Saturday, 25 February 2012

एक खुला दरवाजा

जब खुदा अपना दरवाजा बंद कर लेता है तब...दुनिया अपना दरवाजा खोल देती है...अपनी बाँहें फैला देती है ..समेट लेती  है अपने आँचल में, अपनी गोद में, इस तरह कि अपना ही होश नहीं रहता, ऐसे कि उसके प्यार का नशा जागते हुए  भी सोते रहने को मजबूर कर देता है, ख्वाब दिखाता  जाता है  ...

जब खुदा अपना रास्ता बदल देता है तब ....दुनिया का हर रास्ता खुल जाता है....उसका हर रास्ता जाना पहचाना हो जाता है..हर गली अपनी और हर मोड़ ठिकाना बन जाता है...खुदा जब अपना दरवाजा बंद कर लेता है तो...दुनिया के सारे दरवाजे, खिड़कियाँ और परदे खुल जाते हैं..हर चेहरा, हर नाम, हर पता, हर वो रास्ता जो कहीं आगे जाता है या नहीं जाता या आगे जाकर बंद हो जाता है , वो सब आगे बढ़कर गले लगाने  लगते हैं ...और आखिर में भुला देते हैं कि कौनसी वजह थी, कौनसा सफ़र था, कौनसा रास्ता था, कौन था, कहाँ था ...कुछ था भी या नहीं...

और इसलिए खुदा के बंद दरवाजों को हमेशा खटखटाते रहना चाहिए, याद दिलाते रहना चाहिए...उसे नहीं खुद को, कि कहाँ जाना है, क्यों जाना है, किस राह पर रुकना है और इसलिए  कि कहीं हम खो ना जाएँ ....

Wednesday, 25 January 2012

बाबुल जिया मोरा घबराए, बिन बोले रहा न जाए।
बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे सुनार के घर मत दीजो।
मोहे जेवर कभी न भाए।


बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे व्यापारी के घर मत दीजो
मोहे धन दौलत न सुहाए।

बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे राजा के घर न दीजो।
मोहे राज करना न आए।

बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे लौहार के घर दे दीजो
जो मेरी जंजीरें पिघलाए। बाबुल जिया मोरा घबराए।


प्रसून जोशी द्वारा लिखित एक बेहतरीन रचना 

Thursday, 19 January 2012

दो अलग परछाइयां

तुम और मैं दो अलग जिंदगियां हैं. हम दोनों दो अलग दुनिया हैं. हम दोनों समय के दो अलग -अलग आयाम, दो अलग टुकड़े हैं. हम कभी नहीं मिलेंगे, हम कभी नहीं जुड़ेंगे या जुड़ पायेंगे एक--दूसरे से. हम में इतना ज्यादा फर्क है कि मिलना नामुमकिन है. हमारी दुनिया, हमारे सपने, हमारे रास्ते और हमारी ख्वाहिशें सब इतनी जुदा हैं कि मिलने या साथ होने के बारे में सोचना ही असंभव है.

हम दोनों की नज़रें अलग-अलग दिशाओं में अलग अलग नज़ारे देख रही हैं. एक--दूसरे को जो नाम और जो पहचान  हमने दी  है, उनका अर्थ भी हम दोनों के लिए अलग-अलग है.और इसलिए हम दोनों दो अलग  दुनिया, दो अलग वक़्त हैं जो कभी एक--दूसरे से नहीं मिल सकते. हम दोनों सिर्फ दो अलग इंसान ही नहीं, उस से भी ज्यादा "हम दोनों" जैसा कहने के लिए कोई आधार तुम्हारे और मेरे बीच नहीं है. जो है तो सिर्फ "हम" जैसा कुछ होने का वहम, कहीं कुछ एक परछाईं सा, एक नाज़ुक धागा जो "हम" होने के वहम को बनाये हुए है. लेकिन "हमदोनो" ही जानते हैं कि  ये सिवाय वहम के और कुछ भी तो नहीं.

Sunday, 15 January 2012

ख़्वाबों - ख्यालों का बुलबुला : इन्टरनेट

इन्टरनेट एक महासागर है. प्रशांत महासागर से भी ज्यादा गहरा सागर. इसका विस्तार हमारी धरती से भी आगे तक चला गया है (ब्रह्मांड का कौनसा कोना या कोई दूर दराज की आकाशगंगा सब ही तो मौजूद है सिर्फ एक क्लिक पर).  इस सागर की गहराई ऐसी है कि संसार के सारे सागरों का पानी भी इसमें समा जाए फिर भी जगह बची रहेगी. इस सागर में आप मन चाहे जितना तैर सकते हैं, डूबना चाहे तो वो भी संभव है, इसकी गहराई का कोई अंत नहीं है.. लेकिन इन्टरनेट के संसार के पास ऊँचाई  का आयाम नहीं है, उसकी तलाश भी बेकार है..यहाँ से आप कहीं ऊपर उठ सकते हैं या किसी हिमालय की ऊँचाई को नाप सकते हैं..ऐसा ख्याल मुझे तो  समझ नहीं आता... मगर पिछले कुछ वक़्त से कुछ  ख्याल मन में आ रहे थे .. अब इसे मेरा पूर्वाग्रह  कहिये या अनुभव या मेरा observation या खाली दिमाग की कसरत...

इन्टरनेट एक आभासी दुनिया है, एक virtual reality virtual world ...है ना.. पर फिर भी यहाँ हम जिन लोगों से मिलते हैं वो असली होते हैं (अब यहाँ fake profiles को छोड़ दीजिये). वो नाम, वो तसवीरें, उनके जीवन और उसमे होने वाली घटनाएं भी असली और सच होती हैं (कुछ हद तक....बाकी...भगवान् जाने).. उनसे हम बातें करते हैं, साथ - साथ हँसते हैं, हंसाते हैं, कभी कभी दुखी भी हो जाते हैं (शायद ..) कभी उन में से किसी को याद भी करते हों...पर फिर भी यहाँ कोई चीज़, इंसान, कोई रिश्ता (नाम चाहे जो रख लीजिये) वो हमेशा के लिए नहीं होता..जब तक  स्क्रीन ऑन है तब तक आप हैं और इन्टरनेट का असली या नकली(जैसा भी) संसार है. एक बार स्विच ऑफ किया तो सब वहीँ ख़त्म. इन्टरनेट का महासागर, उसके जीव जंतु, झाडी-पौधे  सब वहीँ सो जाते हैं..उनका अस्तित्व बस उस स्क्रीन पर आकर रुक जाता है (कभी कभी असल ज़िन्दगी में भी आ जाते हैं, फोन या personal मीटिंग के ज़रिये..पर..)

पर ये सारा मामला उतना सीधा, सरल और साधारण भी नहीं है...अभी कुछ दिन-हफ्ते हुए एक किताब पढ़ी,  "I Too had a Love Story"  और फिर एक दिन यूँही किसी ब्लॉग को छान रही थी, वहाँ कुछ  budding या already "बेस्टसेलर" लेखकों की आने वाली या आ चुकी किताबों का विवरण दिया हुआ था.. अब संयोग से जिन  २-४ किताबों का introduction मैंने पढ़ा, वो सब लव stories थीं, शुरुआत इन्टरनेट से, फिर फोन और उसी में सारा किस्सा शुरू होकर राम जाने कौन कौन से ट्विस्ट-turns  लेता जाता है..असल ज़िन्दगी में उस इन्सान से मिलना या उसको जानना तो अभी दूर किसी ५-६वे अध्याय में होगा...कहानी तो फिलहाल शुरू हो गई और अच्छे से चल भी गई...मैं यहाँ उन किताबों या उनके लेखकों का कोई मज़ाक नहीं बना रही..आखिर ये किताबे और उनकी कहानियाँ बाज़ार में खूब बिकती हैं तो ज़रूर कुछ वजह से ही..

पर ऐसा क्यों हो रहा है कि हम इन्टरनेट पर अपने लिए ऐसे रिश्ते तलाश कर रहे हैं, रिश्ते बना रहे हैं और उनको बनाए भी रखना चाह रहे हैं( शायद..यकीन से नहीं कह सकती..) कारण ये है कि इन्टरनेट हमारी ज़िन्दगी का एक विस्तार, एक ब्रांच, एक नया आयाम बन गया है. जो खूबसूरत है, जहाँ हर पल कुछ नया है, जहाँ विकल्पों की कोई कमी नहीं, जो आपको तब तक अपनी गोद में खिलाता रह सकता है जब तक आप चाहें.... यहाँ बहुत सी सहूलियतें हैं  (अपनी असली पहचान  बताइए, ना बताइए..बढ़ा - चढ़ा कर बताइए..जो मन करे सो बताइए, कौन आ रहा है आपको देखने या पूछने..) पर जब इतना सब कुछ यहाँ अनिश्चित है, विश्वास करना ज़रा मुश्किल है, तब क्यों लोग यहाँ अपने लिए दोस्त और जाने कौन कौन से सम्बन्ध तलाश लेते हैं..उनकी असल ज़िन्दगी में ऐसी कौनसी कमी है या क्या ऐसा है जो मिल नहीं रहा वहाँ, इसलिए यहाँ इन्टरनेट पर ढूँढने चले आये हैं.. मेरे एक मित्र तलत बारी ने इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों के बारे में एक बहुत सटीक बात कही..उनके अनुसार तीन किस्म के लोग यहाँ आते हैं..

१. एक वो, जो अपनी frustration (कुंठा) दूर करने आते हैं (कुंठा कैसी भी हो सकती है..वो सवाल यहाँ नहीं है).
२. दूसरे वो,  जिनके लिए  इन्टरनेट खुद को एक सेलेब्रिटी की तरह पेश करने का जरिया है. फोटो अपलोड करना, उन पे ढेर सारे कमेंट्स आना, अनगिनत दोस्त (जाने-अनजाने)...
३. तीसरे वो है,  जिनके लिए ये इन्टरनेट एक गुड्डे -गुडिया का खेल है. यहाँ गुड्डा भी अच्छा है, गुडिया भी बहुत अच्छी है..उनके लिए ये सारा कुछ एक प्यारी सी  खूबसूरत फिल्म की तरह चल रहा है.

मेरे ख्याल से बहुत से और लोग भी उपर्युक्त  व्याख्या से सहमत होंगे..

दरअसल, हम सब एक खूबसूरत ख्वाब तलाश कर रहे हैं, ऐसा ख्वाब जो हर तरह से सही है, मुकम्मल है, अच्छा है, प्यारा सा लगता है और हम चाहते हैं कि वो बस यूँही बना रहे.  और जो हमारी असल ज़िन्दगी में हमें मिल नहीं  पा रहा या मिल भी रहा हो तो भी  और बेहतर या और ज्यादा  की चाह हमें यहाँ  इस आभासी दुनिया में ले आती है. हम बस यहाँ अपनी पसंद की एक दुनिया बना लेते  हैं, जिसके  आवरण में हम अपने  असल ज़िन्दगी के पैबंद और कमियों को बड़ी सफाई से छुपा लेते हैं..ये सोच कर कि असल ज़िन्दगी में  न सही, इस छलावे की  दुनिया में तो हम, हमारा जीवन रंगीनियों से लबरेज़ नज़र आये..

   इसी ख्वाब या मृग मरीचिका की खोज इन्टरनेट में पूरी हो रही है..जहाँ हर कोई खुद को परफेक्ट रूप में पेश करता है, यहाँ हर कोई cheerful  है, full ऑफ़ energy है, cool  है और बस "बहुत अच्छा है". दिल को अच्छा लगता है, क्योंकि अभी तक यहाँ स्क्रीन पर हम उस इंसान के या उस रिश्ते के सिर्फ एक ही पक्ष को तो देख पाएं हैं, अभी दूसरा पक्ष जो असल व्यावहारिक ज़िन्दगी में होता है, उस से तो  वास्ता पड़ा ही नहीं..कब पड़ेगा इसका अता  पता भी नहीं..ये खुली आँखों का ख्वाब जो हम नेट के ज़रिये देख रहे हैं उसका ज़मीनी रंग कैसा है, कैसा नहीं है, क्या असल में वो ख्वाब ठीक वैसा ही है जैसा वो नेट पर दिखाई दे रहा है? और सबसे बड़ी बात क्या असल में कहीं सचमुच उस ख्वाब का कोई अस्तित्व भी है? शायद ना हो..शायद हो भी..पर दोनों ही सूरतों में हमारे हाथ क्या लगना है??   सम्बन्ध की जो गर्माहट हमें इन्टरनेट के ज़रिये महसूस हो रही है, जो महत्व हमें मिलता नज़र आता है,  जो जगह हम अपने लिए और उन दूसरों के लिए बना कर बैठे हैं, असलियत में उसकी कहीं कोई अहमियत है भी या नहीं...उन लोगों की नज़र में, अपनी नज़र में..अगर असल ज़िन्दगी  में वो इंसान हमें मिलते तो क्या तब भी उनके साथ वैसा  ही रिश्ता बन पाता...

या ऐसा क्यों है कि असल ज़िन्दगी में जो लोग, रिश्ते हमारे  आस-पास हैं,  उनमे कुछ कमी सी लगती है?

देखा जाए तो,  इन्टरनेट कुछ और नहीं पर शब्दों का एक बेहद हसीन  इंद्रजाल है, जिसमे हम खुद को और दूसरों को उलझाए और बहलाए रखते हैं...जहाँ हर बात का (Hello, Good Morning , Good Night  कहने  तक ) का एक customized version होता है दो लोगों के बीच..पर अगर नहीं  होता तो असल ज़िन्दगी में उनको बाँध सके,  ऐसा कोई एक धागा नहीं होता..हो भी नहीं सकता..भौगोलिक दूरियां..अगर हम ना भी माने तो भी और बहुत सी दूरियां इस समाज और दुनियादारी के लिहाज से महत्त्व रखती ही हैं..एक सीमा आती है, जब हम चाहते हैं कि ये सपना,  ये  इन्टरनेट का इंद्रजाल सच हो जाए, स्क्रीन से बाहर निकल आये.  हम या तो इसे पूरी तरह पा लेना चाहते हैं..या फिर इसे ख़त्म ही कर देना चाहते हैं..किसी नशे की आदत की तरह ख़त्म तो ये हो नहीं सकता, बस एक के बाद एक तसवीरें, नाम बदलते रहते हैं. कल तक  जिन से हम महीनों तक बातें कर रहे थे..अपनी खुशियाँ, सुख-दुःख साझे कर रहे थे.. अचानक या धीरे धीरे से, इस या उस कारण से उनके साथ communication कम होता जाता है और आखिर पूरी तरह ख़त्म भी हो जाता है.

कोई कह सकता है कि इतने लम्बे वक़्त से जिन लोगों से हम बात कर रहे हैं,  उनको इतना या उतना जानते हैं..क्या उन पर भी विश्वास ना करें? क्या अपनी बुद्धि पर भी नहीं? तो इसका जवाब भी तलत ने बड़ी सरलता से दिया.." लम्बे वक़्त तक एक इंसान से बातचीत खुद उस इंसान को ही भुला देती है कि वो क्या है? पहले वो हमें बताता है कि वो कौन है, क्या है. फिर हम उसे बताते हैं कि वो ऐसा है या वैसा है या कैसा है.. और फिर सामने वाला भी उसी बात को सही, सच मान कर reply करता जाता है."  

 और इस तरह ये एक श्रृंखला चलती जाती है. यहाँ इन्टरनेट पर हम हर रोज़ नए नए रंग में रूप में उस सामने वाले इंसान की नज़र और पसंद के हिसाब से ढलते जाते हैं. और इस तरह अलिफ़ लैला का ये किस्सा कभी ना ख़त्म होने की तर्ज़ पर चलता रह सकता है..कम से कम तब तक, जब तक कि दोनों में से एक को कोई और बेहतर, ज्यादा दिलचस्प "विकल्प" ना मिल जाए..और इसलिए जैसा कि
 मैंने शुरुआत में कहा था, यहाँ इस सागर में आप डूब सकते हैं, तैर सकते हैं, लेकिन फिर भी अंत में थक कर सूखी ज़मीन का कोई कोना, कोई किनारा  तलाशना ही पड़ता है..


लेकिन इन्टरनेट का सपना नहीं रुकता..एक की जगह कोई दूसरा आ जाता है..दूसरे  की जगह तीसरा, यानी यहाँ किसी की कोई ख़ास जगह या भूमिका नहीं है. .हमारे नश्वर संसार का सबसे अच्छा उदाहरण है इन्टरनेट..मेरे एक इन्टरनेट वाले दोस्त ने ही एक बार मुझसे  कहा था कि, एक दिन ये सब कंप्यूटर, इन्टरनेट केबल्स, ये सब crash  हो जायेंगे तो क्या तब हम बात नहीं करेंगे एक दूसरे से? तब क्या हमारा एक-दूसरे के लिए  कोई अस्तित्व नहीं होगा? क्या उस सूरत में हम कभी नहीं मिलेंगे?

सवाल अपनी जगह बिलकुल वाजिब थे पर  मैं इन सारे सवालों का कोई जवाब नहीं दे पायी थी..जवाब था भी नहीं मेरे पास.. और मजे की बात ये है कि उस सवाल करने वाले से अब मेरी सच में बिलकुल बात नहीं होती...ऑनलाइन होते हुए भी, visible होते हुए भी नहीं....


Saturday, 7 January 2012

ज़िन्दगी इस पार, ज़िन्दगी उस पार

यहाँ से वहाँ तक...ज़िन्दगी के इस छोर से उस अनंत  तक जाने वाले दूसरे छोर तक एक नए रास्ते,  नई दिशा और नए सपने की तलाश है..ज़िन्दगी के इस किनारे से उस दूसरी तरफ के किनारे तक, जहाँ मेरी नज़रों का विस्तार नहीं पहुँच सकता ..उस किनारे के रंग-ढंग, आकार और रूप को मैं अभी से जान लेना चाहती हूँ....जान लेने के लिए पा लेने के लिए और थाम कर रख लेने के लिए मैं बेकरार हूँ...ज़िन्दगी इस पार से चलकर जब तक उस पार  पहुंचेगी, तब तक का इंतज़ार बहुत लम्बा और थका देने वाला लगता है..ऐसा लगता है कि वक़्त बहुत कम बचा है, बहुत थोड़े  से लम्हे हैं  जिनमे बहुत सारी दूरियां तय कर लेनी हैं, बहुत सी दिशायें और रास्ते जान लेने हैं...धरती के इस छोर पर खड़े वक़्त को उसके वर्तमान आयाम से अलग कहीं किसी और आयाम तक ले जाना है.. 

ज़िन्दगी इस पार या ज़िन्दगी उस पार..इस छोर से उस छोर तक, कि जिसके आगे अनंत आकाश की सीमा आरम्भ होती है..जहाँ से अगर लड़खड़ा के कदम फिसल भी जाएँ, पैरों का संतुलन बिगड़ भी जाए तो भी free -fall की तरह अनत में खो जाने, उसमे मिल जाने का अहसास हो...

ऐसा एक पल ज़िन्दगी का इस पार या उस पार..इस छोर पर या उस छोर पर...आकाश और धरती के बीच जहाँ नज़रों का भ्रम जन्म लेता है ..उस क्षितिज की तलाश में ...

Thursday, 29 December 2011

उस पार --1

वो झील के किनारे बैठी थी. उसके पैर एडियों  तक पानी में डूबे हुए  थे और  उसके लम्बे रेशमी  बाल  उसकी पीठ पर बिखरे थे और ज़मीन को छू रहे थे. उसने एक लम्बा सा  फ्रौक पहन रखा था जिस पर नीले, सफ़ेद और पीले रंग ऐसे लग रहे थे जैसे किसी चित्रकार ने यूँ ही ब्रश चलाया हो.. उसके चेहरे पर एक  मुस्कराहट थी और वो अपने ही जाने कौनसे  ख्यालों में खोई हुई थी.  उसकी आँखें अपने आस पास के वातावरण की हर चीज़ को एक आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी के साथ देख रही थी, जैसे उस खूबसूरत, शांत और अनछुए कुदरत के नजारों को अपनी आँखों में क़ैद करती जा रही हो...उस वक़्त उसे सिवाय उन नजारों के और किसी चीज़ का शायद ही कुछ ध्यान रहा होगा..अचानक उसे अपने हथेली के पास  कुछ गुदगुदी सी महसूस हुई, उसने देखा एक मखमल सा सफ़ेद खरगोश उसके हाथ के पास अपनी छोटी सी नाक से ज़मीन रगड़ रहा था..उसे हंसी आई, जैसे कोई छोटा बच्चा हंसा हो ...

उसने एकदम से बढ़कर खरगोश को पकड़ने की कोशिश की..पर ये क्या, वो तो एक ही क्षण में  जाने कितनी दूर तक दौड़ गया..वो भी उसके पीछे भागी ..और फिर एक झाडी से दूसरी झाडी के पीछे, एक पेड़ से दूसरे पेड़ की तरफ, एक कोने से दूसरे तक..वो खरगोश के पीछे दौड़ती रही कि शायद पकड़ में आ जाए..उसकी साँसे तेज़ हो रही थीं पर उसकी हंसी पूरे माहौल में गूँज रही थी ..अचानक उसने कुछ महसूस  किया, वो रुक गई, पीछे मुड़ी, उस दिशा में देखने के लिए, जिसने अचानक उसके खेल में विघ्न डाल दिया था.. 

वहाँ एक लड़का खड़ा था, उसे अजीब सी निगाहों से देखता हुआ, जैसे किसी अनिश्चय में डूबा हुआ...उसने भी लड़के को देखा..सर से पैर तक ..उसकी निगाहों में एक कठोरता थी ..एक उपेक्षा, लापरवाही और थोडा सा गुस्सा भी ..जाने कितने सवाल थे उन आँखों में..शायद पूछना चाह रही थीं, " कौन हो तुम और किसकी इज़ाज़त से यहाँ तक चले आये हो?" पर फिर वो बिना कुछ कहे चुपचाप मुड गई , जिस तरफ से आई थी , उसी तरफ वापिस चली गई.. लड़का अभी भी उसे घूर  रहा था और फिर  कुछ सोच कर वो उसके पीछे चलने लगा..

"कौन हो तुम?" उस लड़के ने पूछा.

लड़की ने एक बार फिर  उसकी तरफ तीखी नज़रों से देखा जैसे कह रही हो, " तुम कौन होते हो पूछने वाले या क्यों पूछ रहे हो?" 
एक बार फिर से उसकी आँखें उस खरगोश को तलाशने लगीं जो अब पता नहीं कहाँ खो गया था और  कहीं भी  नहीं दिख रहा था..वो चुपचाप फिर से झील की  तरफ चली गई और वहीँ उसी जगह जाकर बैठ गई. उसका प्रतिबिम्ब पानी में झिलमिला रहा था और वो उसे देखे जा रही थी या शायद उसमे कुछ तलाश रही थी ..कहा नहीं जा सकता. 

लड़का भी अब तक उसके पास पहुँच चुका था. उसने पानी में  लड़की के प्रतिबिम्ब को देखते हुए  धीरे से पूछा, "क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ ?"  वो इतना नज़दीक खडा था कि अब उसका प्रतिबिम्ब भी पानी में  दिखाई देने लगा था, बिल्कुल लड़की के प्रतिबिम्ब के पास..उन दोनों की परछाइयां  झील की शांत और पारदर्शी  सतह  पर  एक-दूसरे में घुल मिलकर एक अलग ही तस्वीर बना रही थीं. 

"कौन हो तुम?"  सवाल दोहराया गया लेकिन लड़की ने एक बार फिर  इसे उपेक्षित कर दिया और पलट कर प्रति प्रश्न किया..

"तुम कहाँ से  आये हो?"
वो मुस्कुराया, " उस पार से.."

" उस पार..!! कहाँ  से.." निश्चित रूप से इस जवाब ने लड़की की जिज्ञासा बढ़ा दी.
"पहाड़ के उस पार से.." उसने थोड़ी दूर एक पहाड़ की तरफ अपनी ऊँगली से इशारा करके बताया. वो अब तक उसकी इस  दिलचस्पी को  समझ गया था. लड़की ने उस दिशा में देखा और दूसरा  सवाल किया, " क्या तुम यहाँ अक्सर आते हो?" 

"नहीं ज्यादा नहीं, सिर्फ कभी कभार, लेकिन कभी किसी को यहाँ नहीं देखा इसलिए तुमको देख कर कुछ हैरानी सी हुई."

"वैसे तुम कहाँ से आई हो?" अब पूछने की बारी लड़के की थी.

"उस पार से". 
वही जवाब उसे भी मिला और फिर उसने भी वही सवाल लड़की की तरफ दोहराया...

"नदी के उस पार से,"  अबकी बार लड़की ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
"लेकिन मैंने तो यहाँ कभी कोई  नदी नहीं देखी."

"क्योंकि तुमने कभी देखने की कोशिश नहीं की". 
"अच्छा.." अब हंसने की बारी लड़के की थी.

थोड़ी देर बाद लड़की के पैर पानी में छप छप कर रहे थे..

"तुम्हारा नाम क्या है?" लड़के ने पूछा.

"क्या उस से कुछ फर्क पड़ता है?" वो एक बार फिर हंसी.  फिर उसने  पूछा,  "अच्छा, पहाड़ के उस पार कैसी  दुनिया है?  मैं कभी वहाँ नहीं गई."

लड़के ने धीरे धीरे बताना शुरू किया, और इस तरह उन दोनों के बीच बातों का सिलसिला चल निकला...और यूँ ही चलता चला गया जाने कब तक, वहीँ झील के किनारे बैठे .. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि दोनों अजनबी हैं और अभी कुछ देर पहले ही मिले हैं...ऐसा लग रहा था जैसे दो पुराने दोस्त एक लम्बे अंतराल के बाद मिल रहे हों ..  समय के कांटे भी  जैसे कहीं रुक गए, सुस्ताने लगे,  उनकी बातें सुनने लगे...अचानक लड़की बातें करते करते रुक गई जैसे किसी चीज़ ने बेसाख्ता उसका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया हो..उसने लड़के की तरफ कुछ झिझकते हुए देखा..उसने समझा, और पूछा, "क्या हुआ?"

"मुझे वो फूल चाहिए." लड़की ने उंगली से इशारा करके बताया...वहाँ झील में फूल था..पूरा खिला हुआ, थोडा गुलाबी,  थोडा किनारों पर सफ़ेद और थोडा सा कुछ और हरे भूरे रंगों का मिश्रण.. फूल झील के किनारे से थोडा दूर था, वहाँ तक पहुंचना  ज़रा मुश्किल सा था..

"वो तो काफी दूर है, और कुछ है भी नहीं कि वहाँ तक जाया जा सके.."  लड़के ने थोडा परेशान होते हुए समझाना चाहा.. पर लड़की इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई. लेकिन उसने आगे कुछ  न कहा न पूछा पर उसका चेहरा कुछ नहीं, बहुत कुछ कहता हुआ सा लग रहा था..लड़के ने देखा , कुछ समझा  और कुछ महसूस किया..फिर कहा..

"तुम वो फूल क्यों नहीं ले लेतीं..वो भी तो बहुत सुन्दर हैं...हैं ना?"  उसने कुछ झाड़ियों की तरफ इशारा करते हुए कहा..और लगा जैसे कि लड़की को ये  सुझाव पसंद आ गया और वो तुरंत ही उन झाड़ियों की तरफ तेज़ कदमों से चली गई.. फिर जैसे उसे कोई नया ही खेल मिल गया ..उसने कुछ फूल डंठल समेत तोड़ लिए और कुछ को उनके डंठल और नरम छोटी पत्तियों समेत ....कुछ फूलों को उसने अपनी कलाई पर कंगन की तरह लपेट लिया, कुछ फूलों को कानों के बुन्दों की तरह सजा लिया और कुछ का एक हार बना कर गले में पहन लिया.. और अपने माथे पर फूलों का छोटा ताज भी सजा लिया..उसकी हंसी, खिलखिलाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी, एक पेड़ से दूसरे की तरफ जाती हुई, पेड़ों से लटकती  फूलों की लताओं से लिपटती हुई, उनमे खुद को उलझाती हुई..बस यहाँ से वहाँ..

वो उसे देख रहा था... आश्चर्यचकित और चमत्कृत सा, ..ये उसकी आँखों के सामने क्या है...ये कोई  लड़की है या फूलों की एक  बेल जो उस लड़की की तरह दिख रही है.. दोनों में अंतर करना मुश्किल लग रहा था..थोड़ी देर में लड़की का ध्यान उस पर गया, उसकी निगाहों पर गया...और उसने भी अपनी आँखें लड़के के चेहरे पर टिका दीं.. उसकी तेज़ नज़रें लड़के की आँखों के परदे को भेदते हुए उसके दिल और आत्मा तक पहुँच रही थीं..जैसे सब कुछ जाने ले रही हो, सब देख रही हों.. लड़के ने अपनी आँखें  झुका ली और बड़ी मुश्किल से बोला..

"तुम.. तुम बहुत..बहुत.."

"सुन्दर लग रही हूँ.." उसने वाक्य पूरा किया और फिर से एक खिलखिलाहट हवा में बिखर गई..

"हाँ बहुत सुन्दर.."

वो मुस्कुराई..और फिर अगले कुछ लम्हों तक खामोशी ही उन दोनों के बीच बातें करती रही..कुछ कहती रही और सुनती रही..ऐसा लगा जैसे सारा जहान..ये सारी कायनात, वक़्त के उस एक लम्हे पर आकर थम  गई हो..कुदरत की बनाई हर चीज़, हर रचना जैसे उस खामोशी से  सम्मोहित हो कर वहीँ रुक कर उन दोनों को देख रही थी..खामोशी के उस जादू में सिर्फ साँसों की आवाज़ ही हवाओं में प्रतिध्वनित हो रही थी..

अचानक एक तेज़ आवाज़ ने उस प्रवाह को तोड़ दिया..लड़का तुरंत मुड़ा और उस दिशा में देखने लगा जहाँ  से आवाज़ आई थी.. "मुझे बुला रहे हैं, मुझे जाना होगा.." उसने धीमी आवाज़ में कहा..लड़की चुप रही, बगैर एक भी शब्द बोले..

"मुझे जाना है.."

वो वैसी ही खामोश रही, उसकी आँखें अब किसी शून्य में खो गईं सी लगती थीं...

वो कुछ देर, कुछ क्षण वहाँ खड़ा रहा, इतनी देर में वो तेज़ आवाज़ फिर से गूंजी..लड़का अब उस आवाज़ की दिशा में दौड़ चला..लेकिन फिर जैसे कुछ याद आया और फिर एक पल के लिए रुका और चिल्लाया.. 

"तुमने मुझे अभी तक अपना नाम नहीं बताया..?"

"जून ..मेरा नाम जून है.."

"जून.. अजीब नाम है.." लड़के ने अपने आप से कहा और फिर चला गया. लड़की अब उस दिशा में देखने लगी जहाँ वो भागता हुआ  गया और फिर कहीं खो गया. अगले कुछ क्षणों तक वो वहीँ खड़ी रही, निरुद्देश्य सी और फिर धीरे धीरे पेड़ों की तरफ वापिस चली गई. वो सोच रही थी.. समझ नहीं पा रही थी.. 
"क्या मैं दुखी हूँ..क्या कुछ कमी सी है, क्या मुझे उसकी कमी महसूस हो रही है..क्या मैं..???















Sunday, 25 December 2011

एक दुनिया जिसका नाम है परछाई उर्फ़ सपना

सपनों का एक संसार है ..या संसार में सपने है ..शायद ये सब एक दूसरे  में घुल मिल गए हैं.  सपनों का संसार जिसमें वो सब रंग हैं जो हम इस वास्तविक संसार में देखते हैं या देखना चाहते हैं और वो रंग जो हमें बहुत अच्छे लगते हैं ..वो सब खूबसरत रंग जो अच्छे तो बहुत लगते हैं पर असल ज़िन्दगी में हमारे पास है  नहीं . सपनों के इस संसार की हुकूमत और उस हुकूमत का दायरा  हमारी दो छोटी आँखों और उन पर बिछी नाज़ुक पलकों पर ही है ..सपने देखना ज़रूरी है ये ज़माने से चली आ रही सीख है ...सपनों को पूरा करना ये मज़बूत इरादों और उनके पीछे पड़  जाने वालों की सीख है.  पर सपने कोई शिकार का जानवर तो नहीं है कि हर बार या हर किसी का निशाना ठीक बैठ ही जाए...निशाना चाहे कितना ही चूके
..चाहे कितनी ही बार चूके ..आँखों के बंद लेकिन पारदर्शी (हाँ आँखों का पर्दा बेहद झीना होता है ..वो दिखता है जो होता है और वो भी जो हम देखना चाहते हैं और वो भी जो नहीं होता ही नहीं) ..तो आँखों के बंद पर ज़रा खुले हुए परदे एक के बाद एक  सपने  देखते ही जाते हैं ..थकते नहीं..कोई एक सपना पूरा हो जाए तो उसके बाद उस से आगे का..कोई सपना पूरा ना हो अधूरा छूट जाए तो उसकी जगह नया सपना ..सपने ना हुए भगवान् कृष्ण का दिया चावल का कटोरा हो गया कि  जिसमे एक दाना शेष रहते भी फिर से पूरा भर जाता था.


यानि सपने एक ऐसा गिफ्ट बॉक्स हैं जो कभी खाली नहीं हो सकता ..जादुई डब्बा ..वहाँ हमारे लिए हमेशा कुछ ना कुछ  रहेगा...आंखें बंद करते ही कुछ ख्याल, कुछ बातें दिल  दिमाग में तैरने लगती हैं ..और देखा जाए तो उन बातों को आँखें बंद होने का भी इंतज़ार नहीं होता ..पर इतना ज़रूर है कि पलकें खुली रहे तो उन ख्यालों के साथ और बहुत सी चीज़ों की
मिलावट होती रहती है ..पर एक बार बिस्तर पर लेटते ही..तकिये पर सर टिका नहीं कि आँखों के आगे एक सुन्दर सी फिल्म चलने लगती है ..खुली आँखों के सपने ..जिनको सच हो जाना चाहिए ..जिनको पूरा होना चाहिए ..जिनकी ताबीर कब होगी इसका जवाब ढूँढने  में अक्सर नींद भी बेचारी थक हार के अपना घर कहीं किसी और के तकिये में ढूँढने चली जाती है.. 

सपनों के इस साम्राज्य में.. (भले इसका राज पाट हमारी आँखों की परिधि से बाहर ना हो..कुछ ऐसे कि जगत के स्वामी का शासन आलम से पालम तक)....जगह सबके लिए है, हर चीज़ के लिए है ..हर उस बात के लिए जो हमें अच्छी लगती है ..हर उस इंसान के लिए जो हमें पसंद है ..हर उस घटना के लिए जो अभी घटित नहीं हुई पर होनी चाहिए ..या हर उस घटना के लिए जो हो चुकी है और हम चाहते है कि ऐसा दोबारा हो और  उन घटनाओं के लिए भी जो हम चाहते हैं कि ऐसा कभी तो, कभी एक बार ही सही पर होना चाहिए ..यहाँ सबके लिए जगह है ..छोटी या बड़ी पर एक ख़ास कोना सबके लिए..हर इंसान के लिए हर बात के लिए...सपने हैं या भानुमती का पिटारा ..कभी कभी ये सपने हमको एक अलग ही यूटोपिया में ले जाते हैं..उस दुनिया में जैसी हम अपने लिए चाहते हैं  पर जो हमारे पास होती नहीं. एक ऐसा जीवन जिसका रंग रूप हमारी पसंद का हो ..जिसका हर चेहरा, हर किरदार हमारे लिए हो, जहाँ  सब कुछ "हम से हो"...ऐसी एक ख़्वाबों भरी  दुनिया  हो हमारी पसंद की.. पर मुसीबत ये है कि ऐसा कुछ परफेक्ट दुनिया में होता नहीं..इसलिए हम में से कुछ लोग अपने उन सपनों को ही अपना घर बना लेते हैं ..यूटोपिया सच होता नहीं ..उसकी तृष्णा बनी रहती है.. 
पर फिर भी उस थोड़ी देर के यूटोपिया में जो ख़ुशी और सुकून मिलता है वो कहीं नहीं, कहीं भी नहीं..इस असल ज़िन्दगी में भी नहीं....लेकिन कांच की परछाई  को सच नहीं मानना है ये दिमाग जानता है  इसलिए बार बार अपनी चाबुक चला के हमको सावधान करता रहता ..कभी हम सुन लेते हैं कभी अनसुनी कर देते हैं 


कितनी बार टूटते हैं सपने  ..तिनका तिनका बिखर भी जाते हैं ..कभी सपने मर भी जाते हैं तो कभी पहुँच  से बहुत दूर हो जाते हैं. पर ऐसे  में हमारा दिल बड़ा समझदार है वो पुराने सपने का कोई नया version तैयार कर लेता है..जिसमे थोडा नया, थोडा  पुराना , थोडा ऐसा, थोडा वैसा का कुछ अजीब घालमेल सा बना कर हमको बहला लेता है..फिर से आँखों की
चमक लौटा लाता है ..जैसे कभी कुछ खोया ही नहीं था ..कुछ भी, कहीं भी   कम नहीं हुआ ..सपने हमेशा जीते रहते हैं ..तब तक, जब तक दिल जाग रहा है ..और तब तक, जब तक दिल बैचैन है...सपने किसी "हमेशा" का वरदान लेकर आये हैं ..जिनकी उम्र हमारी ख्वाहिशों से भी बड़ी है..ना हो ये सपने तो सच में जीना ही मुश्किल हो जाए .. इनके होने से मन को तसल्ली मिली रहती है ..कि आने वाला कल.. कल सुबह का सूरज बड़ा ख़ूबसूरत होने वाला है ..उस किसी अनजानी सुनहरी सुबह के मिलने कि आस में  आँखें हर लम्बी से लम्बी और सख्त रात बड़े आराम से मीठी नींद में काट देती हैं...हम से ज्यादा  हिम्मत हमारी पलकों के पास है..दिल-दिमाग के हर उस बोझ को जो आँखों से झांकता रहता है ..बहने की
कोशिश करता है ..उसे बड़ी मजबूती से बाँध लेती हैं ...थामे रखती हैं...सपनों के इंद्रजाल में उलझाए रखती हैं..सुलाए रखती है ...ना होता इस दुनिया में सपनो का जहान तो जाने क्या होता ..

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