओ !!!!!"  मानिक उस साइक्लोन  को बांह पकड़ कर  झिंझोड़ रहा था .. चीख कर पूछा  था लेकिन फिर भी ऋचा को आवाज़ बहुत दूर से आती हुई  महसूस हुई ...




मानिक अब वहाँ नहीं है, ऋचा भी अब अपने कमरे में सो रही है।

टोरंटो सो गया है .. बर्फ जाग गई है ..  उसकी  स्याह चादर अब  और गहरी हो गई है क्योंकि शहर की बत्तियां अब बुझने लगी है। 



बंगला गीत शिवानी गौरा पन्त की किताब "आमादेर शान्तिनिकेतन" से  लिया गया है