Life with Pen and Papers
When the Pen Speaks wid Paper..a landscape of WORDS and Thoughts...
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Saturday, 15 October 2011
कभी कभी खामोशी भी बोलती है
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खामोशियों के बंद दरवाजे जिस आँगन में खुलते हैं वहाँ समय और गति के सारे समीकरण अपना अर्थ खो बैठे हैं ..यहाँ एक ऐसा ब्लैक होल है जहां आका...
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Friday, 30 September 2011
रजनीगंधा --Part 2
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"सौम्या" अगले कुछ क्षणों तक उस लड़के की तरफ देखती रही , जैसे सोच रही थी कि क्या वो पुराना परिचय इतना प्रगाढ़ था कि उसके लिए...
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Thursday, 22 September 2011
एक थी दुनिया
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एक थी दुनिया..इस भरे-पूरे ब्रह्मांड में कहीं किसी एक कोने, अपने में सिमटी हुई एक छोटी सी दुनिया. (अब शीर्षक से और इस introduction से आप c...
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Wednesday, 21 September 2011
कुछ सही कुछ थोड़ा कम सही
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आज George Hegel का एक quote पढ़ा अखबार में, जो बहुत तर्कपूर्ण बात कहता है .. "असल त्रासदी सही और गलत के बीच टकराव या मतभेद होना नह...
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Saturday, 10 September 2011
कहानी के किरदार मर जाते हैं
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कहानी के किरदार मर जाते हैं पर कहानी जिंदा रहती है.. कहानी में कोई नाम, कोई किरदार जिसका रंग, रूप, आकार हम अपनी पसंद , अपनी कल्पना से गढ...
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Thursday, 1 September 2011
एक अधूरा ..सुना अनसुना सपना ..
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मैं ज़िन्दगी का एक अधूरा ख्वाब हूँ जिसे उसने अपने सफ़र के सबसे सुहाने और बेपरवाह दौर में देखा... मैं उसकी रात के आखिरी पहर की गहरी बेफिक्...
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Friday, 19 August 2011
मेरा सपना भी तुम और सच भी तुम...
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मेरा सपना भी तुम और सच भी तुम..खुली आँखों के चमकते जुगनू भी तुम और बंद आँखों की पलकों का सुकून भी तुम ...जागती हुई आँखों के आगे का नज...
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