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Saturday, 19 February 2022

अमेज़न के जंगल और शहर की सड़क

 भारतीय सड़कें कितना बड़ा दिल रखती हैं।  कभी लगता है कि सड़कें हैं या कोई इमामबाड़ा .... फल सब्ज़ी के ठेले, चाट वाले, घास बेचने वाले, फ़ास्ट फ़ूड वाले और भी पता नहीं, क्या क्या बेचने वाले के ठेले या स्ट्रीट काउंटर सड़क किनारे जगह बनाये एक परफेक्ट फ्रेम की तरह सुशोभित होते हैं।  अभी तो हमने सड़क किनारे या फुटपाथ पर या चौड़े डिवाइडर पर रहने, बसने या  सोने वाले भिखारियों का तो अभी तक  कुछ नक्शा ही नहीं निकाला !!! और इस सबके साथ, भारतीय सड़कों की स्थाई विशेषता जो अब कह लीजिये कि इन सड़कों की शोभा को बढ़ाते हैं या बिगाड़ते हैं, वो हैं खड्डे, टूटी फूटी सड़क के पत्त्थर, मिटटी और कीचड के टापू।  सडकों पर जो स्थाई रूप से गाय, कुत्ते समेत कई तरह के पशु प्राणी निवास करते हैं, उनकी संख्या का तो कोई हिसाब ही नहीं।    कितना संसार बसा हुआ है इन सड़कों पर।  इतने पर भी अपनी  शाही सड़कों पर हिंदुस्तान मजे से, पूरी रफ़्तार से दौड़ रहा है।  बिना रुके, बिना ट्रैफिक सिग्नल की परवाह किये , बगैर ब्रेक लगाए; बस दौड़ रहा है।  "हर लिमिट की हाइट पर चढ़ के डांस बसंती " ( एक फिल्म का लिरिक्स)


सड़क के किनारे या सड़क पर ही दुकानें हैं, ढाबे हैं ; जिनका फैलारा सड़क तक खिंचा हुआ है।  कभी कभी मुझे लगता है कि भारत की अर्थव्यवस्था सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था और राजनितिक व्यवस्था सब कुछ सडकों पर ही रहती - चलती है।  सड़क किनारे भिखारी अपने  परिवार सहित टपरों में या अकेले एक कम्बल लपेटे पड़े रहते हैं।  रैली, जुलूस, झांकी, प्रदर्शन, धरना यह सब भी सड़क पर चलता है. यहां तक कि जगह हो या ना हो लेकिन देवी देवताओं के थान, देवरे भी किसी चौराहे, नुक्कड़ पर जगह निकाल कर स्थापित कर दिए जाते हैं। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। कहने का लब्बोलुआब यह रहा, कि एक भारत  ऐसा भी है कि जिसकी समस्त संरचनाएं, रचनाएं, ताने - बाने और जीवन व्यव्हार सब कुछ सड़क से जुड़ा है, सड़क पर  हो रहा है, सड़क पर चल रहा है।  हिंदुस्तान सड़क पर जी रहा है।  

सड़कें भी इस धीर गंभीर गुरुत्तर दायित्व को खूब समझती हैं।  इसलिए जैसे कैसे करके भी हर व्यवहार के लिए, हर रचना के लिए ( ईश्वरीय, मानवीय ) जगह बना ही देती हैं। कभी किसी को निराश नहीं करती।  यहां जगह ही जगह है ; इतनी  जगह कि राजा का महल भी एडजस्ट हो जाए ; बस अगर कुछ एडजस्ट नहीं होता तो वह है दिन ब  दिन बढ़ता ट्रैफिक !!!


अब यह सड़क की महिमा गाते गाते मेरी खोज पूर्ण दृष्टि जा पड़ी ऑफिस के परिसर में सब तरफ लगे पेड़ों पर, घर से ऑफिस आते जाते रास्ते में लगे पेड़ों पर।  यह पेड़ हैं या कोई दो मंजिला तिमंजिला बिल्डिंग।  इनकी ऊंचाई इमारत के बराबर ही है ; बस एक समस्या है, यह बेचारे ज़रा छितरे, पीले, सूखे, थके या एकदम उदासीन से मालूम होते हैं। इन्हें देख कर ऐसा लगता है जैसे ये पेड़ जाने कब से यहां इस जगह पर ऐसे ही खड़े हैं, पड़े हैं, विराजमान हैं।  इनको इस आती जाती फानी दुनिया से कोई लेना देना नहीं।  गाहे बगाहे यह अपने आस पास नज़र डाल  लेते होंगे फिर वापिस अपनी ध्यानावस्था में तल्लीन हो जाते होंगे या सोचते होंगे कि आखिर यह क्या तमाशा दिन रात मचा रहता है; एक मिनट को भी शान्ति क्यों नहीं है ???  तो रोज सर्दियों के दिनों में  धूप  सेंकते वक़्त इन ऊँचे पेड़ों को देख कर अचानक से मुझे अमेज़न के वर्षा वन याद आने लगे।  अब पूछिए  कि अमेज़न के वर्षा वन और सड़क और पेड़ और घने जंगल ; इन सब में भला क्या कनेक्शन है ? या क्या हो सकता है ? खैर, सवाल है तो जवाब भी है; कनेक्शन तो खैर है।  

कनेक्शन इस तरह से है कि जहां आज सड़क है, शहर है, बस्ती है, वहाँ कभी जंगल था।  जहां आज जंगल है वहाँ आने वाले वक़्त में सड़कें होंगी, बस्ती होगी और ट्रैफिक होगा।  दूसरा कनेक्शन ये है कि सडकों पर धूप , धूल , धुंआ, मिटटी, कचरे के ढेर सब कुछ एक साथ फैला रहता है।  लेकिन ये जंगल और इनके पेड़ और इनकी हरी छतरियां धूप  को भी ज़मीन तक पहुंचने से रोक देती हैं. याद है, वर्षा वनों का एरियल व्यू !!! हरे पेड़ों के शामियाने  से ढंकी छुपी ज़मीन !!!  लेकिन फिर भी इन्हीं वर्षा वनों के कारण हमारी ये धरती सांस लेती है, इन्हीं जंगलों से पृथ्वी हरियाली कहलाती है।  


शहर के पेड़ों को जब देखती हूँ तो लगता है कि इनमें हरियाली की वैसी चमक नहीं है, यह प्रदूषण  या खर दूषण किसी ना किसी चीज़ के मारे हैं।  इनकी बिखरी डालियाँ, भूरी सूखी टहनियां, छितराई हुई पत्तियां और ज़मीन की तरफ झुकती सूखी मुरझाई हुई बेलें। हर पेड़ अपने आप में एक पोज़ है, एक एक्सप्रेशन है किसी इमोशन या इम्पल्स का। ऐसा लगता है कि हर एक पेड़ एक अलग अस्तित्व है, एक नाम है, पहचान है जैसे इंसान की नाम पहचान होती है वैसी ही। नाक नक़्श, डालियों का झुकाव या फैलाव, तने की छाल की रंगत और बनावट। क्या पेड़ों की भी कोई चॉइस होती होगी कि ऐसे नहीं वैसे दिखने चाहिए हमको या ऐसा क्यों दिखें, वैसे ही क्यों ना लगें हम !!! कुछ रंग ढंग का शौक !!! ऐसा कुछ होने की संभावना होती होगी क्या ??   Trees


 किस दिशा की तरफ देख रहा है ये पेड़ ? किस कोण त्रिकोण या चतुर्भुज या समकोण को नाप रहीं हैं इसकी टहनियां और इस पेड़ पर पलती  हुई बेलें ? हर पेड़ का अपना एक ढंग है, एक ढब है, एक कोई अंदाज़ है जिसमें एक कथा निरंतर कही जा रही हो।  आते जाते, गुज़रते सभ्यता के परिवर्तनों और विकास के प्रमाण हो सकने की कथा।  शहरों के पेड़, सड़क किनारे लगे पेड़, सिटी प्लानिंग के अंतर्गत बनाई गई ग्रीन बेल्ट ; यह सब हरियाली में गिने जाते हैं ; शहर की हरियाली  !!! पर फिर इस हरियाली में हरापन क्यों नहीं है ? यह सब्ज़ हरा रंग होने के बजाय पीला भूरा, चित्तीदार कत्थई रंग कहाँ से आ गया ? 

Image Courtesy : Google 

Blog Link : My Old Post on Trees 


Friday, 7 March 2014

सड़कें और ट्रेन : एक अनुभव

सड़कें  आजकल मुझे एक अजब फिलॉसॉफी की तरह लगती हैं. हर रोज़ दफ्तर तक जाने के लिए मुझे दस किलोमीटर का रास्ता तय करना होता है.  और तब थोड़ी थोड़ी देर में मुझे सड़क के कई रंग रूप और नक़्शे दिखाई देने लगते हैं. जाने क्या क्या विचार सूझने लगते हैं. 

सड़कें एक फैले हुए जाल की तरह लगती हैं,  और सिर्फ जाल होता तो उसका कोई आदि - अंत भी हो सकता था लेकिन ये एक अंतर्जाल है, एक जंगल की तरह; गाड़ियों का, ट्रैफिक सिग्नल्स का और लोगों का.  यहाँ तेज़ रफ़्तार से पहियों पर सररर्र से भागती छोटी बड़ी गाड़ियां है, चार पहिया हो या दो पहिया सबको जल्दी से भी ज्यादा जल्दी है. और तब एक अजब सा ख्याल मुझे आता है कि भारतीय  सड़कें पूरी तरह समाजवादी हैं. हमारे यहाँ, दो पहिया, चार पहिया, बिना पहिया, साइकिल, रिक्शा, ट्रक, ट्रेक्टर,  ऑटो, बैलगाड़ी और पैदल सबके लिए एक ही सड़क है, जिस पर सबके लिए एक से  गडडे, धक्के, यहाँ वहाँ फैले पत्थर और किनारों से बुरी तरह कटी फटी, उधड़ी हुई  सड़क हैं. इस  निर्जीव  डेकोरेशन के बाद सड़कों पर रहने वाले या उनको खुला मैदान गार्डन वगरैह समझ कर वहाँ घूमने वाले जानवर भी समाजवादी ही हैं और किसी भी किस्म के भेदभाव में विश्वास नहीं करते। 

इसके अलावा समाजवाद का एक रूप ये भी है कि गाडी चलाने वाले सभी लोग (छोटी बड़ी सब तरह की गाड़ियां ) पक्के तौर पर संसाधनों पर समाज के सामूहिक स्वामित्व में मजबूत आस्था रखते हैं सब लोग मानकर चलते हैं कि सड़कें उनकी हैं, केवल उनके लिए बनी है  इसलिए वे जैसे चाहें  अपनी गाडी को चला दौड़ा सकते हैं. wrong side, right side, कहीं से भी कट मार के निकलना, जगह हो ना हो पर ज़बरदस्ती साइड से जगह बनाना या बीच में घुस जाना हम  सबका विशेष अधिकार है. (खबरदार जो इस पर किसी ने ऐतराज उठाया ) 

दो पहिया वाहन चालकों का ख्याल है कि उनकी ये दुबली पतली, हलकी फुलकी  गाडी  बेहद कम जगह घेरती है (bikers तो खैर सब "धूम" प्रेरित हैं ) इसलिए आड़ा तिरछा इधर उधर कहीं से भी गाडी निकालना उनकी ख़ास "स्टाइल" है. 

एक हैं चार पहिया वाले, इनमे ज़रा श्रेणीक्रम है … एक हैं बड़ी गाड़ियां जैसे  बोलेरो, स्कार्पियो, फिर हैं मध्यम साइज़ और आखिर में छुटकू कार जैसे बिचारी मारुती 800. तो ये सब लोग अपनी कार की साइज़ के हिसाब से सड़क पर अपना हक़ मानते हैं और उसी अनुपात में दूसरों से जल्दी आगे निकलने में लगे रहते हैं. जैसे बोलेरो और बड़ी लक्ज़री कार वाले छुटकू कार को  हड़काएँगे और ऑटो वाले को तो किसी गिनती में नहीं रखेंगे। अब बड़ी गाडी की बात हो और सरकारी गाडी  का ज़िकर ना हो ये हो नहीं सकता। ये गाड़ियां स्पेशल हैं, इनके ड्राईवर और अंदर बैठे लोग भी स्पेशल हैं. इनको फुल स्पीड भागने का विशेषाधिकार है, कृपया इसकी अवमानना ना की  जाए. 

इस सब के बाद हैं ट्रेक्टर, ट्रॉली, ट्रक, सिटी बस, टैक्सी वाले। जिनके बारे में कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने के बराबर; कारण कि समाजवाद का मूल  आधार, शक्ति का स्त्रोत, क्रान्ति के वाहक यही लोग है. सर्वहारा  वर्ग, मजदूर किसान, निम्न वर्ग या निम्न मध्यम  वर्ग (बुर्जुआ सर्वहारा).  समाजवाद इन्ही कि कृपा से आया है और इनके कारण ही बना हुआ है. अतः सड़क पर इनके अधिकार किसी भी शाब्दिक  व्याख्या  से बाहर की चीज़ है. 

इतने अलग अलग किस्म की विविधता को समेटे भारतीय सड़कें अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता, सहनशीलता और निस्पृहता के कारण मुझे एक बड़ा बहुत बड़ा डरावना जाल   लगती हैं. कभी chess बोर्ड वाला जाल, जहां चलने के नियम तो बने पर ऊंट, घोडा, हाथी कब कहाँ कैसे मुड़ेंगे, बैठेंगे पता लगना मुश्किल है.  और कभी ये मकड़ी का जला लगता है, समझ नहीं पड़ता कि कहाँ से निकलें, कैसे फंसे और कहाँ रुकेंगे। 

हर रोज़ गाडी चलाते वक़्त ऐसा लगता है कि गाडी के पहिये जिस तरह सड़क पर दौड़ते हैं वैसे पहिये ज़िन्दगी को भी लगे हैं तभी तो ये लगातार भागती जाती है बिना रुके बिना थके.  इसकी गति, लय ताल का कोई जोड़ नहीं, केवल सफ़र है मंज़िल नहीं।  जाने क्यों ये भागने का विचार मन में गहरे तक पैठ गया है. लगता है कि "सबकुछ" भाग रहा है समस्त ब्रह्माण्ड भाग रहा है लेकिन भागने के साथ ही कहीं कुछ अटका हुआ भी है. कुछ ऐसा जो बेहद मामूली है, कुछ फालतू है और कुछ कीमती या बेशकीमती भी है.   

सडकों से भी ज्यादा अगर कुछ जादुई है तो वो रेल की पटरियां है. लोहे की बनी पर बेहद लचीली पटरियां …ट्रेन के साथ साथ पटरियां भी भागती है, मुड़ती हैं, कभी साथ मिलती कभी अलग होती है. कहने को  है कि पटरियां कहीं नहीं जाती एक ही जगह स्थिर रहती हैं पर फिर भी नज़रों को साफ़ धोखा देते हुए वे ट्रेन के बराबर वेग से दौड़ती दिखती हैं. कभी आपने चलती ट्रेन में खिड़की से नीचे की तरफ देखा होगा तो वहाँ पटरियां अपना अलग ही खेल खेलती दिखेंगी। जैसे कोई मैजिक शो चलता हो वैसे ही ट्रेन भी जब धीमे धीमे रफ़्तार पकड़ती है तब आहिस्ता आहिस्ता पटरियां भी बदलती है, कैसे बड़ी सफाई से एक  से दूसरी पटरी पर पहुँच जाती है. कैसे अभी ये वाली पटरी इतनी दूरी पर समानांतर चल रही थी और कैसे अभी एकदम पास और फिर ट्रेन झट से उस पर चढ़ गई. कैसे  भागती दौड़ती पटरी बीच में ही रुक गई क्योंकि उसकी लाइन ख़त्म हो गई. आपस में क्रॉस होती, नदी की धाराओं की तरह शाखाएं बनाती पटरियां … किसी रहस्य से कम नहीं हैं.


सड़क पर जब बड़ी सफाई से खराब ट्रैफिक या टूटी हुई सड़कों पर हम गाड़ियां मोड़ते या निकालते हैं तब खुद पर बड़ा नाज़ होता है, बड़े ही सधे  हाथों से तेज़ रफ़्तार से 4th  या 5th गियर में गाडी दौड़ाते अपने ही अंदाज़ पर फ़िदा हुए जाते हैं हम. और तब मुझे ट्रेन  याद आने लगती है. ट्रेन  के लोको पाइलट जो पटरियों पर ट्रेनो को दिन रात दौड़ाते सकुशल अपनी मंज़िल तक ले जाते हैं तब लगता है कि उनसे ज्यादा एक्सपर्ट और daring ड्राईवर और कोई नहीं हो सकता।

जाने ये किस चीज़ का सम्मोहन है, स्पीड का, या रास्ते का या उन साधनो का जो रास्ता तय करने में हमारी मदद करते हैं. नहीं जानती।