Friday, 30 September 2011

रजनीगंधा --Part 2

"सौम्या" अगले कुछ क्षणों  तक उस लड़के की तरफ देखती रही , जैसे सोच रही थी कि क्या वो पुराना परिचय इतना प्रगाढ़ था कि उसके लिए ये अजनबी (हाँ अजनबी ही कहा जाना चाहिए क्यूंकि सौम्या अभी  तक उसका नाम नहीं जानती थी, कितनी अजीब सी बात थी पर सच थी.. ) इतना खुश हो रहा है . फिर शांत और संयत  आवाज़ में कहा, "मैं आपका नाम भूल गई हूँ"....कहते हुए मैंने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया  और उत्तर की अपेक्षा में उसकी और देखने लगी ..पर शायद वो लड़का कुछ बेहतर प्रतिक्रिया या यूँ कहें कि एक गर्मजोशी और प्रसन्नता से भरी आवाज़ की अपेक्षा कर रहा था. खैर कुछ सेकंड के लिए लगा कि वो थोडा निराश हुआ है, फिर अगले ही पल संभल कर उसने कहा, " आप भूली नहीं है,  हम दोनों का ऐसा कभी कोई औपचारिक परिचय कभी हुआ नहीं कि नाम बताने की नौबत आई हो ...वैसे मेरा नाम "जय"  है और आपका नाम सौम्या है  इतना मैं जानता हूँ." 
मुझे हैरानी हुई, पर क्या कहूँ ये समझ नहीं आया...और मैं वही उलझी हुई निगाहों से उसे  देखने लगी ...क्या कहूँ , कुछ कहना तो चाहिए पर क्या....पहचान का जो सूत्र ये अजनबी उर्फ़ जय ढूंढ लाया है..वो धागा अब भी मेरी स्मृति में दर्ज है...जैसे किसी किताब के पन्नों में हम गुलाब की पत्तियां छुपा के रखते हैं .. ...पर जिस तरह समय के साथ वो पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, उनकी खुशबू कम  होने लगती है , कुछ वैसा ही अहसास मुझे भी हो रहा था ....पर मैं ये ज़ाहिर  नहीं करना चाहती थी..लेकिन मेरी ख़ामोशी और चेहरे की सपाट भाव-भंगिमा ने माहौल को और ज्यादा  असुविधाजनक बना दिया ..खैर फिर जाने कहाँ से दिमाग में  कुछ स्पंदन हुआ और मुझे शिष्टाचार और सामाजिक व्यवहार के सारे सबक याद आ गए ..

 मैंने मुस्कुराने की भरपूर कोशिश करते हुए कहा, "this is really surprising to meet you once again, that too here in rishikesh..I never anticipated any such thing ".( ये अंग्रेजी बड़ी सुविधाजनक भाषा है, इसमें बगैर किसी परेशानी के  बड़ी से बड़ी औपचारिक बात को बड़े सहज ढंग से कह दिया जाता है ..और हमारा लहजा भी बेहद  casual हो जाता है .)   खैर, इस एक वाक्य  ने माहौल को काफी हल्का बना दिया और जय को भी लगा कि वो unwanted - entry नहीं है. इतने में निशिता ने उसे  हमारे साथ बैठने का भी निमंत्रण दिया जिसे उसने ये कहते हुए नकार दिया कि " आप को देखकर, मैं  बस यूँही मिलने आ गया ". 

"लेकिन आप यहाँ कैसे और आजकल क्या कर रहे हैं?"    मेरा ये  सवाल जय के लिए काफी उत्साहवर्धक साबित हुआ क्योंकि  उसकी वो पहले वाली मुस्कराहट अब वापिस लौट आई  और कुछ संक्षेप, कुछ विस्तार और कुछ बेहद दिलचस्पी से उसने बताना शुरू किया ,  "मैं यहाँ दोस्तों के साथ हिमालयन mountaneering इंस्टिट्यूट  में ट्रेनिंग के लिए आया था. basic  course ख़त्म करने के बाद यहाँ कुमायूं हिमालय  में trekking की. और इसके बाद उसने कुछ trekk pass और पहाड़ों के स्थानीय नाम बताये जहां वो लोग अब तक जा चुके थे,,  ये सब नाम मेरे लिए अजनबी ही सही पर काफी दिलचस्प थे. देखा जाये तो अब तक मेरे सभी दोस्त जय में काफी रूचि लेने लगे थे..   
जय और आगे कहता गया कि वो आजकल एक फ्रेंच कंपनी का बिज़नस develpoment manager है और   भी पता नहीं क्या- क्या......  

जाते-जाते उसने मेरा फोन नंबर माँगा जो कुछ झिझकते हुए मैंने दे भी दिया ..कहने की ज़रुरत नहीं कि शाम तक उसके massage और एकाध कॉल भी आ गए..अगले दिन हमें वापिस जाना था और जय का जब फोन आया तब हम ऋषिकेश से आधा  रास्ता तय कर चुके थे..उसे शायद ये लगा था कि जाने से पहले मैं उस से मिल कर जाउंगी लेकिन अब मैं इतनी अच्छी  कब से हो गई .   

पर जय को उपेक्षित करना आसान नहीं था..जयपुर के उस workshop कि स्मृति अभी इतनी भी धुंधली नहीं हुई थी और ना मैं उस संक्षिप्त सी और कभी कभी ही होने वाली बातचीत को और उस मुस्कुराते चेहरे को भूल सकी थी..इसलिए घर लौट कर भी मेरा जय से फोन, mail  के ज़रिये संपर्क बना रहा... अब ऐसा तो नहीं कह सकती थी कि मुझे जय से प्यार हो गया था या ऐसा कभी कुछ था , पर  मैं आसानी से उसे खुद से परे नहीं हटा पा रही थी... लेकिन इतना ज़रूर था कि  मेरे अन्दर के एक खाली कोने को जय की  उपस्थिति   ने भर दिया था... वक़्त अपने तरीके से गुज़रता रहता है...कहीं एक अजनबी शहर में मिला कोई पुराना परिचित ..कब आपका बड़ा अच्छा दोस्त बन जाता है ..कुछ पता नहीं चलता ...

और कभी कभी तो उस अजनबी की एक आदत सी हो जाती है.. और शायद जय अब "सौम्या" की आदत बनता जा रहा था... वक़्त अपनी गति से चलता जा रहा था..कुछ और महीने बीते ..और समय के साथ अब इसे हम दोस्ती कह लें या और कोई समीकरण बनाएं ..जो भी था..कुछ ऐसा कि जो अच्छा लग रहा था..और जिसकी अब आदत होने लगी थी. लेकिन  फिर भी जय और उसके किस्से, कहकहों, उसके साथ लड़ने-झगड़ने के अलावा और भी दुनिया थी,  है  और हमेशा रहनी ही है.

जय में मेरी बढती दिलचस्पी को सबसे  पहले निशिता ने पकड़ा और तोप के गोले की तरह उसने  एक सवाल मेरी तरफ उछाला .." तुझे जय पसंद है ना ?"

उसके चेहरे पर एक तीखी सी मुस्कराहट  थी , जैसे उसने कोई बहुत बड़ा राज़ जान लिया है और अब अपनी  इस सफलता की पुष्टि मुझसे चाहती हो...

"अच्छा लड़का है, पर ऐसा भी कुछ नहीं सोचा है मैंने..पर हाँ, "we are  good  friends " (बताया था ना  कि  अंग्रेजी बड़ी सरल भाषा है)

"अच्छा, good friends !!!!!!!!!, उसने कभी  कुछ कहा तुझसे???"

"ओफ्फ्हो, निशि, तेरा तो दिमाग खराब हो गया है, ऐसा कोई सीन नहीं है , बेकार ख्याली पुलाव मत बना" .
खैर उस वक़्त बात आई -गई हो गई. पर शायद ऐसा नहीं था.. अब  जैसे जय के बात करने या कुछ कहने या पूछने के तरीके में, मैं कुछ फर्क महसूस कर रही थी..कभी-२ कोई बात कहते -कहते रुक जाना या उसे अधूरा ही छोड़ देना ..समझ नहीं आ पा रहा था.. पर फिर उसने एक दिन सीधे से ही सवाल कर दिया .." तुम शादी कब कर रही हो ..."
सवाल कोई बहुत अप्रत्याशित  तो नहीं था ..अक्सर दोस्त, रिश्तेदार ऐसा सवाल पूछते ही हैं और इसलिए मैंने भी बेफिक्र तरीके से यूँही टालने भर के लिए कह दिया कि "कर लूंगी जब कोई पसंद का लड़का मिल जाएगा"...

"और क्या पसंद है तुम्हारी?" ये अगला सवाल था. मुझे समझ नहीं आय़ा कि वो ऐसे ही पूछ रहा है या सचमुच उसे जानने में दिलचस्पी है या पता नहीं क्या..लेकिन इस मुद्दे मेरी दिलचस्पी ना देखकर उसने आगे कुछ नहीं पूछा.

खैर, उन दिनों ऐसा लग रहा था कि मेरी शादी की  फिकर मम्मी और निशिता के लिए दुनिया का सबसे अहम् मुद्दा बन गई थी. लगभग हर तीसरे-चौथे दिन मेरे सामने कोई  ना कोई नाम, उससे जुडी जानकारियाँ और संभव हो तो तसवीरें भी रख दी जातीं. जितनी बार मैं मम्मी या पापा को किसी रिश्ते के बारे में या किसी लड़के के बारे में बात करते सुनती , उतनी ही बार मेरा दिल कांपने लगता, बस यही मनाती कि किसी भी बहाने , कारण से ये रिश्ता, ये नाम रिजेक्ट हो जाए. और सचमुच ऐसा हो भी  जाता, कभी हमारी तरफ से तो कभी दूसरी तरफ से कोई ना कोई ऐसी वजह बन जाती कि शुरू होता सूत्र वहीँ समाप्त हो जाता. और मैं चैन की  सांस ले लेती. (कुछ देर के लिए ही सही). फिर सोचती कि ऐसा कब तक चलेगा? क्या इसका कोई अंत नहीं? ..

निशिता के पास भी जैसे बात करने के लिए यही एक विषय था.." तो कुछ सोचा तुमने, कुछ तय हुआ ..?" मेरा नकारात्मक  जवाब सुनकर मुझ पर नाराज़ होती...अब जब निशिता का ये हाल था तो मम्मी के कहने -सुनाने के बारे में अलग से क्या बताया जाए..

पर इस सारी माथा-पच्ची में,  मैं जैसे इस पूरी प्रक्रिया से दूर भागने लगी थी. मेरा द्वंद, जाने कौनसी   अनजानी चिंताएं और कुछ न तय कर पाने की  उलझन बढती ही जा रही थी. और जब ऐसे ही एक बोझिल दिन पर जब माँ और निशिता फिर से  मेरी शादी और उस से जुडी परेशानियों पर बात कर रही थीं....और माँ ने हमेशा कि तरह कहा...
"पता नहीं कब होगी इसकी शादी, मैं तो अब थक गई हूँ...? कब कोई लड़का मिलेगा.."
उस समय अचानक से यूँ लगा कि इतना बड़ा सिरदर्द और इसकी वजह मैं...निशि कुछ कहने वाली थी पर उसे कुछ कहने का मौका दिए बिना मैंने सपाट आवाज़ में कहा.." मेरी शादी की  अब आप लोग फिकर करना बंद कर दें... मुझे नहीं करनी शादी. मुझे किसी से शादी नहीं करनी."

"क्या बोल रही है.. पागल हो गई है क्या ?" मम्मी गुस्से में कहने लगी...निशि ने मुझे चुप रहने का इशारा किया लेकिन मैं सब कुछ सुनी-अनसुनी करते हुए वहाँ से चली आई.. कुछ और सूझा नहीं तो छत पर चली गई.. निशि मेरे पीछे आई..

"ये क्या नाटक है सौम्या?  क्यों नहीं करनी शादी?  क्या हो गया ?"

"कुछ नहीं..."

"अब ये मत कहना कि तू अब भी वैभव के बारे में सोच रही है?"

" No, he is a closed chapter and whatever happened was good for both of us."

"फिर...क्या बात है?"

"किसी को पसंद करती है तो वो भी बता दे..कोई बात अगर मन में है तो बताती क्यों नहीं? "

ये मम्मी की  आवाज़ थी जो हमारे पीछे आकर  खड़ी हो गई थी.  मैं वैसे ही चुप खड़ी रही.

"आंटी आप जाइये, मैं बात कर रही हूँ ना.." निशिता फिर मेरी तरफ मुड़ी..और मैं सर नीचे लटकाए जाने कौनसे  शून्य में घूर रही थी..

"सौम्या तू क्या सोचती है ...अपनी ख़्वाबों की  दुनिया से बाहर निकल. क्या लगता है तुझे कि,  कोई सपनों का राजकुमार तेरे लिए धरती पर उतर आएगा.?"
उसने धीरे से  मेरा  हाथ पकड़ कर कहा..

"मुझे कोई राजकुमार नहीं चाहिए ..और सपने मैंने कभी देखे नहीं."  मैंने धीमी लेकिन
एक सूखी गंभीर आवाज़ में कहा.

"तो क्या सारी ज़िन्दगी अकेले ही गुजारनी है?"
"क्यों अकेले नहीं रहा जा सकता क्या??  क्या शादी करना ज़रूरी है ..लोग बिना शादी किये ज़िन्दगी नहीं गुजारते ?"

"बेकार की बातें मत कर ..ये कोई मज़ाक नहीं है. तू सोचती है कि  सारी उम्र यूँही अकेले बिता सकती है  ..बिना किसी साथी के ? तुझे कुछ अंदाज़ा भी है ज़िन्दगी की कडवी  हक़ीक़तों का ??"

मैं अब भी वैसी ही चुप रही पर एक असहमति या विरोध या और कोई भाव कह लें, वो चेहरे पर साफ़ ज़ाहिर था.

निशि और ज्यादा चिढ गई, झल्ला गई, " मेमसाहब अगर आपको लगता है कि,  आप दुनिया से जुदा कोई अनूठा नमूना हैं तो ये ग़लतफ़हमी दूर कर लें." ....फिर जैसे अचानक उसे कुछ सूझा, उसने पूरी गंभीरता से मेरे चेहरे पर अपनी नज़रें ज़मा दी..." Jai..it's Jai..I knew that.."

जय इस सब में  कहां से आ गया..मैं बिफर पड़ी.." he has nothing to do with this..don't drag him into my personal matter."

"alright, then what is the matter?"

"बस अब मैं रोज़- रोज़ की इन बातों से तंग आ चुकी हूँ . एक बेकार की कवायद लग रही है,  मैं रिश्तों  को किसी समझौते या बेस्ट deal की तरह नहीं ले सकती . और  ये सब मुझे किसी बाज़ार के जैसा लग रहा है ....जैसे हम कपडे खरीदने जाते हैं ... दस पीस try  करने के बाद कहीं एक चीज़ पसंद आती है..कुछ वैसा ही लग रहा है.."


कुछ देर के लिए निशिता चुप हो गई, फिर जैसे उसने थकी हुई सी आवाज़ में कहा .. "चल रहने दे इस वक़्त इन सब बातों को. अभी तुझे कुछ समझाने से कोई फायदा नहीं."

इस पूरे चैप्टर के बाद भी कहीं कुछ ना बदला  और ना बदलने की कोई उम्मीद ही थी. वही  सब  अजनबी नाम और उनकी बातें..  इसी बीच एक  बात और हो गई...एक पब्लिक policy  research इंस्टिट्यूट में मेरी PhD application  approve  हो गई.  इंस्टिट्यूट NCR में ही था..हालांकि घर से दूर पर delhi से बहुत ज्यादा दूर  नहीं. तो बस इसे एक नई शुरुआत मान कर, घरवालों को थोड़ा समझा कर और निशि के ढेर सारे instructions साथ लेकर मैं चली आई एक नई जगह,  एक नए landscape के बीच....

शुरू के कुछ दिन तो मुश्किल बीते,  कभी ये  तो कभी वो समस्या ..पर जैसे-तैसे २-३ महीने गुज़रते  ना गुज़रते आदत पड़ने लगी,  अच्छा भी लगने लगा और सबसे बड़ी बात मुझे यूँ लगा कि जैसे मेरा क्षितिज अब बहुत विस्तृत हूँ गया है ..ऊँचा, खुला, आसमान जैसे अनंत की  खोज करने के लिए उकसा रहा हो...कुछ दिन बाद मुझे एक ऑनलाइन magazine के लिए कुछ education एंड policy  based articles लिखने का भी  ऑफर मिला ..काम शुरू में तो मुश्किल लगा..लेकिन धीरे- धीरे हर हफ्ते के एक नए task  की  आदत पड़ने लगी..



मेरे यहाँ आने के बाद से २-३ महीने में निशिता अपनी official  मीटिंग  के बहाने ३-४ चक्कर तो मेरे अपार्टमेन्ट के  लगा ही चुकी थी और अब निश्चिन्त होने लगी थी कि मैं यहाँ ठीक से और आराम से रहूंगी. और जय तो खैर हर weekend या १० दिन में एक बार तो मुझसे मिलने आ ही जाता था. समय अब भी गुज़र  रहा था पर अब वो पहले वाला बोझ नहीं था. पर उन दिनों जय में आये बदलाव साफ़ दिखाई दे रहे थे.

और आखिर वो दिन, वो लम्हा भी आय़ा जिसका मुझे कुछ - कुछ अंदाज़ा तो होने लगा था पर मैं फिर भी उसे  एक वहम  समझकर दूर हटा रही थी.

...जय ने वही कहा या मुझसे पूछा जिसका अंदाज़ा निशि को  काफी पहले हो गया था. लेकिन उस वक़्त मैं जय को वो जवाब नहीं दे पायी जिसकी उसे  ख्वाहिश  थी  और जो निशि के लिए  " ये तो होना ही था"  वाली बात होती.

कारण, वजह सिर्फ इतनी थी कि ज़िन्दगी में पहली  बार मुझे लग रहा था कि मैं खुले आसमान के नीचे खड़ी अपनी आँखों से विस्तृत क्षितिज को पार करती जा रही हूँ.  पहली बार लग रहा था कि ज़िन्दगी सिर्फ शादी-ब्याह -घर -परिवार नहीं और भी कुछ है.  मैं सिर्फ एक perfect bride के अलावा भी कोई नाम-पहचान-ख्वाब हूँ  और ये सब समंदर की एक ऐसी लहर की  तरह था जिस पर surfing करते मैं थक नहीं रही थी. ....और जब,  जय ने वो सवाल सामने रखा तो समन्दर  और लहरों के रोमांच के बावजूद  घर, मम्मी और जाने कितने चेहरे आँखों के आगे तैर गए.... "क्या मैं इतना बड़ा फैसला अकेले ले सकती हूँ?" .....लेकिन अगले ही पल मैंने अपना सर झटक कर उस ख्याल को ही दूर हटा दिया ...

 
जय से सिर्फ इतना कहा..." आज नहीं, अभी नहीं ...फिर कभी..फिर कहीं..."

"ये लम्हा फिलहाल जी लेने दे... कल की कुछ खबर नहीं... कल कौन सी सुबह होगी, कैसा सूरज  होगा ...होगा भी या नहीं ..लेकिन इस लम्हे को अभी यहीं थाम ले..इसे अभी यहीं बाँध ले.... आज इस वक़्त को यहीं थोड़ी देर और ठहर जाने दे .."


Thursday, 22 September 2011

एक थी दुनिया

एक थी दुनिया..इस भरे-पूरे ब्रह्मांड में कहीं किसी एक कोने, अपने में सिमटी हुई एक छोटी सी दुनिया.
(अब शीर्षक से और इस introduction से आप confuse  ना हों..."एक थी दुनिया"  कहने का मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि जिस संसार में हम सब रहते है ..वहाँ हम सब की अपनी अलग-अलग दुनिया होती है... छोटे छोटे संसार, मेरा , आपका , किसी और का या कह लीजिये लगभग हर इंसान की अपनी एक दुनिया होती है..जो उसके आस-पास रहती है, उसके साथ सोती-जागती और सांस लेती है. ये दुनिया बनती है, घर-परिवार, दोस्त-रिश्तेदार, पास-पड़ोस, दफ्तर, स्कूल-कॉलेज , बाज़ार वगैरह  से. कहने का अर्थ है कि जितना हम चाहें , उतना इस दुनिया का विस्तार किया जा सकता है और ना चाहें तो  इसे  छोटा भी किया जा  सकता है )


...तो ऐसी ही कहीं एक दुनिया थी, जिसमें रहती थी एक राजकुमारी .(एक मिनट , फिर confusion की गुंजाइश है) कोई सचमुच की राजकुमारी की बात नहीं हो रही..और ना ही उसका नाम राजकुमारी था.   पर फिर भी अपनी customized  दुनिया में हर कोई राजा-रानी और राजकुमार होता है. इसलिए हम इस लड़की को भी उसकी छोटी सी मगर उसकी अपनी  दुनिया की राजकुमारी माने लेते हैं. ( इस से कहानी सुनाने  में आसानी होती है और दादी-नानी के वक़्त से यही रिवाज भी चला आ रहा है).

राजकुमारी की ये दुनिया बहुत साधारण थी, छोटी ही थी , बेहद सीधी-सादी और सरल तरीके से बनी हुई थी. इस एक थी दुनिया का हर रंग पानी की तरह साफ़, चमकीला और पारदर्शी था. जिसका हर रूप, सुबह के सूरज की तरह शांत, सुन्दर और आँखों को ठंडक देने वाला था. जिसका हर चेहरा हिमालय  की बर्फ की  तरह बेदाग़ था.  ऐसी एक थी दुनिया , जिसकी एक थी राजकुमारी.

 एक थी दुनिया, राजकुमारी के लिए उसकी  ज़रूरतों के लिए शुरुआत में  पर्याप्त ही  थी . दुनिया सुन्दर थी, दुनिया का हर शख्स अच्छा  था , राजकुमारी से सब प्यार करते थे. उसके पैदा होने से लेकर बड़े होकर  स्कूल -college  तक या उसके बाद भी,  हर तरह से उसे बड़े लाड प्यार से ही रखा गया था.  दुनिया बड़ी ही नर्म-नाज़ुक, फूलों  और रंगों से सजी थी.  हाँ, कहीं कहीं, कभी कुछ कांटे भी उग आते थे, घर के बगीचे में खरपतवार भी.  पर सब मिलाकर सब कुछ बढ़िया चल रहा था. राजकुमारी का अब तक उस बाहर की  बड़ी, बहुत बड़ी, अनेकानेक रंगों, परतों, चेहरों और  आयामों से भरी  दुनिया से अब तक कुछ ख़ास  वास्ता नहीं पड़ा था ..या यूँ कहें कि पड़ने ही नहीं  दिया गया .और शायद यही वजह रही होगी कि राजकुमारी ने इस समतल , चिकनी सतह (smooth  and  flat  surface )  वाली दुनिया को ही शाश्वत सत्य मान लिया ..उसे लगा कि सब कुछ हमेशा ऐसे ही सुन्दर और प्यारा सा बना रहेगा..उसका ख्याल था कि आने वाले जीवन में चाहे जो पड़ाव आयें..पर ये दुनिया ऐसी ही रहेगी ...(अब वहम का तो कहीं कोई इलाज नहीं..हकीम लुकमान के पास भी नहीं था...)

तो...राजकुमारी अपनी इस दुनिया में मजे से  रह रही थी. लेकिन अब धीरे धीरे  उसकी आँखों में किसी और ही नई, विस्तृत दुनिया, किसी अनजानी, समय के किसी और ही आयाम में बसी हुई  एक दुनिया के सपने जगह बनाने लगे. उसकी बड़ी-बड़ी आँखों  के सपने अब बहुत बड़े  होने लगे ..इतने कि पलकें उन सपनों को आँखों में समेट नहीं पाती थी. पर उस नई, अनजानी दुनिया  में जाना आसान  न था..पर जाने की  इस चाहत में राजकुमारी की ज़िन्दगी में बहुत से उतार-चढ़ाव आये ..जिनके लिए हमारी ये नाजों से पली रानी ज़रा भी तैयार ना थी. (sympathy ना दिखायें और ना ही चिंतित हों ..हाँ यहाँ आप राजकुमारी के unprepared होने पर हंस ज़रूर सकते हैं)  अब इसकी वजह ये हो सकती है कि हर इंसान को अपनी निजी दुनिया के तौर-तरीकों से रहने की आदत हो जाती है  यही समस्या हमारी राजकुमारी के सामने भी आ रही थी...खैर..एक लम्बी कशमकश शुरू हुई ..छोटी दुनिया के अन्दर भी और बाहर भी ..एक लम्बी कठिन प्रक्रिया..कह लीजिये कि दुनिया का हुलिया ही बदल गया.

एक थी दुनिया की वो पुरानी नरमी अब सख्त ज़मीन में ढल गई ..सबसे पहले उस सख्त फर्श पर राजकुमारी के काँटों  और पत्थरों से  छिले पैरों का खून बिखरा,  फिर पैर भी उस सख्ती के आदी बन गए (adjustment you see )..फिर धीरे-धीरे दुनिया के हर कोने में राजकुमारी की आँखों से  बहे  पानी की नमी दिखाई देने लगी, पानी में घुला नमक , राजकुमारी की हर ख़ुशी, हर ख्वाहिश, हर सपने  में खारापन घोलता चला गया...मिठास का तो जैसे नामो-निशान ही मिट गया ..ना अन्दर, ना बाहर ..बचा रहा तो सिर्फ नमक, सफ़ेद, खारा नमक...

पर आखिर उस कशमकश का भी अंत आय़ा. transformation  की  प्रक्रिया पूरी तरह रुकी तो  नहीं लेकिन अब उसकी रफ़्तार काफी  धीमी पड़ गई.  राजकुमारी ने चैन की  सांस ली..उसे लगा कि जैसे पूर्ण परिवरतन के ऐन पहले कालचक्र का पहिया दूसरी दिशा में  घूम गया.. पर जैसे फिर भी जब तक पहिये ने दिशा और दशा बदली तब तक बहुत बड़े -बड़े परिवर्तन  हो गए थे..अब राजकुमारी वो पहले वाली राजकुमारी नहीं रही थी..(अब आप पूछेंगे कि यहाँ तो हमको यही नहीं  पता कि पहले कैसी थी तो अब क्या बदल गया,  ये कहां से समझ आये..खैर छोडिये, बस इतना जानिये कि अब राजकुमारी ज़रा सयानी हो गई और परीकथा पीछे छूट गई). वो सब सपने देखे या अनदेखे..सोचे हुए, सजाये हुए,  दूर क्षितिज के ख्वाब ..अब अचानक ही हाथ से छिटक गए.. लगा कि अब ना वो सब राजकुमारी के लिए है  ना राजकुमारी उनके लिए..राजकुमारी को बड़ी हैरानी हुई कि ये क्या हुआ..क्या ये हो सकता है कि समय का एक  हिस्सा, उसकी ज़िन्दगी में आय़ा ही नहीं और गुज़र भी गया ..? कब..किस वक़्त..और जो बातें,  जो ज़िन्दगी उस हिस्से में होनी चाहिए थी..वो भी गायब है ..अजीब गोरखधंधा है ..क्या तिलिस्म है..खैर...अब क्या किया जा सकता था..गया सो गया ..या गुम हो गया..कुछ भी कह लीजिये ..

पर फिर भी राजकुमारी को अपनी पुरानी दुनिया की कुछ चीज़ें बेहद पसंद थीं..इतनी कि लगता था कि उन चीज़ों के बिना, उन खूबसूरत अहसासों के बिना ज़िन्दगी अधूरी , कठोर और बेजान हो जायेगी. और हर नए परिवर्तन  को अपनाते हुए भी राजकुमारी बस इतना  भर चाहती थी कि ये कुछ पुरानी कोने में पड़ी, बहुत ज्यादा ज़रूरी ना सही पर फिर भी ये कुछ छोटी -मोटी चीज़ें, जो राजकुमारी के ख्याल से उसके अस्तित्व को थामे रखती थीं, वो कैसे भी करके बस बनी रहे ..शायद राजकुमारी को इन outdated चीज़ों से प्यार था. पर जैसा कि अब दिखने लगा था कि transformation प्रोसेस के दौरान जो उथल-पुथल मची, उसका सबक ये था कि अब इस नए परिदृश्य  में, नए वातावरण में इन चीज़ों की अब कोई ख़ास जगह रह नहीं गई है ..और अब तो शायद वो राजकुमारी से "belong "  भी नहीं करती. अब चाह कर भी उन पीछे छूट गई चीज़ों को इस रंग-रूप बदल चुकी दुनिया में नहीं लाया जा सकता..शायद वो अब यहाँ मिसफिट होंगी.

अब हालांकि इस नई बनी दुनिया में थोड़ा कुछ ऐसा है जो राजकुमारी का जाना-पहचाना है. पर बहुत कुछ ऐसा है जो अजनबी है या जो अब जाना-पहचाना होते हुए भी कहीं दूर खडा दिखता  है , जिसका चेहरा अब उतना जाना-पहचाना नहीं लगता. पर अजनबी रास्तों से भरी इस इस नई दुनिया में  राजकुमारी को कोई डर नहीं  कि वो खो जायेगी या ऐसा कुछ.. (बेकार कल्पनाएँ ना करें,  राजकुमारी  इतनी भी परीकथा वाली राजकुमारी नहीं)

राजकुमारी की "एक थी दुनिया"  कुछ बदली, कुछ ना बदली. कुछ राजकुमारी बदली और कुछ ना बदली. पर फिर भी इस नई दुनिया  से तालमेल बिठाते हुए भी, राजकुमारी रह-रह कर अपनी उस पीछे छूट गई दुनिया को याद करती है और कभी खुद से और कभी दूसरों से कहती है, " एक थी दुनिया"....मेरी दुनिया..कहां चली गई, क्या फिर कभी मिलेगी, या कभी फिर से  में वहाँ जा सकूंगी...या अब तो किसी अगले ही जन्म में; (जो अगर होता हो तो, हमारे धार्मिक मिथक-मान्यताएं बहुत सारी बातें  कहते हैं इस बारे में..अब झूठ तो नहीं कहते ना..)....मिलेगी वो एक दुनिया...

Wednesday, 21 September 2011

कुछ सही कुछ थोड़ा कम सही

आज George Hegel का एक quote पढ़ा अखबार में, जो बहुत तर्कपूर्ण बात कहता है ..


"असल त्रासदी सही और गलत के बीच टकराव या मतभेद होना नहीं,  असल त्रासदी दो सही के बीच टकराव का होना है.."


सबकुछ सही है, कोई चीज़, कोई शख्स अपनी जगह  गलत नहीं है ...लेकिन फिर भी कुछ तो खटक रहा है... कुछ तो ऐसा है जो होना  नहीं चाहिए. जो अपनी  सही जगह पर ना होकर  किसी गलत जगह पर है. सम्पूर्ण परिदृश्य में कुछ तो कमी है.  ये जो पिक्चर परफेक्ट है इसमें सब कुछ  सही, सुन्दर और सम्पूर्ण नही है. और यही है दो सही के बीच का टकराव. किसी को तो हार माननी होगी, किसी एक को झुकना होगा, पीछे हटना होगा, अपना दावा वापिस लेना होगा , सच होते हुए भी, सही होते हुए भी गलत होने कि स्वीकृति देनी होगी.

इसके अलावा समन्वय, सामंजस्य का कोई दूसरा बहुत सुविधाजनक मार्ग है नहीं.  ऐसा इसलिए कि जो सही है, सत्य है, वो  एक खुली तलवार है  और उस तलवार की पहली चोट उसे थामने वाले को ही लगती है . और दो सही धारणाएं जो दो विपरीत ध्रुवों  पर खड़ी हैं, जिनकी दिशा, उद्देश्य, साधन सब एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं. ऐसी दो सही तलवारें एक साथ, एक वक़्त में, एक ही जगह पर, एक म्यान में नहीं हो सकतीं.  अगर एक साथ रखा गया तो वे  एक -- दूसरे को चोट पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएंगी.

दो सही के बीच का टकराव ही हमारी जिंदगियों की  सबसे बड़ी  उलझन, सबसे  बड़ी  समस्या, सबसे बड़ी  रुकावट और सबसे बड़ी दुखदायी वजह है. जब दो सही चीज़ें टकराती हैं.  तो किसी को, उन टकराने वालों को भी  ख़ुशी नहीं मिलती. लेकिन अपने सही होने का अहसास, समझौतों का रास्ता मुश्किल कर देता है.

हम सब अपनी-अपनी जगह पर सही हैं..हम में से कोई भी गलत नहीं है और इसलिए पिक्चर परफेक्ट को देखने का हमारा नज़रिया भी अलग-अलग है. हम सबके पास सही होने, सही देखने , सही समझने के अपने कारण, अपने चश्मे और अपनी मान्यताएं है..बस फर्क सिर्फ ये है कि ये सब चीज़ें एक - दूसरे से  मेल नहीं खातीं.

Saturday, 10 September 2011

कहानी के किरदार मर जाते हैं

कहानी के किरदार मर जाते हैं पर कहानी जिंदा  रहती है.. कहानी में कोई नाम, कोई किरदार जिसका रंग, रूप, आकार हम अपनी पसंद , अपनी कल्पना से गढ़ लेते हैं, जिनका  जीना, मरना, सोचना, समझना हमको अपना सा, अपने करीब सा लगने लगता है. कहानी में  किरदार मरते  हैं, कभी कहानी को आगे बढाने के लिए तो कभी कहानी को वहीँ ख़त्म कर देने के लिए ..किरदारों का जीना मरना सब पहले से तय होता है, उनकी तकदीर कहानी लिखने वाला तय करता है..ठीक   वैसे ही जैसे असल दुनिया में होता है जहाँ भगवान् की मनमर्जी और हुकुम  चलता है ..पर कभी कभी लगता है कि किरदार ना मरे ..फिर से जी उठे ..उसी रंग में, उसी नाम से , उसी चेहरे में ..एक बार फिर से बोल उठे.. और फिर से कहानी वहीँ से वापिस आगे शुरू हो जाए जहाँ वो किरदार उसे  छोड़ गया था ..और अगर कहीं वो कहानी ख़त्म हो जानी हो किरदार के मरने पर तो कहानी और आगे से आगे चलती जाए ...

पर कहानी में किरदार मर जाते हैं ..उनका मरना अच्छा नहीं लगता लेकिन फिर देखा जाए तो किरदार के साथ कहानी नहीं मरती ..वो जीती रहती है ..हमारे दिमाग में ..हमारे ख्यालों में ..हमारी कल्पनाओं में..जहाँ हम उन किरदारों से  मेल खाते कुछ चेहरे या लोग अपने आस पास ढूंढ निकालने की कोशिश करते हैं ...और कभी कभी वो चेहरा मिल भी जाता है तो कभी कुछ कम -ज्यादा  का समझौता भी कर लिया जाता है ..

कहानी के किरदार मर कर भी जिंदा रह जाते हैं...और हम उन्हीं को सोचते रहते हैं..कि ऐसा  क्यों हुआ कि कहीं कोई preppy ...कोई जेनिफ़र ..कोई नताशा रोस्तोवा ..कोई एमा, कोई मरक्युरी  या कोई johnathan या कोई और नाम या रूप   ..अगर कहीं होगा तो कैसा होगा ..क्या सोच रहा होगा ..या कहीं  नहीं हो सकते ये किरदार ..जो किसी कहानी में ..कहानी की  ज़रुरत भर के लिए पैदा हुए फिर मर भी गए ...पर उनके मरने के साथ ही  थोड़ी देर के लिए हमारे दिन का, हमारे ख्यालों का एक हिस्सा भी मर जाता है.. और फिर उसको एक बार फिर जिंदा देखने  के लिए हम अपनी ही तरफ से नए ख्याल बुनते रहते हैं...

एक ख़याल कि कहीं एक ऐसा नाम इस दुनिया में है या होना चाहिए ..जिसका अस्तित्व सिर्फ कहानी तक ना हो..कहानी के पन्नों के बाहर जीता -जागता एक किरदार ...जो हमारे आस-पास जी उठे ..हँसे -बोले, मुस्कुराए और कहे कि देखो मैं तो यहीं हूँ ..तुम मुझे कहां तलाश कर रहे हो..

Thursday, 1 September 2011

एक अधूरा ..सुना अनसुना सपना ..

मैं ज़िन्दगी का  एक अधूरा ख्वाब हूँ जिसे उसने अपने सफ़र के सबसे सुहाने और बेपरवाह दौर में देखा... मैं उसकी रात के आखिरी पहर की गहरी बेफिक्र मीठी  नींद का हिस्सा हूँ, उसकी सुबह की प्रभात बेला की अलसाई, अधमुंदी - अधखुली आँखों की धुंधली सी चमक ... वो ख्वाब जो अब शायद अब उसे कुछ याद है, कुछ भूला हुआ सा..  कुछ फीकी लकीरें, कुछ गहरे निशान, कुछ मिट गए , कुछ रह गए...इस ख्वाब की ताबीर कब, किस रास्ते, किस मोड़ पर, कैसे होगी या ना होगी... अब ये सवाल वक़्त और ज़िन्दगी की अपनी सामर्थ्य के परे जा चुका सा लगता है..

कैसा है ये सपना कि जिसकी मृगतृष्णा  का कोई ओर छोर नहीं, जिसकी कभी ना बुझ सकने वाली प्यास शायद आबे-हयात से भी ना बुझे, जिसकी रात कभी ख़त्म नहीं होती और सुबह आती है दबे पाँव... और फिर जल्दी ही शाम की मटमैली सी परछाइयों में डूबते सूरज के काले-भूरे, लाल-नारंगी और पता नहीं कौन कौन से रंगों में घुल जाती है ऐसे  कि  उसके आने या चले जाने का भी पता नहीं चलता ... समय भागता जाता है और ज़िन्दगी अपने अधूरे ख्वाब के लिए हर लम्हे से कुछ और ..थोड़ा और ..बस ज़रा सा और ...मांग लेना चाहती है..समेट के मुट्ठी में रोक लेना चाहती है..और इसलिए इस अधूरे से,  कुछ टूटे , कुछ बिखरे और कुछ सिमटे हुए और कुछ बनते- बिगड़ते ख्वाब का हर हिस्सा अब सिर्फ अपनी अधूरी तस्वीर को किसी तरह कुछ सुन्दर रंगों के धब्बों से पूरा कर लेना चाहता है.. पर कौन जाने कि ज़िन्दगी को किन रंगों के धब्बे ...मिल पायेंगे और उनका रंग कितना चमकीला, कितना फीका या कितना मुकम्मल होगा....ये भी तो अधूरा सा ही सवाल है ...

Friday, 19 August 2011

मेरा सपना भी तुम और सच भी तुम...

मेरा सपना भी तुम और सच भी तुम..खुली आँखों के चमकते जुगनू  भी तुम और बंद आँखों की पलकों का सुकून भी तुम ...जागती  हुई  आँखों  के आगे का नज़ारा भी तुम और बंद आँखों का भ्रम भी तुम.   क्या सच , क्या सपना ..सब कुछ सिमट कर एक ही रंग,  एक ही रूप, एक ही आकार, एक ही सांचे में ढल गए... मेरा तो सपना भी तुम और सच भी तुम...तुम्हारे लिए सपना , मेरे लिए वही जीवन...चमकती सुबहों की मसरूफियत या थकी हुई शामों का अँधेरा ...


जो सपना तुमने बंद आँखों से देखा , वो मेरी खुली आँखों का सच बन गया , तुमने तो सपना देखने को कहा  लेकिन मेरी आँखों ने उस दूर के क्षितिज के तारे को ही सच मान लिया ..सपने हम दोनों ने मिलकर देखे या शायद तुमने दिखाए और कहा कि एक दिन हम मिलकर इन्हें ज़मीन पर उतार लायेंगे ....

सपने ही तो एक दिन सच बनते हैं ..सपनों के बीज से सच की फुलवाड़ी खिलती है ..सपनों के रंगों से सच की तस्वीर आकार लेती है.....  और इस तरह  धीरे-धीरे  दबे पैर, बिना हमें बताये , कब चुपके से सपने ज़िन्दगी के सच को ढक देते हैं पता ही नहीं चलता....


मेरा तो सपना भी तुम और सच भी तुम,  कहने को तो सपना एक भ्रम  है, illusion है,  परछाई है पर जब सपना जागती आँखों का सच बन जाए तो भ्रम और वास्तविकता के बीच की सीमाएं  मिट जाती हैं ..और मैंने भी मिटा दीं... जागती आँखों का सपना, बंद आँखों का सपना, जागती आँखों का सच और बंद आँखों की परछाई कब ये सबकुछ एक दूसरे में मिल गए, मुझे  खबर तक ना हुई.

समय के तीन आयामों में चौथा आयाम और जुड़ गया, सपनों का आयाम.  सुबह की रौशनी  और दिन की भागदौड, शाम की थकान और रात के धुंधले  जुगनुओं की चमक सब कुछ सपनों के आयाम से जुड़ गए,  मिल गए उसमे और खो गए.  कुछ खबर नहीं कि ज़िन्दगी सपने में जी रहे हैं या वास्तविकता  के धरातल पर , जो कुछ खबर है तो सिर्फ यही कि बड़ा ही सुन्दर  नज़ारा आस-पास है, जैसे किसी कैनवास पर बड़े ध्यान और लगन से बनी एक मोहक तस्वीर, जो छू देने भर से मैली हो जाती हो.


ऐसे सुन्दर सपने  तुमने दिखाए,  मैंने देखे, हमने मिल कर देखे , सपनों में जीने लगे , भूलने लगे शेष तीन आयामों को . पर फिर एक दिन ..सपना तो ना टूटा पर लगा कि इस सपने में कुछ कमी आ गई है , कैनवास की तस्वीर के रंग फीके हो गए हैं, मिटने लगे हैं ..नज़रें कुछ तलाशने लगीं, आस-पास, दूर कोने-अंतरों में,  कहीं कुछ जाना पहचाना दिख जाए शायद..

पर नहीं , अब सपना था, मैं भी, पर तुम नहीं हो,  इस सच जैसे दिखने वाले और मेरे जीवन के बन चुके  सच वाले  सपने में अब तुम नहीं हो...कहां हो, इसकी खबर नहीं,  मेरा तो सपना भी तुम और सच भी तुम...

अब सपना  ही  सच बन गया है, आदत हो चली है इस सपने की, इसमें रहने और जीने की,  कि अब इस से बाहर निकलना तकलीफ देता है,  कि अब मानने को जी नहीं चाहता कि सपना अब नहीं रहा, कहीं उसका नाम निशान भी नहीं , फिर भी उस गुज़ार चुके सपनों के संसार की  याद में कि जिसका हर पत्थर हमने अपनी कल्पना और आँखों की चमक से सजाया था..एक बार फिर से कह लेने दो कि मेरा सपना भी तुम और सच भी तुम ...सपना ही सही पर .. मेरा अपना हो तुम ..

Monday, 15 August 2011

मालंच : A review

 जापान में एक कहावत है कि "बगीचे का काम कभी ख़त्म नहीं होता, जब हो जाता है तब इंसान मर जाता है".  पर उस वक़्त  क्या होता है जब इंसान भी जिंदा है और बगीचे का काम भी अधूरा पड़ा है. 

            मालंच बंगला भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है "फूलों का बगीचा". इस  शब्द  से  मैं  पूरी  तरह  अपरिचित  नहीं  हूँ, पहले पहल इसे  शिवानी गौरा  पन्त की किताब में पढ़ा था, शान्तिनिकेतन के एक प्रोफ़ेसर अनिल चंदा के घर का नाम भी मालंच था...मुझे ये शब्द तब से बहुत आकर्षित करता रहा है ..जब कि इसका अर्थ भी मालूम न था. 

मालंच, रवीन्द्रनाथ टैगोर की   एक लघु उपन्यासिका  है और मेरे विचार से इसे उपन्यास के बजाय एक लम्बी कहानी जैसी क़ि कुर्रतुल एन हैदर ने लिखीं है, उस श्रेणी में रखा जा सकता है. मालंच कहानी है नीरजा की और उसके बगीचे की, बगीचा कोई आम छोटा मोटा घर का फूल पत्ती या सब्जी उगाने का बगीचा नहीं असल में उसके पति का  बेहतरीन और अनेक देशी विदेशी  किस्म के फूलों और पौधों का कारोबार है. ये बगीचा उनकी ज़िन्दगी का अटूट हिस्सा है और नीरजा ने भी बगीचे के काम को इस तरह अपने अस्तित्व के साथ मिला लिया  कि दोनों में कोई फर्क नहीं रह गया. लेकिन बगीचा तो यहाँ महज एक प्रतीक है,  कहानी कहने का माध्यम है ..असल मुद्दा है, स्त्री की मानसिकता, उसकी मनः स्थिति, उसका अधिकार क्षेत्र और अधिकार जताने और उसे बनाये रखने की प्रबल इच्छा जिसको दिखाने में, बयान करने में रवीन्द्रनाथ ने (शिवानी के शब्दों में कहूँ तो..) कलम तोड़ कर रख दी  है. 


 जब स्त्री का ये  अधिकार  किसी भी कारण या अकारण या लगने भर के लिए ही लगे कि,  मेरा ये  सारा ऐश्वर्य छिन रहा है, कि एक दूसरी औरत फिर वो जो भी है, उस पर हक जमाने का प्रयास कर रही  है तो मन बुद्धि सब बस के बाहर हो जाते हैं तब सही गलत, उचित- अनुचित, भला- बुरा कुछ नहीं सूझता या दिखाई देता है   ...दिखता है तो  बस छिनता हुआ साम्राज्य.

यहाँ  एक स्त्री के मन, उसकी इच्छाओं, उसके सुख-दुःख के अहसासों और इन सबके ऊपर उसकी कमजोरियों का चित्रण करने में रवीन्द्रनाथ को कमाल की सफलता मिली  है . यहाँ प्रेमचंद की एक नायिका याद आती है, "बड़े घर की बहू आनंदी" ..मैंने ये उपन्यास  तो नहीं पढ़ा पर कहीं उसका एक सन्दर्भ पढ़ा था क़ि  आनंदी के पास अभिमान और मान करने योग्य एक ही चीज़ है और वो है उसका पति, घर-गृहस्थी . यही उसका संसार और जैसा किसी मैगजीन  की कहानी में पढ़ा था ..."मेरा घर मेरा साम्राज्य".


और यही बात नीरजा पर भी लागू हुई, एक औरत अपने जीते-जी, आँखों के सामने अपना संसार, जिसे  उसने अपनी आत्मा से सींचा, किसी और को नहीं दे सकती. भले ही वो खुद अब उसे संभाल ना पा रही हो( अपनी लम्बी बीमारी की वजह से अब नीरजा बगीचा तो दूर घर की देखभाल भी नहीं कर सकती). भले ही उसे पता हो कि किसी के ना संभालने पर घर का ये बगीचा नष्ट हो जाएगा, पर फिर भी अपने  अधिकार का मोह छोड़ना बेहद मुश्किल है. उस से भी ज्यादा मुश्किल है ये स्वीकार करना कि मेरे बाद, मेरे पीछे , मेरा नामो-निशान , मेरा कोई चिहन भी शेष ना रहेगा...कल तक जिस महल का वैभव मेरे कारण था , वही कल मुझे भूल कर किसी और के व्यक्तित्व से महकेगा और जब वो  गृह स्वामिनी, वो कल की ऐश्वर्य लक्ष्मी  बीमार और कमज़ोर हो जाए तब इंसान का मन नकारात्मक रूप से शक्तिशाली हो जाता है.  बगीचा, जिसका हर कोना, हर हिस्सा नीरजा और उसके पति के हाथ से बना है, अब नीरजा के आँखों के सामने है पर अपनी बीमारी के चलते अब वो वहाँ चल कर जा भी नहीं सकती, वहाँ काम करना या उसे संभालना तो दूर की बात.

सरला को नीरजा के बीमार होने के कारण बगीचे की  सार-संभाल के लिए बुलाया गया. उसे फूल पौधों और बगीचे के हर काम की जानकारी विरासत में अपने ताऊ जी से विरासत में मिली, जिन्होंने आदित्य को भी यही काम सिखाया और रोज़गार शुरू करने में सहायता भी दी. आदित्य का  कहना कि, "सरला  को मैंने आश्रय दिया है या उसके आसरे में रहकर मैं यहाँ तक पहुंचा हूँ?"  और सरला का ये उलाहना कि, "....नाप तौल में मेरी तरफ से कुछ कम नहीं हुआ..फिर अचानक मुझे धक्का क्यों दे दिया गया...?"  ये दो सन्दर्भ ही उन दोनों के प्रगाढ़ लेकिन सहज सम्बन्ध को ज़ाहिर कर देते हैं. पर नीरजा का दुःख कुछ और है. उसे ये सहन नहीं कि कोई दूसरी औरत उसके बगीचे में आये, वहाँ वैसे  ही काम करे जैसे वो अपने अच्छे  दिनों में किया करती थी, अपने  पति के साथ.  कोई तीसरा, जिसे बगीचे के बारे में उस से ज्यादा ज्ञान है..जो उसके और आदित्य के बनाए आर्किड घर तक में प्रवेश पा गया है..ये उसके अस्तित्व को, उसके अधिकार को सीधी  चुनौती है.  ये संकेत है कि अब जाने का, इस घर-गृहस्थी को पीछे छोड़ जाने का समय आ गया है..

और इसलिए कभी नीरजा, सरला को कहीं दूर भेजने की बात कहती है, कभी अपने देवर से उसके विवाह का प्रस्ताव तो कभी आदित्य के जीवन में उसके महत्त्व और उसके  स्थान को स्वीकार कर लेने का प्रयास करती ही रहती है पर पूरी तरह नहीं मान सकती..और इस अंतर्द्वंद के चलते एक ओर उसका स्वास्थ्य और अधिक बिगड़ता जाता है वहीँ उसका मन अपने ही घर में उपेक्षित हो जाने के भय से,   अपना अधिकार और  अपना पृथक  अस्तित्व बचाए-बनाए रखने के लिए नकारात्मक रूप से और अधिक  शक्तिशाली होता जाता है.

नीरजा ये भी समझती है कि ये बंधन ..ये मोह उसे  अपने ही संसार से दूर कर रहा है ..उसे अपनी कमजोरी, अपनी विवशता और इन सबके ऊपर अपने मन की दुष्टता का भी पूरा  अहसास हो  गया है ...लेकिन ये समझते  हुए भी कि सब कुछ, सारे अधिकार  दे डालने में ही मुक्ति है और उसके मन की   शान्ति भी. ..लेकिन  बार बार कोशिश कर के भी, अंत में  सब दे डालने की ख्वाहिश ..सब कुछ को समेट लेने और उसे कस कर मुट्ठी में जकड लेने में बदल जाती है .

और शायद यही वजह है क़ि  लोग अपने और अपने प्रियजनों के नाम से स्कूल, अस्पताल और इमारतें बनवाते हैं, कहीं पूरी कायनात तो कहीं पत्थर की एक पट्टी ही सही पर कहीं न कहीं नाम तो हो कि जाने के बाद याद रखा जाए. नीरजा भी यही चाहती है कि जैसे कैसे भी उसकी उपस्थिति को, उसकी इच्छाओं को, आदेशों को महत्व मिले, बगीचे को लेकर उसकी समझ और ज्ञान को सब लोग आज भी वैसे ही सराहें जैसे कि हमेशा वो सुनती आई है. पर अब ऐसा हो नहीं पा रहा है...

कैसी अजीब है ये ख्वाहिश, कितना तकलीफदेह है, किसी से कहना कि " मुझे, मेरे बाद भी उसी तरह याद रखना, मेरे अस्तित्व को वैसे ही महसूस करना जैसे कि  आज या कल तक करते थे...मुझे आज भी वैसे ही प्यार करो जैसे पहले करते थे..और बाद में करते रहना..तुम्हारे दिल में मेरी वही जगह रहे जो अब तक रही है..."  जैसे कि कहीं ये सुनिश्चित कर लेना चाहता  है मन, कि मेरे बाद भी "मैं" यहीं रहूँगा/रहूंगी.


नीरजा नहीं दे सकती , क्योंकि उसके अपने जीवन  का आधार, उसकी सार्थकता और उसके अभिमान  का आधार ये बगीचा ही है और बगीचा किसके लिए , उसके पति आदित्य के लिए. यानि बगीचा नहीं उसे आदित्य को ही दे देना होगा , जो असम्भव तो नहीं है पर निश्चित रूप से आसान  भी नहीं. अब यहाँ  मुझे याद आई मैथिलीशरण गुप्त की "यशोधरा" और विद्ध्यानिवास  मिश्र की "यशोधरा" ..जो सब कुछ, अपना सारा खज़ाना, ऐश्वर्य यहाँ तक कि अपना बेटा राहुल भी भिक्षु संघ के लिए दे देती है और फिर  भी बुद्ध से पूछती है क़ि "और कुछ...कोई और अभिलाषा शेष है तपस्वी..?"


पर वहाँ  लेने वाला सिद्धार्थ यानि संसार के तथागत और बुद्ध है..पर यहाँ लेने वाला एक बाहरी व्यक्ति है ....नीरजा के लिए तीसरा इंसान पर आदित्य के लिए उसके बचपन की और बगीचे की  साथी  "सरला"  जो खुद भी किसी तरह नीरजा की जगह लेना नहीं चाहती...लेकिन नीरजा उसके हस्तक्षेप को बगीचे में यानि अपने संसार में  सहन कर रही है  वही बहुत माना  जाना चाहिए.  पर सब दे डालने से भी  बड़ी समस्या है  ये बर्दाश्त  करना क़ि जिसके लिए ये सारा प्रपंच, सारा अधिकार और उसकी लड़ाई है, वही अब किसी कारण से छिटक कर दूर होने लगा है या साथ नहीं दे रहा तो प्रयास ये हो जाता है क़ि उस तीसरे के माध्यम से इस आधार को थाम के रखा जाये पर इसके लिए भी त्याग करना होगा  और नीरजा इस त्याग को अपने जेवर और दूसरे प्रतीकों के माध्यम से जताए रखना चाहती है ..."हाँ  मैं बेड़ियाँ डालना चाहती हूँ. ताकि जन्म- मरण में तुम्हारे पाँव निस्संदेह रूप  से  मेरे पास बंधे रहे."


नीरजा की तकलीफ और उसका द्वंद सरला भी समझ रही है  इसलिए खुद ही पूरे परिदृश्य से हट जाना चाहती है ..पर नीरजा ऐसा भी होने नहीं देगी क्योंकि वो सारे सूत्र अपने  हाथों में रखना चाह रही है.


कहने का अंत दुखांत है ..नीरजा मर गई..पर दे नहीं सकी और सरला कुछ ले भी नहीं सकी...

 अंततः रवीन्द्रनाथ टैगोर  की एक बेहतरीन रचना,  जिसका सार है क़ि,  प्रेम और स्नेह जब बंधन हो जाता है तब इन्सान की  आत्मा का ही सर्वनाश कर देता है ..और पता तक नहीं चलता...