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Thursday, 7 August 2014

चौराहे पर सीढ़ियां : Book Review

कभी कभी फ़ास्ट फ़ूड से मन भर जाता है, मुग़लई या या ऐसा ही कुछ "देसी" दाल बाटी सरीखा खाने का मन करता है फोर्थ गियर में गाडी दौड़ाते दौड़ाते लगता है कि ज़रा स्पीड कम कर ली जाए, सेकंड गियर में चलाया जाए। कूदते फांदते, भागते वक़्त के पैरों को ज़रा थाम लिया जाए, रोक लिया जाए. घडी की  सुइयों को ही धीमा कर दिया जाए. तसल्ली से बैठ कर एक कप गरम  चाय के साथ भुजिया खाते हुए सुस्ताया जाए.  कुछ ऐसे ही मिज़ाज़ की कहानियों का नाम है "चौराहे पर सीढ़ियां". किशोर चौधरी का लिखा एक बेहतरीन कहानी संग्रह जो हिंदी के बेस्ट सेलर में गिना जा रहा है. इस किताब को पढ़ते वक़्त ऐसा लगा जैसे वक़्त खुद कहानियाँ सुनने के लिए ठहर गया है या धीमे धीमे बीत रहा है.

इस संग्रह की  खासियत है इसका मिज़ाज़, इसकी भाषा, शिल्प और कहानी सुनाने का अंदाज़ ( जी हाँ लेखक आपको एक कहानी सुना रहा है, बैठिये उसके पास और सुनिये कि वो क्या कहता है).   आप कहेंगे कि मैं तो लेखक की  और उसकी किताब की  बड़ी तारीफें किये जा रही हूँ पर ऐसा नहीं है, मैं तो केवल भूमिका बाँधने की  कोशिश कर रही हूँ. दरअसल इस किताब को आप ऐसे ही भागते दौड़ते, बीच में से समय निकाल कर, यूँही महज़ समय काटने के लिए नहीं पढ़ सकेंगे। इन कहानियों के लिए आपको समय निकालना होगा, पढ़ने के साथ इन्हे समझना भी होगा कि ढेर सारी  उपमाओं, प्रतीकों और उदाहरणों के बीच कहानी कब किस मोड़ से गुज़र रही है.



संग्रह का नाम जिस कहानी के नाम पर रखा गया है "चौराहे पर सीढ़ियां", वो इस संग्रह की सबसे अच्छी कहानी है या नहीं ये निर्णय पाठक खुद करें। मुझे इसमें  जो दिखाई दिया वो है लेखक की अद्भुत कल्पनाशीलता और लोक जीवन में गहरे पैठी  हुई  मानसिकता को पहचानने की  नज़र. सीढ़ियां एक प्रतीक है, एक बहाना है जिनके ज़रिये कहानी कही जा रही है और आप पूरी तरह आज़ाद हैं इन सीढ़ियों को "घर की बेटी", "बुजुर्ग"  "रिश्ते नाते सम्बन्धो"  या और किसी भी मूर्त अमूर्त चीज़ से जोड़ने के लिए, बस इतना याद रखिये कि सीढ़ियां घर का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा  हैं जो अब घर की चौखट लांघ कर चौराहे पर खड़ी  है और चौराहे पर आने के बाद किसी भी घटना, पात्र और प्रतीक का कैनवास बहुत बड़ा हो जाता है. खुद चौराहा भी इसमें एक पात्र है. जब पहली बार मैंने कहानी पढ़ी तो मुझे लगा कि सीढ़ियों का अर्थ बेटियों से या लड़कियों से है, दूसरी बार लगा नहीं शायद  घर के बड़ों से है और तीसरी बार लगा कि कुछ और है.  अर्थ यही कि आपकी कल्पना के लिए यहाँ बहुत से हिंट और क्लू हैं.  

इस संग्रह की दूसरी कहानियों में  "परमिंदर के इंतज़ार में ठहरा हुआ समय", "खुशबू बारिश की नहीं मिटटी की  है",  "बताशे का सूखा हुआ पानी",  "एक फासले के दरम्यान खिले हुए चमेली के फूल",  और "लोहे के घोड़े" मुझे ज्यादा याद आ रही हैं.  "परमिंदर" की कहानी में हास्य और व्यंग्य दोनों को  धीर गम्भीर भाषा के ज़रिये पेश किया गया है जो इस स्कूल लव स्टोरी को और भी रोचक बना देता है.  चमेली के फूल, लोहे के घोड़े और चाँद का सूखा बताशा, इन कहानियों  में इनके पात्रों के आपसी सम्बन्ध, जीवन के उतार चढ़ाव और अनुभव ही एक पूरी  कहानी बुनते जा रहे हैं. और तब पाठक सोचता है कि ये तो रोज़मर्रा की  ज़िन्दगी का हाल है, क्या  इसे भी कहानी के रूप में लिखा जा सकता है ?  जवाब लेखक ने हाँ में दिया है.

 इन कहानियों  में राजस्थान  दिखाई देता है, छोटे शहर, कसबे, गाँव की कहानियाँ और वहीँ के पात्र भी. यहाँ आपको गाड़िया लोहार, रेगिस्तान के किसी दूर दराज गाँव का स्कूल मास्टर, भोपे, लोक भाषा के शब्दों की सहज उपस्थिति, लोक कथाओं और आस्थाओं का सन्दर्भ,  हेरिटेज होटल की पृष्ठभूमि और  जेठ की चिलचिलाती धूप  का पसरा हुआ आँचल और मेह के इंतज़ार में बाट  जोहते  हुए दिन मिलेंगे। पर फिर भी हम इन कहानियों को किसी एक खांचे जैसे केवल ग्रामीण परिवेश की कहानियां या स्त्री केंद्रित विषय तक सीमित नहीं कर सकते। यहाँ होस्टल में अकेलेपन से जूझने वाली अंजलि भी है वहीँ  सुगणी भी है जिसकी  दुनिया थार के एक कोने में अपने पति गोमिन्दा के आस पास  सिमटी हुई है. फिर यहाँ "गीली चौक" की सीलन का सबब ढूंढते और "रात की अँधेरी बाँहों"  में दो टीनएजर्स की प्रेमकथा के सूत्र सुलझाने में लगे हुए सूत्रधार जैसे दो पुरुष पात्र भी हैं. एक तरफ सिमली का सशक्त पात्र है जो रेत  के सागर में अपने हिरण कुलांची  वाले  मन का ठिकाना तलाश रही है और मन है कि कहीं टिकता ही नहीं; वहीँ  एक सिंगल मदर  नैना है जिसे एक घर की तलाश है, सर पर एक छत और ज़िन्दगी के भरे पूरे होने का अहसास दे सके ऐसे कुछेक रिश्तों की तलाश है.  

ना तो कहानियों की विषयवस्तु असाधारण है और ना इनके पात्र, असाधारण अगर कुछ है इसमें तो कहानी सुनाने का तरीका, सूत्रधार की तरह जो आपको बताता चलता है कि कब क्या हो रहा है.  इन कहानियों में आपको बड़े दिलचस्प विवरण मिलेंगे, ऐसी तुलनाएं और उपमाएं पढ़ने को मिलेंगी जो शायद आपने पहले कभी नहीं सोचा होगा कि चीज़ों को इस नज़रिये से भी देखा जा सकता है.

यहाँ आपको समय का एक चेजारा मिलेगा जो हर रोज़ नया दिन उगाता है, जहां घर चुप्पियों के शोर से गूंजते हैं, जहां चौराहे का माथा खुजाने के लिए कनखजूरे सीढ़ियों के रास्ते आते हैं;  जहां कांसे के रंग वाली सांझ आती है और रात पखावज की तरह बजती है और उसके साथ संगत  के लिए ह्यूमन नोड्स वाली सारंगी भी है. एक निराश्रित बेवा के फटे ओढ़ने जैसी सड़कें है और  मगरमच्छ की तरह गुलाची खाने वाले रास्ते भी है. निश्चित रूप से एक संवेदनशील पाठक को बाँध लेने के लिए एक नए किस्म की लच्छेदार भाषा है ये.  


 अंग्रेजी में जिसे हम कहते हैं थॉट प्रोसेस, तो कहानियाँ पढ़ते वक़्त उस प्रक्रिया की गहराई, परिपक्वता और उसके विविध आयामों का एक खूबसूरत उदाहरण है ये किताब। किशोर चौधरी की इन कहानियों की एक खासियत ये है कि इनमे कोई एक फिक्स थीम नहीं है कि  "एक बार की बात है, ऐसा हुआ और फिर वैसे और फिर इस तरह किस्सा ख़त्म हुआ". देखा जाए तो ये कहानियाँ  किसी एक घटना या किसी ख्याल को केंद्र में रखकर  अपने पात्रों  के ज़रिये जीवन यात्रा को उकेरती, पात्रों के अंदर और बाहर की दुनिया का हाल चाल बताती  चलती  हैं, और अक्सर ऐसे ही कहीं एक मोड़ पर आकर रुक जाती हैं और तब लेखक याद दिलाता है कि कहानी ख़त्म हो गई;  अब यहाँ से आगे इसे  आपकी कल्पना ले जायेगी।


खैर, अब तारीफ़ बहुत हो गई, अब कुछ  तीखी बातें भी होनी चाहिए। इन कहानियों में  जो  अच्छा नहीं लगता वो है, इन सबका एक जैसा रंग रूप यानि लगभग सभी कहानियों में धीमा और उदास समय है जो मौसम के बदलते रंग  पर अक्सर भारी पड़  जाता है.  इस किताब को पढ़ते समय मुझे निर्मल वर्मा का एक  कहानी संग्रह  याद  आ गया (नाम भूल रही हूँ)  जिसमे बर्फ और  बारिश एक ऐसा मौसम है जो लगभग हर कहानी में था; कुछ वैसा ही धूल उड़ाते दिन और रात, इंसान के भीतर और बाहर की आग और गर्मियों की धूप  में तपे  हुए लम्बे दिन, इन कहानियों में बार बार दिखते  हैं.  ऐसा लगता है कि  कई जगह विवरण बहुत ज्यादा भारी और बोझिल हो गए हैं जिनसे कहानी का प्रवाह भी टूट ही जाता है, उस समय एक औसत पाठक ये सोचने पर मज़बूर हो सकता है कि वो कहानी पढ़ रहा है या कोई निबंध जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान या किसी और विज्ञानं से है.  कुछेक कहानियाँ ऐसी भी लगी जिनके लिए समझ पाना मुश्किल है कि, आखिर इन पात्रों और उनके इर्द गिर्द बुने संसार के ज़रिये लेखक क्या कहने की कोशिश कर रहा है. "एक अर्से से", "गीली चॉक " और  "सड़क जो हाशिये से कम चौड़ी थी" को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है.  इसके अलावा संवादों की कमी होना ज़रा अखरता ही है,  क्योंकि कहानी के पात्र जितना ज्यादा आपस में  बात करेंगे, वो किस्सा कहानी उतना ही ज्यादा जीवंत होकर पाठक के सामने आएगा और पाठक खुद उसका हिस्सा बनता जाएगा।

पर जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि इस किताब को पढ़ने के लिए आपको समय निकालना होगा तभी आप इस धीमे लेकिन लयबद्ध शब्दों के प्रवाह के साथ कदमताल कर पाएंगे। इस बात को लेखक ने एक कहानी में कुछ इस तरह समझाया है कि,  "ज़िन्दगी जिसे कहते हैं वह कैसी यात्रा है?  कैसी तलाश है? जो माया की तरह आसपास  महसूस तो होती है मगर दिखाई नहीं पड़ती, सामने नहीं आती, खुलकर बयान नहीं होती।"  जैसा उन्होंने एक और  जगह भी  कहा है कि 

"ये एक आदमी के दिमाग में दर्ज हो रही घटनाओ का बेतरतीब ब्यौरा है."

इस रिव्यु को आनक पत्रिका के  तीसरे अंक  के  लिए लिखा गया था 

Image courtesy : Google